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विवेकानंद पुण्यतिथि: पिता की मौत ने कर दिया था उदास, गुरु की राह ने बनाया स्वामी

मृत्यु से पहले स्वामीजी ने 3 घंटे तक योग किया था और शाम को 7 बजे अपने कमरे में यह कहकर गए थे कि कोई उन्हें परेशान न करे

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi Updated On: Jul 06, 2018 04:05 AM IST

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विवेकानंद पुण्यतिथि: पिता की मौत ने कर दिया था उदास, गुरु की राह ने बनाया स्वामी

'ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं. वो हम हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है.' दुनियाभर को भारत से भगवा की यात्रा करवाने वाले स्वामी विवेकानंद ने करीब 126 साल पहले यह बात कही थी. लेकिन, आज के दौर में भी उनके विचार लोगों को जीवन जीने की नई दिशा दे रहे हैं.

आज यानि 4 जुलाई को स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि है. साल 1902 में आज ही के दिन उन्होंने पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्थित बेलूर मठ में देह त्याग दी थी. हैरानी की बात यह है कि मृत्यु से पहले उन्होंने 3 घंटे तक योग किया था और शाम को 7 बजे अपने कमरे में यह कहकर गए थे कि कोई उन्हें परेशान न करे. लेकिन, किसे पता था कि दुनिया को परेशान करने के लिए मौत उनके कमरे में पहले ही दस्तक दे चुकी है.

रात 9 बजकर 10 मिनट पर विवेकानंद की मौत की खबर पूरे मठ में फैल गई थी. स्वामीजी का अंतिम संस्कार गंगा नदी के उसी तट पर हुआ था जहां 16 साल पहले उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस की अंत्येष्टि हुई थी. विवेकानंद की अचानक हुई मौत के बारे में मठ में मौजूद लोगों का कहना था कि उन्होंने महासमाधि ली है.

हालांकि मेडिकल साइंस इस बात को आज भी नकारता है. कई जगह प्रकाशित लेखों में इस बात का जिक्र मिलता है कि मेडिकल साइंस 'ब्रेन हेमरेज' को विवेकानंद की मौत की वजह मानता है. इतिहास में कई जगह इस बात का दावा किया जाता है कि विवेकानंद की मौत दिमाग की नस फटने की वजह से हुई. वहीं मशहूर बांग्ला लेखक शंकर ने अपनी किताब 'द मॉन्क ऐज मैन' में लिखा है कि स्वामीजी को मलेरिया, माइग्रेन, डायबिटीज और अनिद्रा समेत दिल, लीवर और किडनी से जुड़ी 31 बीमारियां थीं. यही बीमारियां उनकी मौत की वजह बनी थीं.

नरेंद्रनाथ से विवेकानंद कैसे बन गए थे स्वामीजी

Vivekananda

12 जनवरी 1863 को कलकत्ता हाईकोर्ट के अटॉर्नी विश्वनाथ दत्त के घर में एक लड़के का जन्म हुआ जिसका नाम नरेंद्रनाथ दत्त रखा गया. घर के सभी लोग नरेंद्रनाथ को नरेंद्र या नरेन कहकर पुकारते थे. नरेंद्र पर सबसे ज्यादा प्रभाव उनकी मां भुवनेश्वरी देवी का पड़ा जोकि बहुत धार्मिक थीं और लगभग हर दिन उनके घर में कथा-भागवत और पूजा-पाठ होता रहता था.

दादा दुर्गाचरण दत्त के जीवन ने भी नरेंद्र को काफी प्रभावित किया क्योंकि वह(दुर्गाचरण) संस्कृत के स्कॉलर थे और 25 साल की उम्र में घर-परिवार छोड़कर संन्यासी बन गए थे. हालांकि नरेंद्र के पिता वेस्टर्न कल्चर में विश्वास रखते थे और अपने बेटे को भी अंग्रेजी पढ़ाकर वेस्टर्न बनाना चाहते थे, लेकिन, नरेंद्र बचपन से ही ईश्वर और उससे जुड़े रहस्यों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते थे.

अपनी उत्सुकता की वजह से वह 'ब्रह्म समाज' भी गए लेकिन वहां उन्हें अपने सवालों के जवाब नहीं मिले. फिर वह तर्क-वितर्क करने के लिए दक्षिणेश्वर जाकर काली-भक्त रामकृष्ण परमहंस से मिले, परमहंस के सिद्धांतों और विचारों ने नरेंद्र को अपना मुरीद बना लिया और नरेंद्र ने उन्हें अपना गुरु मान लिया.

अमेरिकी मीडिया ने स्वामीजी को कहा था 'साइक्लॉनिक हिंदू'

Swami_Vivekananda

साल 1884 में नरेंद्र के पिता की अचानक मौत हो गई, इस घटना से नरेंद्र को काफी सदमा पहुंचा. इस दौरान रामकृष्ण ने उन्हें अपना मन ध्यान और अध्यात्म में लगाने के लिए कहा. जिसके बाद से नरेंद्र की जिंदगी बदलती चली गई.

वहीं फ्रांसिसी लेखक रोमां रोलां ने अपनी किताब 'द लाइफ ऑफ विवेकानंद एंड द यूनिवर्सल गोस्पल' में लिखा है कि विवेकानंद का राजस्थान के खेतड़ी कस्बे से खास संबंध रहा है क्योंकि शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में जाने से पहले खेतड़ी के राजा अजीत सिंह के अनुरोध पर ही स्वामीजी ने 'विवेकानंद' नाम स्वीकार किया था. विवेकानंद के शिकागो जाने का पूरा खर्च भी राजा अजीत सिंह ने ही उठाया था और उन्हें रेशमी कपड़े भी दिए थे.

1893 में अमेरिका के शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मलेन में स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरुआत 'मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों' कहकर की थी. जिसके बाद धर्म, सभ्यता और भारतीय संस्कृति पर उनके विचारों से वहां के लोग काफी प्रभावित हुए. विदेशी मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिंदू नाम दिया था.

भारतीय साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, 'अगर आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए, उनमें सब कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं.'

आखिर एक वेश्या ने स्वामीजी को कैसे सिखाया संन्यास का पाठ

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जयपुर के पास एक छोटी सी रियासत में विवेकानंद को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था. वहां के राजा ने उनके स्वागत के लिए एक कार्यक्रम रखा जिसमें बनारस की मशहूर वेश्या को गाना गाने के लिए बुलाया गया. स्वामीजी को जब इस बात का पता लगा कि उनके स्वागत के लिए एक वेश्या का इंतजाम किया गया है तो उन्होंने कार्यक्रम में जाने से साफ मना कर दिया.

वेश्या को जब इस बात की खबर मिली कि स्वामीजी उसका गाना सुनने नहीं आ रहे हैं तो वह बहुत दुखी हुई. उसने सूरदास का भजन 'प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो..' गाया जिसका मतलब था कि पारस पत्थर के स्पर्श से तो लोहे का टुकड़ा भी सोना बन जाता है फिर वह टुकड़ा चाहे पूजा घर में रखा हो या कसाई के दरवाजे पर पड़ा हो. अगर पारस लोहे की जगह देखेगा तो उसके पारस होने का क्या फायदा.

जब स्वामीजी ने इस भजन को सुना तो वह रोती हुई वेश्या के पास पहुंचे और उन्होंने कहा, 'पहली बार आज मैंने वेश्या को देखा, मेरे मन में न ही उसके लिए प्रेम जागा और न ही नफरत, अब मैं पूरी तरह से संन्यासी बन चुका हूं.'

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