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कभी ‘सजा-ए-मौत’ सुनाने के लिए चर्चित 'माई-लॉर्ड', अब जुटे हैं  ‘जिंदगी’ बांटने-बचाने में!

इलाके में कैंसर के मरीजों की रिकॉर्ड संख्या और इलाज का पूर्णत: अभाव. कुछ साल पहले यह खबर किसी तरह से दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एस.एन ढींगरा यानी शिव नारायण ढींगरा के कानों तक पहुंची

Updated On: Dec 02, 2018 09:42 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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कभी ‘सजा-ए-मौत’ सुनाने के लिए चर्चित 'माई-लॉर्ड', अब जुटे हैं  ‘जिंदगी’ बांटने-बचाने में!

'कल तक जो ‘माई-लॉर्ड’ यानी जस्टिस कहिए या फिर न्यायाधीश. न्याय के मंदिर में बैठकर 'सजा-ए-मौत' सुनाने के लिए चर्चित थे. सामने खड़े मुजरिम की ‘जिंदगी’ जिनके सामने पनाह मांगा करती थी. रिटायरमेंट के बाद न्याय के मंदिर के बाहर जब उनके पांव आये तो, अब वही माई-लॉर्ड ‘ज़िंदगियां’ बांटने-बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं. हिंदुस्तान के कहीं किसी बड़े नामी-गिरामी मेट्रो-शहर में नहीं. देश की राजधानी दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर. जमाने की भीड़ में खोए हुए अनजान से एक गांव में. आखिर कौन है यह अजूबा इंसान? और क्या है पूरी कहानी?' जैसे सवालों के जवाब पाने के लिए पढ़िए ‘SUNDAY CRIME SPECIAL’ की यह खास किश्त.

पंजाब के बठिंडा जिले का गांव अकलियां कलां

बठिंडा (बठिण्डा) पंजाब राज्य का पुराना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति-प्राप्त शहर (जिला मुख्यालय) है. यूं तो किसी जमाने में इस इलाके के बाशिंदों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. मालवा की सरहद में स्थित इस शहर और उसके आसपास के गांवों का इलाका इससे भी ज्यादा प्रसिद्ध इस बात के लिए है कि, कालांतर में गुरु गोविंद सिंह जी ने कई सौ साल पहले इसी बठिंडा के जंगलों में चुमक्का ताकतों को ललकारा था. दिल्ली से पंजाब के बठिंडा जिले की अनुमानित दूरी है करीब 350 किलोमीटर. यहां हम जिस गांव की बात कर रहे हैं उसका नाम है अकलियां कलां. बठिंडा और और उसके आसपास मौजूद 28 गांवों की अनुमानित आबादी होगी करीब 14-15 लाख. बठिंडा का ‘किला-मुबारक’ भी विशेष एतिहासिक महत्व रखता है.

पहले मुजरिमों को फाँसी पर लटकाते थे अब कैंसर से इंसानों को बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहे दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस शिव नारायण ढींगरा

पहले मुजरिमों को फांसी पर लटकाते थे अब कैंसर से इंसानों को बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहे दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस शिव नारायण ढींगरा

सफेद-कपासने इंसानी जिंदगी कालीकर दी!

किसी जमाने में बठिंडा और उसके आसपास के इलाके में कपास की सबसे ज्यादा खेती होती थी. कपास की पैदावार बढ़ाने और उसे कीड़े से बचाने के लिए कीटनाशक दवाईयां भी इस्तेमाल में लाई जाती थीं. उन केमिकल से कपास की खेती तो उन्नत होने लगी. पैदावार यानी फसल को भी नुकसान से बचा लिया गया. जाने-अनजाने में किसानों को मगर इसकी कीमत, खुद की आने वाली पीढ़ियों का ‘जीवन’ (उम्र)- दांव पर लगाकर चुकानी पड़ी. कपास को कीड़े से बचाने वाला कीटनाशक धीरे-धीरे जमीन, हवा और पानी में समाहित होता चला गया. शुरुआती कई दशक तो अंदाजा ही नहीं लगा कि, कपास की उन्नत फसल का यह उपाय, आने वाली पीढ़ियों को ही नेस्तनाबूद कर देगा. जब अहसास हुआ तब तक, बहुत देर हो चुकी थी.

रिसर्च के आंकड़ों ने चौंका दिया

कुछ साल पहले देखा गया कि, पंजाब में इसी जिले के आसपास के इलाकों में कैंसर जैसी घातक बीमारी के सबसे ज्यादा मरीज सामने आने लगे हैं. मरीजों की तादाद तो बढ़ती गई. सरकारी मशीनरी की लाल-फीताशाही यानी लेट-लतीफी के चलते, इलाज का मगर कोई माकूल और सस्ता उपाय नहीं हो सका. कुछ साल पहले इसके परिणाम यह सामने आए कि, बठिंडा के कई गांव पूरी तरह से कैंसर की चपेट में आ गए. मरीजों की बहुतायत और इलाज के लिए आसपास अस्पताल का नाम-ओ-निशां नहीं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के छात्रों ने इलाके पर रिसर्च की. पता चला कि, ऐसा कोई गांव नहीं बचा है, जिसके अंदर कैंसर के मरीज मौजूद न हों. आंकड़े तो यहां तक खतरनाक निकल कर सामने आए कि, हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों से 40 फीसदी ज्यादा कैंसर के मरीज सिर्फ इसी इलाके में मौजूद हैं. इन आंकड़ों के आधार पर ही बठिंडा इलाके को हिंदुस्तान में, ‘कैंसर-कैपिटल’ के नाम से जाना जाने लगा.

