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कभी 'पुलिस-टैक्स' में टांग अड़ाने वाले जिस दारोगा पर सिपाही भारी पड़ा था, वही बाद में बना मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डीसीपी

रवि शंकर 30 अप्रैल 2017 को दिल्ली पुलिस डीसीपी (पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज) से रिटायर हो चुके हैं और आजकल गांव में मौजूद खेतीबाड़ी के काम में जुटे हैं

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Jun 24, 2018 09:11 AM IST

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वक्त कब किसके साथ और कब किसके खिलाफ होगा? इंसानी दुनिया में हर कोई इस सवाल के जबाब में निरुत्तर हो जाएगा. ऐसा कतई नहीं है. सब-कुछ फरिश्तों की दुनिया या उन्हीं के दामन में नहीं बिछा या समाया है. इसी सरजमीं पर हमारे आपके बीच भी कुछ ऐसे करिश्माई इंसान मौजूद हैं, जिनके पास एक-दो नहीं, तमाम ऐसे अजीब-ओ-गरीब सवालों के माकूल उत्तर मौजूद हैं. जरूरत है तो इंसानों की भीड़ में से ऐसों को तलाश और ताड़ लेने भर की.

इस बार हम आपको मिलवाएंगे ऐसे ही उस इंसान से जो बाद में दो-दो रुपए की ‘चौथ-वसूली’ में रोड़ा बने और जिस दारोगा पर एक अदद अदना सा उसका सिपाही भारी पड़ गया था. जिसके चलते उसे खुद ही थाने से तबादला कराकर रुखसत होना पड़ा. यह अलग बात है कि, बाद में वही दबंग दारोगा देश का मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डिप्टी पुलिस कमिश्नर बना.

इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में हम और आप पलटते हैं, उन्हीं रिटायर्ड डीसीपी (पुलिस उपायुक्त) रवि शंकर कौशिक की 35 साल पुरानी पुलिसिया यादों के उन पन्नों को, दिल्ली पुलिस की नौकरी में, जिन पन्नों को करीने से किताब के रूप में संवारने-सजाने की फुर्सत ही इस जाबांज को नसीब नहीं हुई.

61 साल पहले दक्षिण-पश्चिम दिल्ली का ढांसा गांव

दिल्ली की तहसील नजफगढ़ के ढांसा गांव में श्री गंगाधर और धर्म देवी का परिवार रहता था. 13 अप्रैल सन् 1957 को चार संतानों के बाद पांचवीं और सबसे छोटी संतान के रूप में श्री गंगाधर-धर्म देवी के यहां बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा गया रवि. रवि के बड़े भाई-बहन में सबसे बड़ी महादेवी (शारदा निकेतन दिल्ली), प्रेमलता (मॉडल टाउन दिल्ली), विमला देवी (गुड़गांव), सुरेंद्र प्रकाश (गुड़गांव) है. गंगाधर भारतीय वाणिज्य मंत्रालय में चीफ कंट्रोलर थे. सन् 1973 में गंगाधर सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए. गंगाधर के बेटे दूसरे (बड़े) बेटे सुरेंद्र प्रकाश कई साल पहले राजपत्रित अधिकारी से पद से रिटायर हो चुके हैं. रवि जब एक साल के हुए तो पिता को दिल्ली के देव नगर में सरकारी फ्लैट अलाट हो गया. लिहाजा गंगाधर पत्नी धर्म देवी सहित गांव ढांसा से बच्चों के उज्जवल भविष्य की उम्मीदें मन में संजोये-समेटे हुए दिल्ली आ गए. यह बात है सन् 1958 की.

बेटे शौर्यांक कौशिक और पत्नी सुषमा शर्मा के बीच मौजूद रवि शंकर

बेटे शौर्यांक कौशिक और पत्नी सुषमा शर्मा के बीच मौजूद रवि शंकर

दो बार लगातार फेल होकर भी ‘हायर-एजूकेटेड’ बना

बचपन की यादों के पन्नों से धूल साफ करते हुए बेबाकी से बताते हैं दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड डिप्टी पुलिस कमिश्नर रवि शंकर कौशिक, ‘पढ़ने में खासा कमजोर था. फिर भी बड़े भाई-बहनों के दबाव में उच्च शिक्षा लेने का मन बनाया. दिल्ली विवि के शिवाजी कॉलेज (उस वक्त कर्मपुरा में था) से सन् 1974-75 में इकनॉमिक्स ऑनर्स से पढ़ाई करनी भी चाही. पढ़ाई में हाथ पहले से तंग था. सो लगातार दो साल फेल हो गया. न चाहते हुए भी पत्राचार से बीए पास-कोर्स में डीयू में एडमिशन ले लिया. ले-देकर सन् 1978 में राजा गार्डन स्थित राजधानी कॉलेज से बी.ए. कर लिया. डिस्टेंस से पंजाब यूनिवर्सिटी से बाद में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एम.ए. कर लिया.’

