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‘खालिस्तान’ बनवाने की नाकाम-घिनौनी कोशिशों में, पाकिस्तान का खुला सपोर्ट था!

पंजाब में कोहराम मचा हुआ था, सिख आतंकवाद चरम पर था. राज्य के अंदरूनी हिस्सों में रिबैरो साहब की रणनीति को केपीएस गिल और पाकिस्तान से जुड़ी भारतीय सीमाओं पर बीएसएफ यानी मैं निगरानी करता था

Updated On: Jan 27, 2019 09:21 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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‘खालिस्तान’ बनवाने की नाकाम-घिनौनी कोशिशों में, पाकिस्तान का खुला सपोर्ट था!

भाग्य और हस्त-रेखाएं फिजूल होती हैं. सीधे-सीधे ऐसा कहना विधाता और उसके लिखे विधान को खुली चुनौती देने जैसा हो जाएगा. यह किसी भी नजरिए से मान्य तो हो ही नहीं सकता. साथ-साथ यह सरासर अनुचित भी है. हां इतना जरूर है कि, विधाता और विधि के विधान के बाद. इंसान का ‘कर्म’ भी जीवन में कम महत्व नहीं रखता है. गीता जैसे महाकाव्य में भी ‘कर्म’ को ही प्रधान तय किया गया है. शायद इन्हीं तमाम अल्फाजों की चाशनी से निकली होगी वो शख्सियत, जिसका जिक्र मैं ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस विशेष-किश्त में करने जा रहा हूं. विभागाध्यक्ष-प्रोफेसर बॉस ने खुद के बेटे की नौकरी लगवाने की घिनौनी-चाहत में. किसी जमाने में इसी शख्स की 150 रुपया महीने की पगार वाली ‘कच्ची-नौकरी’ भी छीन ली थी! हस्तरेखाओं से ज्यादा ‘कर्म’ में विश्वासी इस इंसान ने मगर हिम्मत नहीं हारी. न ही नौकरी छीन लेने वाले और ओछी-मानसिकता वाले ‘बॉस’ को कोसा या कभी बद्दुआएं दीं.

हां, जीवन में खुद ही कुछ कर-गुजरने की जिद पर उतरे इस इंसान ने सिविल सर्विसेज की परीक्षा दी... और बन बैठा  भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस के 1959 बैच का ‘टॉपर’.  यहां तस्वीर का दूसरा उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि, अब यह शख्स जन्म-जन्मांतर तक हिंदुस्तान की सर-ज़मीं पर, ‘आईपीएस’ ही बनने की हसरत दिल में संजोए है. आखिर कौन है यह अजूबा इंसान? जो हिंदुस्तान जैसे विशाल देश के दो सूबों का पुलिस डायरेक्टर. एक प्रमुख केंद्रीय अर्ध-सैनिक बल का मुखिया रहने के बावजूद... हर जन्म में IPS ही बनना चाहता है आखिर क्यों? जानने के लिए पढ़िए...

जनवरी 1936, यूपी का जिला आजमगढ़

जिस शख्सियत का यहां जिक्र किया जा रहा है, उनका जन्म 10 जनवरी सन् 1936 को यूपी के आजमगढ़ में हुआ था. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से इतिहास में स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई करने के बाद. वहीं  (इलाहाबाद विश्वविद्यालय में) उन्हें तदर्थ रूप से असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. तनख्वाह थी 150 रुपए महीना. यह बात है अब से करीब 61 साल पहले... यानी सन् 1958-1959 की. परिवार वालों को उम्मीद थी कि, कच्ची-असिस्टेंट- प्रोफेसरी ही सही. धीरे-धीरे कभी न कभी वो ‘पक्का’ (परमानेंट) भी कर ही दिया जाएगा. कहते हैं कि हस्तरेखाओं में लिखा सब कुछ है. विधाता ने देखने-पढ़ने के लिए आंख भी दी है. इस सबके बाद भी इंसान खुद की आंख से सब-कुछ देख-पढ़ सकता है.

