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पुलिस अफसर ने जिसके लिए ‘खाकी-वर्दी’ उतारी, उस बीवी का ‘शव’ दान कर आया!

कभी सवा रुपए में शादी करने वाले और पत्नी की खुशी के लिए चांदी के सितारे जड़ी खाकी-वर्दी को उतार देने वाले रमेश चंद्र भाटिया आज करोड़पति बिजनेसमैन है

Updated On: Oct 21, 2018 04:32 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पुलिस अफसर ने जिसके लिए ‘खाकी-वर्दी’ उतारी, उस बीवी का ‘शव’ दान कर आया!
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कंधों पर चांदी के बिल्ले (सितारे) लगी ‘खाकी-वर्दी’ पहनकर समाज में रुतबा झाड़ने की चाहत भला किसके दिल में नहीं बलबती है. जिसके बदन पर खाकी वर्दी चढ़ चुकी होती है वो, हमेशा उसकी सलामती/बरकरारी की दुआ मांगता है. जिसे खाकी-वर्दी नसीब नहीं हो सकी है वो उसको पाने की मुरादें मांगते नहीं थकता. भीड़ में कुछ ऐसे भी महानुभाव मौजूद हैं जो, खाकी-वर्दी की आड़ में ‘मोटा-आसामी’ बनने की ‘जुगत’ में जुटे होते हैं. वहीं कुछ लोग समाज-सेवा के वास्ते खाकी पहनने की तमन्ना संजोए भी गाहे-ब-गाहे देखने को मिल जाते हैं. हालांकि इस कैटेगरी के लोगों की संख्या मौजूदा समाज में ‘नगण्य’ है, या फिर गिनी-चुनी ही मिलती है. इकलौती फौजी या फिर खाकी-वर्दी ही एक वो लिबास है जो, इंसानों की भीड़ में ‘इंसान’ को ‘हनकदार’ दिखाने/बनाने की कुव्वत रखता है.

शौहर की ‘खाकी-वर्दी’ उतरवाने वाली ‘बेगम’!

इन तमाम बातों-किस्से-कहानी-कहावतों के बीच अगर आपका पाला किसी ऐसी महिला से पड़ जाए जिसने, आला-पुलिस अफसर पति के बदन पर चांदी के चमकते सितारों से सजी खाकी-वर्दी जिद करके उतरवा दी हो. पुलिसिया अफसर शौहर (पति) के पास मौजूद रुतबा, सरकारी घोड़ा-गाड़ी-शाही दफ्तर और आलीशान बंगला जैसी तमाम ‘-सुख-सुविधा’ को ‘तिलांजलि’ दिलवाकर. सिर्फ इसलिए कि उसकी तमन्ना, आला-पुलिस अफसर जीवन-साथी (पति) को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘बिजनेसमैन’ बनाने की थी! तो आप किसी मोहतरमा के इस कदम और उनके बारे में भला क्या-क्या न कहेंगे और सोचेंगे?

आप कुछ मत सोचिए. आसानी से गले न उतरने वाले सच को बस पढ़िए. मेरे द्वारा पेश की जा रही, हैरतंगेज ऐसी ही हकीकत के इर्द-गिर्द घूमती यह सच्ची कहानी. इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में. उस रिटायर्ड दबंग आला पुलिस अफसर की मुंह-जुबानी जिसने, महज अर्धांगिनी (पत्नी) की खुशी की खातिर, चांदी के सितारे लगी ‘खाकी-वर्दी’ की तमाम रुतबेदार ‘सहूलियतों’ पर एक झटके में ‘खाक’ डाल दी.

सौ साल पहले सियालकोट पाकिस्तान का दसुआ

बात सन् 1902 के आसपास की. जगतराम भाटिया उर्फ जग्गा तीन-चार साल का था. प्लेग फैलने से उसके कुनबे का नाम-ओ-निशान मिट गया. एक अदद जीवित बची जग्गा की दादी (चाची-दादी) ने जैसे-तैसे यतीम जग्गा को पालकर 8-9 साल का किया. कालांतर में यही जगतराम भाटिया उर्फ जग्गा भगतजी सियालकोट (पाकिस्तान) में ‘जग्गा-हलुवे’ वाले के नाम से मशहूर हुआ. भारत-पाक बंटवारे के बाद और पाकिस्तान में जन्मा, इन्हीं जग्गा उर्फ भगत-जी का पोता रमेश चंद्र भाटिया (आरसी भाटिया) कालातंर में भारत पहुंचने के बाद, दिल्ली पुलिस में चर्चित दबंग सहायक पुलिस आयुक्त यानी एसीपी (लंदन स्थित भारतीय दूतावास का पूर्व डिप्लोमेटिक रेड पासपोर्ट होल्डर ‘अटेची’) बना.

