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जन्मदिन विशेष: जिसने कमिटमेंट के लिए ब्लैंक चेक को भी ठुकरा दिया था

तलत महमूद का हरेक गीत शीशे से नाजुक है, जिसे सहेज कर रखने को जी चाहता है

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Feb 24, 2018 09:49 AM IST

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जन्मदिन विशेष: जिसने कमिटमेंट के लिए ब्लैंक चेक को भी ठुकरा दिया था

साल 1961 की बात है. कराची में एक कॉन्सर्ट हुआ था. उसे देखने और सुनने करीब 58 हजार लोग आए थे. कॉन्सर्ट एक भारतीय गायक का था. उस कॉन्सर्ट के बाद मलिका ए तरन्नुम नूरजहां ने उस गायक को फोन किया. उनसे गुजारिश की कि एक कॉन्सर्ट में वो और हिस्सा लें, जो लाहौर मे होने वाला था. लाहौर के उस कॉन्सर्ट में नूरजहां गाने वाली थीं. गायक ने मना कर दिया कि व्यस्तताओं के चलते वो ऐसा नहीं कर पाएंगे. नूरजहां को लगा कि शायद पैसों की वजह से मना कर रहे हैं. उन्होंने गायक से कहा कि मैं आपको ब्लैंक चेक भेज रही हूं. इसमें आप अपनी मर्जी से रुपए भर लीजिए. लेकिन गायक ने फिर विनम्रता से मना कर दिया.

1982 में नूरजहां भारत आईं. एक बार फिर उस गायक के साथ मुलाकात हुई. दोनों ने एक कॉन्सर्ट में गाया. नूरजहां ने गाना सुना और कहा, ‘तलत भाई, आपकी आवाज में अब भी वही कशिश है.’ तलत भाई यानी तलत महमूद. 21 साल बाद नूरजहां उन्हीं तलत महमूद की बात कर रही थीं, जिन्होंने अपने कमिटमेंट पूरे करने के लिए ब्लैंक चेक को ठुकरा दिया था. इस किस्से का जिक्र तलत महमूद पर बनी वेबसाइट में है, जो उनके बेटे ने शुरू की थी.

तलत महमूद को जो लोग जानते हैं, उनके लिए यह तय कर पाना आसान नहीं रहा कि वो ज्यादा बेहतर इंसान थे या गायक. लखनऊ में 1924 में जन्मे तलत महमूद में वो सारी खूबियां थीं, जिसे लखनवी तहजीब से जोड़कर देखा जाता है. वो उनकी आवाज में भी झलकती है. इस तरह की मखमली और लरजती आवाज मिलना लगभग नामुमकिन है. लरजपन, कंपन या वाइब्रेटो तो उनकी गायकी की पहचान थी.

जब अनिल बिस्वास ने पूछा- मेरा तलत कहां है?

इस कंपन की वजह से उन्होंने अनगिनत फैन बनाए. कुछ मुश्किलें भी आईं. एक बड़े संगीतकार ने उन्हें कंपन की वजह से रिजेक्ट कर दिया था. तलत महमूद को लगा कि ये स्वाभाविक वाइब्रेटो उनकी राह में रोड़ा बन रहा है. उससे पहले वो अनिल बिस्वास से मिल चुके थे, जिन्होंने उनसे फिल्में गाना गवाने का वादा किया था. तलत महमूद ने खुद को बदलने की कोशिश की. उसी दौरान अनिल  बिस्वास ने उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया.

talat mahmood

1961 की एक तस्वीर. पत्नी नसरीन और बच्चों के साथ तलत महमूद. (http://www.talatmahmood.net से साभार)

तलत ने गाना शुरू किया. अनिल बिस्वास ने थोड़ी देर सुना, उसके बाद रिकॉर्डिंग रोक दी. वो सीधा तलत महमूद के पास गए और पूछा, ‘मेरा तलत कहा है?’ तलत महमूद को समझ नहीं आया. उन्होंने कहा कि अनिल दा मैं समझा नहीं. अनिल बिस्वास ने कहा कि वो लरज कहां है, जो तुम्हारी पहचान थी. मुझे वही तलत चाहिए. रिकॉर्डिंग कैंसल कर दी गई. अनिल बिस्वास ने एक टीवी प्रोग्राम में यह किस्सा सुनाया था. उन्होंने कहा कि तुम जाओ और मेरे तलत को भेजो. तलत महमूद की आंखों में आंसू थे. वो वापस गए और उसी आवाज में गाया, जिसकी वजह से आज भी उनके गाने अलग रंगत देते हैं.

