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टॉम साब- मेरे पीर, मेरे यार

टॉम साब के साथ जुड़ी मेरी कुछ यादें. पूरा दिन शूटिंग छोड़ क्रिकेट खेलते रहे टॉम साब

Asif Khan Updated On: Sep 30, 2017 07:17 PM IST

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टॉम साब- मेरे पीर, मेरे यार

मेरे हुजूर, मेरे टॉम साहब ने शुक्रवार रात दुनिया को अलविदा कह दिया. शब्दों में उनकी शख्सियत को समेट पाना मुश्किल काम है, फिर भी कोशिश कर रहा हूं.

मेरी पहली मुलाकात उनसे साल 2010 में हुई जब मैं वाइल्डलाइफ पर फिल्में बना रहा था. मैंने इसी सिलसिले में उनसे बातचीत की. टॉम साब खुद भी वाइल्ड लाइफ के बेहद शौकीन थे और शायद इसी वजह से उन्होंने बात मान ली. मेरी खुशकिस्मती रही कि वाइल्ड लाइफ पर सामान्य सी फिल्मों को टॉम साब ने अपनी आवाज और एंकरिंग देकर बेमिसाल बना दिया.

टॉम साब को देखकर वक्त घड़ी मिलाता था

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वो बाकमाल इंसान थे. वक्त के ऐसे पाबंद कि एक बार जो वक्त, जो जगह तय हो गया बस वो तय हो गया...उसमें कोई बदलाव नहीं.

किसी शूट के लिए मुझे उनके साथ नैनीताल जाना था. सब तय था, हमेशा की तरह. मैं नैनीताल पहुंच चुका था.

हुजूर ट्रेन से काठगोदाम पहुंचने वाले थे. मौसम खराब था और टॉम साब को संपर्क कर पाना नामुमकिन क्योंकि फोन वो रखते नहीं थे. किसी तरह वो नैनीताल पहुंचे तो मैंने उनसे कहा कि हुजूर एक मोबाइल रख लीजिए, आपको दिक्कत होती होगी. कहने लगे, मोबाइल फोन ने इंसान को झूठा बना दिया. अब देखिए, मैंने और आपने आज सुबह 11 बजे मिलने का वक्त और जगह तय की और हम मिल लिए. अब फर्ज कीजिए मेरे पास मोबाइल फोन होता तो आप मुझे कह सकते कि हुजूर मैं रास्ते में हूं या ट्रैफिक में हूं, भले ही आप घर पर बैठ कर पराठे खा रहे होते. इसलिए मेरा इस मोबाइल फोन पर ऐतबार नहीं, इसने हमें झूठ बोलना सीखाया है.

जब टॉम ने कहा, ‘मैं पैसे के लिए नहीं, मोहब्बत के लिए काम करता हूं’

अक्सर मैं उनसे कहता कि हुजूर थोड़ा आराम भी किया कीजिए, हमेशा भागते रहते हैं. आज दिल्ली, तो कल मुंबई. बस भागते रहते. और ऐसा नहीं कि सिर्फ दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर टॉम साब छोटी-छोटी जगहों पर चैरिटी के कामों के लिए खुद का पैसा लगाकर जाया करते थे. पैसा तो शायद उनके लिए मायने ही नहीं रखता था. काम के लिए इतना प्यार शायद ही किसी और में मैंने देखा होगा.

एक बार मैं टॉम साब के साथ रणथंभौर टाइगर रिजर्व में एक फिल्म की शूटिंग कर रहा था. हमें एक साथ काम करते हुए करीब तीन साल गुजर चुके थे. इस दौरान टॉम साब ने कभी पैसे को लेकर कोई चर्चा नहीं की. मैंने उनसे कहा कि हुजूर तीन साल बीत चुके हैं अगर आप चाहें तो एक बार पैसे बढ़ाने के बारे में फिर से बात की जा सकती है. आप यकीन नहीं करेंगे टॉम साब गुस्सा हो गए. उन्होंने जो जवाब दिया वो शायद ही कोई सामान्य इंसान दे. उन्होंने कहा, ‘आज ये हिमाकत की है, आइंदा न करें. मैं आपकी मोहब्बत के लिए काम करता हूं, पैसों के लिए नहीं. मैं पर्याप्त पैसे कमाता हूं और मुझे पैसों के लिए आपसे तकादा करने की जरूरत नहीं.’

