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प्लेटफॉर्म पर सोने वाला कल का वह ‘प्लंबर-वेटर’, 20 साल से जिसकी ‘मौत’ के इंतजार में है अंडरवर्ल्ड!

नौकरी के शुरुआती दिनों में राधा के बेटे की पहली पोस्टिंग हुई जूहू थाने की डिटेक्शन-विंग में. वर्दी पहनकर अभी तो पुलिसिंग सीखने के ही दिन थे. अचानक एक दिन अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन के गुंडों से सामना हो गया

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Jul 08, 2018 09:25 PM IST

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प्लेटफॉर्म पर सोने वाला कल का वह ‘प्लंबर-वेटर’, 20 साल से जिसकी ‘मौत’ के इंतजार में है अंडरवर्ल्ड!

अंडरवर्ल्ड के क्रूर-कारिंदे या खुद को ‘डॉन’ समझने वाले भी किसी के खौफ में तिल-तिल कर जीते और मरते रहते हैं, तो उस शख्स के बारे में जानने की जिज्ञासा हर किसी के जेहन में बलबने लगती है. इस बार पेश ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में हम अपने-आपके बीच मौजूद एक ऐसी ही अजूबा मगर दबंग शख्सियत से मिलवा रहे हैं, जिसका बचपन झुग्गी में बीता. तमाम रातें रेलवे-स्टेशन की बेंच/प्लेटफॉर्म और फुटपाथ पर गुजरीं.

मुंबई के होटलों में ‘वेटर’ और ‘प्लंबर’ की नौकरी की. कालांतर में यही तंगहाल बच्चा अंडरवर्ल्ड की दुनिया के ‘बादशाहों’ की दिल-दहला देने वाली ‘मौत’ का अचूक ‘हथियार’ बन गया. यह तस्वीर का दूसरा पहलू है कि, अंडरवर्ल्ड के आका, कल के इसी गरीब-तंगहाल और आज खौफ के दूसरे नाम के मालिक की एक अदद ‘गर्दन’ पाने की बेसब्री से बाट जोह रहे हैं. मुंह-मांगी कीमत के बदले. मुराद है कि, पूरी होने का नाम नहीं ले रही बीते दो दशक से.

60 साल पहले कर्नाटक में उडुपी जिले का एनहोले गांव

उडुपी जिले के एनहोले गांव में पत्नी राधा के साथ रहते थे बड्डा. चारों संतान (तीन बेटे और एक छोटी बेटी) जब छोटी थीं, तभी बड्डा ने एक दिन अचानक घर-परिवार छोड़ दिया. कहां चले गए? किसी को पता नहीं चला. पति अचानक घर छोड़कर गए, उस वक्त राधा के दोनों बड़े बेटे बचपने को भूलकर दो जून की रोटी के जुगाड़ में गांव से मुंबई कूच कर चुके थे. अब घर में बची राधा. सबसे छोटी बेटी और उससे बड़े बेटे के साथ. यह बात है आज से तकरीबन 55-60 साल या उससे भी कुछ पहले की. परेशान-हाल राधा को याद आई मायके में रह रहे भाई की. राधा भाई के पास पहुंची तो वहां, सब-कुछ उल्टा मिला. पति की संदिग्ध अनुपस्थिति में अचानक दो छोटे बच्चों को लेकर मायके जा धमकना राधा के भाई को नगवार गुजरा. परेशान हाल राधा मायके में ही एक खेत के कोने में झुग्गी डालकर दोनों बच्चों के साथ जिंदगी बसर करने की कोशिश में जुट गईं.

वक्त ने मां से घरों में झाड़ू-पोंछा भी करवा लिया

वक्त और किस्मत दोनों से हारी राधा पूरी तरह टूट चुकी थी. साथ बचे तीसरे बेटे और बेटी के मासूम चेहरों ने राधा को खुद की जिंदगी भी असमय ही खत्म करने से रोक लिया. जिसने जख्म दिए उसने मरहम भी बनाया था. सो वक्त के साथ दो बच्चों और खुद को पालने के लिए लाचार राधा ने कालांतर में घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन धोने का काम शुरू कर दिया. मगर उससे दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल था. लिहाजा चौका-बर्तन से वक्त बचता तो, आसपास बन रहे मकानों में ईंट-गारा ढोने की मजदूरी करके दो पैसे का जुगाड़ करने लगीं. क्योंकि बेबस और लाचार मासूमों की आंखों में पल रही उम्मीदें उनके सपनों को राधा किसी भी कीमत पर आने वाले वक्त में ‘विकलांगता’ का शिकार होते देख पाने को राजी नहीं थी.