फिर भी नसीब आई क्लर्की/जेनरेटर बेचने की नौकरी

बकौल रवि शंकर (दिल्ली पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक रवि शंकर कौशिक), ‘मां-पिता और बड़े भाई-बहनों के भागीरथ प्रयासों से जैसे-तैसे हायर-एजूकेटेड हो गया. उसके बाद भी नसीब में आई जेनरेटर बेचने की नौकरी. सैलरी थी 4 सौ रुपए महीना. उच्च-शिक्षित होने के बावजूद कुछ समय कृषि मंत्रालय में 'क्लर्की' की. इस बीच कम्पटीशन की तैयारी भी करता रहा. मेहनत रंग लाई तो अक्टूबर 1982 में दिल्ली पुलिस में सीधे सब-इंस्पेक्टर बन गया. पहली पोस्टिंग मिली पूर्वी दिल्ली जिले के गांधी नगर थाने में. वेतन था 949 रुपए महीना.’

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करीब 35 साल की पुलिस नौकरी के बाद पहली बार इस संवाददाता के सामने बेबाकी से बयान करते हैं रवि शंकर, वे दिल्ली पुलिस में थानेदारी के पहले ही दिन का कड़ुवा और किसी भी इज्जतदार को शर्मसार कर देने वाला अनुभव बताते हुए कहते हैं- 'थानेदारी के पहले दिन ही सिपाही ने ‘बूथ’ में सजा दिया ‘गांधी नगर थाने में जाकर पहले दिन रिपोर्ट की. मेरी ड्यूटी लगा दी गयी यमुना पुश्ते पर. उसी प्वाइंट पर जहां से, थाने को रेत खनन-माफिया से रोजाना ‘मोटी-कमाई’ होती थी. मैं दारोगा था तो क्या हुआ? पहले से पुलिस नौकरी में खेल-खा रहे पुराने ‘घाघ’ हवलदार-सिपाहियों ने यमुना पुश्ता पहुंचते ही मुझे, वहां पहले से रखे पुलिस-बूथ में ले जाकर गुलदस्ते की मानिंद सजा (बैठा) दिया. पहले दिन पुलिस बूथ में चुपचाप बैठा-बैठा, बूथ के बाहर खाकी और खनन-माफियाओं की शहद-मधुमक्खी सी दोस्ती देखता रहा.’

‘टैक्स’ में टांग अड़ाई तो सिपाही-एसएचओ लिपट गए

बकौल रवि शंकर, ‘सिपाही खनन माफियाओं से दो-दो रुपए लेकर जेब में भर रहा था. तभी रेत से भरी बैलगाड़ी या ट्रैक्टर ट्रॉली यमुना-पुश्ता से ऊपर (बाहर) जा पा रही थी. मुझसे गोरे लोगों (कानून के रखवाले पुलिस वालों का) का काला-धंधा (पुलिस टैक्स-चौथ-वसूली) देखा नहीं गया. मैंने पुलिस बूथ से बाहर आकर रेत ले जा रहे लोगों से खुलेआम कह दिया कि तुम लोग आज से किसी भी पुलिस वाले को 2-2 रुपए की चौथ-वसूली (पुलिस-टैक्स) नहीं दोगे. मेरे इतना कहने के कुछ देर बाद सिपाही-हवलदार तो मौके से नौ-दो ग्यारह हो गए.

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पुलिस-टैक्स (रिश्वत) बंद कर दिए जाने की खबर फैलते ही, यमुना-पुश्ता पर रेत लेने आने वाली बैलगाड़ियों की भीड़ लग गई. ले-देकर पहले ही दिन पुलिस-टैक्स वसूलने वाला सिपाही मुझ पर भारी पड़ा. ‘कमाऊ-सिपाही’ ने उस्ताद (थाना एसएचओ) के कान भर दिए. रिजल्ट यह रहा कि मुझे, अगले ही दिन ‘उस्ताद-जी’ (एसएचओ) ने यमुना-पुश्ता से घसीट कर (हटाकर) थाने के अंदर ‘अटैच’ कर दिया. यह अलग बात है कि मैं, उस एसएचओ और सिपाही से चार कदम आगे निकला. सात दिन बाद मैं अपना तबादला गांधी थाने से पश्चिमी जिले में करा ले गया.’

