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नेहरू की इस तस्वीर का इसरो और एपीजे अब्दुल कलाम से संबंध जानते हैं?

इस तस्वीर में दिख रहे दोनो लोगों के स्नेह के पीछे बहुत कुछ है. नेहरू और साराभाई की आपसी जानपहचान, सहयोग, मित्रता या स्नेह से हिंदुस्तान को कई फायदे हुए हैं

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Aug 12, 2018 04:32 PM IST

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नेहरू की इस तस्वीर का इसरो और एपीजे अब्दुल कलाम से संबंध जानते हैं?

पंडित जवाहर लाल नेहरू की एक तस्वीर इंटरनेट पर बहुत शेयर होती है. इसमें वो एक लड़की के कंधे पर हाथ रखकर खड़े हैं. इस तस्वीर के ज़रिए भारत के पहले प्रधानमंत्री को कथित 'अय्याश' और 'रंगीनमिजाज़' बताया जाता है. ऐसे तमाम प्रपंच और प्रोपोगैंडा को फैलाने वाले ज़्यादातर लोग नहीं जानते हैं कि उस तस्वीर में नेहरू के साथ जो लड़की है वो कौन है? वो ये भी नहीं जानते हैं कि जिस महिला के कंधों पर चढ़कर वो नेहरू के चरित्रहनन में लगे हुए हैं, वो इस देश की तमाम उपलब्धियों की गवाह रही हैं.

नेहरू के साथ तस्वीर में मृणालिनी साराभाई हैं. मशहूर नृत्यांगना और प्रोफेसर विक्रम अंबालाल साराभाई की पत्नी. प्रोफेसर विक्रम साराभाई आधुनिक भारत की नींव के पत्थरों में से एक कहे जा सकते हैं. भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और इसरो को खड़ा करने में उनका सबसे बड़ा योगदान है. आईआईएम अहमदाबाद उन्हीं की देन है. इस तरह की तमाम चीज़ों, भारत के परमाणु कार्यक्रम के बीच भारत के लिए उनकी विरासत में हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम भी हैं. साराभाई ही वो जौहरी थे, जिन्होंने कलाम को न सिर्फ पहचाना बल्कि तराशकर इस देश के खजाने का अहम हिस्सा बनाया. नेहरू की उस तस्वीर और मृणालिनी साराभाई की कुछ चर्चा हम करेंगे लेकिन पहले बात विक्रम साराभाई की.

आज़ादी, नेहरू, भाभा और साराभाई

1947 में भारत आज़ाद हुआ और 1948 में नेहरू ने परमाणु ऊर्जा आयोग बनाया. इसके साथ ही डॉ. होमी जहांगीर भाभा को अपना वैज्ञानिक सलाहकार बनाया. भाभा परमाणु विज्ञान से जुड़े थे, उन्होंने 28 साल के साराभाई का नाम नेहरू  को सुझाया जो कैंब्रिज से पढ़कर भारत आया था और अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि रखता था. साराभाई ने अपने कारोबारी पिता की मदद से अहमदाबाद में फिज़िक्स रिसर्च लैब (PRL) की स्थापना की थी. भारत की आज़ादी के पहले दशक में साराभाई ने कई काम किए और कई कंपनियों और संस्थानों की शुरुआत की. इस सिलसिले में अहम मोड़ 1957 में आया. रूस ने अपना सैटेलाइट स्पूतनिक लॉन्च किया. डॉ साराभाई ने प्रधानमंत्री नेहरू से कहा कि भारत को भी अंतरिक्ष विज्ञान में कदम रखना चाहिए. देश भर से सवाल उठा कि भारत जैसे देश को अंतरिक्ष विज्ञान में पैसा लगाने की क्या ज़रूरत है?

प्रोफेसर साराभाई का जवाब था, 'हमारे सामने लक्ष्यों को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं है. आर्थिक रूप से समृद्ध देश चंद्रमा पर खोजबीन या दूसरे ग्रहों तक इंसानों को पहुंचाने जैसे अभियान चला सकते हैं लेकिन हमारी इन देशों से होड़ लगाने की कोई इच्छा नहीं है... लेकिन इस बात पर पक्का यकीन है कि अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है तो इंसान और समाज की समस्याओं को सुलझाने में आधुनिक तकनीक के उपयोग में किसी से पीछे नहीं रहना है.'

प्रोफेसर साराभाई को नेहरू और डॉ भाभा का पूरा सहयोग मिला. 1962 में केरल के थुम्बा में रॉकेट लॉन्च के लिए एक जगह चुनी गई. वहां एक समस्या थी. डॉ कलाम ने अपनी किताब इग्नाटेड माइंड्स में लिखा है कि जिस जगह को चुना गया वहां मैग्दालिन चर्च नाम का बहुत पुराना चर्च और बिशप का घर था. इसके चलते ज़मीन अधिग्रहण नहीं हो पा रहा था. साराभाई खुद बिशप से मिलने गए. बिशप डॉ पीटर बर्नाड पेररिया ने इतवार को चर्च में लोगों से कहा, 'धर्म की अगली सीढ़ी आध्यात्म है. आध्यात्म लोगों की तरक्की और उनके जीवन में शांति लाता है. प्रोफेसर विक्रम साराभाई भी यही काम करते हैं. उन्हें लोगों के जीवन में खुशहाली और शांति लाने के लिए हमारा चर्च और मेरा घर चाहिए, क्या हम उन्हें दे दें?' इसके बदले में लोगों ने 'आमेन' कहा.

