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पढ़ने में फिसड्डी स्टूडेंट कॉलेज का ‘TOPPER’ और CBI का दबंग ‘JOINT-DIRECTOR’ बना

दाऊद इब्राहिम ने 1990 के दशक में जब मुंबई को दहला दिया था. उसके बाद सीबीआई में गठित स्पेशल टास्क फोर्स के JOINT DIRECTOR शांतनु सेन ही बनाए गए

Updated On: Dec 09, 2018 09:16 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पढ़ने में फिसड्डी स्टूडेंट कॉलेज का ‘TOPPER’ और CBI का दबंग ‘JOINT-DIRECTOR’ बना

‘पूत के पांव पालने में ही पता लग जाते हैं’... मतलब बड़े होकर बालक कैसा बनेगा? इसका अंदाजा शैशव काल (बचपन) में ही होने लगता है. अब तक हमने-आपने घर-परिवार-समाज के बड़े और बुजुर्गों से यही सुना है. यह गलत बात है. अब ऐसा नहीं है. यह बात मैं नहीं कह रहा हूं. वरना साबित भी किया है. किसी जमाने में हिंदुस्तान की इकलौती इज्जदार ‘पड़ताली-एजेंसी’ रह चुकी. और मौजूदा वक्त में कुर्सी की ‘बंदर-बांट’ में मशरुफ. दुनिया की नजरों में ‘भस्मासुर’ बन चुकी, सीबीआई के एक पूर्व जॉइंट-डायरेक्टर ने. यह अलग बात है कि पूरी जिंदगी, सीबीआई में अड़ियल मगर मनमौजी अफसरी करने के लिए चर्चित रहा यही इंसान.

जिंदगी के शुरुआती दिनों में औसत दर्जे से भी नीचे का छात्र रहा. वो लापरवाह और अल्लहड़ छात्र जो, किताबों के बीच में छिपाकर अक्सर उपन्यास पढ़ता हुआ पकड़ा जाता था. और तो और इस ‘डरपोक बेबी जम्बो’ को बचपन में जैसे ही एक क्लास में डबल-प्रमोशन मिला, उसकी पढ़ाई लिखाई की रही-सही और बची-खुची सामर्थ्य भी ‘हवा’ हो गई! आखिर कौन यह अजूबा शख्सियत? जानने के लिए पढ़िए ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की यह खास किश्त.

सन् 1850 का कोलकता और जयपुर शहर

इस सच्ची मगर हैरतंगेज कहानी की शुरुआत होती है अब से करीब 258 साल पहले सन् 1850 से. नीलांबर सेन इस जमाने में ईस्ट इंडिया कंपनी में चीफ-कैशियर थे. सन् 1865 के आसपास नीलांबर सेन कोलकता से उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में चले आए.

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कालांतर में नीलांबर सेना का बेटा संसार चंद्रा सेन जयपुर महाराजा के स्कूल में टीचर लग गया. संसार चंद्रा सेन की शादी जयपुर में ही हुई. संसार के बेटे अविनाश चंद्रा सेन का जन्म भी जयपुर में ही हुआ. अविनाश चंद्रा सेन के चौथे बेटे का नाम था डॉ. जी एन सेन. जोकि राजस्थान के पहले मेडिकल कॉलेज सवाई मानसिंह के संस्थापक प्रिंसिपल बने. डॉ. जी एन. सेन की सन् 1987 में मृत्यु हो चुकी है. यहां मैं उन्हीं डॉ. जी एन. सेन (गिरीजा नाथ सेन) और श्रीमती लीला मजूमदार सेन के दो बेटों शांतनु और डॉ. गौतम सेन में से एक. यानी उनके बड़े बेटे शांतनु सेन की संघर्ष और सफलता की सच्ची कहानी पेश कर रहा हूं. ब-जुबान 80 साल के शांतनु सेन ही.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ शान्तनु सेन

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ शान्तनु सेन

बचपन का फिसड्डी छात्र DU का टॉपर बना

आजादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम रहे नीलांबर सेन की पांचवी पीढ़ी में जन्मे शांतनु सेन का जन्म 27 अप्रैल सन् 1938 को जयपुर में हुआ था. कक्षा K.G. में एडमिशन हुआ. पहले दिन स्कूल पहुंचने पर शांतनु ने रो-रोकर कोहराम मचा दिया. उस कोहराम का रिजल्ट सामने आया. परेशान-हाल घरवालों ने बच्चे को स्कूल में नहीं भेजा. शांतनु इस कदर मोटे थे कि कक्षा-दो में पढ़ाई के दौरान साथी बच्चे उन्हें ‘मोटू’ कहकर चिढ़ाते थे. 1945 से 1957 तक (ग्रेजुएशन) की शिक्षा जयपुर में ही ली. बचपन में पढ़ने में औसत दर्जे से भी कम के छात्र थे. कक्षा-3 या चार में स्कूल में ‘डबल-प्रमोशन’ मिल गया. उसके बाद पढ़ाई की हालत और भी बदतर हो गई. यह अलग बात है कि, जो बच्चा शांतनु पढ़ाई से जी-चुराता था. उसी ने कालांतर में (1957 में) दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य) में एडमिशन लेकर कॉलेज में टॉप कर डाला.