नजफगढ़ थाने में भी सिर मुंड़ाते ही ओले पड़ गए

रवि शंकर बताते हैं- ‘पश्चिमी जिले में डीसीपी थे उमेश कुमार कटना (कटना साहब की दिल्ली पुलिस से रिटायर होने के बाद काफी समय पहले मृत्यु हो चुकी है). उन्होंने मुझे मेरे गृह-थाना नजफगढ़ में लगा दिया. मैंने कहा कि कानूनी रूप से होम-थाना होने के कारण मैं नजफगढ़ में नहीं लग सकता हूं. कटना साहब बोले कि, “अगर तुमने नजफगढ़ थाने में नौकरी कर ली तो समझना कि, दिल्ली पुलिस में कहीं भी कभी भी किसी पोस्टिंग में फेल नहीं होओगे. इसे समय का फेर कहूं या अपनी बदकिस्मती. नजफगढ़ थाने के पास नाले में एक दिन संदिग्ध हालातों में घायल एक शराबी मिल गया. मेरा लेना एक न देना दो. उस मामले में तत्कालीन डीसीपी एस.बी. देओल ने मेरे ही खिलाफ आईपीसी की 308 जैसी गंभीर धारा में मुकदमा लिखवा दिया. जांच में मैं बेदाग निकला.’ अपनी बीती पुलिसिया जिंदगी की भूली-बिछुड़ी यादें साझा करते हुए खूब हंसते हैं पूर्व डीसीपी रवि शंकर.

थाने की नौकरी से डीसीपी को दो टूक मना कर दिया

हर जगह यही देखा-सुना जाता है कि, अधिकांश पुलिसकर्मी ‘मलाई’ चाटने (ऊपरी-आमदनी) की चाहत में थाने की पोस्टिंग पर ही नजरें गड़ाए रहते हैं. खुद्दार रवि शंकर यहां भी खुद को बाकियों की भीड़ से इतर साबित कर गए. बकौल रवि शंकर, ‘गांधी नगर और नजफगढ़ थाने के झंझावतों से निकलकर राजौरी गार्डन थाने पहुंचा. वहां एसीपी से भिड़ंत हो गई. उसी दिन मैंने थाने की नौकरी से तौबा कर ली. लिहाजा मैं डीसीपी अजय चढ्ढा साहब का स्टाफ अफसर बन गया. चढ्ढा साहब ने मुझसे एक ही बात कही थी, 'आप मेरे दफ्तर में हैं. आपका काम-व्यवहार मेरी छवि को डायरेक्ट रिफलैक्ट करेगा. बाकी आप समझदार हैं. कभी मेरा विश्वास नहीं तोड़ना.' चढ्ढा सर के वे शब्द और उनकी मुझसे दिली-हसरत, मुझे अपने रिटायरमेंट के बाद आज भी हू-ब-हू याद है.’

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर से सम्मानित होते रवि शंकर

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर से सम्मानित होते रवि शंकर

थाने-चौकी की छीछालेदर से बचकर भी मन बेचैन था

पुलिसिया-जिंदगी का हर पन्ना बेखौफ हो पढ़वाते हैं रवि शंकर, ‘दफ्तर में नौकरी तो कर ली, मगर मन बेचैन था. भीड़ से अलग दिखाई देने की चाहत हर लम्हा उकसाती रहती. ललक सामने थी, मगर मौका दूर तलक नजर नहीं आ रहा था. सब्र, समय और नसीब ने संग दिया. 1989 में दिल्ली पुलिस के सिरदर्द त्यागी गैंग के खूंखार गुर्गे जसपाल उर्फ जस्सा और ओमी, जान जोखिम में डालकर दबोच लिए. पुलिस कमिश्नर राजा विजय करण ने आउट आफ टर्न प्रमोट करके थानेदार से इंस्पेक्टर बना दिया.’

