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बहुओं के साथ 56 की उम्र में M.A. कर रहा स्टूडेंट पुलिस का ‘हीरा’ है या ऑटोमैटिक मशीनगन!

ज्ञान उम्र का मोहताज नहीं है. न ही उसे रिश्तों की बेड़ी-बंदिशों से कोई बांध सकता है, इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान ने इसे साबित किया है

Updated On: Aug 19, 2018 09:15 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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बहुओं के साथ 56 की उम्र में M.A. कर रहा स्टूडेंट पुलिस का ‘हीरा’ है या ऑटोमैटिक मशीनगन!

ढलती उम्र की जिद और जज्बा वो ‘मंत्र’ है जो, बुढ़ापे में भी मात देने का माद्दा इंसान में पैदा कर सकता है. इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में आपको मैं ऐसी ही अजब शख्सियत से रु-ब-रु करा रहा हूं जो, ‘बढ़ती-उम्र’ को ‘चिढ़ाने’ के साथ-साथ, दिन-ब-दिन ‘नौजवानी’ से दोस्ती कर, बुढ़ापे से ‘दुश्मनी’ मोल लेकर उसकी ‘खिल्ली’ उड़ाने पर आमादा है.

56 साल की उम्र में भी जिसके बदन में, बुढ़ापे के किसी ‘अशुभ-इशारे’ की जगह मौजूद है आवाज में, 18-20 साल के युवक की सी खनक-ठसक. पांवों में गाय के बछड़े की सी ऊंची-ऊंची, टेढ़ी-मेढ़ी मन-मोहिनी कुलांचें मारने की चंचलता. किसी फुर्तीले ‘अश्व-शिशु’ के दुलत्ती मारने वाले पांवों की सी, बाहों में समाई काबिल-ए-गौर फौलादी ताकत. भूख से व्याकुल दूध के वास्ते बिलखते किसी मां के दुधमुंहे बालक की सी पढ़ने की हठ-ललक. नौजवानों के सामने भी, मोर्चे पर डटे पुलिस या फौजी के हाथों में मौजूद स्वचालित मशीनगन की सी धुंआंधार फायरिंग ‘स्पीड’ से तेज दौड़ने की रफ्तार!

पहले हम हैरान थे अब आप हैरत में आइए!

इस अजूबे इंसान के बारे में जब मैंने सुना तो सब बकवास और फरेब लगा. आमना-सामना हुआ तो, खुद की आंखें ही ‘झूठी’ सी लगने लगीं. सच तो मगर सच था. आखिर कब तलक कोई इंसान किसी सच को झुठला सकता है? वो चाहे मैं होऊं या फिर आप. मेरे सामने मौजूद शख्सियत का सच वही था जिस पर, मुझे ही विश्वास नहीं हो पा रहा था. जिससे सामना होने पर मेरे जेहन में यही सवाल कुलांचें मारता रहा कि, ‘खुद से आधी उम्र की दो-दो बेटों की पत्नी (पुत्र-वधू) के साथ M.A. कर रहा खाकी वर्दी वाला यह स्टूडेंट पुलिस का ‘हीरा’ है! या फिर रणभूमि में मोर्चे पर मौजूद फौजी के हाथ में मौजूद 56 साल पुरानी अंधाधुंध फायरिंग करने वाली कोई ऑटोमैटिक मशीनगन! ज्यों-ज्यों आप इस इंसान की साधारण सी जिंदगी की असाधारण किताब के पन्ने, मेरे साथ पलटना-पढ़ना शुरू करेंगे, त्यों-त्यों जेहन में उठ रहे तमाम ऊट-पटांग सवालों के सटीक जबाब आपको हासिल होते रहेंगे.

