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पुलिस ने जिसे संसद में नहीं घुसने दिया, इंदिरा ने उसी इंस्पेक्टर को दोबारा SHO बना दिया!

दिल्ली के दबंग रिटायर्ड असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर (एसीपी) ठाकुर कंछी सिंह सुना रहे हैं, अपने जमाने की कहानियां, आखिर कैसे वो गरीब बेटे से धाकड़ एसएचओ बने.

Updated On: May 20, 2018 01:12 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पुलिस ने जिसे संसद में नहीं घुसने दिया, इंदिरा ने उसी इंस्पेक्टर को दोबारा SHO बना दिया!
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‘बात है सन् 1939-40 के आसपास की. मेरी उम्र रही होगी 10-11 साल. चौमास (बरसात) के दिन थे. मूसलाधार बारिश हो रही थी. एक दिन नाई ने गांव में थानेदार के आने की ‘मुनादी’ ढोल बजाकर की. दारोगा के डर से गांव के बड़े-बूढ़ों (बुजुर्गों) ने बच्चों-औरतों को घरों के भीतर कैद कर दिया. बाहर से दरवाजों पर ताला लगा दिया. दारोगा के गांव में पहुंचने के इंतजार में बुजुर्ग, घरों की देहरी-चौपालों पर बैठ गए. उस दिन मुझे थानेदार के 'रुतबे और खौफ' का अहसास हुआ था. उसी दिन 'थानेदार' बनने की मन में ठान ली. इस बात को 80 साल हो चुके हैं. बाद में मैं थानेदार भी बना.'

'अब वक्त बदल चुका है. पुलिस बदल चुकी है. मैं और मेरी यादें आज भी वैसी ही हैं, जैसी आठ दशक पहले थीं. अगर साथ छोड़ रही है तो मेरी याददाश्त. बुढ़ापे से जूझते बदन की लम्हा-लम्हा कम होती ताकत. यह विधाता का लिखा सच है. परमात्मा ने अपने इस लिखे को मिटाने की 'रबड़' नहीं बनाई. वरना जमाने वालों को वो रबड़ भी मेरी जेब में मौजूद मिलती. 90 साल की जिंदगी में हासिल लाखों 'खुशियों' की गठरी में लगी 'बेबसी' की इस गांठ को खोलने में अब बेजान ऊंगलियाँ भी साथ नहीं देतीं.’

यादों की गठरी खोलते-बांधते ‘बुढ़ापे’ की देहरी पर खड़े, ‘जवानी’ की यादों को करवटें दिलाते वक्त, दिल्ली के दबंग रिटायर्ड असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर (एसीपी) ठाकुर कंछी सिंह की डबडबा आई आंखों में भरे आंसू उनकी ही बूढ़ी हो चुकी बाजूओं पर गिरकर फूट जाते हैं.

90 साल पहले अलीगढ़ का गांव दौरऊ चांदपुर

पेशे से किसान ठाकुर देवी सिंह की पत्नी सोमवती सिंह ने सन् 1928 में बेटे को जन्म दिया. नाम रखा गया कंछी सिंह. दूसरी संतान के रूप में बेटी रेवती का जन्म हुआ. जब कंछी सिंह छोटे थे, तभी पिता की मृत्यु हो गई. फलस्वरूप कंछी का पालन-पोषण इस कदर गरीबी में हुआ कि दो-दो दिन तक उन्हें भूखे सोना पड़ा. 1 जनवरी सन 1937 को अमृतपुर प्राथमिक विद्यालय में दाखिला हुआ. स्कूल रिकॉर्ड में जन्म-तिथि लिखी गई 1 जनवरी 1931. आठवीं जमात में अंग्रेजी पढ़ने के लिए वीरपुरा गांव स्थित विद्यालय जाने लगे. इसी बीच 1945 में सिर से मां का साया भी उठ गया. 1949 में दसवीं का रिजल्ट आया. पूरे स्कूल में 5 लड़कों की फर्स्ट डिवीजन आई. उनमें एक नाम ठाकुर कंछी सिंह का भी था.

