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बाबा अलाउद्दीन खां, पुण्यतिथि विशेष : ऐसा उस्ताद जिसने शागिर्दी के लिए लगाई थी जान की बाजी

बाबा अलाउद्दीन खां की जिंदगी अनुशासन, सादगी और गुरु को पाने की कहानी है.

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Sep 06, 2017 10:33 AM IST

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बाबा अलाउद्दीन खां, पुण्यतिथि विशेष : ऐसा उस्ताद जिसने शागिर्दी के लिए लगाई थी जान की बाजी

गुरु की तलाश में कोई किस हद तक जा सकता है? अंदाजा लगाने की कोशिश कीजिए. अंदाजा लगाने की कोशिश के बाद बाबा अलाउद्दीन खां के जीवन पर एक नजर घुमाइए.

शायद आपको इस तरह की कोशिशों का अंदाजा न रहा हो. वाकई, बीसवीं सदी के इस महान संगीतज्ञ के लिए गुरु ऐसा शब्द रहा, जिसके बगैर उनका जीवन या उनका संगीत पूरा नहीं हो सकता था.

खां साहब के इंतकाल को करीब 45 बरस होने को आए. लेकिन संगीत से जुड़े लोग मरते कहां हैं. वो तो फिजां में सरगम की तरह गूंजते हैं.

गुरु खोजने के लिए छोड़ा घर

हम सब जानते ही हैं कि खां साहब के सुपुत्र सरोद सम्राट अली अकबर खां और बेटी अन्नपूर्णा देवी हैं. पंडित रवि शंकर से लेकर पन्नालाल घोष, शरण रानी और तमाम बड़े संगीतज्ञ उन्हें अपना गुरु मानते रहे. मैहर घराने के आधुनिक स्वरूप की आधारशिला खां साहब ने ही रखी थी.

लेकिन इतने महान लोगों के गुरु ने अपने गुरु के लिए क्या किया, इसे जानना बेहद दिलचस्प है. उनके जन्म को लेकर एकराय नहीं है. कुछ किताबों और लेखों के आधार पर इसे 1862 माना जाता है.

परिवार चाहता था कि बाबा पढ़ें भी और संगीत भी सीखें. लेकिन उन्हें पढ़ने में कोई रुचि नहीं थीं. आठ साल की उम्र में उन्होंने बिना किसी को बताए घर छोड़ दिया. गुरु की तलाश थी उनको.

पास के गांव चले गए, वहां संगीतकारों की टोली का हिस्सा हो गए, जो जगह-जगह जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करती थी. वहां उन्होंने खुद को अनाथ बताया. इन्हीं के साथ रहकर उन्होंने ढोल, तबला, पखावज सीखा. शहनाई बजाना भी आ गया.

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ऑर्केस्ट्रा पार्टी में बजाया तबला और सीखी वॉयलिन

उसके बाद उन्होंने बांग्ला गायक नुलो गोपाल से तालीम ली. उन्होंने वहां झूठ बोला और कहा कि वो हिंदू हैं. झूठ बोलने की सिर्फ एक वजह थी. बाबा को लगता था हिंदू बनकर वो अपने गुरु के ज्यादा करीब होंगे.

नुलो गोपाल की मौत के बाद आजीविका के लिए कलकत्ता में स्टार थिएटर में तबला बजाने लगे. पैसे होते नहीं थे, तो एक वक्त ही खाना खाते थे. वॉयलिन सीखा, ताकि ऑर्केस्ट्रा पार्टी का हिस्सा बन सकें. इससे कुछ और पैसे आ सकें.

जिन ऑर्केस्ट्रा पार्टी का बाबा हिस्सा बनते थे, उनके आयोजक थे हाबू दत्त. जानते हैं कि हाबू दत्त कौन थे? वो स्वामी विवेकानंद के भाई थे. हाबू दत्त ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों तरह के संगीत सीखे थे. उनसे प्रेरित होकर बाबा ने मैहर बैंड की स्थापना की.

जिंदगी चलती रही. इसी के साथ गुरु ढूंढने का सिलसिला भी जारी रहा. बाबा अलाउद्दीन खां पूर्वी बंगाल गए. वहां राजा जगत किशोर के दरबार में उस्ताद अहमद अली को सुना. उनके शिष्य बन गए.

सब कुछ छोड़कर सरोद बजाना शुरू कर दिया. वहां से दोनों रामपुर आए. रामपुर दरबार में वजीर खां साहब थे, जो बीनकार घराने से ताल्लुक रखते थे. बीनकार घराना यानी तानसेन घराने से उनका ताल्लुक था. वो नवाब के गुरु थे.

बाबा ने तय किया कि इनसे सीखना ही है. वो वजीर साहब से मिलने गए. लेकिन भिखारी जैसे कपड़े पहनने की वजह से बाबा अलाउद्दीन को अंदर नहीं जाने दिया गया.