आज भी दिल में बसी हैं मिस फ्रांसिस

सात साल की उम्र में दोबारा स्कूल में दाखिल कराया गया. स्कूल था सेंट जेवियर्स जयपुर. क्लास थी दूसरी. बाकी बच्चों की तुलना में कहीं ज्यादा वजनदार होने के कारण क्लास-स्कूल में बच्चे ‘मोटा’ ‘बेबी-जम्बो’ और न जाने किन किन उप-नामों से बुलाते थे. 2-3 क्लास में पढ़ाई में अच्छा था. मिस फ्रांसिस थीं शांतनु की क्लास-टीचर. जो आज करीब 90 साल की हो चुकी हैं. पढ़ने में तीव्र-बुद्धि के कारण तीसरी कक्षा से सीधे पहुंचा दिया गया डबल प्रमोशन देकर 5वीं में. बस यही सबसे ज्यादा खतरनाक हो गया. डबल प्रमोशन मिलते ही शांतनु पढ़ाई में पिछड़ते चले गए. कुछ दिन में ही स्कूल में उनकी गिनती फिसड्डी छात्रों में होने लगी. बकौल शांतनु, ‘स्कूल और बचपन की यादों के ढेर लगे हैं. जिनमें से क्लास टीचर मिस फ्रांसिस को आज भी नहीं भूला हूं. उनसे मिली वक्त की पाबंदी की सीख आज 80 साल की उम्र में साथ मौजूद है.’

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किताब के भीतर उपन्यासपढ़ते पकड़े गए

बकौल शांतनु सेन-

‘शुरुआती पढ़ाई के दौरान गणित से बहुत डर लगता था. जबकि पिता का जोर हमेशा मैथ्स पर ही रहता था. पढ़ने में फिसड्डी हूं. पूरे कुनवे को पता था. सो परिवार वालों की नजर हर वक्त मुझ पर लगी रहती. चूंकि मैथ्स पढ़ने में मन नहीं लगता था. इसलिए घरवालों को दिखाने के मैथ्स की किताब लेकर बैठ जाता था. उसके अंदर चोरी-छिपे कोई मनपसंद नोबेल पढ़ने लगता था. एक दिन मां ने मैथ्स की किताब मे उपन्यास छिपाकर पढ़ते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया. उसके बाद घर में कितना कोहराम मचा होगा? कोई भी अंदाजा लगा सकता है. हालांकि पिताजी हम भाईयों को खेलने की भी बहुत छूट देते थे. पिता चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं. क्योंकि वे खुद सर्जन थे. मगर वैसा हो न सका जैसा पिता चाहते थे.’

जिस कॉलेज के टॉपरथे वहीं शिक्षक बने

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज के टॉपर बने. उसके बाद वहीं पढ़ाने का मौका भी हाथ लग गया. करीब एक साल तक दिल्ली के हिंदू कॉलेज में ही लेक्चरशिप की. बाद में पिलानी आर्ट्स कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए. वहां नौकरी करते हुए ही सन् 1963 में नौकरी के लिए परीक्षा दी. 1963 में सीबीआई में डायरेक्ट डिप्टी-एसपी सलेक्ट हो गए. दिसंबर 1965 में ट्रेनिंग के बाद सीबीआई में नौकरी शुरू कर दी. पोस्टिंग मिली कोलकता में. उसी साल 13 दिसंबर को सुनंदा मजूमदार जो कि उस जमाने में संस्कृत में एम.ए. पास थीं, से शादी हो गई.

पत्नी के साथ शान्तनु सेन

पत्नी के साथ शान्तनु सेन

फिर भी जूते-चप्पल हम ही उठाते

कहने को घर में नौकर-चाकरों की लंबी जमात मौजूद थी. इसके बाद भी पिता हमें आलसी बनने से बचाने का हर प्रयास करते रहते थे. पिता के ‘हंटर’ का नतीजा था कि, अपने बिस्तर तक हम भाईयों को खुद ही तह करके रखना होता था. जूते-चप्पल तक अपने खुद ही तरीके से सही जगह लगाने-रखने होते थे. यह सब करते हुए अक्सर मन में आता था कि, जब सब हमें ही करना है तो फिर, पिता नौकरों को घर में काहे को घेरे हुए हैं. उन सबको भगा क्यों नहीं देते? यह बात तो बहुत बाद में समझी कि अगर, नौकर-चाकरों के भरोसे रहता तो आज 80 साल की उम्र में भी जो चुस्त-दुरुस्त दिनचर्या है. वह शायद न रहती.

