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गजनी और मुगलों की विरासत समोसे के लिए अब चिंता होती है

समोसे के बीज चंगेज़ खान के साम्राज्य में पड़े. महमूद गजनी के दरबार ने इसने पहली शक्ल और नाम पाया

Updated On: Nov 24, 2018 09:22 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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गजनी और मुगलों की विरासत समोसे के लिए अब चिंता होती है

देश में नाम बदलने की बयार चल रही है. कहने वाले ये भी कह सकते हैं कि नामों की पुनर्स्थापना की प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में कभी-कभी समोसे के लिए चिंता होती है. अब आप कहेंगे कि नाम से समोसे का क्या लेना-देना. जी समोसे की पूरी विकास यात्रा चंगेज़ खान से होते हुए मुगलों तक पहुंचती है. इसलिए लगता है कि कहीं समोसे पर भी किसी दिन कोई आदेश न आ जाए. समोसे के इतिहास की बात करने से पहले बात करते हैं समोसे से जुड़े एक और नाम की जिसके बारे में आप शायद ही जानते हों.

फ़र्रुख़ाबाद में रेलवे रोड पर समोसे की एक छोटी सी दुकान है. समोसे वाले का नाम है नैनू. जब देश ने टाटा नैनो का सपना देखना शुरू किया तो नैनू के समोसे नैनो समोसे बन गए. आगे बढ़ने से पहले बता दें कि यह कहना कतई अतिश्योक्ति नहीं है कि नैनू के नैनो समोसे से बेहतर समोसे शायद ही कहीं खाए हों और अगर यही समोसे पुरानी दिल्ली जैसी किसी जगह पर मिल रहे होते तो शायद करीम की निहारी या पराठे वाली गली की तरह से मशहूर होते.

बात सिर्फ नाम और समोसे के स्वाद की नहीं है. लखटकिया नैनो की तरह ही नैनो समोसे भी एक रुपए के ही मिलते रहे. इस साल जब पेट्रोल और डीज़ल 90 के पास पहुंचा तब समोसे की कीमत 2 रुपए हुई. इस एक रुपए के समोसे में वो सब कुछ है जो आदर्श समोसे में होना चाहिए. भुना जीरा, धनिया और हल्की सी कालीमिर्च के साथ तेज़ हींग होती है. पतली सी पपड़ी और आकार में सामान्य समोसे से एक तिहाई. दिल्ली के अधिकतर समोसों से अलग अवध के इलाके में समोसे का मसाला और आलू काले होने तक भूने जाते हैं, जिनसे समोसे के स्वाद को एक अलग ही मुकाम मिलता है. और हां! इन समोसों को चटनी के साथ की ज़रूरत नहीं पड़ती.

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नैनू के समोसे को खत्म करके समोसे की विकास यात्रा पर चलते हैं. वैसे अगर कोई समोसे का भी नाम बदलना चाहे तो बिहार-बंगाल में प्रचलित सिंघाड़ा नाम इस्तेमाल कर सकते हैं. केटी आचाया की डिक्शनरी ऑफ़ इंडियन फू़ड के मुताबिक पहले सिंघाड़ा (शायद जिसमें तीन आड़े सींग निकले हों) शाकाहारी समोसे और समोसा कीमा भरे समोसे के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द था. आज के समय ये बंटवारा किसी काम का नहीं रह गया है.

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घुड़सवारों से चाय की दुकान तक

अगर मध्य एशिया से लेकर मध्य चीन तक देखेंगे तो समोसे से मिलते जुलते या कहें कि डंपलिंग परिवार के कई सदस्य आपको दिखेंगे. मोमो, डिमसुम, स्प्रिंग रोल, गुजिया और समोसे जैसे तमाम पकवान एक ही ढर्रे पर बने हैं. सूखे पके हुए मांस को मैदे की तह में भर दिया जाता है. सोचकर देखिए इसे लेकर सफर करना और घोड़े पर बैठे-बैठे खा लेना कितना आसान है. महमूद गजनी के दरबार में इसी तरह की एक डिश संबोसाग या संबोसाज पेश की जाती थी. जिसमें मैदे की खस्ता तहों के बीच कीमा भरा जाता था. लगभग 1000 साल पुराना यही संबोसाज मुगल काल आते-आते समोसा बन गया. हालांकि इसमें आलू तो पुर्तगालियों के आने के बाद ही भरा गया.