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ट्रेन जो, ‘कैंसर-वालीबन गई!

बठिंडा जिला मुख्यालय हो या फिर उसके आसपास के गांव. अथवा कोई अन्य पड़ोसी जिला मुख्यालय. कैंसर के इलाज की बात तो दूर की कौड़ी रही. कैंसर की फौरी (प्राथमिक) जांच-पड़ताल तक की सुविधा मयस्सर नहीं थी. न ही आज उपलब्ध है. इलाज के लिए यहां के कैंसर पीड़ित निर्भर हैं राजस्थान के श्रीगंगा नगर शहर पर. बठिंडा और श्रीगंगा नगर शहर के बीच एक ट्रेन चलती है. इस ट्रेन में आने जाने वाले ज्यादातर यात्री पंजाब के (बठिंडा) के कैंसर मरीज और उनके तीमारदार ही होते हैं. और तो और इलाके के आजिज कैंसर पीड़ितों ने अब इस ट्रेन का रोजमर्रा की भाषा में नाम ही ‘कैंसर-रेल’ (ट्रेन) रख दिया है!

दिल्ली दूर पंजाब के गांव में कैंसर-कैपिटल के नाम से बदनाम इलाके में कैंसर अस्पताल की नींव क्या रखी आम आदमी ने भी जिंदगी की इस जंग में कंधे से कंधा मिला लिया...बायें से दायें एस.एन.ढींगरा महताब सिंह के साथ

दिल्ली दूर पंजाब के गांव में कैंसर-कैपिटल के नाम से बदनाम इलाके में कैंसर अस्पताल की नींव क्या रखी आम आदमी ने भी जिंदगी की इस जंग में कंधे से कंधा मिला लिया...बायें से दायें एस.एन.ढींगरा महताब सिंह के साथ

इसलिए जरूरी था इलाके में कैंसर अस्पताल

इलाके में कैंसर के मरीजों की रिकॉर्ड संख्या और इलाज का पूर्णत: अभाव. कुछ साल पहले यह खबर किसी तरह से दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एस.एन ढींगरा यानी शिव नारायण ढींगरा के कानों तक पहुंची. बकौल एसएन ढींगरा,

‘जानकारी हैरत में डालने वाली थी. मुझे लगा कि मैं, यहां के कैंसर पीड़ित बेहाल लोगों के लिए कुछ मदद कर सकता हूं. मेरी इस सोच के पीछे दो वजह थीं. पहली वजह मैं चार साल से जस्टिस गोपाल सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट और सेवापंथी हॉस्पिटल ट्रस्ट दिल्ली का चेयरमैन हूं. दूसरे दिल्ली हाईकोर्ट जस्टिस पद से रिटायर होने के बाद, मेरे पास इस सेवा के लिए भरपूर समय और संसाधन मुहैया थे. जिन जरुरी चीजों का अभाव था, उन्हें मैं सामाजिक लोगों से और सेवा ट्रस्ट से पूरा कर पाने में भी सक्षम हूं.’

ट्रस्ट ने मदद की तो हिम्मत बढ़ी

एस.एन ढींगरा बताते हैं कि, ‘इस चुनौती पर खरा उतरने के लिए मैंने पंजाब में भाई कन्हैया चेरिटेबल ट्रस्ट से संपर्क साधा. उन लोगों को जब मेरे इरादों के बारे में पता चला तो, उन्होंने अकलियां कलां (गुनियाना मंडी के पास जैतू रोड) में हमें करीब सवा सात एकड़ जमीन कैंसर अस्पताल के लिए दान में दे दी. जिसका आज के वक्त में बाजार मूल्य होगा करीब 2 ढाई करोड़ रुपए. सेवापंथी गुरुद्वारे से जमीन मिलते ही मैंने स्थानीय लोगों और गुरुद्वारे की मदद से 300 बिस्तर के अस्पताल की नींव रखवा दी. हमारा इरादा है कि, हम 2021-22 तक यहां यह कैंसर अस्पताल पूरी तरह से शुरु करवा दें.’