सिवाए एक अदद अपनी ही हथेली में दर्ज किस्मत और भविष्य की रेखाओं को छोड़कर. विधि का विधान जब सबके लिए समान है तो फिर उससे, बीते कल का यह युवा भी भला कैसे अछूता रह पाता? हाथ की रेखाएं आंख से देखता तो था, जमाने के तमाम बाकी इंसानों की मानिंद वो भी उन्हें मगर पढ़ नहीं सका. एक दिन जैसे-तैसे नौजवानी में हाथ आई, वो 150 रुपए वाली कच्ची-नौकरी भी विभागाध्यक्ष ले डूबा. वजह थी ‘बॉस’ को उसकी वाली पोस्ट पर, अपने बेटे को साम-दाम-दण्ड-भेद से कैसे भी ‘फिट’ करवाना था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ देश की सीमा पर लगाई जा रही कंटीली बाड़ का जायजा लेते हुए पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह

तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ देश की सीमा पर लगाई जा रही कंटीली बाड़ का जायजा लेते हुए पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह

150 रुपए की नौकरी गई तभी जमाने ने भी जाना

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कच्ची-असिस्टेंट प्रोफेसरी गई तो दिमाग ने कुलांचें मारना शुरू किया. दिल-ओ-जेहन पर गुस्सा या फिर बदले की भावना को हावी नहीं होने दिया. न ही नौकरी खाने वाले घटिया इंसान को कोसने या बद्दुआएं देने में ही वक्त जाया किया. जुट गये सीधे कुछ ऐसा कर गुजरने की तलाश में, जो जमाने की भीड़ से अलग हो. लिहाजा बेरोजगारी के उन दुर्दिनों में संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC (सिविल सर्विसेज) परीक्षा का फॉर्म भर दिया. दिन-रात मेहनत की. तबीयत खराब में ही सिविल-सर्विसेज का इम्तिहान दिया. आईपीएस तक के पेपर दे चुके. तो बीमारी ने गंभीर रूप से जकड़ लिया. लिहाजा आईएएस की परीक्षा के बाकी बचे प्रश्न-पत्र नहीं दे सके. आईपीएस की जो परीक्षा दी उसमें देश में TOP कर गए. अपने बैच के इस टॉपर-आईपीएस को बैच मिला 1959 और कैडर यूपी. बतौर सहायक पुलिस अधीक्षक पहली पोस्टिंग मिली कानपुर में.

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एक आईपीएस दो सूबों का पुलिस-मुखिया

बहैसियत आईपीएस जिंदगी शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. सन् 1991 में मूल कैडर से बाहर. असम जैसे संवेदनशील और अनजान सूबे का पुलिस महानिदेशक बनाया गया.

उसके बाद मूल कैडर में वापसी पर (1991 से जनवरी 1993 तक) यूपी जैसे देश के सबसे बड़े सूबे के पुलिस महानिदेशक बनाया गया. इसके बाद जून 1993 से जनवरी 1994 तक देश के सबसे बड़ी फोर्स यानी सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का महानिदेशक बनाया गया. हालांकि इससे पहले जब पंजाब में खालिस्तान बनाए जाने की मांग को लेकर आतंकवाद चरम पर था, तो यही दबंग आला आईपीएस अफसर वहां भी, बहैसियत महानिरीक्षक सीमा सुरक्षा बल अपना लोहा मनवा चुका था.

कुछ नेताओं द्वारा पाला गया भिंडरावाला भारी पड़ा!