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साइंस पढ़ने की ललक थी, उसी में 2 बार फेल हुए.

‘11वीं में धर्म समाज कॉलेज अलीगढ़ में एडमिशन ले लिया. प्रिंसिपल थे वंश गोपाल झींगरन. यू.एन. सिंह मैथ पढ़ाते थे. बाद में यू.एन. सिंह दिल्ली विवि के वाइस-चांसलर बने. साइंस पढ़ने की ललक बेइंतहा थी. मगर ललक से ज्यादा परेशानी साइंस पढ़ने-समझने में थी. लिहाजा मैं इंटर में साइंस में दो बार फेल हो गया. जैसे-तैसे थर्ड डिवीजन इंटर साइंस से पास कर लिया. एक मजिस्ट्रेट की 'जुगाड़' से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बीएससी में एडमिशन लिया. रो-धोकर दो साल में थर्ड डिवीजन ही बीएससी कर सका. सन 1957 में खींचतान करके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही केमिस्ट्री में एमएससी कर लिया. उस वक्त यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे डॉ. जाकिर हुसैन. ए.आर. किदवई साहब (बाद में बिहार के राज्यपाल भी बने) मुझे केमिस्ट्री पढ़ाते थे.’ 70 साल पहले की खुद की खट्टी-मीठी जिंदगी बयान करते हुए खूब हंसते हैं ठाकुर कंछी सिंह.

 50 साल पहले छापे के दौरान बरामद माल दिखाते हुए रिटायर्ड एसीपी ठाकुर कंछी सिंह.


50 साल पहले छापे के दौरान बरामद माल दिखाते हुए रिटायर्ड एसीपी ठाकुर कंछी सिंह.

केमिस्ट्री में फेल हुए, बाद में उसी के टीचर बने

यादों के पन्ने पलटते-पलटते अचानक ठाकुर कंछी सिंह ठहाका मारकर हंसने लगते हैं, कहते हैं 'लो सुनो अगर मेरा अतीत ही सुनने आये हो तो, मैं साइंस में कई बार फेल हुआ. बीएससी में सिफारिश से एडमिशन लिया. इसके बाद भी सन 1957 में मैं सरस्वती विद्यालय इंटर कॉलेज में 12वीं क्लास के छात्रों को फिजिक्स-केमिस्ट्री पढ़ाने जाने लगा. एक साल तक खूब पढ़ाया भी.’ सुनाते-सुनाते फिर बेसाख्ता हंस पड़ते हैं कंछी सिंह और ठहाका मारते हुए मुझसे ही सवाल करते हैं... ‘अगर मैं न बताऊं तो भला कौन कहेगा कि, मैं जिस सब्जेक्ट का सबसे कमजोर स्टूडेंट था, उसी का 'टीचर' भी रहा होऊंगा?

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फिर भी थानेदार बनने की ललक कमजोर नहीं हुई

‘बतौर साइंस स्टूडेंट कमजोर जरूर था. थानेदार बनने की तमन्ना मगर कभी कम नहीं होने दी. सन 1957 में स्पेशल कैटेगरी में दिल्ली पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर की परीक्षा दी. 5 मार्च, 1958 को दिल्ली पुलिस में थानेदारी मिल गई. जब खाकी वर्दी पहनी तब अहसास हुआ कि, दारोगा क्या होता है? यह सपना उसी दिन से आंखों में पला हुआ था, जब मेरी 10-11 साल की उम्र में गांव में थानेदार के पहुंचने की मुनादी नाईं ने ढोल बजाकर की थी. गांव के हम सब बालकों को मकानों में बंद करके दरवाजों पर बुजुर्गों ने ताले जड़ दिए थे, थानेदार के भय से.’ बताते हैं ठाकुर कंछी सिंह.