सी रामचंद्र ने की तलत महमूद की आवाज में गाने की कोशिश

1955 में एक फिल्म आई थी आवाज. उसमें गाना था- कितना हसीं है मौसम, कितना हसीं सफर है... यह गाना तलत महमूद को गाना था. दिलीप कुमार पर पिक्चराइज होना था. तलत ने रिहर्सल भी किया. लेकिन उनके पिता का इंतकाल हुआ, जिसकी वजह से उन्हें लखनऊ जाना पड़ा. शूटिंग रोकी नहीं जा सकती थी. फिल्म के संगीतकार सी. रामचंद्र या रामचंद्र चितलकर जानते थे कि तलत इस समय भावनात्मक तौर पर टूट गए हैं. इसलिए उन्होंने वापसी की जिद नहीं की और वो गाना खुद गा दिया. सुनकर देखिए, आपको लगेगा कि तलत गा रहे हैं. सी. रामचंद्र ने लगभग तलत महमूद के अंदाज में ही वो गाना गाया है. सी. रामचंद्र के गाए गानों में चाहे आप शोला जो भड़के सुनें या मेरे पिया गए रंगून.. उससे इस गाने का फर्क समझ सकते हैं कि उन्होंने कैसे तलत महमूद जैसा होने की कोशिश की.

गज़ल के बादशाह कहे जाते हैं तलत महमूद

तलत महमूद को गजल या स्लो गानों के लिए ज्यादा जाना जाता है. शाम-ए गम की कसम.. ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहां कोई न हो... आज भी ये बड़े ताजा लगते हैं. 40 के दशक में तलत ने आकाशवाणी लखनऊ और लाहौर के लिए गाना शुरू किया था. फिर वो कोलकाता चले गए, जो तब कलकत्ता था. वहां उनका नाम भी बदला. 1946 के आसपास उन्होंने अपना नाम भी बदला. वो तपन कुमार हो गए. फिल्मों में काम किया. हालांकि ये ज्यादा समय नहीं चला. वो वापस तलत महमूद ही बने और इसी नाम से मकबूल हुए. अदाकारी से ज्यादा, गायकी के लिए ही उन्हें याद किया जाता है और आगे भी किया जाएगा.

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तलत महमूद ने उस दौर के सभी बड़े कलाकारों के लिए गाने गाए. देव आनंद के लिए जाएं तो जाएं कहां, राज कपूर के लिए मैं दिल हूं इक अरमान भरा या तुमको फुरसत हो मेरी जान इधर देख तो लो.. दिलीप कुमार के लिए ऐ मेरे दिल कहीं और चल या ये हवा ये रात ये चांदनी...

उन्होंने 1951 में बांग्ला फिल्मों की हीरोइन लतिका मलिक से शादी की, जो शादी के बाद नसरीन तलत महमूद हो गईं. खुशहाल पारिवारिक जिंदगी के बीच जैसे-जैसे वक्त बीता, तलत महमूद कॉन्सर्ट में व्यस्त हो गए. खासतौर पर 70 के दशक को इसके लिए जाना जाता है. यह वो दौर था, जब विदेश में होने वाले कॉन्सर्ट में उनकी तस्वीर कई बड़े अदाकारों से ज्यादा बड़ी होती थी.

9 मई, 1998 को उनका इंतकाल हुआ. लेकिन जैसा कहा जाता है, फनकार कभी मरते नहीं. उनके गाने हमेशा सुने जाते रहेंगे, जिनमें एक गाना खासतौर पर, जो सुनील दत्त ने टेलीफोन पर नूतन को सुनाया था. तलत महमूद की आवाज में वो गाना था- जलते हैं जिसके लिए..  उसकी इन दो पंक्तियों पर गौर करें-

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे ना कहीं

गीत नाजुक है मेरा शीशे से भी, टूटे न कहीं

वाकई तलत महमूद का यही नहीं, हरेक गीत शीशे से नाजुक है, जिसे सहेज कर रखने को जी चाहता है. इसीलिए उनकी गायकी के सुनहरे दौर को करीब आधी सदी और मौत को 20 साल होने के बाद भी वो गीत उतने ही ताजे लगते हैं, जितना बनने के वक्त थे.

 

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