सन् 1962 का हरियाणा का गांव रनसी माजरी गांव

देश की राजधानी दिल्ली से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हरियाणा के रिवाड़ी जिले की बावल तहसील मुख्यालयांतर्गत स्थित है गांव रनसी माजरा (रणसी). किसान सुरजन सिंह पत्नी धनकौर के साथ इसी गांव में रहते थे. कालांतर में सुरजन सिंह-धनकौर दंपत्ति के दो बेटी सुरजो देवी, ज्ञाना देवी व चार पुत्र भरत सिंह, कन्हैया लाल, गुरु दयाल सिंह और 2 जून सन् 1962 को सबसे छोटे बेटे हीरा लाल बालियान का जन्म हुआ. उस जमाने में सुरजन सिंह करीब 20 वीघा जमीन के मालिक थे. कुल जमा इतने बड़े परिवार में भी दूध-दही से लेकर खाने-पीने-खेल-कूद से लेकर किसी चीज की कमी नहीं थी.

गांव के किसान हुए तो क्या हुआ...जन्म तो हीरा लाल बालियान जैसे फौज-पुलिस के रणबांकुरों को ही दिया..पिता सुरजन सिंह और माँ धनकौर.

गांव के किसान हुए तो क्या हुआ...जन्म तो हीरा लाल बालियान जैसे फौज-पुलिस के रणबांकुरों को ही दिया..पिता सुरजन सिंह और माँ धनकौर.

फौज-पुलिस और खिलाड़ियों का खानदान

वक्त गुजरने के साथ सबसे बड़ी बेटी सुरजो देवी का बेटा अजित सिंह दिल्ली पुलिस में सहायक सब-इंस्पेक्टर (पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज झड़ौदा) बन गया. दूसरी बेटी ज्ञाना देवी के तीनों बेटे राज सिंह (दिल्ली के थाना छावला में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर), राजेश (दिल्ली पुलिस के स्पेशल पुलिस कमिश्नर रॉबिन हिबू के साथ हवलदार/चालक) और परमजीत (दिल्ली पुलिस में हवलदार, फिलहाल राष्ट्रपति भवन में तैनात) दिल्ली पुलिस में भर्ती हो गए. संतानों में तीसरे नंबर के और सबसे बड़ा बेटा भरत सिंह कबड्डी और कुश्ती का नामी खिलाड़ी बन गया. उसे रेलवे पुलिस फोर्स और फौज में नौकरी मिली. पुत्रों में सबसे बड़ा होने के कारण भरत सिंह के प्रति सुरजन सिंह और धनकौर का लगाव ज्यादा था. लिहाजा मां-बाप की ममता भरत के रास्ते की बेड़ी बन गई. लिहाजा भरत सिंह नौकरी में नहीं जा सके.

भरत सिंह का मन पिता की जमींदारी में कुछ ऐसा रम गया कि वे, तीन बार ग्राम प्रधान चुन लिए गए. दूसरा बेटा कन्हैया लाल कबड्डी कोटे से भारतीय फौज की जाट रेजीमेंट में हवलदार की नौकरी से रिटायर हो चुका है. कन्हैया लाल के दो बेटों में बड़ा जितेंद्र कुमार स्पोर्ट्स कोटे से नौका-चालन में भारतीय सेना में भर्ती हो गया. गोल्ड मेडलिस्ट और सेना में आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन पाकर जितेंद्र (इंजीनियरिंग विंग) सूबेदार के पद पर पंजाब में पोस्टेड हैं. जबकि भूपेंद्र सिंह, मानेसर (हरियाणा) स्थित एनएसजी मुख्यालय में कमांडो है. भूपेंद्र का मूल महकमा भारतीय सेना (जाट रेजीमेंट) ही है. एनएसजी में वो फिलहाल प्रति-नियुक्ति (डेपूटेशन) पर हैं.

आंगन जो बन गया रणबांकुरों की जन्म-भूमि!

सुरजन सिंह और धनकौर का तीसरा बेटा गुरुदयाल सिंह इंडियन मिलिट्री की जाट रेजीमेंट (पूना पीटी कोर्स पास फर्स्ट डिवीजन) से हवलदार पद से रिटायर हो चुका है. गुरु दयाल सिंह एनएसजी (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) कमांडो रह चुके हैं- ऑपरेशन ब्लैक थंडर में जिसे ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से भी जाना गया, के दौरान टीम के लीडर थे. गुरू दयाल ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए एतिहासिक कारगिल युद्ध भी लड़ा. गुरू दयाल सिंह का एक बेटा पूरण सिंह जाट रेजीमेंट में हवलदार (मैराथन का उप-विजेता) है. दूसरा बेटा मनीष कुमार बी.टेक करने के बाद इंजीनियर बन गया.

