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जानिए, जहां कहते थे ‘पढ़ाई का छोरी से के जोड़?' वहां पिता-बेटी ने मिलकर कैसे की सबकी बोलती बंद

हरियाणा के उस पिता-बेटी की कहानी, जिन दोनों ने मिलकर समाज की कई बेकार की बंधनें तोड़ीं

Updated On: Oct 14, 2018 10:15 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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जानिए, जहां कहते थे ‘पढ़ाई का छोरी से के जोड़?' वहां पिता-बेटी ने मिलकर कैसे की सबकी बोलती बंद

‘जो सूबा किसी जमाने में कोख में ही कन्या पर कयामत ढहाने के लिए कुख्यात/ बदनाम था! कन्या को साक्षर बनाना जिस सर-ज़मीं पर किसी जुर्म से कम नहीं था! जानकी (बेटी) को जन्म देने वाली जननी (मां) को जहां, हासिल कराई जाती थी जलालत-भरी जिंदगी! शायद ऐसी ही तमाम बदकिस्मत लड़कियों/महिलाओं की जिंदगी संवारने की खातिर जन्मा होगा, सन् 1928 के आसपास हरियाणा में वो लड़का जिसकी, आज उम्र है 90 साल. वह बुजुर्ग जिसने कालांतर में ‘बाबुल’ (पिता) बनते ही ‘बेटी-बहू’ की जिंदगी के हर ‘नासूर’ को कर डाला नेस्तनाबूद.

अपनों द्वारा चलाई गई विरोधी तपिश की तूफानी-हवाओं के थपेड़ों से बेफिक्र होकर जिसने कभी, अतीत के पत्थरों पर खुद के नाखूनों से लिख दी थी वह नजीर. जिसे न अब तक कोई मिटा पाया. न आने वाली पीढ़ियां आईंदा जिसकी, लिखी इबारत को मिटाने का हुनर या कुव्वत खुद में पैदा करा पाएंगीं.’ ‘संडे क्राइम-स्पेशल’ की ‘ऑफ-बीट’ स्टोरी में इस बार मैं आपको रु-ब-रु करा रहा हूं. उस बाबुल (पिता) से जो खुद पूर्णत: निरक्षर यानी अंगूठा-टेक रहे. कुनवे की बेटियों को पढ़ाने की ललक में जिन्होंने मगर, चंदा करके खुलवा डाला गांव में ही ‘कन्या-गुरुकुल’. जमाने में उस तकिया-कलाम को खुलेआम चिढ़ाते हुए जिसमें कभी कहते थे, ‘म्हारे हरियाणे में अंग्रेजी और पढ़ाई से छोरियों का के जोड़?’

देश के मशहूर घोड़ा-व्यापारी की हैरतंगेज हसरत

हरियाणा राज्य के जींद जिले की तहसील है नरवाना. इसी के अंतर्गत स्थित है गांव काना- खेड़ा. जाट-बाहुल्य इसी गांव में हुआ था देश के मशहूर घोड़ा व्यापारी सरुप सिंह का जन्म. यह बात है 1800 के अंत और 1900 ईस्वी के शुरुआती दिनों की. यानी अब से करीब 100 साल से भी ज्यादा पहले की. नौजवानी में ही सरुप सिंह हिंदुस्तान के मशहूर घोड़ा व्यापारियों में शुमार होने लगे थे. मुंबई, गोवा और गुड़गांव (अब गुरुग्राम, दिल्ली से सटा हरियाणा राज्या का जिला) में सरुप सिंह की टक्कर का घोड़ों की खरीद-फरोख्त करने वाला दूसरा व्यवसायी नहीं था. सरुप सिंह और प्यारी के 8 बेटे और 2 बेटियों सहित 10 संतानों (भरपूर सिंह नैन भूर, जर्मन सिंह, दलेल सिंह, भूम सिंह, राज सिंह, जापान सिंह, राम कुमार सिंह, दलबीर सिंह और बेटी माया व चंद्रवती) का जन्म हुआ. संतानों को सरुप सिंह का पढ़ाने का मन बहुत था, लेकिन संसाधन नहीं थे. यह बात है सन् 1930-35 के आसपास की. सरुप सिंह की दिली इच्छा थी कि चाहे जैसे भी हो उनका कुनबा (विशेषकर बेटियां) उच्च-शिक्षित बने. यह अलग बात है कि सरुप सिंह हसरत को दिल में समाये हुए ही जमाने से रुखसत हो गए.