क्रिकेट और टॉम साब

क्रिकेट के इतने बड़े शौकीन थे कि पूछिए मत. छोटी हल्द्वानी में एक शूट के दौरान कुछ बच्चों को उन्होंने क्रिकेट खेलते हुए देख लिया. बस फिर क्या था. पहुंच गए बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने. 2 गेंद, 4 गेंद कब इनिंग में बदल गए पता ही नहीं चला. लंच का वक्त हुआ, तो मैं उनसे आगे के शूट की बात करने लगा. उन्होंने कहा, ‘जनाब अभी तो हमारी बैटिंग खत्म हुई है, अब फील्डिंग की बारी. बस फिर क्या था, पूरा दिन उनको क्रिकेट खेलते देखने में ही गुजर गया.’

बातों बातों में एक रोज मैंने उनसे पूछा कि हुजूर पहली बार सचिन तेंदुलकर का आपने ही इंटरव्यू किया था. उन्होंने बताया, हुजूर वो इंटरव्यू मुझे नहीं करना था. हुआ कुछ ऐसा कि वो इंटरव्यू रवि शास्त्री को करना था. किसी वजह से वो नहीं कर पाए और फिर कोई और नहीं मिला तो मुझसे कराया गया. ये उनकी महानता ही थी जो इस बात को इतनी आसानी से बता गए.

सच्चे हिंदुस्तानी थे टॉम साब

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मैं एक रोज उनके साथ शूट पर सरिस्का जा रहा था. एयरपोर्ट से उन्हें लिया और वहीं से निकल गए. गाड़ी में बैठते उन्होंने आदाब कहा तो ड्राइवर ने चौंक कर उनकी ओर देखा और धीरे से पूछने लगा ये हिंदी भी बोल लेते हैं. गलती से उसकी फुसफुसहाट टॉम साब ने सुन ली. गुस्से में चिल्लाए, ‘तेरे बाप को भी हिंदी सीखा दूंगा. मैं हिंदुस्तानी हूं.’

ये कसूर बेचारे ड्राइवर का नहीं था. हमारी फिल्मों ने ही शायद उन्हें हिंदी फिल्मों का सिर्फ एक अंग्रेज ही बना रहने दिया.

कभी मौलाना, कभी गांधी, तो कभी गालिब

टॉम साब स्टेज पर कभी मौलाना को निभाते तो कभी गांधी को. उनकी बातों से अक्सर लगता कि शायद ही मौलाना और गांधी को इनसे बेहतर किसी ने समझा होगा. उनके बैग में हमेश उर्दू के नामचीन शायरों की किताबें होती थीं. शूटिंग खत्म होते ही वो उन्हें पढ़ते और मुझे भी सुनाते. कई बार जब मुझे शेरों के मायने न समझ आते तो बड़े प्यार से समझाते. किसी भी माहौल में जब मैं उनसे गुजारिश करता कि हुजूर एक शेर हो जाए तो टॉम साब की जुबान पर एक बेहतरीन शेर होता.

टॉम साब के लिए क्या अमीर और क्या गरीब?

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रणथंभौर में एक शूट के दौरान हमारे ड्राइवर रईस भाई ने टॉम साब को अपने घर पर खाने की दावत दी. टॉम साब ने हामी भर दी.

सुबह पांच बजे से शूट करते-करते शाम के सात बज गए. हम थके-हारे होटल पहुंचे तो मुझे लगा बात आई-गई हो गई. मैं और टॉम साब अपने-अपने कमरे में आराम करने चले गए.