नसीब के इंतजार में कई साल खोदा खेत

बहन-भाइयों में सबसे छोटे हीरा लाल बालियान की कहानी सबसे जुदा और हैरतंगेज है. हीरा लाल ने पांचवीं तक की शिक्षा गांव के ही स्कूल से ली. 1978 में पड़ोस के गांव प्राणपुरा से हाई-स्कूल करके पढ़ाई छोड़ दी. वजह खाने-कमाने-खिलाने-पिलाने के इंतजामी दो बड़े भाई फौज में पहले से ही थे. घर में दादलाई (पुश्तैनी) खेतीबाड़ी भरपूर थी. सो मनमौजी हीरा ने सन् 1978 से 1982 तक जिंदगी के 5 साल खेतों में खुदाई करते-करते जाने-अनजाने खुद की खूबूसरत किस्मत की खोज में गुजार दिए.

बायें से दायें बेटी मोनिका, पुत्र मनोज और मनिन्दर बालियान, पत्नी संतोष और पिता सुरजन सिंह के साथ हीरा लाल बालियान

बायें से दायें बेटी मोनिका, पुत्र मनोज और मनिन्दर बालियान, पत्नी संतोष और पिता सुरजन सिंह के साथ हीरा लाल बालियान

खेलने की उम्र में वक्त ने पति-पिता बना दिया!

ठेठ देसी किसानी रहन-सहन था. जिसका परिणाम यह रहा कि मां-पिता ने हीरा लाल की शादी उनके बड़े भाई गुरू दयाल सिंह के विवाह के साथ ही कर दी, अलवर राजस्थान के गांव चिरुनी मुंडावर की रहने वाली संतोष कुमारी के साथ. यह बात है सन् 1975 की. हीरा लाल पढ़ रहे थे कक्षा-8 में. उन दिनों हुई शादी का आज चर्चा होने पर खूब हंसते हैं हीरा. बताते हैं, ‘पढ़ाई लिखाई की तो छोड़िए. पूरी तरह हिंदी भी लिखनी-पढ़नी नहीं आई थी. पति बन कर भी नहीं लगता था कि मेरी जिंदगी में कितना बड़ा बदलाव हो चुका है. एक दिन के लिए नहीं. पूरी एक जिंदगी के वास्ते.’

कालांतर में हीरा लाल और संतोष कुमारी के तीन संतान मनोज कुमार बालियान, मनिन्दर कुमार बालियान और बेटी मोनिका का जन्म हुआ. तीनों बच्चों की शादी चुकी है. मनोज कुमार फ्रांस की एक नामी कंपनी में दिल्ली/एनसीआर का ब्रांड एंबेसडर और कॉलेज का 400 मीटर दौड़ का गोल्ड मेडलिस्ट है. छोटा बेटा मनिंदर कुमार बीटेक के बाद सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में सब-इंस्पेक्टर हो गया. मनिंदर इन दिनों स्पेशल प्रोटक्शन ग्रुप (एसपीजी) में डेपूटेशन पर बहैसियत टेक्निकल सिक्योरिटी एडवाइजर पदासीन है.

दोनो बेटों मनोज और मनिंदर बालियान, बेटी मोनिका तथा पत्नी संतोष के साथ इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह बालियान

दोनो बेटों मनोज और मनिंदर बालियान, बेटी मोनिका तथा पत्नी संतोष के साथ इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह बालियान

बचपन में खेती-बाड़ी, अब बहुओं संग पढ़ाई

जग-जाहिर है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने डीएवी कॉलेज कानपुर (यूपी) से, पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी के साथ एक ही क्लास में एडमिशन लेकर कानून की पढ़ाई पूरी की. यानी ज्ञान उम्र का मोहताज नहीं है. न ही उसे रिश्तों की बेड़ी-बंदिशों से कोई बांध सकता. इस सत्य को 56 साल की उम्र में इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान भी, भला साबित करने में क्यों पीछे रहते.