बेजुबानों से भला काहे की दुश्मनी...अंडरवर्ल्ड का दुश्मन नंबर-वन इंस्पेक्टर दया नायक फुर्सत के पलों में

बेजुबानों से भला काहे की दुश्मनी...अंडरवर्ल्ड का दुश्मन नंबर 1 इंस्पेक्टर दया नायक फुर्सत के पलों में

मां की बेबसी ने बेटे को खुद्दार बनने को उकसाया

उधर यही हालत कमोबेश तीसरे नंबर के बेटे और सबसे छोटी बेटी की भी थी. साथ रह रहे बेटे से मां की यह हालत देखी नहीं जा रही थी. मां और भाई से भी ज्यादा बेबस थी सबसे छोटी बहन. जो बदतर हालात देखती तो सब थी, लेकिन कुछ कर पाने की उसमें अभी समझ नहीं थी. लिहाजा 10-12 साल की उम्र में ही हालातों के हाथ मजबूर राधा और बड्डा का तीसरे नंबर का बेटा सन् 1979 के आसपास माया नगरी मुंबई चला गया.

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काम की तलाश में अनजान शहर में कई दिन तक खाना-बदोशों की मानिंद मुंबई में, कभी इस स्टेशन के प्लेटफॉर्म, कभी उस फुटपाथ-गली-मोहल्ले में मारा-मारा फिरता रहा. उसी दौरान उसे रेलवे स्टेशन पर चल रही एक कैंटीन में नौकरी मिल गई. कुछ दिन कैंटीन में काम करने के बाद बर्सोवा स्थित एक होटल में बैरा (वेटर) की नौकरी कर ली. बैरा की नौकरी में तनख्वाह थी करीब पांच सौ रुपए. तनख्वाह के अलावा ग्राहकों से मिलने वाली दो-चार सौ रुपए महीने की ‘टिप’ ऊपरी आमदनी बन जाती. अब राधा को अपना और बेटी का पेट पालने के वास्ते तीसरे नंबर के बेटे की कमाई में से 300-400 रुपए महीने गुजारे के लिए नसीब होने लगे थे.

दौलत ने तबाही नहीं पढ़ाई की ओर उकसाया

जग-जाहिर है कि, कच्ची उम्र की कमाई से हाथ आने वाली दौलत अक्सर बचपन को तबाह कर देती है. वो भी तब जब, मुंबई जैसे रंगीन भीड़-भरे शहर में 12-13 साल का कोई गरीब बच्चा, जिसे दो जून की रोटी मयस्सर न हो पा रही हो, उसके हाथ में अचानक सैकड़ों रुपए आने लगें. ऊपर से तब जब मां-बाप या किसी बड़े का मार्गदर्शन भी न हो तब और भी. जेब में जब आमदनी आनी शुरु हुई तो, उसके मन में पढ़ाई की लालसा जाग उठी. वो सातवीं तक की पढ़ाई गांव में ही पूरी कर चुका था. नौकरी से हासिल पैसों से एक दिन कुछ किताबें खरीद लाया. जैसे-तैसे पढ़ाई शुरु कर दी. होटल में दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत, रात को पढ़ने नहीं देती थी.

होटल मालिक ने पकड़ी नब्ज, साबित हुआ मां-बाप सा फरिश्ता

जिस होटल मालिक के यहां वेटर की नौकरी कर रहा था, उसने राधा के बेटे का जब रुझान पढ़ाई की ओर देखा, तो वो मालिक न बनकर फरिश्ता बन गया. उसने पढ़ाई के लिए वक्त तो दिया ही. साथ-साथ राधा के बेटे को मुंबई में गोरेगांव स्थित एक नाइट स्कूल में दाखिला कराने में भी मदद कर दी. राधा को गांव में जब यह बात पता चली, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. क्योंकि अब राधा का बेटा दिन में नौकरी (वेटर) और रात में पढ़ाई करने लगा था. देखते-देखते बेटे ने हायर सेकेंडरी अच्छे नंबरों से पास कर लिया. इसके बाद तो राधा के बेटे के सपनों को उड़ाने के लिए मानो पंख और खुला आसमान मिल गया. देखते-देखते बेटे ने कब एम.एस.सी. कर लिया राधा को पता ही नहीं चला.

