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हिस्ट्रीशीटर: 4 स्टार पाकिस्तानी जनरल जिसने 30 लाख बंगालियों को मरवा दिया

टिक्का खान दुनिया के लिए भले ही कसाई रहा हो, पाकिस्तान ने उसे 'वॉर हीरो' माना.

Updated On: Jul 07, 2018 09:12 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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हिस्ट्रीशीटर: 4 स्टार पाकिस्तानी जनरल जिसने 30 लाख बंगालियों को मरवा दिया
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जनरल टिक्का खान, पता नहीं 90 के दशक के उत्तरार्द्ध और 21वीं सदी के शुरुआती सालों में पैदा हुई पली-बढ़ी हिंदुस्तान की मिलेनियल पीढ़ी ने ये नाम सुना है या नहीं. मगर पाकिस्तान के इस पहले 4 स्टार जनरल को दुनिया के सबसे बड़े युद्ध अपराधियों में से एक माना जाता है.

इतिहास में जनरल टिक्का खान के लिए एक और नाम है, 'बूचर ऑफ़ बंगाल' यानी बंगाल (आज का बांग्लादेश) का कसाई. फौज की चमकदार वर्दी पहने हुए ऐसा हत्यारा जिसने बड़े आराम से कहा था, 'महज 30 हजार बंगाली ही तो मरे हैं, क्या हो गया.' दुनिया के लिए टिक्का खान कसाई था. दुनिया के लिए ही नहीं खुद पाकिस्तान के ही जनरल नियाजी ने कहा था कि टिक्का खान ने जो किया वो कोई वर्दीवाला सैनिक नहीं कर सकता.

बंगाल में कत्ल-ए-आम और फिर टेलीग्राम

टिक्का खान की कहानी ब्रिटिश इंडियन आर्मी से शुरू होती है. टिक्का खान ने 1965 की जंग भी लड़ी लेकिन टिक्का खान का नाम इतिहास के पन्ने पर बांग्लादेश(पूर्वी पाकिस्तान) पहुंचने के बाद दर्ज हुआ. टिक्का खान के इतिहास को जानने से पहले 1970 के दशक की शुरुआत की बात जाननी चाहिए. 1971 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे रिचर्ड निक्सन. 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने याह्या खान. याह्या खान इससे पहले पाकिस्तानी सेना के कमांडर इन चीफ थे.

General.TikkaKhan

इसी समय भारत की प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी. इंसान को चांद तक पहुंचाने की सफलता से खुश रिचर्ड निक्सन भारत से बुरी तरह चिढ़े रहते थे. उन्हें एक तेज-तर्रार महिला नेता से बात करना पसंद नहीं था. निक्सन को लगता था कि भारतीय कायर होते हैं और अगर युद्ध हुआ तो पाकिस्तान के पूर्व फौजी जनरल राष्ट्रपति के आगे एक महिला क्या टिकेगी!

खैर, इसी बीच निक्सन को एक बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से उनके एक राजनायिक ने एक के बाद एक कई टेलीग्राम भेजे. आर्चर ब्लड के भेजे गए ये टेलीग्राम ब्लड टेलीग्राम (इसी विषय पर गैरी ब्रास की किताब 'ब्लड टेलीग्राम' भी है) कहलाते हैं. इन टेलीग्राम में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों पर विस्तार से कहा गया था.

ब्लड ने 'चुना हुआ नरसंहार' टाइटल से लिखा था, 'यहां ढाका में हम पाकिस्तानी सेना के आतंक के शांत गवाह हैं. आवामी लीग के समर्थकों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है. उन्हें घर से निकाला जाता है और गोली मार दी जाती है. ढाका यूनिवर्सिटी से फिलॉस्फी के हेड फजलुर रहमान और एक हिंदू, इतिहास के हेड एम आबेदिन को मार डाला गया. पॉलिटिकल साइंस के हेड रज्जाक की हत्या किए जाने की भी अफवाह है.'

Blood_telegram

छात्रों को कमरों में ‘मूव डाउन’ करवा दिया गया. जलते हुए रेजीडेंस हॉल में मशीनगन से इन सभी पर फायर करवाया गया. हिंदू डॉरमेट्री से एक इंग्लिश स्कॉलर को खींच कर बाहर लाया गया और गर्दन में गोली मार दी गई. 6 और फैकल्टी मेंबर्स के साथ भी इसके बाद यही हुआ. शायद इसके बाद भी कुछ और लोग मारे गए हों.

निक्सन के लिए आर्चर ब्लड की रिपोर्ट उम्मीद से बिलकुल अलग थी. वो पाकिस्तान का समर्थन करना चाहते थे, यहां उल्टा हो रहा था. पाकिस्तानी सेना वहां टिक्का खान की अगुवाई में 'ऑपरेशन सर्चलाइट' चला रही थी. सर्च लाइट का मकसद था 'विद्रोहियों' के इलाके में घुसना और और उसे बिना किसी को माफी दिए खत्म कर देना. यहां ये विद्रोही खुद पाकिस्तान की ही जनता थे.

