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खतरनाक फौजी ‘सुंदर’ जो मरने के बाद भी, 13 पुलिस अफसरों को जेल में डलवा गया!

सुंदर डाकू राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और यूपी पुलिस का नंबर-वन ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ बन चुका था. दिल्ली पुलिस ने उस जमाने में सुंदर के सिर पर 5 हजार का इनाम रख दिया था

Updated On: Jul 29, 2018 09:10 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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खतरनाक फौजी ‘सुंदर’ जो मरने के बाद भी, 13 पुलिस अफसरों को जेल में डलवा गया!

‘लाश’ भला किसी का क्या बना-बिगाड़ सकती है?  ऐसा सोचने की गलती मत करिए! बेशक मुर्दे बेजान होते हैं मगर, 1970 के जमाने में एक मुर्दे को ‘मुर्दा’ भर समझ लेने की अनजाने में हुई महज एक भूल ने, पुलिस को मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा था! यह मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि, गुजरे जमाने का हैरतंगेज सच है. वो सच जिसमें एक इंसान खुद के ‘लाश’ में तब्दील होने के बाद भी, पुलिस की आने वाली पीढ़ियों को सबक दे गया कि कोई-कोई ‘मुर्दा’ चलते-फिरते इंसानों को भी ‘जिंदा-लाश’ में बदलवा देने की कुव्वत रखता है!

इस बार पेश ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में मैं एक ऐसे ही इंसान की सच्ची मगर रूह कंपा देने वाली खौफनाक हकीकत आपको पढ़वाने जा रहा हूं (बिना किसी महिमा-मंडन के) जो वाकई, ‘लाश’ में तब्दील होने के बाद पीछे बचे ‘जीवित’ लोगों पर ‘जिंदा’ से भी ज्यादा भारी-भरकम साबित हुआ. जो पीछे सलामत बचे चलते-फिरते भारत के दबंग 2 आईपीएस सहित 13 आला-पुलिस अफसरों को जेल की काल कोठरी में डलवाकर उन्हें ‘जिंदा-लाश’ में तब्दील करा गया. आखिर कैसे....? जानने-समझने के लिए पढ़िए दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी उन्हीं तमाम इंसानों की मुंहजुबानी, संदिग्ध हालातों में मरने के बाद भी ‘सुंदर’ बना गया था जिनकी, खूबसूरत शाही जिंदगी को ‘जहन्नुम’, आज पूरे 42 साल बाद....

80 साल पहले दादरी (ग्रेटर नोएडा) का दुजाना गांव

1940 के दशक में थाना दादरी (अब जिला गौतमबुद्ध नगर) के अंतर्गत स्थित गांव दुजाना निवासी चौधरी छज्जू सिंह रसूखदार किसान थे. पत्नी बलदेई से संतान नहीं हुई. तो छज्जू सिंह ने कालांतर में दूसरी शादी अफीमी से कर ली. अफीमी से शादी के कुछ दिन बाद ही पहली पत्नी बलदेई से एक पुत्र ने जन्म लिया. बेटे का नाम रखा मंगल सिंह. जबकि दूसरी पत्नी अफीमी से चौधरी छज्जू सिंह के घर-आंगन में तीन पुत्रों की किलकारियाँ गूंजी. नाम रखे गए भोपाल सिंह, सुंदर सिंह और सूरज सिंह.

गठीला बदन ही जिसकी जिंदगी की ‘गांठ’ बन गया

तीसरे नंबर का छह फुट डेढ़ इंच लंबा-चौड़ा गठीले बदन का गोरा-चिट्टा बेटा सुंदर सिंह देखने में जितना मासूम और खूबसूरत था, उतना ही जुबान और मन का चलायमान. जैसे-तैसे सुंदर सिंह ने मीर भोज इंटर कॉलेज दादरी से 10वीं पास कर लिया. उसी दौरान या उसके आसपास ही, उसने दादरी थाने के एक दारोगा को गोली मारकर घायल कर दिया. हांलांकि अफीमी और छज्जू सिंह को पूत (सुंदर) के पांव (चाल-ढाल) पालने में ही डग्ग-मग्ग दिखाई देने लगे थे. लिहाजा वे उसे किसी भी कीमत पर दुजाना गांव से हटाने की जिद पर अड़ गए.