पिता के सपनों को पुत्र ने दिए पंख

सरुप सिंह के सबसे बड़े पुत्र पहलवानी शौकीन भरपूर सिंह नैन ‘भूर’ और उनकी पत्नी कलावती ने कालांतर में कमाल कर दिया. बहू-बेटियों को पढ़ाने की पिता सरुप सिंह की अधूरी तमन्ना को पंख दिए पुत्र भरपूर सिंह नैन ने. पहले पांच भाइयों जर्मन सिंह (ग्रेजुएट), दलेल सिंह (लॉ ग्रेजुएट पेशेवर वकील), राज सिंह (रिटायर्ड पंचायत सेक्रेटरी), रामकुमार सिंह (रिटायर्ड कानूनगो हरियाणा राजस्व विभाग) और दलबीर सिंह (फार्मासिस्ट) को पढ़ा-लिखाकर स्थापित किया. जबकि खुद 20 साल गांव की सरपंची और खेती-किसानी करते रहे. भाइयों को पढ़ाने-लिखाने के बाद भरपूर को चिंता सताई, शहर में अपनी और भाइयों की संतानों को पढ़ाने की.

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‘अंगूठा-टेक’ पिता को बेटी की शिक्षा की चिंता

भरपूर सिंह के चार संतान बेटा महावीर सिंह (पटवारी थे, जिनकी कुछ समय पहले सांप के काटने से मृत्यु हो गई), कुलदीप सिंह, इकलौती बेटी शकुंतला और पुत्र सुरेंद्र सिंह हुए. 12 मई सन् 1966 को जन्मी बेटी शकुंतला जब चौथी कक्षा में पहुंची तो, भरपूर सिंह को पिता सरुप सिंह का अधूरा सपना याद आ गया. बड़ी होती बेटी शकुंतला की उच्च शिक्षा का इंतजाम गांव में कोई था नहीं. सो भरपूर सिंह नैन के सामने जब-जब बेटी शकुंतला पड़ती. उनका कलेजा मुंह को आ जाता. वजह वही कि पांचवी के बाद आखिर बेटी को कैसे और कहां पढ़ाएंगे? संसाधन जीरो थे. मार्गदर्शक कोई साथ नहीं था.

कैसी-कैसी मिसालें..मां निरक्षर और बेटी अंग्रेजी में एमए लॉ-ग्रेजुएट... यादगार लम्हें, मां कलावती के साथ शकुंतला ढुल, (मां कलावती का स्वर्गवास मार्च 2018 में हो चुका).

कैसी-कैसी मिसालें..मां निरक्षर और बेटी अंग्रेजी में एमए लॉ-ग्रेजुएट... यादगार लम्हें, मां कलावती के साथ शकुंतला ढुल, (मां कलावती का स्वर्गवास मार्च 2018 में हो चुका).

हसरत सुनकर अपने ही हंसने लगे

भरपूर सिंह नैन जानते थे कि जैसे ही बेटी शकुंतला और कुनबे की अन्य लड़कियों की पढ़ाई की बात उजागर होगी तो, घर-कुनबा-गांव में जग-हंसाई तय है. भरपूर सिंह ने जैसे ही परिवार की बेटियों की उच्च शिक्षा की बात का चर्चा किया. दबी जुबान ही सही वे गांव-कुनबा में हास्य का पात्र बन गए. परिणाम यह निकला कि अपनों के इस बेहूदा व्यवहार से हलकान भरपूर नैन एक दिन जिद पर उतर आए. उन्होंने गांव वालों को गांव में ही लड़कियों के लिए गुरुकुल (स्कूल) खोलने की मंशा बेखौफ जाहिर कर दी. तय रणनीति के मुताबिक एक कमेटी का गठन कर डाला. खुद कमेटी के प्रधान बन गए.