कुछ समय पहले ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ से बातचीत के दौरान इस दबंग पूर्व पुलिस अफसर ने बेबाकी से माना कि, पंजाब में आतंकवाद, काफी हद तक कुछ नेताओं की दी हुई घिनौनी-देन थी. खालिस्तान की मांग कर रहे भिंडरावाले को पहले कुछ नेताओं ने पाला. बाद में वही भिंडरावाला सूबे और देश की सरकार पर जब भारी पड़ने लगा, तो उसे चढ़ाने वाले नेता उस मैली-फिल्म से नदारद हो गए. यह तो जे.एफ. रिबेरो, दबंग पुलिस अफसर केपीएस गिल और बहैसियत महानिरीक्षक बीएसएफ, पंजाब पोस्टिंग के दौरान मेरी ही हिम्मत का परिणाम था जो, पंजाब में काफी हद तलक हालात काबू में रखने के लिए सकारात्मक कदम उठाए गए. वरना हालातों की सूरत, बद-सूरत होने में कोई गुंजाईश बाकी नहीं बची थी. अगर मैं यह कहूं कि पंजाब में खून-खराबे के लिए कुछ हद तल नेता भी जिम्मेदार हैं. तो गलत नहीं होगा! कुछ नेताओं द्वारा पाला गया जहर का बीज भिंडरावाला बाद में ‘नागफनी’ सा कंटीला साबित हुआ. यह मैं नहीं कह रहा हूं, वरन् दुनिया ने अपनी आंख से देखा है.

इसलिए याद आते हैं रिबेरो और केपीएस गिल

पंजाब में कोहराम मचा हुआ था. सिख आतंकवाद चरम पर था. रिबेरो जैसा जीवट वाला अफसर रणनीति बनाता था. पंजाब के अंदरूनी हिस्सों में रिबैरो साहब की रणनीति को केपीएस गिल और पाकिस्तान से जुड़ी भारतीय सीमाओं पर बीएसएफ यानी मैं निगरानी करता था. इस बेहतर आपसी सामंजस्य का परिणाम यह हुआ कि, पंजाब में थोक के भाव में आतंकवादी केपीएस गिल ने ढेर किये करवाए. जबकि पाकिस्तान से भारत की सीमा में घुसने वाले आतंकवादियों को या तो बार्डर पर ही दबोच लिया गया. या फिर उन्हें वहीं ढेर कर दिया गया. इन तमाम प्रयासों के बाद भी जो दो-चार बचते-बचाते बार्डर से पंजाब में पहुंच भी जाते, उनकी सेवा के लिए गिल साहब और उनके मातहत की आग उगलती गोलियां, कुछ करने देने से पहले ही ‘अकाल-मौत’ सुला दे रही थीं.

सात समुंदर पार के फॉर्मूले ने गजब ढहा दिया

बकौल इसी दबंग आला आईपीएस अफसर के, ‘पंजाब में खून-खराबा मचाने के लिए जितने भी खाड़कू आते थे, उनमें से अधिकांश ब-रास्ता पाकिस्तान पहुंचते थे. यह कमजोरी मैंने पकड़ ली. उसी दौरान मुझे भनक लगी कि, अमेरिका-मेक्सिको और उत्तरी-दक्षिणी कोरिया के बॉर्डर पर तार की गजब की फैंसिंग है. उन सबके नक्शे मैंने मंगाकर देखे. केंद्र सरकार और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की मदद से हमने इंडो-पाक बॉर्डर पर करीब 550 किलोमीटर की सीमा-रेखा पर उन तमाम देशों से ज्यादा बेहतर कहिए या फिर घातक फेंसिंग तैयार कर दी. हमारी फेंसिंग में बेहतरी के लिए उन पर फ्लड लाइट्स भी लगाई गईं. फेंसिंग की इकहरी के बजाए, दोहरी दीवार खड़ी की गई. इतना ही नहीं पाकिस्तान की तरफ (हिंदुस्तानी सीमा में ही) वाली कंटीली दीवार के नीचे बारूदी सुंरग और भीषण बिजली करंट वाली तार भी बिछवा दी गई. यह अलग बात है कि 1980 के दशक में भी उस एक किलोमीटर बॉर्डर-फेंसिंग पर करीब 19 लाख रुपए प्रतिकिलोमीटर का मोटा खर्च भारत सरकार को वहन करना पड़ा.’

मातहत हथियारबंद जवानों के साथ बहैसियत उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जंगलों में उतरे दबंग प्रकाश सिंह

मातहत हथियारबंद जवानों के साथ बहैसियत उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जंगलों में उतरे दबंग प्रकाश सिंह

दुश्मन ने चिट्ठियों में कबूला भारत से ‘तौबा-तौबा’

बॉर्डर पर हुई जानलेवा फेंसिंग ने पाकिस्तानी आकाओं के दिल-ओ-जेहन में कोहराम मचा दिया. खालिस्तान बनवाने की लड़ाई में अप्रत्य्क्ष रूप से ही सही जुटे, पाकिस्तानी हुक्मरानों की नींद उड़ी हुई थी.