वर्दी में गांव पहुंचा तो वो खुशी से लिपट कर रो पड़ी

‘दिल्ली पुलिस में थानेदार बनने के बाद पुलिस की वर्दी पहने हुए होली के मौके पर पहली बार गांव गया. गांव में काम करने आने वाली एक महिला मुझसे लिपट गई और खुशी के मारे जोर-जोर से रोने लगी... यह कहते हुए कि... ‘सब जने (गांव वासी) घरों से बाहर आओ. हमारे देवर (कंछी) दिल्ली को दारोगा बन के लौटे हैं.’ 60 साल पहले की यादें सुनाते हुए खूब हंसते हैं कंछी सिंह. 'दिल्ली पुलिस में दारोगा बनकर गांव पहुंचा, उससे पहले यह सूचना थाना चंदौस (हमारे गांव इलाके का थाना चंडौस) भी पहुंच चुकी थी. कौतुहल की वजह थी कि आस-पास के इलाके में और अपने गांव में उस जमाने में दारोगा बनने वाला मैं पहला युवक था. वो कंछी सिंह दिल्ली पुलिस में दारोगा बना था, दो-दो दिन तक जिसके पेट में रोटी का निवाला नहीं जाता था.'

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पूछते एमएससी पास हो तो पुलिस में क्यों आए?

'एमएससी तो पास कर लिया था. कैसे गिरते-पड़ते किया, यह अपनों के अलावा किसी को नहीं मालूम था. दिल्ली पुलिस की ट्रेनिंग के लिए फिल्लौर (पंजाब) गया. वहां मुझसे सवाल होने लगे. एमएससी करने के बाद मैं पुलिस की नौकरी करने क्यों आया? वे सब पूछ तो सच रहे थे, मगर मैं चुप लगा गया. यह सोचकर कि इन सबको दिल्ली पुलिस में जमने के बाद जवाब दूंगा. दिल्ली पुलिस में पहली पोस्टिंग मिली थाना कोतवाली चांदनी चौक.'

करीब 40 साल पहले एक पब्लिक मीटिंग को संबोधित करते हुए कंछी सिंह

करीब 40 साल पहले एक पब्लिक मीटिंग को संबोधित करते हुए कंछी सिंह

मां से किया वो विरोध याद था सो कसम खाई कि...

बकौल ठाकुर कंछी सिंह, ‘बचपन में मां, भतीजे की रोटी में घी कम लगातीं. मेरी रोटी में खूब घी लगातीं. यह बात मैंने कई बार ताड़ी थी. एक दिन मैंने मां को दो टूक कह दिया कि यह बेईमानी बंद कर दो तुरंत. दोनो की रोटियों में घी बराबर का लगाया करो. मां से किया हुआ वो विरोध मुझे याद था. भुखमरी तंगहाली से भरा बचपन याद था. सो दिल्ली पुलिस में भर्ती होते ही कसम खाई कि, चाहे भूखों ही फिर मरना पड़े रिश्वत नहीं लूंगा. किसी का दिल नहीं दुखाऊंगा.’ किसी के गले आसानी से न उतरने वाला जिंदगी का कड़वा सच बयान करते-करते कल के दिल्ली पुलिस के इस जिंदादिल पुलिस अफसर की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ आता है.

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पुलिस वालों ने ही जब मुझे संसद में जाने से रोका

'मैं 5-6 महीने असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर और करीब 6 साल सब-इंस्पेक्टर रहा. 1970 में थ्री-स्टार इंस्पेक्टर बन गया. 12-14 साल इंस्पेक्टरी की. रोशनआरा, सिविल साइंस, लाहौरी गेट, कनाट-प्लेस, मोती नगर, हौजखास आदि थानों में करीब 11 साल एसएचओ रहा. इंस्पेक्टर से एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) प्रमोट हुआ तो, सब-डिवीजन तिलक नगर में पोस्टिंग हुई. जिसके अंतर्गत तिहाड़ जेल, थाना जनकपुरी, कीर्ति नगर और नजफगढ़ आता था.'

आधी रात गवर्नर का थाने में छापा, सब गायब मिले!

