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इलाहाबाद नहीं प्रयागराज? नाम बदला तो कई नाम बदल जाएंगे

अगर बदलना ही है तो हमारे देश में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बरसों से बदलने की राह देख रही हैं

Updated On: May 26, 2018 11:41 AM IST

Nazim Naqvi

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इलाहाबाद नहीं प्रयागराज? नाम बदला तो कई नाम बदल जाएंगे

जबसे ये खबर आम हुई है कि उत्तर प्रदेश सरकार और वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह फैसला कर लिया है कि अगले वर्ष कुंभ मेले के आरम्भ (15 जनवरी) से पहले इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया जाएगा, तबसे हर इलाहाबादी बेचैन है.

इलाहाबाद का एक नाम ‘इलावास’ भी है जो मनु की पुत्री का नाम था. और फिर इतिहास में यह भी दर्ज है कि सोलहवीं सदी की चौथी दहाई में मुग़ल बादशाह अकबर ने इसे इलाहाबाद का नाम दिया. उसके बाद से लेकर आजतक यानी पिछले करीब 480 वर्षों से यह शहर इलाहाबाद के नाम से ही जाना-पहचाना जा रहा है.

प्राचीन नाम है प्रयागराज

इलाहाबाद का प्राचीन नाम ‘प्रयाग’ है. इसे तीर्थराज भी कहते हैं, जिसका मतलब इसके नाम से ही जाहिर है कि यह देश के सारे तीर्थ-स्थलों में सबसे श्रेष्ठ है. इसे त्रिवेणी भी कहा जाता है क्योंकि यही वह स्थान है जहां गंगा-यमुना और सरस्वती आकर मिलती हैं. सरस्वती के दर्शन अब नहीं होते क्योंकि वह लुप्त हो चुकी है लेकिन यहां की आबो-हवा में हरदम सरस्वती के दर्शन किए जा सकते हैं.

सरस्वती हमारे देश में ज्ञान की देवी हैं. इसीलिए इलाहाबाद की आबो-हवा में पलकर हजारों-लाखों लोगों ने ज्ञान की साधना की है. कुछ बड़े नाम गिना सकूं तो महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला’, फ़िराक गोरखपुरी जैसे लोग इसी इलाहाबाद की संस्कृति में पले-बढ़े और लोकप्रिय हुए, इनमें से किसी की पैदाइश यहां की नहीं है. कोई गोरखपुर से भटकता हुआ यहां पहुंचा तो कोई उन्नाव की मिटटी का था तो किसी का सम्बंध फर्रूखाबाद से रहा. यह सब इस शहर के बाशिंदे नहीं थे. ये यहाँ आये और माँ सरस्वती ने इन्हें अपना आशीर्वाद दिया.

क्या अकबर इलाहाबादी का नाम भी बदल जाएगा?

लेकिन एक बड़ी मशहूर शख्सियत और भी है जो इलाहाबाद की ही मिटटी से पैदा हुई और उसे भी ज्ञान का आशीर्वाद मिला. इस शख्सियत का नाम था 'अकबर इलाहाबादी’. यह वह नाम है जो इलाहाबाद के नाम में चार चांद लगाता है और इलाहाबाद भी इस नाम को अपने सीने से लगाता है.

आज जब मेरे अज़ीज़ दोस्त यश मालवीय का फोन आया तो जाहिर सी बात है इस नए नामकारण का जिक्र भी चला. यश कहने लगे यार ये बताओ अगर इलाहाबाद का नाम बदल गया तो क्या अकबर इलाहाबादी का नाम भी बदला जाएगा. और बातों ही बातों में हमने उनका नाम '’अकबर प्रयागराजी’ कर दिया. इस बातचीत का अंत इस घोषणा के साथ हुआ कि अगर शहर का नाम बदल भी जाए तो भी अकबर के नाम के साथ इलाहाबाद हमेशा-हमेशा जिंदा रहेगा.

अकबर और इलाहाबाद इस तरह एक दूसरे से जुड़े हुए थे कि जिन्हें जुदा किया ही नहीं जा सकता. जैसे आजकल आमों का मौसम है इसी मौसम के हवाले से उनका एक बहुत मशहूर किस्सा मशहूर है. आमों की फसल में उन्होंने अपने एक दोस्त को एक ख़त लिखकर आम भेजने की फरमाइश की. जाहिर है कि इस फरमाइश को भी शायरी में पिरोया गया था. वह लिखते हैं:

नामा न कोई यार का पैगाम भेजिए,

इस फस्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए,

मालूम ही है आपको बंदे का ऐडरेस,

सीधे इलाहाबाद मेरे नाम भेजिए....