यतीम जग्गा के सैकड़ों वारिस-वंशज!

प्लेग में इकलौते जिंदा बचे जग्गा की तपस्या कालांतर में रंग लाती गई. जग्गा के परिवार में छह पुत्र और तीन पुत्री सहित 9 संतानों का जन्म हुआ. जिनमें एक बेटे का नाम था दीनानाथ भाटिया. दीना की शादी हुई शीला रानी से. शीला और दीनानाथ के 7 संतान हुईं. गुरुदयाल भाटिया, बेटी सुदेश भाटिया, जगदीश (न्यूयार्क में चमड़े के अरबपति कारोबारी), विपिन चंद्र भाटिया, रमेश चंद्र भाटिया (73 साल, दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त, वसंतकुंज दिल्ली निवासी), नरेंश चंद्र (मुंबई) और सबसे छोटी संतान के रूप में पुत्र वीरेंद्र कुमार (अमेरिका में बस गए) का जन्म हुआ.

बायें से दायें माँ शीला और पिता दीनानाथ भाटिया के साथ शादी के तुरंत बाद रमेश चंद्र भाटिया.

बायें से दायें माँ शीला और पिता दीनानाथ भाटिया के साथ शादी के तुरंत बाद रमेश चंद्र भाटिया.

रमेश चंद्र भाटिया का जन्म दसुआ (जालंधर) में 15 मार्च सन् 1945 को हुआ. रमेश चंद्र भाटिया के पिता दीनानाथ भाटिया पहले वजीराबाद (पाकिस्तान) में रेलवे में तार-बाबू थे. बंटवारे के वक्त रमेश चंद्र भाटिया के पिता दीनानाथ, परिवार को लेकर यूपी के अलीगढ़ जिले के सिकंदरा राऊ में आकर रहने लगे.

पिता ने वहां नौकरी मांगी जहां स्कूल हों

‘बंटवारे के दौरान जान बचाकर हम लोग भारत आ गए. पिता ने आशियाना बनाया सिंकदराराऊ (अलीगढ़) में. जब हम बच्चे थे. पिता चूंकि खुद रेलवे में सरकारी मुलाजिम थे. वे चाहते थे कि उनके सभी बच्चे उच्च-शिक्षित और सरकारी मुलाजिम हों. पाकिस्तान से भारत आने पर उन्होंने रेलवे से गुजारिश की कि, उनकी पोस्टिंग वहीं की जाए जहां, स्कूल हों. ताकि वे संतानों को बेहतर शिक्षा मुहैया करा सकें. शिक्षा के प्रति पिता दीनानाथ की यही ललक थी जो पुत्र आर.सी.भाटिया को, अंग्रेजी सीखने के लिए गर्मी की छुट्टियों में रोहतक में रहने वाले अंग्रेजी के अध्यापाक रिश्तेदार (आरसी भाटिया के मौसा) के यहां भेज देते थे.

दिल्ली पुलिस में भर्ती ‘हादसा’ रही

सुलझे हुए विचार वाले पिता दीनानाथ पुलिस की नौकरी को ठीक नहीं मानते थे. बेटे रमेश भाटिया की कद काठी को देखते हुए पिता के एक आला अफसर पुलिस दोस्त ने सलाह दी कि वे मुझे (रमेश चंद्र), यूपी पुलिस में डायरेक्ट दारोगा बनवा दें. यूपी में दारोगा की बहुत कम तनख्वाह के चलते रमेश चंद्र ने इंकार कर दिया. पिताजी पहले से ही पुलिस की नौकरी के खिलाफ थे. आर.सी. भाटिया उन दिनों कानपुर में बीएससी कर रहे थे. उसी दौरान दिल्ली पुलिस में इंटर-पास वाले लड़कों के लिए सब-इंस्पेक्टर की वैकेंसी निकली. मैने चुपचाप फार्म भर दिया. सलेक्शन के बाद जब इंटरव्यू की बारी आई तो पिता को बताया. पिताजी बोले अगर ‘साहिबी’ ही करनी थी तो, आईएएस या आईपीएस बन जाते. इस थानेदारी के रगड़े में क्यों फंसने जा रहे हो? यह बात है सन् 1965 की. बावजूद इन सब झंझटों के सन् 1967 में दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर भर्ती हो गए.

‘रेड-लाइट’ एरिया में मिली वेश्या-दारु बोतल!