वैसे दुनिया के पहले फास्ट फूड यानी समोसे में काफी विविधता है. दिल्ली और पंजाब के समोसे आकार में बड़े और किशमिश, पनीर की स्टफिंग वाले होते हैं. बंगाल और बिहार में समोसा या सिंघाड़ा थोड़ा छोटा होता है. बंगाल में खोए भरे मीठे समोसे भी होते हैं जिन्हें लबंग लतिका कहते हैं. म्यांमार में समोसे का नाम सामूसा है. वहीं पूर्वी एशिया के देशों में समोसे की ऊपरी पर्त काफी पतली होती है. समोसा अफ्रीकी देशों में किसानों का खाना है. वहां इसे सम्बूस कहते हैं. इसी तरह के मिलते जुलते नाम और आकार के साथ इज़रायल, ईरान जैसे तमाम देशों में समोसे मिलते हैं.

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वैसे समोसे की भारत में आमद अफगानिस्तान के रास्ते से हुई. इसका असर बंटवारे के बाद देखा जा सकता है. भारत में जहां समोसे का मोटामाटी अर्थ आलू है, पाकिस्तान में समोसे की कई किस्में मिलती हैं. कहीं सब्ज़ी भरे, कहीं मसालेदार और कहीं कीमे वाले. वैसे पाकिस्तान में समोसे के प्रति इतना प्रेम है कि वहां की अदालत एक आदेश दे चुकी है कि समोसे की कीमत 25 पाकिस्तानी रुपए से ज़्यादा न की जाए. अगर आपको पाकिस्तान के समोसा प्रेम से थोड़ी कोफ़्त हो रही है तो तसल्ली रखिए. भारत भी समोसे के मामले में काफी विविधता लिए है. 90 के दशक में बात चली कि समोसे में आलू और बिहार में लालू का कोई जवाब नहीं. आलू और शालू की तुकबंदी पर एक गाना भी बन गया. वैसे सुरसाम्राज्ञी लता मंगेश्कर को भी समोसे बहुत पसंद है. लता सुरगाथा में यतींद्र साफ करते हैं कि दीदी को यकीनन समोसे बहुत पसंद हैं लेकिन कीमे वाले समोसे, आलू भरे समोसे नहीं.

शुरुआत में हमने बताया कि ज़्यादातर बड़ी फ्रेंचाइज़ी के समोसे में आलू भरने से पहले भूना नहीं जाता है. इसीलिए उन समोसो का आलू काला नहीं पीला होता है. अच्छा समोसा वही है जिसके साथ चटनी बस सहायक हो, समोसा चटनी पर निर्भर न रहे. वैसे हर जगह समोसे के साथ चटनी दी भी नहीं जाती. जैसे कानपुर में समोसा रायते के साथ परोसा जाता है, कुछ जगहों पर छोले के साथ भी दिए जाते हैं. कहीं सोंठ की चटनी और कहीं खट्टी चटनी भी मिलती है.

समोसे के बीज चंगेज़ खान के साम्राज्य में पड़े. महमूद गजनी के दरबार ने इसने पहली शक्ल और नाम पाया. भारत में इसे मुगलों ने लोकप्रिय किया, इसकी सबसे लोकप्रिय भरावन पुर्तगालियों के ज़रिए भारत में आई. इसके बाद भी समोसा भारतीय है. समोसे के भारतीय होने का प्रमाण इस बात से समझ लें कि एक बार लंदन के एक भारतीय रेस्त्रां ने एक कज़ाकिस्तानी रेस्त्रां को नोटिस भिजवा दिया था. बात यह थी कि कज़ाक रेस्त्रां समोसे को अपने यहां की डिश कह कर बेच रहा था. समोसे जैसे ग्लोबल मगर देसी पकवान के लिए अब थोड़ी चिंता होती है. कहीं मुगलों की इस विरासत को हुकूमत बंद न करवा दे, या इसका नाम कुछ और न कर दे. उम्मीद है कि चाय के साथ समोसा तो सभी खाते होंगे तो समोसा भी बनता और बिकता रहेगा.

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