‘कन्या-गुरुकुल’ को पिता’ ने मांगा ‘चंदा’

बकौल शकुंतला ढुल, ‘गांव में ‘कन्या-गुरुकुल’ खोलने के लिए, पिता जी ने सबसे पहले चंदा इकट्ठा करना शुरू किया. यह बात है सन् 1970 के आसपास की. सन् 1971 में गांव के इसी गुरुकुल से पढ़कर 22-23 लड़कियों का पहला बैच निकला. सन् 1982 में पिता द्वारा चंदे की रकम से स्थापित इसी ‘गुरुकुल’ से मैंने भी फर्स्ट-डिवीजन 10वीं पास किया.’ अतीत का कड़वा सच सुनाते-सुनाते. शकुंतला की आंखों में मौजूद बेहाल आंसू बिलखकर बाहर आ गिरते हैं. मानो यह सब 36 साल पुरानी न होकर. बीते दो-चार दिन पहले की ही खट्टी-मीठी भूली-बिसरी यादें हों.

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पहलवान पिता बन गया ‘दूधिया’!

गांव में चंदे से बेटियों की शिक्षा-दीक्षा के लिए भरपूर सिंह नैन ने ‘गुरुकुल’ खुलवा दिया. लड़कियां पढ़ने भी लगीं. गांव का गुरुकुल मगर 10वीं तक की ही शिक्षा दे पा रहा था. सो घर-कुनबे की बेटियों को और भी उच्च शिक्षा की खातिर अनपढ़ और ठेठ पेशेवर किसान पिता ने नरवाना तहसील मुख्यालय में दूध की डेयरी खोल ली. दूध की डेयरी ‘मुनाफाखोरी’ के लिए नहीं. बेटियों को शहर लाकर उन्हें पढ़ाने के लिए खोली थी. पिता द्वारा बेटियों की पढ़ाई के लिए किए गए ‘भागीरथ’ प्रयासों का जिक्र करते हुए बताती हैं भरपूर सिंह नैन की इकलौती उच्च-शिक्षित बेटी शकुंलता ढुल.

‘जानकी’ के वास्ते ‘जनक’ की जमाने से बगावत!

‘जब मैं 4-5 साल की थी तो, दादी (शकुंतला के पिता भरपूर सिंह नैन की मां प्यारी) मेरे भाइयों को पहले ही चोरी-चोरी दूध पिला देती थी. यह बात पिता को पता लगी. वे दादी से चार कदम आगे निकले. जब तक दादी मेरे भाइयों को दूध पिलाएं उससे पहले ही, पिता ने भैंसों के तबेले में ही दरवाजे के पीछे छिपाकर मुझे छककर दूध पिलाना शुरू कर दिया. यह बात बाद में खुली तो दादी ने पिता जी को खूब खरी-खरी सुनाई. पिताजी मगर चुप लगा गए. वे जानते थे कि मां के मुंह लगने से कोई फायदा नहीं है.’ 50 साल पुरानी खट्टी-मीठी भूली-बिसरी यादों को सुनाते-सुनाते आज बेसाख्ता खिलखिला पड़ती हैं शकुंलता ढुल.

बाबुल के मजबूत कंधे और घुड़सवारी

‘मैं जब 5-6 साल की थी तो, पंचायतों में पिता के कंधे पर बैठकर जाया करती थी. पंचायत में पिता फैसले सुनाते रहते थे. मैं उनके कंधे-गोदी में चढ़कर हुड़दंग मचाती रहती. आज तक याद है पापा के साथ बुलट-मोटर साइकिल की पेट्रोल-टंकी के ऊपर बैठकर गांव की गलियों में चक्कर काटना. कालांतर में मैंने बुलट मोटर साइकिल चलाना और घुड़सवारी भी सीखी. इस सबसे बेहाल कुछ गांव वाले पिताजी से अक्सर कहते भी थे कि, ‘रे भूर लौंडिया ने तू के बनाये कै छोड़ैगा?’ (अरे भूर यानी शकुंतला के पिता तुम इस लड़की को क्या बनाकर छोड़ोगे?). पिता जी हंसकर आगे बढ़ जाते यह कहते हुए ‘देख्खत जा चौधरी. जो है सब सामड़े हैं. आगे भी जो होवैग्गा बढ्ढ़िया ही होवैगा चिंता न कारै.’

