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पुण्यतिथि विशेष: राजनीति के अनूठे शिल्पकार हरकिशन सिंह सुरजीत

कॉमरेड सुरजीत ने कहा था, 'कुछ व्यक्ति विक्षिप्त होते हैं लेकिन कुछ सरकारें भी विक्षिप्त होती हैं.'

Updated On: Aug 01, 2017 08:29 AM IST

Badal Saroj

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पुण्यतिथि विशेष: राजनीति के अनूठे शिल्पकार हरकिशन सिंह सुरजीत

हरकिशन सिंह सुरजीत भारतीय राजनीति की एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने कोई दो दशक तक अपनी राजनीतिक पार्टी की शक्ति और प्रभाव की तुलना से कहीं अधिक देश की राजनीति को ढाला, प्रभावित किया.

ऐसा करते हुए उन्होंने दुनिया के हालात पर से भी नजर नहीं हटाई, बल्कि विश्व स्तर पर भी ऐसी भूमिका निभाई जिसकी भारतीय राजनीति में कोई दूसरी मिसाल नहीं है. वे भारतीय  राजनीति की एक विशेष नस्ल, अदभुत पीढ़ी के नुमाईंदे थे. यह वह पीढ़ी है जो भगत सिंह से प्रभावित होकर मार्क्स से आकर्षित हुई और कम्युनिस्ट बनी. सुरजीत ने यह राह किशोर आयु में ही चुन ली थी.

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता को दिए एक इंटरव्यू में कॉमरेड सुरजीत ने अपने शुरुआती राजनीतिक सफर का जिक्र कुछ इस तरह से किया है, 'कांग्रेस और अकाली नेताओं ने कलेक्ट्री पर तिरंगा झंडा फहराने का आह्वान किया मगर जैसे ही उन्हें मिलिट्री आने और 'देखते ही गोली मारने के आदेश' जारी होने की खबर लगी वैसे ही उन्होंने यह आह्वान वापस ले लिया. तब मैं कांग्रेस ऑफिस गया और कहा कि झंडा दो, मैं फहराऊंगा. कांग्रेसियों ने झंडा नहीं दिया तो मैंने ही झंडा उठा लिया.'

'मिलिट्री को खबर मिल गई थी कि कांग्रेस झंडा नहीं फहराएगी. जब मैं झंडा फहराने के लिए चढ़ा तो दो गोलियां चलीं. मुझे नहीं लगीं. कलेक्टर आमतौर से अंग्रेज हुआ करते थे मगर यहां महाराष्ट्रियन था. उसने देखा कि एक छोटा सा 15 साल का लड़का झंडा फहराने चढ़ रहा है. उसने गोली चलाने से रोकने का हुक्म दिया.

तिरंगा झंडा फहराने के बाद जब मुझे पकड़ा गया तो मजिस्ट्रेट ने सजा सुनाई 1 साल.'

मैंने कहा बस एक साल?

उसने कहा 4 साल!!

मैंने कहा बस चार साल?

उसने कहा: अब इससे ज्यादा इस कानून में हो नहीं सकती!!"

इसी अदालत में सुरजीत से जब उनका नाम पूछा गया था तो उन्होंने बताया था; लंदन तोड़ सिंह!

harkishan singh surjeet

[प्रकाश करात के साथ हरकिशन सिंह सुरजीत]
नेहरू की सभा आयोजन के लिए अपने खेत की फसल उजाड़ दी थी

इसी दौर में जब एक बार पंडित नेहरू की आमसभा के लिए जगह देने से प्रशासन ने इंकार कर दिया था तो सुरजीत और उनके पिता ने अपनी सारी खड़ी फसल उजाड़ कर खेत को ही सभा के मैदान में बदल दिया था.

देश की आजादी और एकता से अटूट प्रेम और साम्राज्यवाद तथा सांप्रदायिकता-फूटपरस्ती से बेहिसाब घृणा और इन दोनों से समझौताहीन संघर्ष की जिस घुट्टी की खुराक उन्होंने 15 वर्ष की आयु में पी थी, वह जीवन की आखिरी सांस तक उनकी राजनीति की दिशासूचक सूइयां बनी रहीं. तीसरी दुनिया के देशों की राजनीति में बहुत ही विरल है इस प्रकार की निडर प्रतिबद्धता, सुरजीत इसका प्रतीक थे.