कई बार सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ करने वालों को दबोचा. उनके पास से कुछ गोपनीय दस्तावेज-चिठ्ठियां जब्त की गईं. कई चिट्ठियों में तो साफ-साफ लिखा था कि, बॉर्डर पार करते समय खाड़कू बिजली तार और बारूदी सुरंगों का विशेष ध्यान रखें. वरना बुरी मौत मारे जायेंगे. धीरे-धीरे ही सही मगर बार्डर पर फैंसिंग होने के बाद पंजाब में घुसपैठियों की संख्या कम हुई. इसमें भी दो राय नहीं. पंजाब को लेकर पाक बॉर्डर पर फेंसिंग के मेरे विचार को अमल में लाने के लिए मैं आज भी केंद्र सरकार के प्रति शुक्रगुजार हूं.

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नेताओं और ब्यूरोक्रेसी का मुचैटा तय है क्योंकि....

देश-दुनिया में बेबाकी के लिए पहचाना जाने वाला हिंदुस्तान का यह दबंग पूर्व आईपीएस खुद को हमेशा ‘सही’ यानी ‘जायज’ के ही पक्ष में खड़े रखने की लड़ाई 83 साल की उम्र में भी लड़ रहा है. देश में मौजूद तमाम नौजवान और पूर्व आईपीएस की मौजूदगी के बावजूद अकेले ही बिना किसी सहारे और बैसाखियों के अपने दिल-ओ-जेहन की आवाज पर. मुद्दा चाहे देश के हित का हो या फिर, किसी भारतीय फोर्स खासकर पुलिस के सिपाही के हितों से संबंधित. ऐसा भी इंसान भला खरा नहीं होगा तो सोचिए कि आखिर फिर कौन हुकूमत की कमियों पर उंगली उठाने की हिमाकत करने का जिगर रखेगा. इसलिए पूछे जाने पर बेलाग होकर बताते हैं, ‘अच्छे-बुरे सब जगह हैं. सिर्फ पुलिस को ही कोसने से या नेता को कोसने से काम नहीं चलेगा. मकसद होना चाहिए समाज और देश की भलाई का. कहने को तो पार्लियामेंट और असेंबली देख लीजिए. गिन लीजिए वहां कितने अपराधी मौजूद हैं!’

मैंने पाकिस्तान में 30-40 हजार बांग्लादेशी घुसाए!

हुकूमत अपना काम करती है. ब्यूरोक्रेसी अपना काम करती है. हुकूमत और ब्यूरोक्रेसी अगर मिलकर काम करें तो फालतू की मुचैटाबाजी न हो. ऐसा मगर कम ही देखने में आया है. मतभेद कहीं न कहीं बरकरार रहते ही हैं. कहीं कम कहीं ज्यादा. जहां तक मेरा सवाल है तो मैंने खुद से पहले देश को सामने रखकर हमेशा सोचा. आईपीएस खुद की सेवा के लिए नहीं. हिंदुस्तान की सेवा के लिए बना था. यह बात आज आपको (इस लेखक के समक्ष) जीवन में पहली बार उजागर कर रहा हूं कि, बीएसएफ में पोस्टिंग के दौरान मैंने कैसे पाकिस्तान को उसकी औकात बताने का हर संभव प्रयास किया था. करीब 30-40 हजार बांग्लादेशी घुसपैठिए ब-रास्ता पंजाब, मैंने पाकिस्तान सीमा में घुसा दिए.

हिंदुस्तानी हुकूमत ने एक आंख बंद की और पाकरो पड़ा!