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पिता पढ़ाने पर और कुनबा शादी पर अड़ा

शकुंतला जब ग्यारहवीं जमात में आईं, तो कुनबे वालों ने घर-आंगन में उसकी शादी करने का रुक्का ( शोर) मचाना शुरू कर दिया. कुनबे वाले शादी का राग अलापते रह गए. तब तक नरवाना में भरपूर सिंह नैन ने बेटी का दाखिला इंटर में करा दिया. नरवाना के ही एस.डी. गर्ल्स कॉलेज से शकुंतला ने हवा के रुख के खिलाफ दौड़ते-भागते स्नातक कर लिया. पिता सरुप सिंह का सपना और खुद की जिद भरपूर सिंह नैन पूरी कर चुके थे. सो सन् 1986 में 20 साल की उम्र में बाबुल ने (भरपूर सिंह) ने ग्रेजुएट बिटिया शकुंतला के हाथ पीले कर दिए.

गांव की पहली ‘ग्रेजुएट’ बेटी ने तोड़े रिवाज!

शकुंतला काना-खेड़ा गांव की पहली ग्रेजुएट लड़की बनी. शकुंतला की शादी तय हुई गांव ईक्कस, जिला जींद हरियाणा निवासी वन-विभाग में डिप्टी रेंजर दिलबाग सिंह से. यह बात है 1986 की. शकुंतला गांव-कुनबे की वह पहली लड़की थी जिसकी, ‘रिंग-सेरेमनी’ यानि ‘टीके-रोक्के’ की रस्म हुई. काना-खेड़ा गांव में यह बात फैली तो कोहराम मच गया. समजा के कुछ कथित ठेकेदारों की सोच थी कि, पहले तो जबरिया लड़की को ग्रेजुएट तक पढ़वा डाला. उसके बाद शादी से पहले ही ‘रिंग-सेरेमनी’ करके भरपूर सिंह नैन (शकुंतला के पिता) गांव-समाज के रीति-रिवाजों को भी अंगूठा दिखा रहे हैं. यह अलग बात थी कि, कथित ठेकेदार यहां भी मन मसोस कर रह गए.

बहू के ‘घूंघट’ को लेकर ब्याह में बबाल

शकुंतला ने शादी में सात-फेरे (भांवरे) लेते वक्त ‘घूंघट’ नही किया. समाज के बिलबिलाए चंद मठाधीशों ने घर-आंगन से लेकर चौपाल तक कोहराम मचाया. पिता-पुत्री सहित भरपूर सिंह का घर-कुनबा समाज के कथित ठेकेदारों के निशाने पर आ गया. घूंघट वाले मुद्दे पर जब शकुंतला के पति और शकुंतला के ससुराल पक्ष ने ठेकेदारों को आड़े हाथ लिया तो, वे ठंडे पड़ गए. इस मोर्चे पर पिता और खुद की ‘यादगार-जीत’ के लिए शकुंतला ढुल सीधे-सीधे पति दिलबाग सिंह ढुल और ससुराल पक्ष से मिले अविस्मरणीय सहयोग को पूरा-पूरा श्रेय देना आज भी नहीं भूलती हैं.

जिंदादिल जीवन-साथी..पति दिलबाग सिंह ढुल के साथ शकुंतला...जिन्होंने एलएलबी (कानून की पढ़ाई) पूरी करने पर पत्नी भेंट की थी सेंट्रो कार

जिंदादिल जीवन-साथी..पति दिलबाग सिंह ढुल के साथ शकुंतला...जिन्होंने एलएलबी (कानून की पढ़ाई) पूरी करने पर पत्नी भेंट की थी सेंट्रो कार

छोरी को ‘एम.ए.अंग्रेजी’ में देख छोरे ‘बेहाल’