ठसक वाले नौजवान को ‘लाश’ के बोझ ने दबा दिया

जैसे-तैसे मां-बाप की जिद पर सन् 1964 आते-आते सुंदर सिंह भारतीय फौज की राजपूताना राइफल में सिपाही बन गया. 1965 के युद्ध में भारतीय फौज की ओर से युद्ध लड़ा. खुराफाती दिमाग ने लेकिन सुंदर को फौज में टिकने नहीं दिया और घर लौट आया. कुछ समय बाद समझा-बुझाकर उसे दुबारा सेना में भेजा गया. फिर वो सेना से वापिस लौट आया. गांव की राजनीति में पूर्व फौजी सुंदर सिंह की टांग ऐसी फंसी कि गरम-खून सुंदर ने कम उम्र के बावजूद ‘हथगोले’ से रात के वक्त गांव के ही एक बुजुर्ग की हत्या कर दी. उस हत्याकांड के बाद भी गांव की राजनीति तो नहीं सुलझी हां, दुजाना गांव का एक होनहार युवक जरूर मुसीबतों में ‘उलझ’ कर कालांतक में एक दुर्दांत डकैत बन गया. यह वाकया होगा सन् 1966 के अंत या 1967 की शुरुआत का.

दुजाना का दुस्साहसी ‘सुंदर’ जब दुर्दांत होता गया

गांव में पहले कत्ल के बाद दादरी (यूपी) पुलिस पीछे पड़ गई. दिल्ली और यूपी पुलिस से तमाम मुठभेड़ हुईं. फरीदाबाद में हुई मुठभेड़ में सुंदर साफ बच निकला. दो साथी बदमाश बली बागपत (यूपी) का रकम सिंह और हरियाणा का जयचंद्र पुलिस द्वारा मार डाले गए. सुंदर मगर पुलिस के हाथ नहीं लगा. गिरफ्तारी और मौत से महफूज रहने के लिए अब तक, पुलिस की नजर में सुंदर का दुर्दांत बनकर रहना मजबूरी बन गया था. उसे अब लगने लगा था कि शराफत से रहा तो पुलिस ‘घेर’ लेगी. इन तमाम जतन के बाद भी दिल्ली पुलिस ने सुंदर को गिरफ्तार कर लिया. 8-9 साल तक दिल्ली की तिहाड़ जेल सहित मेरठ, बुलंदशहर, गुड़गांव की जेलों में उसे कैद करके रखा गया. यह बात है सन् 1975 के आसपास की.

दिल्ली में हथकड़ी सहित यूपी पुलिस कस्टडी से फरार

एक दिन दिल्ली में यूपी पुलिस की कस्टडी से मय हथकड़ी सुंदर सिंह भाग गया. इस संवाददाता ने सुंदर के पैतृक गांव दुजाना में रह रहे सुंदर के भतीजे चौधरी शेर सिंह नागर को भी ढूंढ़ निकाला. बकौल चौधरी शेर सिंह नागर (सुंदर के बड़े भाई चौधरी भोपाल सिंह के बेटे), ‘दरअसल चाचा (सुंदर सिंह) के ऊपर पुलिस कोई केस साबित ही नहीं कर पा रही थी. किसी भी मामले में पुलिस शिनाख्त तक करा पाने में कामयाब नहीं हो सकी थी. जब हर मामले में यूपी पुलिस थक-हार ली तो, सुंदर सिंह को 'मीसा' में बंद करके अलीगढ़ जेल में डाल दिया गया.’

5000 इनाम होते ही सबसे रहीस ‘मोस्ट-वांटेड’ बन गया

सुंदर डाकू अब तक राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और यूपी पुलिस का नंबर-वन ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ बन चुका था. परेशान हाल दिल्ली पुलिस ने उस जमाने में सुंदर के सिर पर 5 हजार का इनाम रख दिया. उसी दिन से 1970 के दशक में सुंदर डाकू देश का सबसे मंहगा और खूंखार डकैत करार दिया गया. दिल्ली पुलिस द्वारा देश भर में सुंदर डाकू के इश्तिहार लगवाये गये. वह इश्तिहार सुंदर के भतीजे ने इस लेखक को भी मुहैया कराया है. इश्तिहार पर वही फोटो दिल्ली पुलिस ने लगाई जो, फरीदाबाद में मुठभेड़ के दौरान सुंदर के लाइसेंस पर लगी मिली थी. उसके बाद और उससे पहले की कभी कोई फोटो पुलिस के हाथ सुंदर ने नहीं लगने दी. ‘फ़र्स्टपोस्ट’ हिंदी को भी सुंदर के भतीजे ने वही लाइसेंस वाली ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ फोटो उपलब्ध कराई. करीब 45 साल बाद.

