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आखिर पीलीभीत कैसे बन गया आदमखोर बाघों का अड्डा?

पीलीभीत में 2017 में अब तक बाघ के हमलों में 15 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में लोगों में आदमखोर का खौफ होना लाजमी है

Subhesh Sharma Updated On: Sep 26, 2017 03:28 PM IST

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आखिर पीलीभीत कैसे बन गया आदमखोर बाघों का अड्डा?

बाघ और इंसानों के बीच की लड़ाई कई सौ सालों से चली आ रही है. एक समय था, जब लोगों में बाघ का डर इस कदर था कि सूरज ढलने के बाद लोग अपने घरों से नहीं निकलते थे. लेकिन इसके बाद वो दौर आया जिसने बाघों का दुनिया से लगभग सफाया ही कर दिया. शानो-शौकत के लिए बाघों का अंधाधुंध शिकार किया गया. आदमखोर तो छोड़िए जंगलों में बाघों की खबर ही मिलनी बंद हो गई. हालांकि प्रोजेक्ट टाइगर, एनटीसीए और वन विभाग के प्रयासों के बाद बाघ एक बार फिर भारत के जंगलों में फल-फूल रहे हैं.

लेकिन आदमखोर का खौफ एक बार फिर लौट आया है. आज फिर लोग शाम होते ही अपने घरों से निकलने में हिचक रहे हैं. आलम ये है कि लोग अपने खेतों में काम तक करने नहीं जा रहे हैं. लकड़ियां जुटाने जंगल की ओर जाने में कतरा रहे हैं. उन्हें डर है कि कोई उन पर हर समय नजर बनाए हुए है. कोई है जो जरा सी भी बेफिक्र होते ही उन्हें अपना शिकार बना लेगा. लेकिन बाघ को आदमखोर बताकर दोषी करार देना भी ठीक नहीं है. ज्यादातर मामलों में यही सामने आता है कि एक बाघ किसी न किसी मजबूरी में ही आदमखोर बनता है. अधिकतर मामलों में वही बाघ इंसानों का शिकार करता है, जो बूढ़ा हो या फिर चोटिल हो.

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में आजकल जो कुछ भी चल रहा है, वो कहीं से भी सामान्य नहीं लगता. यहां के लोगों में नरभक्षी बाघ का खौफ है. 21वीं सदी में आदमखोर बाघ की कहानियां सुनने में जरूर अजीब लगती है. लेकिन पीलीभीत में 2017 में अब तक 15 लोगों की मौत होने के बाद, लोगों में ये खौफ होना लाजमी है. लाख कोशिशों के बाद भी प्रशासन बाघ को पकड़ नहीं पा रहा है. बताया जा रहा है कि पिछले एक हफ्ते में ही एक बाघ ने चार लोगों की जान ली है. जिसके बाद वन विभाग और प्रशासन पर उसे पकड़ने का दबाव काफी बढ़ गया है.

कुछ ऐसा है पीलीभीत का माहौल

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पैदल तो छोड़िए बाघ बाइक सवार को भी नहीं छोड़ रहे. हाल ही में गजरौला थाना इलाके के हटूआ गांव में बाइक पर अपनी पत्नी और बच्चे के साथ लौट रहे गोदनलान पर बाघ ने हमला कर दिया. बाघ की दहशत से अनियंत्रित होकर बाइक गिर गई. बाघ जब तक दूसरे हमले के लिए तैयार होता तब तक वहां से गुजर रही चार पहिया वाहन को देखकर वह जंगल की ओर भाग गया. हालांकि डीएफओ कैलाश प्रकाश ने इस मामले पर कहा कि बाघ के दहशत में बाइक नीचे गिरने से पीछे बैठी महिला घायल हुई है. ऐसा नहीं है कि हमले एक ही जगह हो रहे हों. कुछ हमलों में तो दूरी 60 किलोमीटर तक की है.

ऐसा नहीं है कि मामले को लेकर सरकार और प्रशासन गंभीर नहीं है. बाघ की तलाश में लखनऊ जू, वन विभाग, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) के करीब 100 लोग लगे हुए हैं. जगह-जगह कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं, हाथियों पर बैठ कर भी बाघ की तलाश की जा रही है. लेकिन इस शातिर शिकारी का कोई पता नहीं चल पा रहा है. खुद सीएम योगी आदित्यनाथ तक ने पीलीभीत का दौरा कर अधिकारियों को मैन-ईटर को जल्द से जल्द पकड़ने के आदेश दिए हैं.

प्रशासन के लगातार नाकाम होने के कारण लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है. कहीं ऐसा न हो जाए कि वन विभाग से पहले लोग ही बाघ को पकड़ लें. और खुद ही उसका इंसाफ कर दे. अगर ऐसा होता है तो इसमें किसी बेगुनाह बाघ के भी मारे जाने का उतना ही खतरा है, जितना कि एक नरभक्षी की जान को है.