खूबसूरत वक्त में दुर्दिनखुद ही किनारा कर गए

अब बेटे की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. होटल की नौकरी से मां-बेटे का मन शांत नहीं था. सो एक दिन बेटे ने पुलिस में निकली दारोगा (सब-इंस्पेक्टर) की नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया. सामने यक्ष-प्रश्न था कि अब, पुलिस की परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई कैसे और कहां की जाए? इसके लिए दादर में एक लाइब्रेरी में नौकरी कर ली. कई महीने की कड़ी मेहनत रंग लाई. सन् 1995 आते-आते राधा का बेटा मुंबई पुलिस में सब-इंस्पेक्टर बन चुका था. आंखों में आंसू थे. हाथ-पांव कांप रहे थे. किसी परेशानी में नहीं. बल्कि उस खुशी के आलम में जिसे पाकर, राधा को खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था. छोटी बहन ने भाई को वर्दी में देखा तो, खुशी से उसके भी लब सिल से गए.

गुंडों से घिरते ही दारोगा को डीसीपी की नजरें ‘ताड़’ गईं

नौकरी के शुरुआती दिनों में राधा के बेटे की पहली पोस्टिंग हुई जूहू थाने की डिटेक्शन-विंग में. वर्दी पहनकर अभी तो पुलिसिंग सीखने के ही दिन थे. अचानक एक दिन अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन के गुंडों से सामना हो गया. राधा के बेटे ने छोटा राजन के गुर्गों को जिस तरह छकाया था, उस घटना ने उसे चंद दिन में ही मुंबई पुलिस और मीडिया में सबके सामने ला खड़ा किया. उसी घटना के बाद उस नए लड़के पर नजर पड़ी, उस वक्त आईपीएस और मुंबई पुलिस के डिप्टी पुलिस कमिश्नर (मुंबई के रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर, अब केंद्र सरकार में मंत्री) सत्यपाल सिंह की. सत्यपाल सिंह ने राधा के बेटे की जाबांजी के मद्देनजर उसे तुरंत सीआईयू ब्रांच में ले लिया. और लगा दिया मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा के साथ. अंडरवर्ल्ड की खूनी दुनिया को करीब से समझने-परखने के लिए.

जब कल का ‘वेटर’ अंडरवर्ल्ड के गुंडों की मौत बन गया

राधा के बेटे ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा के साथ सन् 1996 में मुंबई में अंडरवर्ल्ड डॉन बबलू श्रीवास्तव के दो गुर्गों को गोलियों से भून डाला. पुलिसिया हाथियारों से गोलियां बरसाने में एक दफा हाथ खुला, तो वो आदत में शुमार हो गया. अब राधा के बेटे की नजरें हर वक्त मुंबई की भीड़ में खून के प्यासों की तलाश में रहने लगीं. जिसका परिणाम यह हुआ कि, नौकरी के शुरुआती साल में ही एलटीटीई जैसे खतरनाक संगठन के तीन बदमाशों को भरे बाजार में गोलियों से भून डाला. कहा जाता है कि, वे तीनों मुंबई के कुख्यात गैंगस्टर अमर नाइक के लिए भी काम करते थे. बेटे के इन कारनामों से मां और बहन का दिल बेटे-भाई के इन किस्सों से बाग-बाग खिल तो जाता था, लेकिन दुश्मनों की बढ़ती तादाद ने दोनों का दिन का चैन रात की नींद भी छीन ली थी.

कितने मारे याद नहीं ! पुलिसिया किताब में 80 से ऊपर दर्ज

कालांतर में प्रदीप शर्मा के जोड़ीदार बने राधा और बड्डा के बहादुर बेटे ने भीड़ में से छांटकर रफीक डिब्बे वाला, सादिक कालिया, श्रीकांत मामा, विनोद भटकर, परवेज सिद्दीकी और सुभाष सहित कितने गुंडे मारे गिनती कर पाना मुश्किल है. हां मुंबई पुलिस का रिकॉर्ड अगर देखा जाए तो, राधा के बहादुर लाल ने अब तक खुद को अंडरवर्ल्ड का खूनी-गुंडा कहने वाले 80 से ऊपर खूंखार बदमाशों का नाम इंसानी दुनिया से मिटा दिया है. इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा की साझेदारी में. हालांकि इस बात का कभी राधा के बेटे को कोई गुमान नहीं हुआ. जब कभी भी मीडिया ने उसे ‘फुलाकर’ कुप्पा करने की कोशिश की, तो वह यह कहकर टाल गया कि, पुलिस अफसर का जो काम है मैं वही कर रहा हूं. वो पुलिस और पुलिस वाला ही क्या जिसका बदमाश के दिल-ओ-दिमाग पर खौफ न हो.