‘संडे क्राइम स्पेशल’ के पाठकों को जानकार हैरानी होगी कि ससुर हीरा लाल बालियान मौजूदा वक्त में पुत्र-वधू सीमा बालियान (बड़े बेटे मनोज की पत्नी) और छोटी बहू सोनू बालियान (छोटे बेटे मनिन्दर की पत्नी) के साथ एम.ए. (योगा) की पढ़ाई कर रहे हैं. बहू और ससुर तीनों दिल्ली के जनकपुरी स्थित कॉलेज में साथ-साथ हर शनिवार और रविवार को क्लास अटेंड करने जाते हैं.

सेहत के सजग प्रहरी योगा गुरु के रुप में बायें से दायें छोटी पुत्रवधु सोनू बालियान (लाल सूट) और बड़ी बहू सीमा बालियान (पीला सूट) के साथ इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान

सेहत के सजग प्रहरी योगा गुरु के रुप में बायें से दायें छोटी पुत्रवधु सोनू बालियान (लाल सूट) और बड़ी बहू सीमा बालियान (पीला सूट) के साथ इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान

सूनसान खेतों से दिल्ली की भीड़ में खोने तक

1982 में एशियाड गेम्स (दिल्ली) शुरू हो गए. उन्हीं दिनों हीरा लाल के मन में आया कि कोई ऐसी नौकरी हाथ आ जाए जिससे, खेत-खलिहान (गांव-घर-माता-पिता) तो छूटे न मगर ‘इज्जत’ और जमाने भर के तमाम ‘इज्जतदार’ सुबह-शाम सलाम (सैल्यूट) जरूर ठोंके. सो मात्र हाईस्कूल पास होने के चलते, दिल्ली पुलिस में सिपाही भर्ती हो गए. यह बात है सन् 1982-83 के आसपास की. 400 रुपये की तनख्वाह पर दिल्ली पुलिस की नौवीं बटालियन के कंपनी कमांडर के रीडर लग गए.

पुलिस कमिश्नर नहीं रहे उनकी तहजीब जिंदा है

हीरा लाल बालियान जब दिल्ली पुलिस के फिजिकल-टेस्ट में शामिल हुए तब लंबाई थी पांच फुट और साढ़े नौ इंच. 20 साल की उम्र में एक साल की पुलिस ट्रेनिंग पास-आउट करते-करते लंबाई बढ़कर हो गई छह फुट. 26 जनवरी की परेड के लिए दिल्ली पुलिस में 6 फुटा जवानों की तलाश थी. लिहाजा हीरा लाल भी परेड में सलेक्ट कर लिए गए. उस परेड में जोकि, वर्दी में किसी जवान की जिंदगी की सबसे बेशकीमती धरोहर होती है.

30 जनवरी 1983 को नई पुलिस लाइन में (किंग्जवे कैंप दिल्ली) पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन, परेड में भागीदार जवानों की हौसला-अफजाई के वास्ते पहुंचे. उन्होंने हीरा से हाथ मिलाने को अपना हाथ बढ़ाया तो, उसके बाद उन्होंने खुद का हाथ वापिस नहीं लिया. हीरा लाल का हाथ जोर से दबाकर बोले, ‘हाथ भी मिलाना नहीं आता. हाथ इस कदर पुख्ताई से पकड़कर मिलाओ कि सामने वाला कभी भी तुम्हारे हाथ की मजबूत पकड़ को भूल न पाए.’ उस दिन से आज तक हीरा लाल उसी जोश-ओ-खरोश से हाथ मिलाते हैं. भले ही पूर्व आईपीएस सुभाष टंडन अब इस दुनिया में नहीं हैं.

छह फुटा लंबाई ने ट्रैफिक में ट्रांसफर करा दिया

बात है सन् 1985 की. अब तक 26 जनवरी और पंद्रह अगस्त 1984-85 की कई परेडों में भागीदारी निभा चुके थे हीरा लाल. सन् 1985 में एसीपी हेडक्वार्टर (ट्रैफिक) थे आईपीएस केवल सिंह. उन्हीं दिनों लंबाई के चलते 72 पुलिसकर्मी एक साथ ट्रैफिक पुलिस में ट्रांसफर कर दिए गए. उन जवानों में एक हीरा लाल बालियान भी शामिल थे. उन 72 जवानों की परेड में भी हीरा लाल ही प्रथम रहे. लिहाजा केवल सिंह ने अपना रीडर बना लिया. सन् 1992 में टेस्ट पास करते ही दिल्ली पुलिस ने हवलदार बना दिया. सन् 1995 से 2000 तक पश्चिमी जिला में नौकरी की.

