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सजा-ए-मौत: कैसा होता है खानदानी जल्लाद होने का अहसास

इस परिवार का दावा है कि भगत सिंह और उनके साथियों को इन्हीं के परिवार ने फांसी दी

Updated On: Mar 11, 2018 09:22 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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सजा-ए-मौत: कैसा होता है खानदानी जल्लाद होने का अहसास

कहा-सुना जाता रहा है कि जल्लाद निष्ठुर-क्रूर होता है. जल्लाद के सीने में लोहे का दिल होता है. फांसी देते वक्त जल्लाद शराब के नशे में धुत होता है. वरना जीते-जागते सामने खड़े इंसान को भला फंदे पर कौन और कैसे लटका सकता है? यह भ्रांतियां और मनगढ़ंत किस्से-कहानियों से ज्यादा कुछ नहीं है. सच जानने के लिए आइए झांकते हैं हिंदुस्तान के इकलौते जीवित बचे उस खानदानी जल्लाद पवन के जेहन में करीब से...जिन्हें ‘जल्लादी’ उनके परदादा, दादा और पिता धरोहर के रुप में सौंपकर गए हैं...

सजा-ए-मौत का इतिहास और तरीके

हमारे देश में फांसी की सजा का प्रचलन मुख्यत: ब्रिटिश काल से ही देखने-सुनने में आता है. दुनिया भर में फांसी देने के अपने अलग अलग कानून और तौर-तरीके हैं. अधिकांश देशों में सजा-ए-मौत इंसान को फंदे पर ही लटका कर ही दी जाती है. दुनिया के कुछ देशों में सीधे गोली मारकर, नींद का इंजेक्शन देकर, इलेक्ट्रिक चेयर पर बैठाकर भी सजा-ए-मौत अमल में लाई जाती है.

इसलिए तोड़ते हैं जज फांसी की सजा देने के बाद पेन

broken pen

जेहन में सवाल आता है कि, भारत में आखिर सजा-ए-मौत लिखने के बाद जज उस पेन या उस पेन की निब को तोड़कर नष्ट क्यों कर देते हैं, जिससे फांसी की सजा की लिखी जाती है. इसके तीन प्रमुख कारण हैं...

भारतीय संविधान में फांसी की सजा से बड़ी कोई दूसरी सजा नहीं लिखी गयी है. इससे पता चलता है कि, जिस पेन से फांसी की सजा लिखी जा चुकी हो, उस पेन से इससे बड़ा और खतरनाक और कोई शब्द नहीं लिखा जा सकता है. लिहाजा फांसी की सज़ा लिखने जाने पेन की उपयोगिता आईंदा के लिए समाप्त हो जाती है.

जिस पेन से किसी की ‘मौत’ लिखी जा चुकी है, उससे बुरी चीज भी भला दुनिया में और क्या हो सकती है. लिहाजा ऐसी चीज का नष्ट होना ही इंसानी दुनिया में ठीक है.

जिस पेन से जज ने एक बार किसी को फांसी की सजा सुना या लिख दी हो, वो जज उस सजा या फैसले को खुद कभी वापिस नहीं ले सकता है. लिहाजा ऐसे में उस पेन से जुड़ी बुरी यादों को रखना किसी सकारात्मकता का द्योतक नहीं हो सकता है. लिहाजा ऐसी चीज को खतम कर देना ही बेहतर है.

भारत में जल्लादी की जिम्मेदारी इकलौते खानदान पर

bhagat singh

यह अलग बात है कि, इतने बड़े देश में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में रहने वाला एक अदद कल्लू जल्लाद का परिवार ही इस ‘बुरे’ और ‘जिल्लत भरे’ पेशे को जिंदा रखने की जद्दोजहद से जूझ रहा है. कालूराम जल्लाद के खानदान में भी इस अजीब-ओ-गरीब पेशे का इकलौता जीवित वारिस पवन कुमार ही बचा है.

भगत सिंह को फांसी देने वाले खानदान से?

पवन के मुताबिक उनके दादा परदादा लक्ष्मन सिंह अंग्रेजों के जमाने में जल्लाद थे. बकौल पवन, लाहोर सेंट्रल जेल में उनके दादा ने ही ब्रिटिश सरकार के हुक्म पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के फंदे पर लटकाया था. हालांकि पवन के इस दावे से संबंधित देश के इतिहास में कहीं कुछ देखने-पढ़ने को नहीं मिलता है. पवन के मुताबिक परदादा की मौत के बाद उनके दादा कालूराम (कल्लू जल्लाद) ने ब-हुक्म भारत सरकार ‘जल्लादी’ के पेशे को विरासत में संभाला. कालांतर में कालूराम पुश्तैनी जल्लाद का काम अपने बेटे मम्मू (पवन के पिता) को विरासत में सौंप गए.