वक्त जिसने खुद ही जब ‘खास’ बना डाला

कभी थाने-चौकी की नौकरी से ऊब चुके रवि शंकर के शब्दों में, ‘काम से खुश डीसीपी सतीश चंद्रा ने पश्चिमी जिले में ही स्पेशल स्टाफ का प्रमुख बना दिया. तभी 10 लाख की फिरौती के लिए किडनैप 13 महीने के मासूम मिंकी गोयल को 72 घंटे में सकुशल छुड़ा लाया. पश्चिमी दिल्ली के दो-दो थानों में एक साथ एक समय में बम धमाके कराने के आरोपी दिल्ली पुलिस के हवलदार और उसके दारोगा पिता का भांडा फोड़ा. पिता को अरेस्ट कर लिया. जबकि फरार आरोपी बेटा बाद में पश्चिम बंगाल में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. काम और किस्मत ने साथ दिया. तो वक्त ने खुद ही पुलिसिया भीड़ से अलग लाकर 'खास' की पंक्ति में ला खड़ा किया.’

अफसर डीटीसी बस में लटक कर भाग गए, मैं फंस गया!

पुलिस महकमे में अपने ही कुछ दगाबाजों की बानगी, बेबाकी से बयान करते हैं दबंग पुलिस अफसर रवि शंकर- ‘बात है सन् 1990-91 के आसपास की. मैं एसएचओ वसंत विहार था. जवाहर लाल नेहरू विवि में छात्रों ने डीन को बंधक बना लिया. डीन को छात्रों के बंधन से मुक्त कराके बाहर भेज दिया गया. इससे नाराज छात्रों ने पुलिस फोर्स घेर ली. पथराव कर दिया. मैंने देखा कि दिल्ली पुलिस के दो एडिश्नल पुलिस कमिश्नर डीटीसी की बस में लटक कर भाग रहे हैं. उन दोनों ने अपनी सरकारी गाड़ियां मौके पर ही छोड़ दी थीं. कुछ पुलिस वाले एक फाइव-स्टार होटल के कमरों में जा छिपे थे. गुस्साए छात्रों की भीड़ ने मुझे बंधक बना लिया. मुझे बंधक बना देखकर मेरे एक विश्वासपात्र शुभचिंतक ने 100 नंबर पर पुलिस को फर्जी सूचना दे दी कि, बंधक बने एसएचओ को चाकू मार दिया गया है. इस खबर से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. तब पश्चिमी दिल्ली जिले के डीसीपी दीपक मिश्रा मय फोर्स मौके पर पहुंचे और मुझे छुड़ाकर लाए.’

जाम से झुंझलाए डॉ. केके पॉल से जब हुआ सामना

उस किस्से के बताने से पहले ही रवि शंकर की हंसी छूटने लगती है. बताते हैं, ‘मंडल कमीशन आरक्षण के वक्त छात्र पूरी दिल्ली में सड़कों पर उतरे हुए थे. उन दिनों डॉ. के.के. पॉल (दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर और अब उत्तराखंड के गर्वनर) दक्षिणी परिक्षेत्र (रेंज) के एडिश्नल पुलिस कमिश्नर थे. वो मेरे ही थाने का इंस्पेक्शन करके लौट रहे थे. रास्ते में छात्रों के जाम में फंस गए. रास्ते से ही पॉल साहब ने जिला डीसीपी को तलब कर लिया कि, जाम लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उन्हें (पॉल को) तुरंत रिपोर्ट दी जाए. हड़बड़ाए डीसीपी ने मुझसे कहा कि, मैं खुद ही डॉक्टर पॉल से बात करूं. मैंने पॉल सर से बात की. उन्हें जब मैंने बताया कि, जाम लगाने वाले लड़के मेरे ही अप्रत्यक्ष इशारे के बाद शांतिपूर्व तरीके से सड़क पर बैठे हैं. वे लोग कोई उपद्रव नहीं करेंगे. न ही सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचायेंगे. मैं अगर इन लड़कों के साथ बल का प्रयोग करुंगा तो, बे-वजह बात बढ़ सकती है. ‘सांप भी मर जाए लाठी भी टूटे न’ वाली मेरी वो रणनीति पॉल साहब के जेहन में उतर गई.’