सिपाहीगिरी के उकसाने पर कानून भी पढ़ लिया

चूंकि हाईस्कूल तक शिक्षित थे. इसलिए सिपाही बन गए. सिपाही बनने के बाद मन में हर वक्त चुभता कि अगर उच्च शिक्षा प्राप्त होते तो, इज्जतदार थानेदारी मिल जाती. लिहाजा सन् 1986 में दुबारा प्राइवेट पढ़ाई शुरू कर दी. परिणामत: इंटरमीडिएट पास कर लिया. इसके बाद दारोगा बनने की इच्छा ने कुछ इस कदर उकसाया कि सन् 1989 में एम.डी. यूनिवर्सिटी रोहतक से ग्रेजुएशन भी कर लिया. धुन के धुनी भला इतने से ही कहां संतुष्ट होत. सो सन् 2007 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय फर्स्ट डिवीजन से एलएलबी (कानून की पढ़ाई) कर ली.

चीफ का चैलेंज मतलब लंबे हवलदार की मौज

थाना राजौरी गार्डन में तैनाती के वक्त एक दिन डीसीपी दीपक मिश्रा (वर्तमान में केंद्रीय पुलिस सुरक्षा बल में स्पेशल डायरेक्टर जनरल) ने चैलेंज दिया. शिवाजी कॉलेज पर रोजाना होने वाले बवाल को रोकना. एसीपी थे श्योदीन सिंह यादव. एसएचओ राजेंद्र सिंह दहिया और एडिश्नल एसएचओ इंस्पेक्टर राम कुमार राठी. ब-हुक्म दीपक मिश्रा, एसएचओ ने ड्यूटी के लिए साथ तैनात किया एक हवलदार, दो सिपाही और दो महिला सिपाही. 4 साल जब तक तैनात रहा शिवाजी कॉलेज पर बबाल की कोई पुलिस-कॉल नहीं हुई. जिसका रिजल्ट यह रहा कि, कॉलेज प्रिंसिपल ने प्रशंसा पत्र दिया. उसी दौरान (एसीपी स्पेशल स्टाफ) प्रमोद कुमार सिंह कुशवाह (2010 आईपीएस, वर्तमान में दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस) के साथ तैनाती मिली तो, 20 खतरनाक अपराधी दबोचकर सलाखों में डाल दिए.

‘भारत के लादेन’ से जब हुआ आमना-सामना!

कई साल तक पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की पत्नी के निजी सुरक्षा गार्ड (पीएसओ) भी रहे. सन् 2002 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में वापिस पोस्टिंग हो गई. 2005 में दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल में रहते हुए अनिल वारसी गैंग के चार बदमाश दबोचने वाली टीम में अहम किरदार अदा किया. यह वही अनिल वारसी गैंग था जिसने, यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) से 2 सेल्फ लोडिड राइफल (एसएलआर) और 2 एसएएफ (सेल्फ आटोमेटिक फायर) जैसे घातक हथियार लूट लिए थे. इस बहादुरी से खुश तत्कालीन पुलिस कमिश्नर (वर्तमान में उत्तराखंड के राज्यपाल) डॉ. के.के पॉल ने आउट ऑफ टर्न (बारी से पहले तरक्की) देकर हवलदार से दारोगा (असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर) बनाने की संस्तुति कर दी. उस वक्त सेल के डीसीपी थे अशोक चांद.