रॉबर्ट पेन की किताब में जिक्र है कि याह्या खान ने खुद टिक्का खान से कहा था, 'तीस लाख बंगालियों को मार दो, बाकी को हम अपने हाथ से खिलाएंगे.' इसी बीच ब्रिटेन के संडे टाइम्स में ऑपरेशन सर्चलाइट को लेकर खबर छपी. एंथनी मैस्करनहास ने 13 जून 1971 को लिखा, '15 अप्रैल को मैं ढाका में घूम रहा हूं. चार छात्रों के सिर इकबाल हॉस्टल में सड़ रहे हैं. हॉस्टल के पीछे की दीवारें गोलियों से छिदी हुई हैं. 9वीं डिवीजन के अफसर अजमत को मेजर बशीर चिढ़ाते हैं क्योंकि उसने एक भी कत्ल नहीं किया है.' इसके साथ ही टाइम मैग्जीन ने भी टिक्का खान और सर्च लाइट को लेकर रिपोर्ट छापी. यहीं से टिक्का खान के लिए 'बूचर ऑफ बंगाल' शब्द इस्तेमाल होने लगा. इससे पहले ये उपनाम डायरेक्ट एक्शन डे के चलते सुहरावर्दी के नाम था.

अपनी ही सेना में अलोकप्रियता

टिक्का खान को पूर्वी पाकिस्तान से वापस बुला लिया गया. भारत और पाकिस्तान में दिसंबर में युद्ध छिड़ गया. इस समय टिक्का खान के पास सेकेंड स्ट्राइक कॉर्प्स की कमांड थी. पंजाब के मुल्तान में उसका बेस था. टिक्का खान इस युद्ध में बुरी तरह फेल हुआ. उसकी कमांड में 3000 से ज्यादा सिपाही मारे गए और 50 टैंक नष्ट हुए.

History Sheeters

सीजफायर होने तक टिक्का खान काफी बदनाम हो चुका था. हालांकि 1965 की लड़ाई में टिक्का खान चाविंडा की लड़ाई में शामिल हो चुका था. चाविंडा की लड़ाई इतिहास में टैंकों की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक मानी जाती है. इसमें पाकिस्तान और भारत दोनों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन अंत में पाकिस्तानी सरकार ने यूनाइटेड नेशन्स के चलते सीजफायर मान लिया था. सीजफायर होने पर भारत के पासे पाकिस्तान का 500 वर्ग किलोमीटर का इलाका था, हालांकि पाकिस्तान चाविंडा को अपनी जीत बताता है.

भुट्टो से वफादारी और जिया उल हक

युद्ध के बाद पाकिस्तानी पीएम ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने टिक्का खान को 4 स्टार जनरल (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) बना दिया. इस समय पर टिक्का खान सेना और राजनीतिक गलियारों का सबसे बदनाम और अलोकप्रिय अफसर था. टिक्का खान जब रिटायर हुआ तो भुट्टो ने टिक्का खान से पूछा कि जिया उल हक को जनरल बनाना कैसा रहेगा? टिक्का खान ने इस प्रस्ताव को नकार दिया. जाहिर सी बात है कि भुट्टो ने टिक्का खान की बात नहीं सुनी. 1976 में टिक्का खान को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर सुरक्षा सलाहकार बनाया गया. इसके कुछ ही समय बाद जिया उल हक़ ने तख्तापलट किया. भुट्टो और टिक्का खान दोनों नजरबंद कर दिए गए. 1979 में भुट्टो को फांसी हुई और टिक्का खान को हाशिये पर डाल दिया गया. बाद में जब बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनीं तो टिक्का खान को फिर से सुरक्षा सलाहकार बनाया गया.

बलोचिस्तान का भी कसाई

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1971 के युद्ध के बाद टिक्का खान ने दो बड़े काम किए. पहला पाकिस्तान में परमाणु बम बनाने के प्रोग्राम को आगे बढ़ाना. दूसरा उसने बलोचिस्तान में कत्ल-ए-आम करवाया. 80 हजार की पाकिस्तानी सेना ने 8-10,000 बलोच कबायलियों को मारा. टिक्का खान की यही फितरत थी. टिक्का खान की कमांड में ढाका में सेना ने एक रात में 7,000 लोगों को मार डाला था. जानबूझ कर पढ़ने-लिखने वाले लोगों, छात्रों और प्रोफेसर्स को निशाना बनाया गया. बताया जाता है कि इस लगभग 9 महीने के दौर में 2 लाख से ज्यादा बलात्कार हुए. पाकिस्तान ऑपरेशन सर्चलाइट में 26,000 लोगों के मारे जाने की बात कहता है, जबकि शेख मुजीबुर्रहमान ने तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर 30 लाख हत्याओं का आंकड़ा दोहराया है.

टिक्का खान दुनिया के लिए भले ही कसाई रहा हो, पाकिस्तान ने उसे 'वॉर हीरो' माना. टिक्का खान ने कभी भी 1971 के युद्ध पर बात नहीं की. 2002 में जब टिक्का खान को दफनाया गया तो तमाम सैन्य कमांडरों के साथ-साथ बेनजीर भुट्टो ने उसे विशेष श्रद्धांजलि दी.

( सारी तस्वीरें विकीपीडिया से हैं डॉक्युमेंट ब्लड टेलीग्राम की कॉपी है. )

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. )

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