मुंबई बम धमाके की STF के अहम हिस्सा

दाऊद इब्राहिम ने 1990 के दशक में जब मुंबई को दहला दिया था. उसके बाद सीबीआई में गठित स्पेशल टास्क फोर्स के JOINT DIRECTOR शांतनु सेन ही बनाए गए. 100 सदस्यों वाली उस ‘जम्बो’ को लीड करने वाले शांतनु सेन के अंडर में दो डीआईजी, 2 एसपी भी दिए गए थे. बकौल शांतनु सेन, ‘उन्हीं दिनों की बात है मेरी नजर में दिल्ली पुलिस नए-नए आईपीएस नीरज कुमार का नाम लाया गया. नीरज सीबीआई में डीआईजी बनकर आ चुके थे.’

सर मैं खाली बॉक्स में बैठा हूं दाऊद नहीं है

सीबीआई के अनुभवों को साझा करते हुए बताते हैं शांतनु सेन, ‘मैंने नीरज से कहा कि जरा दाऊद इब्राहिम पर मेहनत करो. नीरज ने जो मेहनत की वो वाकई काबिले-तारीफ थी. मैंने सीबीआई की ओर से नीरज को दुबई भेजा. शारजाह मैच के दौरान दाऊद इब्राहिम की तलाश करने. एक दिन दुबई से नीरज का फोन आया, ‘SIR, I AM SITTING IN THE BOX OF DAWOOD IN SHARJAH AND THERE IS NO SIGHTING DAWOOD ANY WHERE’ नीरज की वो आवाज. और उस आवाज का विश्वास आज भी मेरे कानों में सुनाई देता है. दिमाग में रच बस गई है नीरज कुमार की वो विश्वास से लबरेज आवाज. नीरज वहां करीब 15 दिन डेरा जमाए रहे. बदकिस्मती से दाऊद हमारे हाथ नहीं लग सका.’

परिवार के साथ एकदम दायें टोपी लगाये हुए बैठे शान्तनु सेन

परिवार के साथ एकदम दायें टोपी लगाये हुए बैठे शान्तनु सेन

सीबीआई डायरेक्टर बनना चाहता था मगर....

मन में छिपी इस बात को बेबाकी से स्वीकारते हैं शांतनु कि, वे सीबीआई के डायरेक्टर बनना चाहते थे. विपरीत हालात और ढीली सरकारी नीतियों के चलते मगर ऐसा नहीं हो सका. उनके मुताबिक, ‘मेरे रिटायर होने से तीन-चार साल पहले ही सीबीआई खराब होने लगी थी. उसमें राजनीति की घुसपैठ शुरु हो चुकी थी. सीबीआई और नेताओं के सिंडिकेट को तबाह कर देता मैं अगर डायरेक्टर बना दिया गया होता. शायद इसीलिए मुझे डायरेक्टर न बनाकर तमाम ने अपनी खैर मनवा ली.’ वे इस बात से भी खासे खफा नजर आते है कि जब, ‘RAW का अफसर डायरेक्टर बन सकता है तो फिर, सीबीआई में ‘NON-IPS’ डायरेक्टर क्यों नहीं बन सकता? अगर सरकारी मशीनरी चाहती तो मुझे, एक्सटेंशन देकर डायरेक्टर सीबीआई बना सकती थी.’

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पुलिस कमिश्नर मेरा पीछा करवाता था!

‘बात उन दिनों की है जब मैं, दिल्ली के उप-राज्यपाल तेजेंद्र खन्ना का O.S.D (OFFICER ON SPECIAL DUTY) था. लेफ्टिनेंट गवर्नर ने मुझे हिदायत दे रखी थी कि,जैसे भी हो मैं उनके दमखम पर दिल्ली पुलिस को काबू रखूं! यह बात किसी तरह दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक फैल गई या फैला दी गई. उसके बाद अपनी गर्दन बचाने के लिए दिल्ली पुलिस ने मेरी गाड़ी का पीछा करना शुरू कर दिया! इसके पीछे दिल्ली पुलिस कमिश्नर का मकसद कोई मेरे प्रति गलत नहीं था. दिल्ली पुलिस कमिश्नर बस यह चाहते थे कि, उनकी पुलिस की तमाम कमजोरियां किसी भी तरह से बजरिए मेरे, उप-राज्यपाल के कानों तक न पहुंचे.’ बताते हुए जोरदार ठहाका लगाते हैं शांतनु सेन.

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं)

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