जानवर को नहीं पता जंगल और खेत में फर्क

पीलीभीत में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है. लेकिन चिंता वाली बात ये है कि कई जगहों पर जंगल और गन्ने के खेत के बीच में फर्क लगा पाना मुश्किल है. क्योंकि छह इंच चौड़ी पगडंडी के एक तरफ जंगल है और एक तरफ गन्ने के खेत. टाइगर और उसके शिकार के लिए जंगल और खेत दोनों एक समान है. पीलीभीत में जिस बाघ ने हाल ही में चार लोगों की जान ली है, उसने उन्हें खेतों में ही मारा है. नीलगाय, हिरण, वाइल्ड बोर जैसे जानवर अक्सर खेतों में आ जाते हैं. और इन्हीं के पीछे बाघ भी चले आते हैं. इस कारण खेत में काम कर रहे इंसान और शिकार की तलाश में निकले बाघ का एक दूसरे से सामना हो जाता है.

पीटीआर में कॉरिडोर्स की कमी भी बाघ और इनसान के बीच बढ़ते विवाद की एक बड़ी वजह है. कॉरिडोर्स न होने के कारण जानवरों को इंसानी बस्ती से होकर गुजरना पड़ता है. प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (PCCF) रूपक डे ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा, कॉरिडोर्स के अलावा, हैबिटैट इसके पीछे की मुख्य वजह है. जानवर जंगल और गन्ने के खेत में फर्क नहीं पहचानता. उसके लिए ये दोनों एक समान है. एक और वजह है यहां की बाउंड्री. खेत और जंगल के बीच में बाउंड्री नहीं है, जो जंगल और खेत को एक दूसरे से अलग कर सके. मीलों-मील लंबी बाउंड्री है. जिसे बना पाना नामुमकिन है.

क्या कर रहे हैं हमलों को रोकने के लिए

पीसीसीएफ मेन रूपक डे ने बताया कि हम मैन ईटर को पकड़ने के लिए हम ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, ट्रैप लगाए गए हैं, हाथियों की मदद से तलाश कर रहे हैं और हमारे लोग भी जमीन पर मैन ईटर की तलाश कर रहे हैं.

लेकिन अगर आपके इलाके में मैन-ईटर है तो लोगों का जमीन पर चलना कहीं से भी सुरक्षित नहीं है.

जमीनी हकीकत जानना जरूरी है

उन्होंने बताया कि जमीनी हकीकत कुछ और है, वो एसी रूम में बैठ कर टाइगर कंजर्वेशन के बारे में चर्चा करने से एक दम परे हैं. हम चाहते हैं कि बाघों बचाव में जुटे लोग यहां आए और जमीनी हकीकत जानें. मैं चाहता हूं लोग यहां आए और कम से कम उस जगह का जायजा लें. जहां मैन-ईटर ऑपरेट कर रहा है. लेकिन लोग जमीनी स्तर नहीं जानना चाहते, वो अपने मिट्टी और कीचड़ में अपने कपड़े गंदे करना नहीं चाहते. टाइगर को कैमरा ट्रैप में कैद करने में कई-कई दिन लग जाते हैं. एक फोटो नहीं मिलती है. फिर सोचिए मैन-ईटर को पकड़ना कितना मुश्किल होता होगा. हमारी टीम ने बेमिसाल काम किया है.

नए रिजर्व बनाने से पहले पहले पुरानी दिक्कतों को सुलझाना होगा

सरकार बाघों को बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा टाइगर रिजर्व्स बनाने की दिशा में काम कर रही है. यूपी में फिलहाल पीटीआर, दुधवा और अमनगढ़ समेत तीन टाइगर रिजर्व्स हैं. वहीं राज्य को सुहेलवा के रूप में नया टाइगर रिजर्व मिलने वाला है. एनटीसीए ने कुछ समय पहले सुहेलवा वाइल्डलाइफ सेंचुरी को टाइगर रिजर्व में तब्दील करने का सुझाव दिया था. वहीं यूपी सरकार अब एनटीसीए के इस फैसले पर अमल करने के बारे में मन बना चुकी है. सुहेलवा के बाद बांदा में रानीपुर वाइल्डलाइफ सेंचुरी को टाइगर रिजर्व के बनाने पर विचार किया जाएगा.

corbett tiger

बाघों के लिए सुरक्षित स्थानों के बढ़ने से उनकी आबादी बढे़गी. खतरे में पड़ी इस प्रजाति को बचाने के लिए ये एक अच्छी पहल है. लेकिन उनकी आबादी बढ़ने के साथ-साथ मैन-ह्यूमन कॉन्फ्लिक्ट भी बढ़ेंगे. ऐसे में नए टाइगर रिजर्व बनाने से पहले पुरानी दिक्कतों को सुलझाना जरूरी है. पीलीभीत में बिगड़ते हालात आने वाले टाइगर प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर डालेंगे. ऐसे में इस समस्या का ठोस समाधान निकालना अहम है. इसके लिए हमें जानवरों को समझना होगा. पर्यावरण को बचाने में उनकी क्या भूमिका है, उसे समझना होगा. तभी जाकर हमारे जल-जंगल फिर से चहक संकेंगे. जिस दिन भारत से बाघ खत्म हो जाएंगे, उस दिन इस महान देश से जंगल भी खत्म हो जाएंगे.

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