जब जल्लादी पर खानदान में हुआ जबरदस्त फसाद

कल्लू जल्लाद ने जब बेटे मम्मू सिंह को जल्लादी सौंपी तो, उनके दूसरे बेटे जगदीश ने खानदान में बबाल मचा दिया. जगदीश का तर्क था कि, बड़ा बेटा होने के नाते पिता द्वारा विरासत उसे ही सौंपी जानी चाहिए थी. जबकि कल्लू का तर्क था कि, शराबी-कबाबी इंसान के कंधों पर जल्लादी जैसा महत्वपूर्ण काम नहीं सौपा जा सकता. कई साल पहले कल्लू जल्लाद के बेटे मम्मू जल्लाद की भी मौत हो चुकी है.

रंगा-बिल्ला हो चाहे इंदिरा के हत्यारे सब लटकाये फांसी

दिल्ली के जीसस मेरी कॉलेज की सेकेंड इअर की छात्रा गीता चोपड़ा और मार्डन स्कूल में 10वीं के छात्र गीता के भाई संजय चोपड़ा के हत्यारे रंगा खुश (कुलजीत सिंह और बिल्ला (जसबीर सिंह) को सन् 1982 में दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल के फांसी-घर में पवन के दादा कल्लू जल्लाद ने ही फांसी पर टांगा था). इसके बाद सन् 1989 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह और केहर सिंह तिहाड़ जेल में पवन के दादा कालूराम जल्लाद ने दूसरे जल्लाद फकीरा की मदद से फांसी लगाई थी.

दादा कल्लू जल्लाद ने दिखाई थी पहली बार जेल

बकौल पवन जल्लाद 25-26 साल की उम्र में पहली बार दादा कालूराम जल्लाद अपनी तनख्वाह लेने मेरठ जेल गए थे. उस दिन वो मुझे भी अपने साथ ले गये. जिंदगी में तभी पहली बार कोई जेल देखी. वो थी उत्तर प्रदेश की मेरठ जेल. उससे पहले कभी जेल देखने का मौका नहीं मिला था.

जेल में जल्लाद का रुतबा जब पहली बार आंखों से देखा

दादा जब मेरठ जेल में गए तो पता चला कि, जिस जल्लाद के नाम से लोगों को पसीना आता है. उस जल्लाद का क्या रुतबा होता है. दादा कालूराम के लिए जेल के संतरी खुद-ब-खुद ही दरवाजे खोलते जा रहे थे. साथ ही जल्लाद होने के बाद भी दादा को संतरियों द्वारा मारे जा रहे सैल्यूट्स देखकर सीना गर्व से फूलकर चौड़ा हो गया. तब लगा कि नहीं, जल्लाद को बुरी नजर से अगर देखा जाता है, मगर समाज में उसकी भी अपनी एक अलग इज्जत-रुतबा होता है. बकौल पवन जल्लाद- ‘मैंने फांसी के फंदे पर मुजरिम को लटकाने की कला दादा कल्लू और पिता मम्मू सिंह जल्लाद की शागिर्दी में सीखी. अब दोनों ही दुनिया में नहीं हैं.’ पवन के मुताबिक जल्लाद बनना हर किसी के बूते की बात नहीं है. शायद इसीलिए उसका बेटा इस पुश्तैनी पेशे को आगे बढ़ाने के लिए राजी नहीं है.

कांप रहे थे फांसी के फंदे पर चढ़ते वक्त उसके पांव

जयपुर जेल की घटना है. दादा के साथ फांसी लगवाने गया था. मौत की सजा पाया मुजरिम राम-राम बोलता जा रहा था. ज्यों-ज्यों वो फांसी तख्ते की ओर बढ़ रहा था, उसकी हिम्मत जबाब देती जा रही थी. फांसी के तख्ते पर खड़े उस इंसान के पांवों में जब मैंने रस्सी डालकर कसी तो, उसके कांपते हुए बदन को देखकर मेरा कलेजा एक बार मुंह को आ गया. मैं सहम सा गया. लेकिन दादा ने मेरी मन:स्थिति भांपते हुए सब कुछ संभाल लिया. वक्त गंवाए बिना मुझे मुजरिम से दूर हटने का इशारा करके मेरे देखते-देखते फांसी तख्ते का खटका यानि लीवर खींच दिया. चंद सेकेंड में ही मेरी आंखों के सामने ही वो इंसान मौत के कुएं में झूल गया.