दिल्ली पुलिस की नौकरी का मजेदार किस्सा सुनाने से पहले जी भरकर हंसते हैं ठाकुर कंछी सिंह, फिर बताना शुरु करते हैं... ‘1980-81 या 1981-82 की बात है. मैं उन दिनों मोती नगर थाने का एसएचओ था. रात करीब एक बजे अचानक थाने पर लेफ्टिनेंट गवर्नर जगमोहन ने छापा मार दिया. सभी पुलिसकर्मी नाइट गश्त पर थे. उप-राज्यपाल को थाना खाली मिला. मैंने उन्हें उसी वक्त वो रजिस्टर दिखाया, जिसमें हर पुलिसकर्मी की ड्यूटी का प्वाइंट लिखा था, जिसे देखकर गवर्नर बहुत खुश हुए. यह अलग बात है कि उस रात थाने के गेट पर वर्दी में अकेला मैं गवर्नर को खड़ा मिला. थाने के बाहर मैंने लिखा था, 'अगर आप मेरी सेवा से प्रसन्न हैं तो सबको बताएं, असंतुष्ट हैं तो मुझको बताएं.' उपराज्यपाल ने पढ़ा और संतुष्ट होकर लौट गए. अगले दिन अखबारों में खबर सुर्खियों में छपी. पूरी दिल्ली पुलिस में कंछी सिंह-कंछी सिंह पढ़ा जा रहा था.’

गवर्नर के छापे में थाना खाली फिर भी मैडम खुश!

'आधी रात को मोती नगर थाने पर गवर्नर साहब के छापे के दौरान अकेला मैं थाने में मुस्तैद मिला. यह खबर हमारी डीसीपी (जिला पुलिस उपायुक्त) किरन बेदी ने भी पढ़ी. बोलीं, ‘कंछी सिंह आप तो आज अखबारों में छाए हुए हो. शाबास...’ इसके बाद उन्होंने मुझे उस जमाने में 500 रुपये का नकद इनाम (रिवार्ड) दिया.' यादों की किताबों में सिकुड़ा-सिमटा पड़ा करीब 40 साल पहले का वो किस्सा, आज शान से सुनाते हैं ठाकुर कंछी सिंह.

पुड्डूचेरी की उप-राज्यपाल और भआरत की पहली पूर्व महिला आईपीएस किरन बेद ... सिंह (बांये गले में माला डाले हुए).

पुड्डूचेरी की उप-राज्यपाल और भआरत की पहली पूर्व महिला आईपीएस किरन बेदी ... कंछी सिंह (बांये गले में माला डाले हुए).

चाहता तो उस रात मैं भी करोड़पति हो जाता!

मोती बाग थाने में पोस्टिंग के दौरान कंछी सिंह की जिंदगी में एक वो रात भी आई, जब वो करोड़पति बन सकते थे. ऐसा मगर वे कर नहीं पाए. उनके करोड़पति बनने में रोड़ा बने उनके बचपन के वो दिन, जब उन्हें अक्सर गरीबी के चलते भूखे सो जाना पड़ता था. बकौल कंछी सिंह, ‘मैं नाइट ड्यूटी में पिकेट पर था. तभी कई लाख कैश ले जा रहे शख्स को दबोच लिया. वो आधा कैश मुझे देने की मिन्नतें करता रहा. मैंने वो लाखों रुपया न खुद लिया न उस बेईमान आदमी को दिया. पूरा कैश 'लावारिस' दिखाकर सरकारी मालखाने में जमा कर दिया. बेईमान को सफल नहीं होने दिया और मैं भी अपना दामन साफ बचा गया.’ रौब से बताते हैं कंछी सिंह.

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मैं न पहुंचता तो आधी तिहाड़ जेल खाली हो जाती!