1970 के दशक में दिल्ली पुलिस द्वारा सुंदर डाकू के सिर पर रखे गये पांच हजार रुपये के इनाम का इश्तिहार.

1970 के दशक में दिल्ली पुलिस द्वारा सुंदर डाकू के सिर पर रखे गये पांच हजार रुपये के इनाम का इश्तिहार.

मरने के बाद भी खाकी पर जिसका खौफ काबिज रहा

नवंबर सन् 1976 में सुंदर डाकू की दिल्ली पुलिस हिरासत से संदिग्ध फरारी और उसके बाद यमुना से रहस्यमय हालातों में सुंदर की हथकड़ी लगी लाश की बरामदगी ने देश की सरकार और दिल्ली पुलिस को हिला दिया था. जिसके चलते दिल्ली के दो आईपीएस प्रीतम सिंह भिंडर (दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर पीएस भिंडर) और पुलिस अधीक्षक गुरु चरन सिंह संधू (बकौल पूर्व डीएसपी सुखदेव सिंह, संधू की कुछ समय पहले मृत्यु हो चुकी है) सहित दिल्ली पुलिस के 13 अफसरों को महीनों तिहाड़ जेल में कैद रहना पड़ा. हालांकि बाद में सभी आरोपी पुलिसकर्मी अदालत से ब-इज्जत बरी कर दिए गए. मगर माथे पर जेल जाने का कभी न मिटने वाला कलंक लगवाकर और कुछ वक्त के लिए ही सही, खाकी वर्दी उतरवा लिए जाने की जीते-जी कभी खत्म न होने वाली टीस के साथ.

‘जज साहब दे दो इन्हें मेरी जिंदगी भर की कस्टडी’

करीब 42 साल पहले गुजर चुकी उस शाम की याद करते हुए चौधरी शेर सिंह नागर बताते हैं कि ‘उस वक्त मेरी उम्र 18-19 साल रही होगी. मैं अपने ताऊ (सुंदर के बड़े भाई चौधरी मंगल सिंह) के साथ शाहदरा थाने की हवालात में चाचा से मिलने गया था. पुलिस वालों ने कहा कोर्ट में पहुंचो वहीं मिल लेना. शाम के तीन-चार बजे के आसपास का वक्त था. पुलिस, कोर्ट से सुंदर सिंह की रिमांड और बढ़ाने की मांग कर रही थी. जिसे जज/मजिस्ट्रेट साहब मंजूर नहीं कर रहे थे. दिल्ली पुलिस के डिप्टी एसपी सुखदेव सिंह, इंस्पेक्टर रोहताश सिंह और दादरी थाने के दारोगा के.के. गौतम (रिटायर्ड डिप्टी एसपी यूपी पुलिस) सहित मौजूद तमाम पुलिस वालों की कोर्ट में बहस होती देखकर चाचा (सुंदर सिंह डाकू) को गुस्सा आ गया. वे बोले 'जज साहब दे दो पुलिस को मेरी जिंदगी भर की कस्टडी और रिमांड.' इसके बाद कोर्ट ने उन्हें 7 दिन की रिमांड और बढ़ाकर दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया.’

रेडियो पर मौत की खबर सुनकर सन्न रह गया

चाचा सुंदर के पुलिस रिमांड पर जाते ही मैं ताऊ के साथ दिल्ली के मौजपुर (पूर्वी दिल्ली) में एक रिश्तेदार के यहां रात को सोने चला गया. सुबह आंख खुली तो रेडियो पर खबर सुनकर हिल गया कि सुंदर डाकू की यमुना में डूबने से मौत हो गई है. सुंदर चाचा की मौत से अखबार भरे हुए थे.' बताते हैं चौधरी शेर सिंह नागर. उस जमाने में सुंदर चाचा की मौत को लेकर पुलिस का अपने तमाम तर्क थे. मैंने लेकिन जिस इंसान को 10 घंटे पहले अपनी आंखों से हंसते-बोलते हुए सलामत देखा हो, वह अचानक पुलिस कस्टडी में रहकर भी हथकड़ियों में जकड़े होने के बाद भी यमुना में डूबकर अचानक कैसे मर गया? बकौल शेर सिंह नागर, ‘अब 42 साल बाद इस सबका कोई मतलब नहीं बनता, फिर भी संदिग्ध हालातों में हमारा कोई अपना इंसान मरा है, जेहन में आ रहे तमाम सवाल नहीं मरे हैं.’