पटियाला (पंजाब) में पांच लोगों के सामूहिक हत्यारे भाईयों को भी दादा के साथ फांसी लगाने गया था. फांसी फंदे पर चढ़ते वक्त वे दोनों बिलकुल नहीं घबरा रहे थे. हां, इलाहबाद नैनी जेल में 7 साल की बच्ची के बलात्कार और हत्या का आरोपी मौत की सजा पाया वो मुजरिम फांसी तख्ते पर चढ़ने से खौफ खा रहा था.फांसी के कुएं पर बार-बार जाकर वो अपने पांव पीछे ले जा रहा था. सिपाहियों ने उसे धक्का देकर फांसी तख्ते पर लाकर खड़ा किया. मैने चंद सेकेंड में उसके पांव में रस्सी कस दी और दादा ने गले में फंदा डाल दिया.

एक जल्लाद की हसरतें जो रह गयीं अधूरी

पवन के मुताबिक मुंबई हमलों के इकलौते जिंदा पकड़े गये आरोपी कसाब को फांसी पर लटकाने की दिली तमन्ना थी. जो अधूरी ही रह गयी. इसी तरह संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु और मुंबई सीरियल बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन को फांसी पर लटकाने की हसरत भी पूरी नहीं हो सकी.

फांसी घर में इसलिए मौजूद होता है जुडिशियल मजिस्ट्रेट

तमाम कोशिशों के बाद भी मुजरिम अगर काल-कोठरी से निकलते वक्त तक भी अपनी अंतिम इच्छा जाहिर न करे, या न कर सका हो, और वो फांसी के तख्ते पर खड़ा होते ही अंतिम इच्छा बयान करना चाहे, तो उस वक्त जुडिशियल मजिस्ट्रेट की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. फांसी घर के भीतर तुरंत ही मजिस्ट्रेट मुजरिम के बताये मुताबिक उसकी वसीयत (अंतिम इच्छा) लिख देता है. फांसी घर में लिखी इस वसीयत को कानूनी मान्यता होती है.

फांसी के फंदे पर घी और पके हुए केले

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फांसी का फंदा बनाने में भारत में सिर्फ बिहार की बक्सर जेल के कैदियों को ही महारत हासिल है. फांसी फंदे पर घी मलने और उसे घी से भरे मटके में रखकर तैयार किया जाता है. इस फंदे पर पका हुआ केला भी लगाया जाता है. ताकि फंदा मुलायम रह सके. साथ ही इससे फांसी पर लटकने वाले इंसान के गले पर निशान नहीं पड़ते और तकलीफ भी कम महसूस होती है.

अगर ऐसा हुआ तो नहीं लग सकती मुजरिम को फांसी

फांसी की रस्सी (रस्सा) टूट जाए तो दोबारा फांसी पर इंसान को नहीं लटकाया जा सकता. फांसी देते समय जल्लाद द्वारा खींचा गया तख्ते का लीवर धोखा दे जाए या किसी कारणवश न चले तो. अगर कैदी अस्वस्थ है तो और खाली पेट हो तो भी मुजरिम को फांसी पर नहीं लटकाया जाता है. फांसी लगाए जाने के बाद भी अगर इंसान की मौत न हो और उसकी सांसे चल रही हों, तो भी उसे दोबारा फांसी पर नहीं लटकाया जाता है.

इसलिए भोर में दी जाती है फांसी की सजा

फांसी अमूमन सूर्योदय के वक्त दी जाती है. इसकी कई वजह हैं. मसलन फांसी के बाद मुजरिम की मृत देह का दिन के उजाले में ही उसके धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार उसका अंतिम संस्कार हो सके. परिवार वाले अगर शव को साथ ले जाना चाहें तो उन्हें इसमें बे-वजह परेशानी न उठानी पड़े. अगर फांसी लगाने के वक्त इत्तिफाकन आरोपी की मौत न हो सके, और उसकी सांसें चलती रह जाए तो, उसकी जिंदगी बचाने की हर संभव कोशिशें निर्विघ्न रुप से अमल में लाई जा सके. हालांकि अब तक कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया है, जब फांसी पर लटकाया गया कोई मुजरिम ज़ख्मी हालत में बच गया हो.

(लेखक अपराध मामलों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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