यह रहस्य शायद ही आज से पहले मेरे अलावा किसी को ज्ञात हुआ हो. क्योंकि मैं देश के लिए किए गए हितकारी काम अधिकांशत: ‘गुप्त’ ही रखने की कोशिश करता हूं. इसी से जुड़ा मजेदार वाकया है कि, जब मैंने भारत में घुस आए बांग्लादेशियों को पंजाब के रास्ते पाकिस्तान बॉर्डर में छोड़ने की बात उठाई. तो हमारा गृह-मंत्रालय खुद को पीछे खिसका ले गया. उसने सारा जिम्मा मेरे कंधों पर डाल दिया, यह कहते हुए कि, ‘मैं अपनी जिम्मेदारी पर जैसा चाहूं करूं!’ हुकूमत के पीछे हटने पर मैं नहीं घबराया. क्योंकि मैं खुद के लिए नहीं देश के लिए कर रहा था. सो मुझे जो जायज लगा सो बेधड़क कर डाला. हां यह कदम उठाने से पहले मैने हिंदुस्तानी हुक्मरानों से कह दिया कि, वे अपनी एक आंख बंद कर लें बस.

खुबसूरत यादें....राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री गृहण करते हुए प्रकाश सिंह

खुबसूरत यादें....राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री गृहण करते हुए प्रकाश सिंह

होगा गलत, मेरा कदम मगर था देश-हित में!

इसके बाद मैंने पाकिस्तान बॉर्डर की सीमाओं पर मौजूद बीएसएफ की चेक-पोस्टों को गुपचुप इशारा कर दिया कि, दिन भर आने वाले बांग्लादेशियों को वे अपने कब्जे में रखें. रोटी खिलाएं. उन्हें इज्जत दें. जैसे ही रात का अंधेरा छाए सभी चेक-पोस्ट इकट्ठे हुए बांग्लादेशियों को गुपचुप तरीके से पाकिस्तानी सीमा में ‘ठेल’ दें. यह काम लगातार करीब 3-4 साल दबाकर चला. कागज पर इसका कोई कहीं रिकॉर्ड नहीं रखा गया. वजह थी कि, भले ही हमने यह कदम देशहित में उठाया था. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक था तो मगर असंवैधानिक काम ही. मेरे अकेले के इस घातक कदम ने मगर रोजाना गुर्राने वाले पाकिस्तान का हलक सुखा दिया था.

इसलिए सूखता था पाक हुक्मरानों का हलक

‘उन दिनों भारत-पाक अफसरों की बैठक बाघा बार्डर पर हुआ करती थी. उन मीटिगों में पाकिस्तानी हुक्मरान और रेंजर्स खूब विधवा-विलाप किया करते थे, कि उनके यहां बांग्लादेशियों की बाढ़ ला दी गई है. पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल जब मीटिंग्स में बहुत रोते तो मैं उन्हें हंसी-हंसी में ही समझा देता कि, आप हमारे देश में मजबूत कद-काठी के खाए-पीए मुस्टडों (सिख खाड़कू/ आतंकवादी) को मय असलाह खून-खराबे के लिए भेज रहे हैं. मैं तो फिर भी आपके पास बिचारे भूखे-गरीब सूखे-बदन. निहत्थे गरीब बांग्लादेशियों को ही आपकी सीमा में सरका पा रहा हूं! तो इसमें भला बताइए ज्यादा बुरा कौन कर रहा है? भारत या फिर आप (पाकिस्तान)!....

इन्हीं तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के साथ मैं उन्हें (पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को) मीटिंग से टरका देता था. यह अलग बात है कि, मैंने देशहित में जो ‘दुस्साहसिक’ कदम खुद के बलबूते पर उठाया था, वो मेरे हटते ही ‘जाम’ हो गया!’ जानते हैं कौन है यह दबंग-बेबाक जुझारू पूर्व मनमौजी आईपीएस अफसर! सावित्री सिंह के पति. देश के 1988 बैच के मौजूदा आईपीएस पंकज कुमार सिंह और उनके भाई तथा अमेरिका की एक आईटी कंपनी के C.E.O. पीयूष कुमार सिंह के पिता का ही नाम है ‘पद्मश्री’ प्रकाश सिंह.

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं. अन्य क्राइम स्टोरी के लिए यहां क्लिक करें)

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