1962 में नेहरू ने साराभाई को इन्सकॉपर की कमान सौंपी. 1969 में इन्सकॉपर का नाम ही इसरो हो गया. 1963 में थुंबा से पहला रॉकेट छोड़ा गया. ये रॉकेट अमेरिका में बना था. अगला लक्ष्य था भारत की ज़मीन से भारत में बना रॉकेट छोड़ना. 1967 में हिंदुस्तान ने अपना पहला रॉकेट रोहिणी अंतरिक्ष में भेजा. हालांकि उस समय तक नेहरू और भाभा दोनों ही इस सफलता को देखने के लिए इस दुनिया में नहीं थे.

अब्दुल कलाम आजाद के साथ विक्रम साराभाई.

अब्दुल कलाम के साथ विक्रम साराभाई

एक इंजीनियर में वैज्ञानिक की खोज

1961 में भारत ने एक होवरक्राफ्ट बनाया. एडीई (एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट) की लैब में रखे इस होवरक्राफ्ट 'नंदी' की सवारी करने कई बड़े लोग आते थे. एक दिन इस होवरक्राफ्ट के चीफ डिज़ाइन इंजीनियर मुंबई से आए एक शख्स को इसकी सवारी करवा रहे थे. शख्स ने उस इंजीनियर से कई सवाल पूछे मगर अपनी तरफ से कुछ नहीं बताया. अगले हफ्ते उस इंजीनियर यानी, कलाम को मुंबई आने का एक पत्र मिला. अपनी आत्मकथा में कलाम लिखते हैं कि टाटा इंस्टीट्यूट के चेयरमैन मेनन (वही दाढ़ी वाले शख्स) ने उन्हें मुंबई बुलाया था. वहां उनको प्रोफेसर साराभाई के सामने पेश किया गया. साराभाई ने कलाम से एक भी सवाल नहीं पूछा कि उन्हें क्या आता है. साराभाई ने कलाम से कई सवाल किए कि भविष्य में क्या-क्या किया जा सकता है. उसी शाम को कलाम का चयन इसरो (तब इनकॉस्पर) के लिए हो गया, जहां उन्हें भारत के पहले सैटेलाइट प्रक्षेपण की ज़िम्मेदारी मिली. कलाम ने बाद में अपने कई भाषणों में कहा कि वे किसी बहुत बड़े संस्थान या विदेशी विश्वविद्यालय से पढ़कर नहीं आए थे. ये प्रोफेसर साराभाई की पारखी नज़र थी जिसने भारत के लिए सबसे नायाब हीरा चुना.

नेहरू, साराभाई और वो तस्वीर

विक्रम साराभाई ने अपने को सिर्फ अंतरिक्ष विज्ञान तक सीमित नहीं रखा. भारत सरकार और हार्वर्ड के साथ मिलकर उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद की स्थापना की. उन्होंने खेल और कला के लिए भी कई काम किए. इन सब कामों में उन्हें सरकार और प्रधानमंत्री से हर तरह के सहयोग मिले. इन सहयोगों में कई बार निजी सहमति शामिल नहीं होती थी. मसलन साराभाई निजी तौर पर परमाणु हथियारों के पक्ष में नहीं थे लेकिन डॉ भाभा की मौत के बाद उन्होंने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी उठाई. इसी तरह नेहरू भारत में टीवी लाने के हिमायती नहीं थे. प्रोफेसर साराभाई को लगता था कि टेलीविजन आना चाहिए तो इस दिशा में उन्हें नेहरू से सहयोग मिला.

मृणालिनी और विक्रम साराभाई के विवाह की फोटो.

मृणालिनी और विक्रम साराभाई के विवाह की तस्वीर

इन सबके बीच साराभाई ने दर्पण अकादमी भी शुरू की. उनकी पत्नी मृणालिनी साराभाई ने शास्त्रीय नृत्यों को आगे बढ़ाने के लिए काम किया. इसी सिलसिले में दिल्ली में. पहला कथकली का कार्यक्रम भी किया. मृणालिनी की मां जवाहरलाल नेहरू की अच्छी मित्र थीं. नेहरू खुद युवा साराभाई को जानते थे और उनके प्रशंसक थे. मृणालिनी की दिल्ली में पहली प्रस्तुति के बाद नेहरू ने उनको बधाई दी. ठीक वैसे ही जैसे घर का कोई भी बड़ा अपनी अगली पीढ़ी से किसी को आगे बढ़ते देख खुश होता है. उस समय भी मृणालिनी न सिर्फ प्रोफेसर साराभाई की पत्नी थीं बल्कि कार्तिकेय साराभाई की मां भी थीं.

हो सकता है, ऐसी और भी तस्वीरें हों, हो सकता है कि ऐसी ही कोई तस्वीर विक्रम साराभाई और नेहरू की हो. कुछ भी हो लेकिन नेहरू , मृणालिनी और विक्रम साराभाई में से किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनकी इस तस्वीर से किसी का चरित्रहनन भी होगा. इस तस्वीर में दिख रहे दोनो लोगों के स्नेह के पीछे बहुत कुछ है. नेहरू और साराभाई की आपसी जानपहचान, सहयोग, मित्रता या स्नेह से हिंदुस्तान को कई फायदे हुए हैं. आईआईएम ने इस देश में अनगिनत रोजगार दिए, इसरो ने हमें गर्व करने के कई मौके दिए, टेलिविजन ने इस देश को बहुत कुछ दिया, और डॉ. कलाम पर तो गर्व करते हुए हम थकते नहीं हैं. मगर हमने इसके बदले में क्या किया. अगली बार जब विक्रम साराभाई की पत्नी या किसी और महिला की कोई तस्वीर 'रंगीनमिजाज़ी' और 'अय्याशी' जैसे कैप्शन के साथ दिखे तो थोड़ी शर्म कीजिएगा, उस समाज का हिस्सा होने के लिए जहां अपनी ही विरासत को मटियामेट करके हम गर्व महसूस करते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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