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Teachers day special: 11,000 दिनों तक रोज स्कूल गए ये शिक्षक

81 वर्ष की आयु के ईश्वरी प्रसाद ने अपनी पांच बच्चियों की शादियां भी शनिवार और रविवार के दिन की ताकि उन्हें अवकाश न लेना पड़े

Updated On: Sep 04, 2017 11:00 PM IST

FP Staff

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Teachers day special: 11,000 दिनों तक रोज स्कूल गए ये शिक्षक

शिक्षक को गुरू कहा जाता है जिसका कद भगवान से भी ऊंचा होता है. जन्म के बाद जीवन की शिक्षा हो या फिर स्कूली ज्ञान एक शिक्षक अपने शिष्यों के जीवन की आधारशिला बनाने मे जड़ का काम करता है. ऐसे ही एक आदर्श शिक्षक मध्य प्रदेश के जबलपुर के गढ़ा निवासी ईश्वरी प्रसाद तिवारी हैं.

इनके चेहरे आज भी ज्ञान का वो प्रकाश झलकता है जो शिक्षा क्षेत्र के प्रति अपनी करूणा और समाज के लिए उनकी कृतज्ञता को दर्शाता है. इनके सैकड़ो छात्र अपने अपने क्षेत्र मे आगे बढ़ रहे हैं, न जाने कितने विदेशों में होंगें और न जाने कितने गरीब बच्चों को शिक्षा देकर ईश्वरी प्रसाद तिवारी ने उनकी ज़िंदगी को संवारा है.

81 वर्ष की आयु का जीवनकाल पूरा कर चुके ईश्वरी प्रसाद आज भी शिक्षा के प्रति खुद को समर्पित कर समाज के अंतिम छोर तक हर किसी को शिक्षित करने का सपना रखते हैं.

ईश्वरी प्रसाद की इस लग्न और तपस्या से हर कोई प्रभावित रहा

एक जमाने मे शहर के सबसे बड़े शासकीय विद्यालयों में से एक कहे जाने वाले मॉडल हाई स्कूल मे बतौर शिक्षक उन्होने करीब 30 साल अपनी सेवाएं दी. इस दौरान उन्होने एक भी दिन छुट्टी नहीं ली. ईश्वरी प्रसाद की इस लग्न और तपस्या से हर कोई प्रभावित रहा. यहां तक कि शासन ने भी उन्हे आदर्श शिक्षक सम्मान से नवाज़ा और भोपाल मे सम्मान के लिए आमंत्रित किया. लेकिन वे नही गए उन्होने प्रतिष्ठा के संसाधन से खुद को दूर रखा लेकिन फिर भी खुद शिक्षा मंत्री ने जबलपुर पहुंचकर उनका सम्मान किया.

अपनी सेवा अवधि मे एक भी छुटटी नही लेना शायद ये बात यकीन करने मे लोगो को थोड़ा समय लगेगा लेकिन ईश्वरी प्रसाद के जीवन से जुड़ा एक वाक्या ऐसा भी है जो किसी को भी झंकझोर सकता है.

ईश्वरी प्रसाद के पिताजी स्व. दुलीचंद तिवारी का जब स्वास्थ्य खराब हुआ तो अचानक सुबह 4 बजे वे कोमा मे चले गए. उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वरी नरसिंह मंदिर सत्यनारायण की कथा करने चले और फिर वहां से स्कूल चले गए. इसी बीच अपने पिता की मृत्यू की खबर पाकर उन्हें अंतिम संस्कार के लिए जाना पड़ा. वहां भी वे अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर फिर बच्चो को पढ़ाने की चिंता मे वे वापस स्कूल आ पहुंचे. जैसे ही वे स्कूल पहुंचे तो वहां उनके पिता के लिए शोक सभा का आयोजन किया गया था वे चुपचाप छात्रों के पीछे खड़े रहे.

बेटियों की शादी भी छुट्टी के दिन की

यहां तक कि उन्होंने अपनी पांच बच्चियों की शादियां भी शनिवार और रविवार के दिन की ताकि उन्हे अवकाश न लेना पड़े.

1 अगस्त 1991 को मध्यप्रदेश शासन ने ईश्वरी प्रसाद की लग्न और शिक्षा जगत के प्रति उनकी तपस्या को देख जिले मे शत प्रतिशत साक्षरता लने के लिए उन्हे परियोजना अधिकारी बनाया गया. ये ज़िम्मेदारी मिलने के बाद ईश्वरी प्रसाद मे शहर मे 18 प्राथमिक केंद्र खोले. इन प्राथमिक केन्द्रो मे ईश्वरी प्रसाद ने उन मलिन बस्तियों मे रहने वाले गरीब बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जो कुछ नहीं जानते थे. इस प्रयास से करीब 500 गरीब बच्चो ने शिक्षा हासिल की.

इसके साथ ही समाजिक क्षेत्र मे भी वे पीछे नही रहे. करीब 3 हज़ार बच्चियों को उन्होंने सिलाई की शिक्षा दी वहीं वृक्षारोपण मे भी उन्होने कई हज़ार पौधे लगावए और इस ओर प्रोत्साहित किया. आज भी जब भी उन्हें मौका मिलता है तो वे मलिन बस्तियों में गरीब बच्चों को शिक्षा देने निकल पड़ते हैं.

[न्यूज़ 18 से साभार]

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