खुद के गोली लगने के बावजूद कुश्ती लड़ते हुए उसे भून डाला

मुंबई पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, राधा के बेटे द्वारा मारे गए सादिक कालिया के सिर 15-20 हत्याओं का बोझ था. सादिक मामा को मौत के घाट उतारने के बाद अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गैंग में जा बैठा था. सादिक कालिया के बारे में कहा जाता था कि, अंडरवर्ल्ड की दुनिया का वो इकलौता ऐसा शार्प-शूटर था जो, दोनों हाथों से एक स्पीड में हथियार चलाता था. राधा-बड्डा दंपत्ति के इस बहादुर बेटे ने 26 दिसंबर 1996 को कोहिनूर सिनेमा हॉल के पास दादर के फूल-बाजार की भीड़ में, ऐसे खूंखार सादिक कालिया को घेर लिया.

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सादिक कालिया जैसे शार्प-शूटर और राधा के दबंग सब-इंस्पेक्टर बेटे की कुश्ती (जमीन पर हो रही गुत्थ्म-गुत्था) को सैकडों तमाशबीनों ने देखा. जैसे ही राधा के बेटे की जांघ में सादिक की गोली लगने से खून का फव्वारा फूटा, तमाशबीन भीड़ मौके से भाग खड़ी हुई. इस के बाद भी उसने, सादिक कालिया को गोलियों से भूनकर ढेर कर दिया.

हाथों में हथियार और सामने दुश्मन हो तो, फिर किसी को किसी का दर्द कम दुश्मनी ज्यादा सताती है...मुंबई पुलिस का जांबाज शार्प शूटर इंस्पेक्टर दया नायक

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जिस कार में बैठे थे बम से उसके चीथड़े उड़ा दिए

राधा-बड्डा के बेटे ने अंडरवर्ल्ड के जितने गुर्गों को ढेर किया है, उससे कई गुना ज्यादा उसके दुश्मनों की संख्या भी बढ़ती गई. इसका अहसास तभी हो गया था जब, अमर नाइक के लिए भाड़े पर काम करने वाले एलटीटीई के तीन खूंखार बदमाशों की जिंदगी लेने वाले इस बहादुर सब-इंस्पेक्टर की कार को बम से उड़ा दिया. कार में राधा का बहादुर बेटा सफर कर रहा था. कार पर बमों से हमला होते ही यह जांबांज किसी मुंबइया फिल्म के हीरो की तरह कार से बाहर कूद गया. दिल दहला देने वाली वो घटना मुंबई के नाका अंधेरी इलाके में हुई थी. करीब एक महीने अस्पताल में मौत से जूझने के बाद ही जिंदगी बच सकी. वेटर से एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और फिर एक असली ‘हीरो’

एक वेटर देश का मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बन चुका था. ऐसे में बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं की नजर से भला वो कैसे बच सकता था? सो पुलिस के इस असली हीरो की बहादुरी के सच्चे किस्सों पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण हुआ. अधिकांश मुंबईया हीरो पर्दे पर राधा के जांबांज बेटे सा दबंग थानेदार बनने को लालायित दिखने लगे. देखते-देखते राधा का बेटा अब पुलिस, पब्लिक के साथ-साथ फिल्म निर्माताओं का असली ‘हीरो’ बन चुका था. हदों के पार शोहरत हासिल करने के बाद भी मगर राधा का बेटा अतीत नहीं भूला. इस चर्चित पुलिस अफसर को फिल्मों की जरूरत कभी नहीं हुई. यह अलग बात है कि, बॉलीवुड और उसके निर्माताओं की वो हमेशा जरूरत बना रहा.