पता नहीं कहां सिसकता होगा पन्नों में दबा सच?

चौधरी शेर सिंह खुद को सुंदर के किसी भी गलत काम में शह देने के कतई पक्षधर नहीं हैं. उनके मुताबिक, ‘अपराधी को सजा मिलती है मिलनी चाहिए’, लेकिन सुंदर की मौत की पुलिसिया कहानी आसानी से गले न उतार पाने वाले शेर सिंह के के दिल-ओ-जेहन में आज भी यह सवाल कौंधते हैं कि, ‘सुंदर सिंह को पहले कहीं और जबरिया पानी में डूबोकर मारने के बाद, यमुना में लाकर फेंका होगा!’ फिर कहते हैं कि, ‘इन तमाम शंकाओं से अब क्या हासिल होगा? काला इतिहास है जो, कानून और पुलिस के पन्नों में दबा न मालूम कहां सिसक रहा होगा?’ साथ ही शेर सिंह बेबाकी से किसी भी अपराध और अपराधी का महिमा-मंडन करने की भी पुरजोर खिलाफत भी करते हैं. वे स्वीकार करते हैं कि सुंदर की आदतें बचपन से ही खराब हो चली थीं. कालांतर में जिसका नतीजा जमाने के सामने था.

सीधे गोली चलाने वाले की मौत पर कोहराम क्यों!

सुंदर डाकू कांड में गिरफ्तार होकर कई महीने जेल में रहे दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी रोहताश सिंह के मुताबिक, ‘सुंदर देखने में जितना निडर, खूबसूरत कसरती बदन वाला इंसान था, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक अपराधी! भारत में यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है. वो इंसान जो पुलिस को देखते ही सिर्फ गोली चलाता था, उसकी मौत पर इतना कोहराम मचा कि 2 आईपीएस सहित 13 पुलिस अफसर जेल में ठूंस दिए गए. उस वक्त मौजूद देश में जनता पार्टी सरकार द्वारा. सिर्फ देश के वोटरों और सुंदर के शुभचिंतकों को खुश करने के लिए! सीबीआई ने तो हमारे खिलाफ हत्या का केस तक दर्ज किया था. पुलिस वालों ने अगर सुंदर डाकू को फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था, तो फिर कोर्ट ने हमें ब-इज्जत बरी क्यों कर दिया? वह सब पॉलिटिकल स्टंट भर था.’

हुक्मरान जिन्हें एक ‘लाश’ ने मुलजिम बना डाला!

सुंदर कांड में जेल गए दो आईपीएस सहित 13 पुलिसकर्मियों में से इस संवाददाता ने तीन को, महीनों की मशक्कत के बाद खोजकर उन्हें ‘फ़र्स्टपोस्ट’ (हिंदी) के साथ बातचीत करने को तैयार किया. इन्हीं में से एक अफसर हैं दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त (असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर) और उस जमाने में फर्श बाजार थाने (पूर्वी दिल्ली जिले के इसी थाने में दर्ज हुआ था सुंदर के पुलिस हिरासत से भागने का मामला ) के एसएचओ/इंस्पेक्टर रहे रोहताश सिंह. दूसरे दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के पहले डीसीपी से रिटायर और सुंदर कांड में जेल गए उस वक्त दिल्ली पुलिस में एसडीपीओ (डिप्टी एसपी) रहे सुखदेव सिंह. तीसरे, सुंदर डाकू की मौत के वक्त दिल्ली के डीआईजी रहे आईपीएस और दिल्ली के रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर प्रीतम सिंह भिंडर.

सब पॉलिटिकल स्टंट था..हम बेकसूर थे इसलिए कानून ने ब-इज्जत ब ... ार होने वाले दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर पी.एस. भिंडर.

सब पॉलिटिकल स्टंट था..हम बेकसूर थे इसलिए कानून ने ब-इज्जत ब ... ार होने वाले दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर पी.एस. भिंडर.

कौन थे सुंदर के साथ हर लम्हा रहने वाले वो भाई-बहन?