निजी अस्पतालों से बचाना प्राथमिकता

‘300 बिस्तर का अस्पताल चालू होने में अभी वक्त लगेगा. तब तक पता नहीं और कितने ही निरीह लोग कैंसर से अकाल मौत की गोद में समा जाएंगे. लिहाजा मैं सोचता हूं कि, किसी तरह से अगले साल यानी सन् 2019 में यहां कैंसर की ओपीडी और कैंसर पता लगाने के लिए चलती-फिरती प्रयोगशाला (मोबाइल वैन) तो कम-से-कम शुरू हो ही जाए. ताकि स्थानीय कैंसर पीड़ित मरीजों को प्राइवेट डाक्टरों के यहां जाकर लुटना न पड़े. कम से कम उन्हें यह तो पता चल सके कि, आखिर उनकी बीमारी की स्टेज क्या है?’ बताते हैं एसएन ढींगरा. दिल्ली हाईकोर्ट जस्टिस रहते हुए संसद हमले के आतंकवादी अफजल गुरु को फांसी पर लटकवाने के बाद अब कैंसर पीड़ित मरीजों की तरफ रुझान कैसे?’ पूछने पर शिव नारायण ढींगरा दो टूक बताते हैं कि, ‘जब जो काम जिंदगी में मिला उसे शिद्दत ईमानदारी से किया. न कभी किसी का अहसान लिया. न किसी पर मैंने कोई अहसान किया.’

सेवा की असली मेवा गांव में ही मिलती है

इतने बड़े प्रोजेक्ट को दिल्ली या उसके आसपास स्थापित करने के बजाये पंजाब के दूर-दराज गांव में ही लगाने की क्यों सोची? पूछने पर पूर्व जस्टिस ढींगरा बताते हैं कि, ‘दिल्ली और उसके आसपास लूटने के लिए तमाम प्राइवेट अस्पतालों की पहले से ही भीड़ मौजूद है. मैं ट्रस्ट के जरिये जो काम कर रहा हूं, उसमें लूट की गुंजाईश नहीं है. सब सेवा-भाव है. असली सेवा शहर में कम, गांव-देहात पिछड़े और जरूरतमंद लोगों के बीच ही ज्यादा की जा सकती है. खाने-कमाने के लिए तो दिल्ली और उसके आसपास के ही इलाके में कई प्राइवेट अस्पताल हैं.’

बठिंडा के गांव अकलियाँ कलां में तीन अरब की लागत से निर्माणाधीन कैंसर अस्पताल

बठिंडा के गांव अकलियां कलां में तीन अरब की लागत से निर्माणाधीन कैंसर अस्पताल

इसलिए यादगार हैं जस्टिस गोपाल सिंह

इतने बड़े सेवा-भाव वाले प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी कंधों पर लेने का श्रेय एस.एन ढींगरा खुद को कतई देना नहीं चाहते हैं. वे इस सब नेक काम का श्रेय सीधे-सीधे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस स्वर्गीय गोपाल सिंह को देते हैं. गोपाल सिंह सन् 1973 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट रिटायर हुए थे. जिनकी सन् 1979 में मृत्यु हो गई. जिनकी प्रेरणा से जस्टिस गोपाल सिंह पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट खड़ा हो सका. बकौल एस.एन. ढींगरा, ‘यह ट्रस्ट सन् 1973 में बना था. 1983 से ट्रस्ट ने गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया.

मैं जस्टिस गोपाल सिंह पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट का जून 2011 में चेयरमैन बना था. तब से सकारात्मक कोशिशें जारी हैं.’ उनके मुताबिक बठिंडा में कैंसर जैसी घातक बीमारी को लेकर जो बदतर हालात है, उसके मद्देनजर ही मैं वहां 300 करोड़ की लागत से कैंसर अस्पताल खोलने की योजना अमल में लाया. इस काम में भाई कन्हैया चेरिटेबल ट्र्स्ट और सेवापंथी गुरुद्वारा टिकानाभाई जगताजी गुरुद्वारा एसोसियेशन ने करोड़ों रुपए की जमीन दान में देकर हमारे अभियान को आसान कर दिया.

कौन हैं जस्टिस एसएन ढींगरा

एस.एन ढींगरा के पूर्वज हरनौली, जिला मियांवाली (पाकिस्तान) के मूल निवासी थी. दादा लोकराम भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान हुए खून-खराबे में मारे गए. जबकि बंटवारे के ‘गदर’ में नाना उदयभान के पैर में गोली लगी थी. पिता करम चंद और मां रामबाई किसी तरह से बचकर गुरुग्राम (गुड़गांव, हरियाणा) के फरूखनगर में आकर बस गए थे. एस.एन ढींगरा का जन्म 12 मार्च सन् 1949 को फरुखनगर में हुआ. छह भाई बहन में एस.एन ढींगरा सबसे बड़े हैं. शिव नारायण ढींगरा ने दिल्ली में पढ़ाई पूरी की.

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उसके बाद 1976 में दिल्ली की तीस हजारी अदालत में वकालत शुरू की. 6 जनवरी सन् 1988 को ढींगरा दिल्ली हायर जुडिशियल सर्विसेज से एडिश्नल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज बन गए. पहली पोस्टिंग मिली तीस हजारी अदालत में जनवरी सन् 1988 में. बीते कल में भारतीय संसद पर हुए हमले के खूंखार मुजरिम को ‘फांसी’ के फंदे पर लटकवाने वाले शिव नारायण ढींगरा, अब कैंसर पीड़ितों को ‘जिंदगी’ बांटने की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं. श्री ढींगरा एक मार्च सन् 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस पद से रिटायर हो चुके हैं. मौजूदा समय में एस.एन ढींगरा 1984 सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय कमेटी के चेयरमैन हैं.

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