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शागिर्दी न पाने पर दी थी आत्महत्या की धमकी

उन्होंने तय किया कि सीखकर रहेंगे. नहीं सीख पाए, तो आत्महत्या कर लेंगे. इस बीच उन्हें एक मौलाना मिले. उन्होंने बाबा की तरफ से उर्दू में एक चिट्ठी वजीर खां साहब को लिखी. इसमें लिखा कि या तो उन्हें शिष्य बना लें, वरना वो जान दे देंगे. अब चिट्ठी दी कैसे जाए?

एक रोज नवाब का काफिला निकल रहा था. बाबा काफिले के सामने लेट गए. पुलिस ने हटाया और नवाब के सामने पेश किया. नवाब ने कहानी सुनी. प्रभावित हुए और उन्हें अपने दरबार में बुला लिया.

वहां बाबा ने सरोद और वायलिन बजाया. नवाब ने पूछा कुछ और बजा सकते हो. बाबा का जवाब था कि दरबार में जो भी वाद्य यंत्र हैं, वो सब बजा सकते हैं. सब मंगाए गए. एक के बाद एक उन्होंने सारे वाद्य यंत्र बजाए.

नवाब ने उन्हें वजीर खां साहब के पास भेजा. बाबा की तरफ से वजीर खां साहब को प्लेट में तमाम उपहार भी भेजे गए. वजीर खां ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया.

अगर आपको लग रहा हो कि कहानी यहीं थम गई, तो ऐसा नहीं है. इस दौरान बाबा अपने घर जाने लगे थे. घर गए, तो उनकी शादी करा दी गई, ताकि वो वहीं रहें. लेकिन बाबा वापस आ गए. दोबारा घर गए, तो दोबारा शादी करवा दी. लेकिन वो फिर भाग आए.

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संगीत सीखने के जुनून में बोला था झूठ

वजीर खां को भी उन्होंने यही बताया था कि वो अनाथ हैं. इस दौरान उनकी दूसरी पत्नी ने आत्महत्या की कोशिश की. घर से टेलीग्राम आया कि वो बहुत बीमार हैं. टेलीग्राम अंग्रेजी में था.

वजीर खां साहब ने पढ़ा. वो नाराज हुए, क्योंकि बाबा ने बताया था कि परिवार है ही नहीं. बाबा को तलब किया गया. बाबा ने सारी कहानी सुनाई. वजीर खां संगीत से उनके प्रेम को लेकर बहुत प्रभावित हुए. इसके बाद वजीर खां उन्हें अपना सबसे प्रमुख शिष्य मानने लगे.

इन कहानियों को इस तरह भी लिया जा सकता है कि बाबा ने अपने गुरुओं से झूठ बोला. लेकिन इस तरह भी कि संगीत सीखने का कैसा जुनून था. जुनून बचपन से था.

'नींद' हराम थी बाबा के लिए

बालक अलाउद्दीन के लिए मानो ‘सोना’ या ‘नींद’ जैसा शब्द था ही नहीं. नींद को सबसे बड़ी दुश्मन मानते थे. बाल बड़े कर लिए थे, ताकि उसे छत के हैंगर या खूंटी से बांध सके.

उससे होता यह था कि अगर नींद का झोंका या झपकी आती थी, तो बाल खिंचते थे. बाल खिंचते ही आंख खुलती थी और हल्के पड़ रहे हाथ फिर अभ्यास में लग जाते थे. ये किसी एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने का रुटीन नहीं. बरसों-बरस ऐसा चला. वो लगन थी, जिसने उस बच्चे अलाउद्दीन को बाबा अलाउद्दीन खां बनाया.

खां साहब की जिंदगी किसी संत या फकीर की तरह थी. सादगी उन्हें पसंद थी. अनुशासित होना उनकी पहली और शायद एकमात्र शर्त होती थी. वो कुछ भी बर्दाश्त कर सकते थे, अनुशासनहीनता नहीं. इसीलिए उनके शिष्यों के लिए जिंदगी कभी आसान नहीं रही. लेकिन इसी वजह से जैसे उनके शिष्य हैं, वैसे बहुत कम गुरुओं के पास होते हैं.

कभी धर्म के दायरे में नहीं बंधे

खां साहब कभी धर्म के दायरे में नहीं बंधे. इसकी वजह ये भी हो सकती है कि उनसे तीन या चार पुश्त पहले ही पूर्वजों ने मुस्लिम धर्म स्वीकारने का फैसला किया था.

बंगाल के अच्छे परिवार से उनका ताल्लुक था. पिता सितार बजाते थे. लेकिन सिर्फ शौकिया. बाबा के बड़े भाई थे अफ्ताउद्दीन. वो भी अच्छे संगीतकार थे. भाई को बांसुरी, हारमोनियम, तबला, पखावज और दोतारा बजाना आता था.

करीब 110 साल की उम्र में बाबा का निधन हुआ. वो पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी नवाजे गए. लेकिन उनकी जिंदगी अनुशासन, सादगी और गुरु पाने की कहानी है.

कहा जाता है कि गुरु के बिना ईश्वर भी नहीं मिलते. गुरु के लिए कहा जाता है कि जब तक आपका शिष्य आपसे बड़ा न हो जाए, आपको मुक्ति नहीं मिलती. बाबा अलाउद्दीन खां की जिंदगी इस सनातन परंपरा का प्रतीक जैसी है.

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