लगभग एक घंटे बाद मेरे कमरे की घंटी बजी तोटॉम साब सफेद रंग के पठानी सूट में सामने खड़े थे. नूर उनके चेहरे पर बरस रहा था. उन्होंने कहा, जल्दी करो, रईस के यहां जाना है. मैं थका हुआ था इसलिए मैंने बात को टालने की कोशिश की. उन्होंने कहा, मैंने रईस भाई को जुबान दी है. फिर हम निकल पड़े. टॉम साब ने घंटों रईस भाई और उनके परिवार के साथ गुजारे. जमीन पर ही बैठ कर खूब मजे से खाना खाया.

जैसे नज्म पढ़ा करते थे वैसे ही चाय भी पिया करते थे

एक लाइन में अगर टॉम साब के खाने-पीने की दिलचस्पी का जिक्र करना हो तो यही कह सकते हैं कि वो जिंदा रहने के लिए खाते थे. सुबह नाश्ते में ब्रेड, जैम और चाय. दोपहर में सेब, जूस और चॉकलेट. रात के खाने में ज्यादातर सूप ही पीते थे.

हां, जब वो मुझे समोसे या कोई चटपटी चीज खाते देखते तो दिल मचल उठता. और ये कहते कि तुम मेरी सेहत खराब कर दोगे. टॉम साब चाय सिर्फ पीते नहीं थे बल्कि मोहब्बत करते थे. एक-एक चाय घंटों तक पिया करते थे.

हाजिरजवाबी में कमाल थे

मैं टॉम साब के साथ रहने के दौरान अक्सर फिल्मी कलाकारों को लेकर उनकी निजी राय लिया करता था. ऐसे ही एक दिन मैंने उनसे पूछा कि नसीरुद्दीन शाह कैसे आदमी हैं? तो उन्होंने बेहद दिलचस्प जवाब दिया. वो बोले, 'नसीर आदमी कैसे हैं, ये सवाल तो आपको किसी महिला से पूछना चाहिए, मैं ये बता सकता हूं कि उनकी शख्सियत कैसी है'.

सबके लिए टॉम साब कलाकार थे, मेरे लिए मेरे पीर

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अभी पिछली ही मुलाकात के दौरान अचानक मुझसे पूछने लगे तुम ठीक हो. वक्त थोड़ा मुश्किल है, बस तुम हिम्मत रखना, सब ठीक हो जाएगा. क्या पता था कि वो आखिरी मुलाकात होगी.

टॉम साब के साथ हमने फर्स्टपोस्ट के लिए हाल में एक सीरीज शूट की थी. वो अभी तक लोगों के बीच नहीं आई है. इसका मुझे हमेशा दुख रहेगा. ये सीरीज मेरे दिल के बेहद करीब है जहां उन्होंने निजी जिंदगी से लेकर देश दुनिया के हर विषय पर अपनी राय रखी.

टॉम साब के इंतकाल की खबर सुनकर बस यही सोचा कि हुजूर, आने वाले बुधवार को आपसे मिलने मुंबई आना था, लेकिन आपका तो वक्त तय था न! हमेशा की तरह. इतनी भी क्या जल्दी? याद रखिए हुजूर ये मलाल मुझे ताजिंदगी रहेगा, मेरा आखिरी सलाम आपने नहीं लिया. मुझे इस बार वक्त की आपकी पाबंदगी को लेकर नाराजगी है. मैं हमेशा आपके तय वक्त पर पहुंचा बस इक बार न पहुंच पाने की ये सजा बड़ी है. आपसे न मिल सका लेकिन बुधवार को आप की कब्र पर फातेहा पढ़ने जरूर आउंगा. अल्ला आपको जन्नत ही देगा, ये मेरा यकीन है.

खुदा हाफिज़

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