पंजाब के गरीब किसान परिवार में जन्मे इस छोटे से दिखने, लेकिन हमेशा तनकर चलने वाले व्यक्तित्व ने अपने जीवन में जो योगदान किए, जिनका वे हिस्सा बने, वे अनगिनत हैं. एक जीवनकाल के लिए कुछ ज्यादा ही हैं.

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क्यूबा तक पहुंचाया था अनाज

अमेरिका जब क्यूबा को भूखा मारने पर आमादा था, तब यह सुरजीत की हिम्मत और मेहनत थी जिसके चलते भारत के किसानों ने 10 हजार टन अनाज और न जाने कितने टन दूसरी सामग्री से भरे पानी के जहाज भर कर क्यूबा पहुंचा दिए, इन्हें रोकने की हिम्मत क्यूबा की नाकेबंदी किए बैठे अमेरिका की भी नहीं हुई.

1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद जब यूरोप और दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में विभ्रम फैला था तब यह सुरजीत की अगुवाई वाली सीपीएम थी जिसने बाकायदा वैचारिक संदर्भों और तथ्यों के साथ इस घटना का तर्कसंगत विश्लेषण प्रस्तुत किया था. मार्क्सवाद की प्रासंगिकता को सिद्ध किया था. साफ किया था कि यह विचार की हार नहीं है उसके अनुचित तरीके से व्यवहार का दुष्परिणाम है. दुनिया की तमाम कम्युनिस्ट पार्टियों को इकट्ठा करके एक तरह से हौसला और दिशा दोनों ही देने की कोशिश की थी.

1989 में वी पी सिंह सरकार में शामिल होने के लिए सूची हाथ में लिए बैठी बीजेपी की सूची सुरजीत की एक टिप्पणी के बाद हाथ में ही रह गई जब उन्होंने कहा कि सरकार जनता दल बनाए बाकी उसे बाहर से समर्थन करें.

harkisan singh surjeet

हरकिशन सिंह सुरजीत

उनके खिलाफ सभी राष्ट्रीय एकता विरोधी ताकतें एकमत थी

इसके बाद तो सुरजीत बीजेपी और आरएसएस की नफरती सूची के शिखर पर आ गए थे. सुरजीत की चिढ़ बीजेपी भर से नहीं थी. सुरजीत ऐसे भारतीय राजनेता थे जिनके खिलाफ हर रंग की सांप्रदायिक और राष्ट्रीय एकता विरोधी ताकतें एकमत थी. पंजाब को झुलसा देने वाले खालिस्तानी आंदोलन और सिख -कट्टरपंथ के खिलाफ सुरजीत ने सिर्फ सियासी नहीं मैदानी मोर्चा भी लिया था.

इसके चलते वे आतंकियों की हिटलिस्ट में भी सबसे ऊपर रहे. उनके साथ यही सलूक कश्मीर के पृथकतावादी संगठनों से लेकर असम के इसी तरह के आंदोलन छेड़नेवालों ने किया. लेकिन सुरजीत सारे जोखिम उठाकर राष्ट्रीय एकता की कायमी की दिशा में आगे बढ़ रहे.

शाहबानो प्रकरण में उभरा कठमुल्लावाद हो या अयोध्या ध्वंस में प्रदर्शित हुआ हिंदुत्ववादी आतंक, वे मजबूती से राष्ट्रीय अखंडता और कौमी एकता की हिमायत में खड़े हुए. आजादी की लड़ाई के सेनानी होने और एक समर्पित कम्युनिस्ट होने के नाते उनकी चिढ़ हर उस विचार या फिरके या पार्टी से थी जो देश की एकता या अखंडता को नुकसान पहुंचाता हो.

जब ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्लाह खोमैनी ने सलमान रश्दी के खिलाफ मौत की सुपारी दी थी, जिसे कुछ लोग फतवा कहते थे, तब कॉमरेड सुरजीत ने कहा था, 'कुछ व्यक्ति विक्षिप्त होते हैं लेकिन कुछ सरकारें भी विक्षिप्त होती हैं.' लगता है इन दिनों उनकी यह टिप्पणी लौट फिर कर भारत आ गई है.