जी हां, ये सच है कि अकबर इलाहाबादी अपने जमाने में इतने मशहूर थे कि ख़त पर पते की जगह सिर्फ उनका नाम ही काफी था. खुद अकबर इलाहाबादी भी अपनी इस लोकप्रियता को जानते थे इसीलिए उन्होंने अपने एक और शेर में इसका इजहार यूं किया है:

कुछ इलाहाबाद में सामां (वस्तु) नहीं बहबूद (खुशहाली) के

यां धरा क्या है बा-जुज़ (सिवाय) अकबर के और अमरूद के

और इलाहाबादी अमरूद का क्या?

इलाहाबादी बड़े फख्र के साथ कहते हैं कि 'आपने अमरूद तो बहुत सी जगहों के खाए होंगे लेकिन जनाब हमारे इलाहाबादी 'सुर्खे’ की बात ही कुछ और है. यहां के अमरुद दुनियाभर में पसंद किए जाते हैं. यहां का सुर्ख, सफेदा, लंगड़ा (अमरुद की किस्में) ख़ास तौर पर गिने जा सकते हैं. नवंबर-दिसंबर से लेकर फ़रवरी-मार्च तक इलाहाबाद आने वालों का स्वागत यह अमरूद मुस्कुराकर करते हैं. यहां के खुसरोबाग, घंटाघर, पत्थर गिरजाघर, मेडिकल चौराहा, एजी ऑफिस और फाफामऊ में फुटपाथ इन्हीं अमरूदों से लदे नज़र आते हैं.

इलाहाबादी अमरूद

इलाहाबादी अमरूद

ज़रा सोचिये कि नाम बदलने की यह चाहत होती ही क्यों है लोगों में? जब इसे प्रयाग कहा जाता था, जो प्राचीन ग्रंथों में मौजूद भी है, तो फिर इसे इलावास क्यों किया गया, और फिर इलावास को इलाहाबाद क्यों किया गया? और अब जब पिछले 480 वर्षों से यह इलाहाबाद के नाम से जाना जाता रहा है तो फिर इसका नाम बदलने की जरूरत क्यों आ पड़ी है? तो क्या इसके बाद लखनऊ का नाम फिर लखनपुर किया जाएगा? यह ऐसे सवाल हैं जो मन में उठते ही हैं. और हां, एक सवाल और. इलाहाबादी अमरूद को फिर क्या कहेंगे?

सोचिए जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, जैसे कि अकबर इलाहाबादी, अगर उनसे कोई पूछे तो शायद वो यह कहेंगे:

नाज़ क्या इसपे कि बदला है ज़माने ने तुम्हें,

मर्द वो हैं जो जमाने को बदल देते हैं...

हो सकता है कि ‘शाद आरफी’ की आत्मा भी यह कह उठे:

कहीं फितरत बदल सकती है नामों के बदलने से,

जनाबे-शेख को मैं बरहमन कह दूँ तो क्या होगा...

हो सकता है यह सुनकर ‘बद्र-ए-आलम खलिश’ की आत्मा अपना वही शेर फिर सुना दे:

शहर क्या दुनिया बदल कर देख लो,

फिर कहोगे हम तो अब उकता गए...

और इन सबको सुनकर जौनपुर में अपनी कब्र में लेटे ‘वामिक जौनपुरी’ बोल उठेंगे:

बदलती रहती हैं क़द्रें (मान्यताएं) रहील-ए-वक़्त (समय-चक्र) के साथ,

ज़माना बदलेगा हर शय (चीज़) का नाम बदलेगा...

यह तो उनके एहसासात हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन इस नाम बदलने की खबर के बाद से हर इलाहाबादी के होठों पर जैसे अब्दुल्लाह जावेद का ये शेर ठहर गया हो:

दरो दीवार के बदलेंगे चेहरे,

खुद अपना घर पराया घर लगेगा...

नाम बदलने की जगह ये सब क्यों नहीं बदलते?

वैसे प्रयागराज नाम से इस शहर के पास एक रेलवे-स्टेशन आज भी मौजूद है. फिर भी यह लेखक अपने तमाम इलाहाबादी दोस्तों के साथ, नाम खो देने के उनके भय में उनके साथ शामिल है. लेकिन वह उनके साथ भी रहना चाहता है जो इलाहाबाद को उसका पुराना नाम दिलाना चाहते हैं. क्यों नहीं मिलना चाहिए इलाहाबाद को उसका पुराना नाम. जब पहले बदला था तो फिर क्यों नहीं बदला जा सकता है.

हां, दुःख है तो बस इस नामकरण की टाइमिंग का. जिसकी चाबी सियासी हाथों में है. अगर बदलना ही है तो हमारे देश में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बरसों से बदलने की राह देख रही हैं. यह वह हैं जिनका बदलना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. जैसे कि गरीबी को बदलना, बेरोज़गारी के हालात को बदलना, शिक्षा के घटते स्तर को बदलना. इलाहाबाद कुछ वर्ष और इलाहाबाद रहेगा तो कोई तूफ़ान नहीं आ जाएगा लेकिन गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का यही हाल रहा तो हर अगला दिन पहले से ज्यादा अंधेरा लेकर आएगा.

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