यादों के दस्तावेजों को झाड़ते-पोंछते हुए कंछी सिंह को ध्यान आती है वो सुबह, जब कुख्यात अंतरराष्ट्रीय अपराधी बिकनी किलर हतचंद भाओनानी गुरुमुख चार्ल्स शोभराज एशिया की सबसे सुरक्षित तिहाड़ जेल से फरार हो गया. दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना पाकर बहैसियत सब-डिवीजन एसीपी (थाना जनकपुरी) कंछी सिंह सबसे पहले तिहाड़ जेल पर पहुंचे. ‘तिहाड़ के सभी दरवाजे खुले पड़े थे. तिहाड़ के पहरेदार नशे में बेसुध इधर-उधर जमीन-कुर्सियों पर मरणासन्न हाल में थे. उनके ‘लोडेड-हथियार’ यहां-वहां बिखरे हुए थे. कुछ कैदी बढ़िया मौका हाथ लगा देखकर दबे पांव जेल के दरवाजे से बाहर निकल रहे थे. मैंने उन्हें समझा-बुझाकर रोका. अगर उस दिन मैं तिहाड़ जेल पर न पहुंच जाता, तो शायद आधी तिहाड़ जेल खाली हो चुकी होती.’ बेबाकी से बताते हैं ठाकुर कंछी सिंह.

संसद के गेट पर मुझे ही पुलिस वालों ने रोक लिया

‘एक बार मैं प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलने संसद भवन गया. उन दिनों संसद का सत्र चल रहा था. गेट पर मुझे सुरक्षाकर्मियों ने रोक लिया. मैंने उनसे लाख कहा कि मैं इंस्पेक्टर ठाकुर कंछी सिंह हूं. इसके बाद भी सुरक्षाकर्मियों को मैं यह विश्वास नहीं दिला पाया कि मैं ही कंछी सिंह इंस्पेक्टर हूं, जिसके चर्चे अक्सर अखबारों और दिल्ली पुलिस में होते हैं. लिहाजा मिसेज गांधी के राइट हैंड दिल्ली के एक हाई-प्रोफाइल नेता जी ने उस दिन मुझे मैडम गांधी से संसद भवन में उनके कार्यालय में मिलवाया.’

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नेता ने हटवाया, इंदिरा गांधी ने एसएचओ लगाया

ईमानदारी और खुद्दारी के लिए दिल्ली पुलिस में मशहूर कंछी सिंह के मुताबिक, ‘कनाट प्लेस थाने का एसएचओ रहते हुए एक बार मैंने दिल्ली के एक मशहूर बिजनेसमैन को चोरी के सामान सहित गिरफ्तार कर लिया. एक हाई-प्रोफाइल नेता ने उसे छुड़वाने की सिफारिश लगाई. मैंने कहा चोरी का माल वापिस करवा दो, तब छोड़ने की सोचूंगा. नेता ने सामान वापिस नहीं कराया. मैंने आरोपी को छोड़ा नहीं. लिहाजा उस कद्दावर नेता ने मेरा ट्रांसफर हौजखास थाने में करा दिया. मैं अड़ गया कि जब मेरी गलती नहीं तो फिर ट्रांसफर क्यों? बात प्रधानमंत्री मैडम इंदिरा गांधी तक गई. उन्होंने मुझे उसी कनाट प्लेस थाने का दोबारा एसएचओ बना दिया. जो आईपीएस अफसर अपनी कार में मुझे बैठाकर, मैडम इंदिरा गांधी के कहने पर दोबारा उसी कनाट प्लेस थाने का एसएचओ का चार्ज दिलवाने गए, वे बाद में तिहाड़ जेल के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए.’ गर्व से बताते हैं ठाकुर कंछी सिंह.