बुरे वक्त में तमाम पुण्य भी पाप बनते गए

देश का नामी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनने के बाद भी राधा के बेटे ने अतीत के दुर्दिनों को नहीं भुलाया. मां की यादें हमेशा जेहन में जिंदा रखने की ललक में उसने पैतृक गांव में सीनियर सेकेण्डरी स्कूल की आधारशिला रखवाई. समारोह में बॉलीवुड की तमाम हस्तियों ने हिस्सा लिया. स्कूल तो बन गया. यहीं से मगर राधा का बहादुर बेटा विवादों में फंस गया. आरोप लगा कि, उसने शोहरत का नाजायज फायदा उठाकर मुंबई के धन्नासेठों से दौलत इकट्ठी की. उसी दौलत से उसने स्कूल खड़ा किया. लिहाजा खतरा नौकरी तक जा पहुंचा. उच्च स्तरीय जांच बैठाई गई. जांच में जब निर्दोष साबित हुआ तो, विरोधियों के मुंह बंद हो गए. बुरा वक्त इतने से ही नहीं टला. इसके बाद उस पर अकूत दौलत इकट्ठा करने का आरोप लगा.

डीजीपी ने जांबांज के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी नहीं दी

एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच बैठाई गई. सन् 2006 में गिरफ्तार हुआ. साथ में दो दोस्त भी गिरफ्तार होकर जेल गए. करीब 2 महीने जेल की सलाखों में गुजारे. महीनों-वर्षों कोर्ट कचहरी के धक्के खाए. तमाम फजीहतों के बाद अंतत: बेदाग साबित हुआ. करीब 5 साल तक मुंबई पुलिस ने उसे सस्पेंड रखा (सन् 2012 में बहाली हुई). लिहाजा मुंबई पुलिस को सन् 2018 के शुरू में ही उसे इंस्पेक्टर बनाना पड़ा.

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सन् 2015 में पुलिस महकमे ने राधा के इस जाबांज थानेदार बेटे को फिर सस्पेंड कर दिया. वजह थी बेटे द्वारा मुंबई से बाहर पोस्टिंग पर ड्यूटी जॉइन न करना. इस पर इस दबंग की दलील थी कि, मुंबई से बाहर उसकी खुद की और परिवार के सदस्यों की जान को खतरा है. सन् 2009 में जब इस बहादुर दारोगा के खिलाफ मुकदमा चलाने की बात आई तो, तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एस.एस. विर्क अड़ गए. उन्होंने मुकदमा चलाने की अनुमति देने से दो टूक इनकार कर दिया. साथ ही सन् 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसके खिलाफ ‘मकोका’ जैसे खतरनाक कानून के तहत लगे तमाम आरोप निरस्त कर दिए.

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अब अंडरवर्ल्ड तलाश रहा है मां के बहादुर बेटे की गर्दन

राधा का बेटा अब इसी साल (2018) के शुरुआती दिनों में मुंबई पुलिस में दारोगा से इंस्पेक्टर बन चुका है. यह अलग बात है कि, कंगाली से बलवानी तक सब कुछ देखने वाले अब इस बहादुर की तलाश में पूरा अंडरवर्ल्ड करीब 20 साल से दिन-रात एक किए हुए है. अंडरवर्ल्ड के आकाओं को लगता है कि, अगर राधा का यह दबंग इंस्पेक्टर बेटा जिंदा रहकर मुंबई पुलिस का ‘नायक’ बना रहेगा, तो उनकी जिंदगी पर ‘अकाल-मौत’ हर लम्हा हावी रहेगी.

लिहाजा देश में या फिर देश से बाहर मौजूद अंडरवर्ल्ड की दुनिया के क्रूर कारिंदों को आज भी राधा के जिस बहादुर बेटे की ‘गर्दन’ की तलाश है...क्या आप जान-समझ पाए उस बहादुर का नाम! जानते तो हम-आप-सब हैं...मगर पाठकों के जेहन में नहीं आ रहा है. यह तमाम खट्टी-मीठी यादें हम यहां बयान कर रहे थे राधा नायक की. वही राधा नायक जिनका बेटा है मुंबई पुलिस का दिलेर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर ‘दया नायक’. जिसने ‘अब तक-56’ नहीं ‘अब तक-80’ से ऊपर शार्प-शूटर कॉन्ट्रैक्ट-किलर सुला दिए हैं. रूह कंपा देने वाली अकाल मौत की गोद में. चोरी-छिपे नहीं. खुलेआम भीड़ भरे बाजारों में हमारी और आपकी आंखों के सामने.

(फोटो साभार: फेसबुक/वाट्सएप)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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