2006 में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का हत्यारा परमजीत सिंह प्योहरा, 2009 में एसीपी रवि शंकर कौशिक और इंस्पेक्टर पंकज सूद की टीम के साथ मनोज बक्करवाला को दबोचने वाली टीम के लिए मील का पत्थर साबित हुए. बटला हाउस (दिल्ली) कांड के 2008 से फरार मास्टर-माइंड, आरिज खान की गिरफ्तारी वाली टीम में शामिल रहे इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान ने पुलिसिया दिमाग की ‘नजीर’ पेश की थी. सन् 2016 से दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डीसीपी प्रमोद कुमार सिंह कुशवाह (मध्य प्रदेश पुलिस के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पूर्व एडिश्नल सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस राजेंद्र सिंह कुशवाह के बेटे) के बतौर स्टाफ ऑफिसर (एसओ) तैनात हैं.

नाती-पोते से ज्यादा तेज दौड़ने वाले दादा-नाना

कुछ तो बढ़ती हुई उम्र का असर. उस पर पुलिस की वजनदार (भारी-भरकम) वर्दी में कई-कई घंटे की लगातार और हाड़तोड़ नौकरी. इस सबके बाद तो बदन का आराम मांगना बेईमानी नहीं है. 56 साल के इंस्पेक्टर हीरा लाल बालियान को मगर, यह सब सवाल-तर्क बेतुके और बेहद नागवार लगते हैं. शायद इसलिए कि सन् 2016 में नेचुरोपैथी योगा में डिप्लोमा-होल्डर हीरा लाल सन् 2009 में आयोजित एअरटेल हाफ मैराथन (21 किलोमीटर, एक घंटा 50 मिनट 22 सेकेंड) में विश्व में 51वां स्थान अपने आयुवर्ग में लिए हुए हैं. दिल्ली एनुअल स्टेट मास्टर एथलेटिक चैम्पियनशिप 2010 में 100, 200 और 400 मीटर दौड़ में गोल्ड-सिल्वर दिल्ली पुलिस के इसी ‘हीरा’ ने झोली में बटोरा था. हीरा लाल के पोता-पोती-धेवते-धेवती (भूमि, भावेश बालियान, मोनिका और निर्भय) अक्सर उन्हें छूकर देखते हैं. वे शायद यह जानना चाहते हैं कि आखिर उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके दादा-नाना सुबह-सुबह चार बजे उठकर रोजाना कई किलोमीटर तक दौड़ने कैसे चले जाते हैं?

बायें से दायें छोटी पुत्रवधू सोनू बालियान (लाल सूट) और बड़ी बहू सीमा बालियान (पीले सूट में) के साथ योगाभ्यास करते हीरा लाल बालियान

बायें से दायें छोटी पुत्रवधू सोनू बालियान (लाल सूट) और बड़ी बहू सीमा बालियान (पीले सूट में) के साथ योगाभ्यास करते हीरा लाल बालियान

बहू संग ससुर करे योगा, थुलथुल बदन मुड़-मुड़ देखें!

हर साल नेशनल मैराथन में भागीदारी (अब तक 10 मैराथन) निभाने वाले पुलिसिया ‘हीरा’ अब तक 14 गोल्ड मेडल, 8 सिल्वर और 9 कांस्य पदक जीत चुके हैं. हीरा लाल की पत्नी संतोष कुमारी के शब्दों में, ‘सुबह-सुबह मैं, पति और बहुओं (सीमा और सोनू बालियान) के साथ पार्क में योगा करने जाती हूं. लोगों को जब पता चलता है कि, हीरा लाल पुत्रवधूओं के साथ योगा कर रहे हैं. ये ससुर-बहू एक ही कॉलेज में योगा में एम.ए. के स्टूडेंट हैं तो, वे कहते कुछ नहीं. कुछ समझदार मार्निंग-वॉक वाले तो हमारे साथ योगा करने लगते हैं, लेकिन तमाम थुल-थुल बदन हमें मुड़-मुड़कर हैरतभरी नजर से देखते हुए भी निकल जाते हैं.’

हालांकि दोनों पुत्र-वधू सीमा और सोनू खुद को खुशकिस्मत मानती हैं कि ठेठ किसान परिवार का बैकग्राउंड होने के बावजूद उन्हें, उनके साथ पढ़ने वाला, योगा करने-कराने वाला पितातुल्य दकियानूसी रीति-रिवाजों से इतर, हीरा लाल बालियान सा ‘ससुर’ नसीब हुआ है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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