सुंदर डाकू जब भी कहीं देखा गया तो, उसके साथ दो बच्चों के भी होने की खबर पुलिस को हमेशा मिलती थी. उन दोनो बच्चों का कई साल तक कोई खुलासा नहीं हो सका. जयपुर पुलिस ने जब सुंदर डाकू को दबोचा (इसके बाद ही जयपुर से दिल्ली पुलिस ले आई थी सुंदर को, उसके बाद ही सुंदर की रहस्यमय हालातों में दिल्ली में मौत हो गई) भाई बहन की जोड़ी तब भी उसके साथ थी. पता चला कि, दोनों बच्चे हरियाणा के एक गांव के सुंदर के ही गैंग के एक खतरनाक डाकू के बच्चे थे. उस डाकू की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो चुकी थी (मारे गए डाकू और उसके बेटे, दामाद और गांव का नाम इस संवाददाता के पास है, लेकिन परिवार की निजता बनाए रखने के उद्देश्य से यहां नामों का खुलासा नहीं किया जा रहा). इन बच्चों की बड़ी बहन का पति और उनका बड़ा भाई दिल्ली पुलिस के साथ फरीदाबाद में हुई मुठभेड़ में ढेर किए जा चुके थे. ‘फ़र्स्टपोस्ट’ के इस सनसनीखेज खुलासे पर दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी रोहताश सिंह भी मुहर लगाते हैं. आज चार दशक बाद.

जनता पार्टी सरकार और सीबीआई ने तो कहीं का नहीं छोड़ा, दिल्ली पुलिस के साथ और हमारी ईमानदारी हमें बचा लाई- फर्श बाजार के थाने के तत्कालीन एसएचओ और रिटायर्ड एसीपी रोहताश सिंह

जनता पार्टी सरकार और सीबीआई ने तो कहीं का नहीं छोड़ा, दिल्ली पुलिस के साथ और हमारी ईमानदारी हमें बचा लाई- फर्श बाजार के थाने के तत्कालीन एसएचओ और रिटायर्ड एसीपी रोहताश सिंह

मुंसिफ को ही जब ‘कातिल’, बेगुनाह लगने लगे!

तीनो अफसरों ने हर सवाल का जबाब बेबाकी से दिया. हां, ‘फ़र्स्टपोस्ट’ से इन तीनों ही आला पुलिस अफसरों का कमोबेश एक सवाल समान सा ही था... ‘अगर हम लोग (आरोपी 13 पुलिस वाले) सुंदर डाकू की हत्या के आरोपी थे, तो फिर हमें दिल्ली हाईकोर्ट ने ब-इज्जत बरी कैसे और क्यों कर दिया? सीबीआई ने सुंदर की मौत के मामले में हमारे खिलाफ सीधे-सीधे हत्या का ही केस दर्ज कर डाला था. अदालत में सीबीआई और उसकी पड़ताल औंधे मुंह गिर पड़ी. तब हम सबकी समझ में आया कि सीबीआई की हार में ही हमारी जीत छिपी हुई थी.’

बाकी सब कोरी बकवास, बस यही सच है

अमूमन मीडिया से दूर रहने वाले चौधरी शेर सिंह नागर, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद डाकू सुंदर सिंह से संबंधित ऊट-पटांग जानकारी से खासे खफा हैं. उनके मुताबिक, ‘पता नहीं कहां-कहां से कौन-कौन ऊल-जलूल मनगढ़ंत कहानियां चाचा के बारे में छापता-डालता रहता है. मैंने तो बस सुना है कि, चाचा की मौत पानी भरे खेत में हुई थी. बाद में बिजली का करंट खेत में डालने के बाद ही पुलिस उन तक पहुंची. सब कोरी बकवास है. मैंने जो कुछ ‘फ़र्स्टपोस्ट’ को बताया है, सुंदर चाचा का अच्छा-भला बुरा जो समझिए. चाहे जैसा समझिए वही सच और अतीत है.’

(सुंदर डाकू के फोटो, दिल्ली पुलिस द्वारा छापा गया सुंदर पर इनाम का इश्तिहार आदि उनके भतीजे चौधरी शेर सिंह नागर द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं. कहानी चौधरी शेर सिंह नागर और उन पुलिस अफसरों में से कुछ के बयानों पर आधारित है जो, सुंदर की फरारी और संदिग्ध मौत के मामले में जेल में बंद रहे चुके हैं)

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