समय के साथ कालांतर में शकुंतला, बेटी निधि की मां बन गई. इसके बाद भी पढ़ाई की ललक मगर कम नहीं हुई. पति दिलबाग सिंह ने आर.के.एस.डी. डिग्री कॉलेज कैथल में एमए में एडमिशन करवा दिया. जाट की छोरी ने सब्जेक्ट चुना ‘अंग्रेजी’. हरियाणा की लड़की को एम.ए. अंग्रेजी में करते देख कॉलेज में पढ़ने पहुंचे लड़के हैरत में थे. शकुंतला बताती हैं, ‘दरअसल शादी के बाद ससुराल पहुंची. वहां जेठ (पति के बड़े भाई) के बच्चों को अंग्रेजी में बोलते-पढ़ते देखा-सुना. मन में आया कि अगर मैं, खुद अंग्रेजी नहीं पढूंगी तो बच्चे सोचेंगे कि मां को अंग्रेजी नहीं आती है. संभव था कि इससे बच्चों के मन में ग्लानि या हीन-भावना उत्पन्न हो जाए. बस इसी जिद या जुनून अथवा ललक कहिए, मैंने एम.ए. अंग्रेजी से करने की ठान ली.’

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पढ़ते-पढ़ते हो गईं जब बेहोश

‘मेरे लिए एम.ए. अंग्रेजी से करना नाखूनों से पहाड़ काटने के बराबर था. बच्चों के भविष्य और पिता की दृढ़ इच्छाशक्ति ने मगर अंग्रेजी में एम.ए. करने के लिए उकसाया. अंग्रेजी आसानी से याद नहीं होती थी. इसलिए अंग्रेजी लिख-लिखकर रजिस्टरों के ढेर लगा लिए घर में. जैसे-तैसे भागीरथ प्रयासों से सन् 1990 में मैंने एम.ए. अंग्रेजी कर लिया. यह अलग बात है कि शारीरिक कमजोरी और जरूरत से कहीं ज्यादा परिश्रम के चलते एक रात मैं पढ़ते-पढ़ते बेहोश होकर गिर पड़ी थी. पानी के छींटे और डॉक्टर जैसे-तैसे होश में ला पाए.’ खुद की कमजोरियों को भी खुलेआम बताती हैं बेखौफ शकुंतला.

वक्त बलबान है...किसी जमाने में YES को S लिखने वाली लड़की शकुंतला ढुल एम.ए. अंग्रेजी, लॉ ग्रेजुएट बनने के बाद चेयरपर्सन गुरुग्राम चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के रूप में

वक्त बलबान है...किसी जमाने में YES को S लिखने वाली लड़की शकुंतला ढुल एम.ए. अंग्रेजी, लॉ ग्रेजुएट बनने के बाद चेयरपर्सन गुरुग्राम चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के रूप में

Yes को S लिखने वाली अंग्रेजी में ‘M.A.’

अमूमन शेखी बघारने के चक्कर में इंसान अपनी कमजोरियों को छिपाता है. शकुंतला ढुल यहां भी भीड़ से अलग साबित हुईं. बताती हैं, ‘अंग्रेजी में मेरी नींव बेहद कमजोर थी. YES को S लिखती थी. इस आलम में भी अंग्रेजी से एम.ए. की कल्पना कोरी बकवास या सफेद झूठ से ऊपर कुछ नहीं हो सकता.’ इन तमाम कमजोरियों के बाद भी शकुंतला के जज्बे ने, उन्हें 52 फीसदी अंकों के साथ एम.ए. अंग्रेजी में करवा दिया. इस सफलता के पीछे छिपी दहला देने वाली सच्चाई यह भी है कि, शकुंतला ने अंग्रेजी में एम.ए. करने की खातिर दुधमुंही बेटी निधि को 2 साल तक मायके (निधि की ननिहाल) में रखा.

जब बहू से बोली सास- नौकरी अभी नहीं!

मौजूदा समाज में टीवी से लेकर घर-गली-मोहल्ले तक में. सास-बहू के बीच जूतम-पैजार ही होती देखी जा रही है. शकुंतला की सास राज कौर ने मगर यहां मिसाल कायम कर दी. शकुंतला को लेक्चरर की नौकरी मिली. तो पति और सास ने नौकरी कराने से मना कर दिया. सास बोलीं कि, ‘बहू का अभी पढ़ाई की उम्र और वक्त है. जितना ज्यादा संभव हो पढ़-लिख ले. नौकरी तो बाद में कभी भी कर लोगी.’ 1990 के बाद बेटी निधि को हॉस्टल भेज दिया. उसके बाद शकुंतला ने ‘कम्प्यूटर-डिप्लोमा’ कर लिया. इसी बीच सन् 1996 में पुत्र लक्ष्य का जन्म भी हुआ.