'सेल’ में मिली शाबाशियों ने शहर में सनसनी मचा दी

किसी जमाने में दिल्ली के ही थाने चौकी की छीछालेदर वाली नौकरी से ऊब चुके रवि शंकर सीना चौड़ा करके सुनाते-बताते हैं अपने जांबाजी के कारनामे- ‘सन् 1991 के अंत में मेरा तबादला स्पेशल सेल में हो गया. डीसीपी थे दिल्ली पुलिस के चर्चित चेहरे और हत्या के तीन-तीन मामलों में जेल में बंद रहने वाले सुखदेव सिंह. बाद में सेल के डीसीपी बने बीएस भोला. कमिश्नर थे मुकुंद बिहारी कौशल (एम.बी. कौशल). पश्चिम विहार में दिन-दहाड़े लाइव एनकाउंटर का मौका हाथ लग गया. उस टीम में मेरे साथ एसीपी अमरीक सिंह भुल्लर, श्याम सिंह, इंस्पेक्टर राजेंद्र छिकारा भी थे. भोर में पांच बजे से शुरू हुई वो लाइव मुठभेड़ करीब सात घंटे चली. उस एनकाउंटर में फ्लैट की छत में छेद करके बब्बर खालसा इंटरनेशनल के खूंखार आतंकवादी मूरता सिंह और उसकी पत्नी को ढेर किया था. उसमें मुझे गैलेंट्री अवार्ड मिला.’

सिपाही से हारे थानेदार को जब डीसीपी ने ‘उधार’ मांगा

जिस दारोगा रवि शंकर को गांधी नगर थाने की पोस्टिंग में सिपाही के पुलिस-टैक्स (चौथ वसूली) वसूली में टांग अड़ाने के कारण अपना तबादला करा लेना पड़ा था. वक्त ने करवट ली तो थानेदार से इंस्पेक्टर बन चुके उसी दबंग रवि शंकर को, दिल्ली पुलिस में तमाम एनकाउंटर स्पेशलिस्टों के जन्मदाता कहे जाने वाले आईपीएस दीपक मिश्रा (वर्तमान समय में केंद्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ में स्पेशल डीजी मुख्यालय) द्वारा 20 दिन के लिए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर एम.बी. कौशल से ‘उधार’ भी मांग लिया गया था. बलराज-नरेंद्र गैंग के सफाए के वास्ते. जबकि राजेश-किशन गैंग का सफाया लक्ष्मी नारायण राव (एलएन राव रिटायर्ड डीसीपी) ने किया था.

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रवि शंकर और एलएन राव ही वे दो जाबांज लड़के (दिल्ली पुलिस के जुझारु जवान) थे, जिनके बलबूते पश्चिमी दिल्ली के डीसीपी दीपक मिश्रा ने, जिप्सी पर खड़े होकर एलान कर दिया था कि, नजफगढ़ में हुए व्यापारियों के दोहरे हत्याकांड का खुलासा तय समय में कर दिया जाएगा. रवि शंकर और लक्ष्मी नारायण ने वही कर भी दिखाया.

बदनाम और दागी थाने में भी मैं प्रमोट होकर एसीपी बना

जोरदार ठहाका मारते हुए रवि शंकर बताते हैं- ‘समयपुर बादली थाना उन दिनों एसएचओ के लिए काजल की कोठरी से कम नहीं था. वहां तैनात अधिकांश एसएचओ की नौकरी पर दाग लगा. मैंने उसी थाने में रहते हुए मॉडल टाउन इलाके में खूंखार दिनेश ठाकुर को मुठभेड़ में ढेर कर दिया, जबकि उसके साथी आफताब अहमद अंसारी को जिंदा दबोच लिया. उसी में आउट-आफ-टर्न प्रमोट होकर इंस्पेक्टर से एसीपी बन गया.’

बकौल रवि शंकर, ‘यह अलग बात है कि, मेरे आउट ऑफ टर्न की फाइल उस समय पुलिस कमिश्नर रहे एक जिद्दी आईपीएस ने तीन बार बैरंग लौटा दी. तमाम बेतुके 'सवालिया निशान' जड़कर. लेकिन डीसीपी कर्नल सिंह (वर्तमान में भारत के डायरेक्टर इंफोर्समेंट) और उस समय एडिश्नल पुलिस कमिश्नर (प्रशासन) वी.एन.सिंह (दिल्ली के रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर वीरेंद्र नारायण सिंह) ने उसी फाइल को पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार से ‘ओके’ करा लिया.’