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हरकिशन सिंह सुरजीत

[सीताराम येचुरी के साथ हरकिशन सिंह सुरजीत]
 स्कूली शिक्षा तक पूरी न कर पाए लेकिन अनेकों किताबें लिखी

वे हमेशा जल्दी में रहते थे. एक भी पल जाया नहीं करते थे, उनकी सेन्स ऑफ टाइमिंग गजब की थी. घनघोर व्यस्तताओं के बावजूद वे लिखने पढ़ने का समय निकाल ही लेते थे. वे अच्छे लेखक होने के साथ ही साहित्यानुरागी और कला पारखी दोनों थे. 'दुःखी दुनिया' 'चिंगारी' जैसे पत्र-पत्रिकाओं, लोकलहर पंजाबी और हिंदी दोनों के वे सम्पादक रहे.

स्कूली शिक्षा तक पूरी न कर पाने वाले सुरजीत ने अनेकों किताबें लिखी है जिनमें भारतीय कृषि संकट सहित अनेकों विषयों को समेटा गया है. भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के 26 खंडों के दस्तावेजों की उनकी भूमिकाएं एक तरह से देश-दुनिया के इतिहास का गुटका संस्करण हैं.

वे एक खांटी स्टेट्समैन थे, कभी भी किसी के भी साथ उन्होंने संवादहीनता नहीं पनपने दी, कभी भाषा और आलोचना का स्तर नीचा नहीं किया. 1989 में इन पंक्तियों के लेखक के लोकसभा चुनाव प्रचार में कॉमरेड सुरजीत ग्वालियर आए थे. उनकी सभा के ठीक पहले सामने के मंच से अटल बिहारी वाजपेयी सभा करके गए थे. सुरजीत ने अपने भाषण में उनका जिक्र करते हुए अपने पंजाबी लहजे में कहा, 'अभी उधर वाजपेयी भाषण देकर गए हैं, आदमी अच्छा है, सोहबत खराब है.'

अपने विचार और पार्टी के प्रति सुरजीत की प्रतिबध्दता पूर्ण थी. वे सिर्फ 1996 में ही अल्पमत में नहीं थे. कई और मौकों पर भी उनकी राय पार्टी में नहीं मानी किंतु वे अपनी राय के साथ नहीं पार्टी के फैसले के साथ खड़े हुए. राष्ट्रीय राजनीति के इस अनूठे शिल्पकार के योगदान को लेकर कुछ उन्हीं के सहविचारी यह सवाल उठाते हैं कि 'इस सबसे आंदोलन का क्या विस्तार हुआ?'

लगता है उनका मानना यह है कि देश के राजनीतिक माहौल को जनवादी सामाजिक गतिविधियों के अनुकूल और हमवार बनाने के साथ साथ सुरजीत को ही गांव-गांव, फैक्ट्री-फैक्ट्री जाकर आंदोलन और संगठन बनाने का काम भी करना चाहिए था.

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harkishan singh surjeet

[प्रकाश करात, हरकिशन सिंह सुरजीत, सीताराम येचुरी]
हरकिशन सिंह सुरजीत उत्प्रेरक 'कैटेलिस्ट' थे

हरकिशन सिंह सुरजीत, केमिस्ट्री की भाषा में कहें तो एक ऐसे उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) थे जिन्होंने अपनी उपस्थिति और हस्तक्षेप भर से ऐसे गुणात्मक राजनीतिक बदलाव ला दिए जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. मिथकीय प्रतीकों में कहें तो वे भारतीय राजनीति के ऐसे भीष्म पितामह थे, जो कभी कौरवों के साथ नहीं खड़े हुए.

एक ऐसे एकलव्य थे जिसने शोषकों के कहने पर अंगूठा कटाया नहीं बल्कि हमेशा उन्हें दिखाया. एक ऐसे चाणक्य हैं, जिसने किसी के राज्याभिषेक के लिए नहीं अवाम को ताकत बख्शने के लिए अपना सर्वस्व झोंक दिया.

( लेखक सीपीआई (एम) केंद्रीय समिति सदस्य हैं. )

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