दिल्ली पुलिस की नौकरी के दौरान 50 साल पहले खीचं गये ब्लैक एंड व्हाइट फोटो की एलबम देखते कंछी सिंह

दिल्ली पुलिस की नौकरी के दौरान 50 साल पहले खीचं गये ब्लैक एंड व्हाइट फोटो की एलबम देखते कंछी सिंह

उत्तराखंड के गवर्नर के.के. पॉल मेरे एसीपी थे

दिल्ली पुलिस से 28 जून, सन 1991 (करीब 28 साल पहले) रिटायर हुए ठाकुर कंछी सिंह की यादों की किताबें बहुत वजनी हैं. रिटायरमेंट के वक्त कंछी सिंह क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल नानकपुरा में तैनात थे. उस वक्त दिल्ली के पुलिस कमिश्नर वेद मारवाह थे. बकौल कंछी सिंह, ‘जब मैं उत्तरी दिल्ली जिला के सिविल लाइंस थाने का एसएचओ था, उस वक्त आईपीएस डॉ. के.के. पॉल मेरे सब-डिवीजन के एसीपी हुआ करते थे. पॉल साहब भले ही दिल्ली पुलिस कमिश्नर से रिटायर होने के बाद गवर्नर बन चुके हों, मगर वे मेरा हाल-चाल आज भी पूछते रहते हैं. दिल्ली की भीड़ भरी जिंदगी में पुलिस की नौकरी के इतने साल बाद मेरे लिए भला इससे बड़ा और क्या सम्मान हासिल हो सकता है? डॉ. पॉल सा तेज-तर्रार मगर बेहद सुलझा हुआ 40-45 साल पुराना मेरा बॉस (आईपीएस) मुझे याद कर लेता है यही मेरी 'कमाई' है.’ बताते हुए एक बार फिर दिल्ली के इस दबंग पूर्व पुलिस अफसर की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़ते हैं.

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भूखे पेट सोने की तपस्या का फल 70 साल बाद मिला

बचपन में भूखे पेट कई-कई दिन सो जाने की बात ठाकुर कंछी सिंह को आज भी याद है. उनकी इसी सादगी और तपस्या में उनका बड़प्पन झलकता है. उन्हें आज कमी खलती है तो 1954 में साथ ब्याह कर आई पत्नी कांती देवी की. जो अब दुनिया में नहीं हैं. मगर भरा-पूरा परिवार उन्हें इस अकेलेपन का अहसास नहीं होने देता है. कंछी सिंह की तीन संतानों में बड़ी बेटी डॉ. शशि बाला सिंह डीआरडीओ में लाइफ साइसेंज में डायरेक्टर जनरल हैं. शशि बाला के पति डॉ. वाई.पी. सिंह रेलवे से इलाहबाद में डीआरएम पद से रिटायर हो चुके हैं. बड़े बेटे डॉ. ए.के. सिंह (अजय कुमार सिंह) इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेस, डीआरडीओ में निदेशक हैं. कंछी सिंह, बेटा अजय कुमार सिंह और बहु विजय लक्ष्मी सिंह (दिल्ली विवि में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर) के साथ ही रहते हैं. जबकि सबसे छोटा बेटा डॉ. राजीव सिंह और उसकी पत्नी निशा सिंह 1987-88 से अमेरिका में रह रहे हैं.

कंछी सिंह दुनिया में नहीं होगा तो याद आएगी....

चार-पांच घंटे चली लंबी बातचीत का दौर खत्म होते देख ठाकुर कंछी सिंह मुझे हाथ पकड़ कर बैठा लेते हैं...और कहते हैं 'सुनो मतलब की बात है...कल ठाकुर कंछी जब इस दुनिया में नहीं होगा तो और कोई नहीं बताएगा.' फिर कहते हैं, ‘पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की वो बात मुझे आज भी याद है और तुम भी (लेखक) गांठ बांधकर ले जाओ साथ. चौधरी साहब कहा करते थे कि भारत में तीन ही पदों की 'कुर्सी' सबसे पॉवरफुल हैं...पटवारी...एसएचओ… और जिलाधिकारी (डीएम). मैं इनमें से 'एसएचओ' मतलब सबसे पॉवरफुल तीन कुर्सियों में से एक पर बैठ चुका हूं. दुनिया से कूच करने से पहले. ईश्वर से और कुछ नहीं चाहिए.’

(स्टोरी ठाकुर कंछी सिंह से हुई लंबी बातचीत पर आधारित है)

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