रवि शंकर कौशिक रिटायरमेंट के बाद आजकल खेतीबाड़ी कर रहे थे

रवि शंकर कौशिक रिटायरमेंट के बाद आजकल खेतीबाड़ी कर रहे हैं

वो फाइल लाओ जिसके अंदर रवि का नाम न लिखा हो

‘उपहार सिनेमा अग्निकांड के आरोपी अंसल बंधुओं को मुंबई से दिल्ली लाना. आजादपुर सब्जी मंडी इलाके से सदर बाजार बम ब्लास्ट के आरोपियों की गिरफ्तारी. पहली बार कश्मीर घाटी (बारामूला, अनंतनाग, शोपियां) में किसी राज्य की पुलिस द्वारा की गई छापेमारी में एके-47 की बरामदगी. 50 लाख की फिरौती के लिए हुए तरुण पुरी अपहरण कांड का खुलासा. अब्दुल करीम टुंडा के शागिर्द मो. आमीर खान उर्फ कामरान की गिरफ्तारी. पाकिस्तानी, बंगलादेशी, वर्मा और भारत के 26 आतंकवादियों की एक साथ गिरफ्तारी. खालिस्तान कमांडो फोर्स के तीन आतंकवादी दिलबाग सिंह बागा, जसवीर सिंह की 50 किलो आरडीएक्स के साथ गिरफ्तारी. रुद्रपुर में इन्हीं के तीन लाख के इनामी दो साथियों कुलवंत सिंह कांता और एक अन्य को मुठभेड़ में ढेर करना. कोलकता में अमेरिकन सेंटर के हमलावरों में से दो का हजारीबाग में एनकाउंटर में ढेर करना. चंडीगढ़ की बुरैल जेल से फरार जगतार सिंह हवारा की दो साथियों सहित सन् 2005 में गिरफ्तारी. बब्बर खालसा के खतरनाक आतंकवादी परमजीत सिंह बेहोरा के साथ 8 अन्य की गिरफ्तारी. मैडम सुमेधा दुर्लभ जी अपहरण कांड का खुलासा. बिजनेसमैन बहाती अपहरण कांड का पर्दाफाश.’ गुडवर्क्स की लंबी फेहरिस्त गिनाते-बताते इस संवाददाता से कहते हैं रवि शंकर, ‘दिल्ली पुलिस के गुडवर्क की वो फाइल तलाशना शुरू करिए, जिसके भीतर बंद कागजों में रवि शंकर का नाम दर्ज न हो.’

सब खुशियां हासिल हो जाएं तो, रवि से कहां मिलेंगे?

‘जमाने में हर इंसान को उसकी हर खुशी हासिल हो जाए तो, वो इंसान न रहकर भगवान या फरिश्ता हो जाएगा. फिर किसी को रवि शंकर कहां मिल पाएगा?’ बातों का सिलसिला खत्म करने की ओर बढ़ते-बढ़ते इस संवाददाता से पूछते हैं रवि शंकर. बकौल रवि शंकर, ‘35-36 साल की पूरी नौकरी में स्पेशल सेल की पोस्टिंग के दौरान एक ही ऐसा अजीब चिड़चिड़े स्वभाव वाला डीसीपी मिला, जिसने मेरी एसीआर (एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट) महज 'सैटिस्फैक्टरी' लिखी. वरना पूरी नौकरी की एसीआर 'आउड-स्टैंडिंग' ही लिखी गई. दूसरे एक ऐसे चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट से पल्ला पड़ा, जिसने मेरे खिलाफ एंटी करप्शन का केस दर्ज करने का आदेश दे दिया. यह बात सन् 2011 की है, जब मैं एडिश्नल डीसीपी था क्राइम ब्रांच में. सेशन कोर्ट ने मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आर्डर ही कैंसिल कर दिए.’

रवि शंकर 30 अप्रैल 2017 को दिल्ली पुलिस डीसीपी (पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज) से रिटायर हो चुके हैं. आजकल गांव में मौजूद खेतीबाड़ी के काम में जुटे हैं.

संस्कारों ने घर में दीवार बनाने की गुंजाइश नहीं छोड़ी

सन् 1984 में पंजाब के जिला फरीदकोट की निवासी स्नातक तक शिक्षित सुषमा शर्मा से शादी हुई. दोनों बेटी प्रियंका कौशिक और इति कौशिक की शादी हो चुकी है. पुत्र शौर्यांकर कौशिक ने हाल ही में वकालत की पढ़ाई पूरी की है. पिता तुल्य बड़े भाई सुरेंद्र प्रकाश का साया आज भी परिवार के सिर पर है. दोनों भाई पड़ोसी भी हैं. कहने को दोनों की अपनी-अपनी आसपास कोठियां हैं. मां-पिता के संस्कारों ने मगर मकानों (कोठियों) के बीच कभी दीवार खड़ी करने की गुंजाइश ही पैदा नहीं होने दी. सो दोनों भाईयों के आंगन आज भी एक ही हैं. भले ही जमाने वालों को बाहर से दरवाजे देखने में दो अलग-अलग कोठियां ही क्यों न नजर आती हों.

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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