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मर्दानी ने शादी में पहनी साड़ी

भरे-बदन, मजबूत कद-काठी. मर्दाना चाल-ढाल के चलते शकुंतला ‘मर्दानी’ के नाम से चर्चित थीं. बचपन में गांव में पिता के साथ खेतों की मेढ़ पर बैठकर हिसाब-किताब जुड़वाती थीं शकुंतला. उसी लड़की शकुंतला ने सन् 2010 में सरसावां कॉलेज यमुनानगर (हरियाणा) से वकालत की डिग्री हासिल कर ली. जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव भरे रास्तों से गुजरकर ‘पर्वतारोही’ सी बन चुकी शकुंतला के मुताबिक, ‘एल.एल.बी की डिग्री हासिल की तो, पति ने गिफ्ट में सेंट्रो कार दी थी.’ 2010 में पंचकुला शिफ्ट होते ही शकुंतला ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी.

खुद नहीं पढ़ सके तो क्या हुआ...कुनबा तो पूरा पढ़ा लिया...पिता भरपूर सिंह नैन 'भूर' और बेटी निधि (बाएं खड़ी हुई) और कुनबे के बच्चों के साथ शकुंतला ढुल.

खुद नहीं पढ़ सके तो क्या हुआ...कुनबा तो पूरा पढ़ा लिया...पिता भरपूर सिंह नैन 'भूर' और बेटी निधि (बाएं खड़ी हुई) और कुनबे के बच्चों के साथ शकुंतला ढुल.

‘हिना’ रंग तो लाई मगर धीरे-धीरे…

कालांतर में अंग्रेजी की ‘ABCD’ से अनजान शकुंतला को सितंबर 2014 में उनकी काबिलियत के मद्देनजर. गुरुग्राम (गुड़गांव) चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) का ‘चेयरपर्सन’ नियुक्त कर दिया गया. यहां उल्लेखनीय है कि शकुंतला को, ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ दिल्ली की साकेत कोर्ट में मेट्रोपॉलिटिन मजिस्ट्रेट दामाद सुधीर सिंह सिरोही (बेटी निधि के पति) ने पढ़ाया. हमेशा हवा के विपरीत उड़ान भरने की माहिर शकुंतला बेलाग होकर बताती हैं. शकुंतला का बेटा लक्ष्य फिलहाल महाराष्ट्र में एम.बी.बी.एस. (अंतिम वर्ष) की पढ़ाई कर रहा है.

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पति बोले बुढ़ापे में पत्नी ग्राम-प्रधान बनेगी..!

‘एक दिन ज्योतिषी ने बताया कि तुम्हें बहुत ऊंची कुर्सी मिलने वाली है. इस पर पति दिलबाग सिंह जोर से हंस पड़े. बोले 45 साल की अधेड़ जाट औरत (शकुंतला ढुल) हरियाणा में ‘ग्राम-प्रधान’ से ज्यादा कुछ नहीं बन सकती! इसके दो चार दिन बाद ही दामाद सुधीर सिरोही ने हरियाणा में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) में चेयरमैन/मेंबर की वेकेंसी निकलने की चर्चा की. मैंने फार्म भर दिया. मैं चेयरपर्सन नियुक्त हो गई. कल तक जो सबकुछ, वक्त, मेहनत और मेरी मुट्ठियों में छिपा था. आज खुद अपने सामने देख रही हूं. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की चेयरपर्सनशिप के दौरान मुझे अपने सहयोगी सदस्यों शेखर जैन, ममता रानी और मीना शर्मा का भी अविस्मरणीय सहयोग हासिल हो रहा है.’ बजरिए ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ के पाठकों तक बेबाकी से खुद की जिंदगी का हर लम्हा-लम्हा पहुंचाने वाली शकुंतला ढुल, बेतहाशा खिलखिलाकर हंस पड़ती हैं. वही ‘वकीलिन’ शकुंतला जो कभी, बीते कल में अंग्रेजी में ‘Yes’ को ‘S’ लिख दिया करती थीं.

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं)

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