‘पहली पोस्टिंग मिली सेंट्रल दिल्ली जिला के कमला मार्केट थाने में. वही कमला मार्केट जिसके इलाके में, रेड-लाइट एरिया जीबी रोड के बदनाम कोठे हैं. टी.एस भल्ला साहब के साथ पुलिसिया नौकरी की पहली रेड पर निकला. पता चला था कि एक वेश्या के पास मौज-मस्ती के लिए कोठे पर खूंखार बदमाश पहुंचा हुआ है. जीबी रोड के कोठों की छतों से कूदते-फांदते जब तक हम पहुंचे, संदिग्ध बदमाश मौके से गायब हो चुका था. हमें मौके पर मिली बेफिक्र बैठी वेश्या और खाली दारू की बोतलें. बीड़ी-सिगरेट के जले-अधजले टोंटे. मजबूरी में हम उन खाली बोतलों को ही लेकर थाने लौट आए. बुझे हुए मन से. उस रेड में हमारे साथ दिल्ली पुलिस में सिपाही से प्रमोट हुए दबंग दारोगा राव लक्ष्मीचंद पहलवान भी थे. बाद में पहलवान साहब गांधीनगर (पूर्वी दिल्ली) में हुई एक मुठभेड़ में बदमाश की गोली से शहीद हो गए.’ पुलिसिया नौकरी की उस पहली ही फेल हुई रेड के बारे में अब ठहाका मारकर हंसते हुए बताते हैं दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर रमेश चंद्र भाटिया.

 चांदी के सितारों से सजी असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की वर्दी, आर.सी भाटिया ने, जिसे पत्नी सुमन की हसरत की खातिर उतारने में देर नहीं की


चांदी के सितारों से सजी असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की वर्दी, आर.सी भाटिया ने, जिसे पत्नी सुमन की हसरत की खातिर उतारने में देर नहीं की

सीबीआई इंस्पेक्टरी में आईपीएस से ज्यादा सैलरी

‘मैं उन दिनों तुगलक रोड थाने में तैनात था. मुझे ‘पड़ताल’ करने का शौक था. हैदराबाद से जैसे ही मैं डिटेक्टिव ट्रेनिंग करके लौटा तो मैने सीबीआई में जाने की ठान ली. मेरे जिद करने की तीन वजह थीं. पहली, मैं प्रधानमंत्री के सुरक्षा दस्ते में नौकरी नहीं करना चाहता था. दूसरे, उस समय का एसपी मुझे जबरिया पीएम सिक्योरिटी की नौकरी कराने पर तुला बैठा था. तीसरे, सीबीआई में डेपूटेशन लेते ही मुझे उस जमाने में आईपीएस की तनख्वाह (450 रुपए प्रति माह) से ज्यादा 550 रुपए प्रति माह और एक प्रमोशन मिल रहा था. करीब पांच साल सीबीआई में रहकर सन् 1977 में वापिस दिल्ली पुलिस में लौट आया. सीबीआई वाले छोड़ने को राजी नहीं थे. मैं फिर भी नहीं माना.’ पुलिसिया नौकरी की जिंदगी में हुए तमाशों की कहानियां अब 73 साल की उम्र में बेबाकी से सुनाते हैं आर. सी. भाटिया.

पुलिस में ‘नोट’ कमाने जा रहे हो क्या?

बकौल आरसी भाटिया ‘सीबीआई में रहते वक्त जब मैने वापिस दिल्ली पुलिस में लौटने की इच्छा जताई तो, वहां के कुछ संगी-साथी बोले कि सीबीआई में ही रुक जाओ. यहीं डिप्टी-एसपी बन जाओगे. कम से कम डीआईजी से रिटायर होओगे. उनमें से (सीबीआई के कुछ साथी) कुछ ने मेरे कान में कहा कि, क्या दिल्ली पुलिस में ‘नोट’ कमाने के चक्कर में जा रहे हो वापिस? मैने उन्हें जवाब दिया, ‘नोट’ तो दिल्ली पुलिस से ज्यादा सीबीआई में मौजूद है. मैंने जब यहीं नोट नहीं कमाए तो वहां (दिल्ली पुलिस) क्या कमाऊंगा? दिल्ली पुलिस में थाने का एसएचओ लगने जा रहा हूं, जोकि दिली इच्छा है. सीबीआई में एसएचओ की पोस्ट नहीं है. वरना यहीं रुक जाता.’

पुलिस में वापिस लौटते ही ओले पड़ गए

सीबीआई की तमाम ‘पॉवर’ नजरंदाज कर रमेश चंद्र भाटिया दिल्ली पुलिस में लौटे थे एसएचओ बनने के लिए. हुआ लेकिन वहां (दिल्ली पुलिस) एकदम उल्टा. पुलिस कमिश्नर जे.एन. चतुर्वेदी ने आरसी भाटिया को लगा दिया ‘विजिलेंस’ में. सन् 1975 में रमेश चंद्र भाटिया इंस्पेक्टर प्रमोट हो गए. जिसके बाद उन्हें एसएचओ कनाट-प्लेस लगा दिया गया. कनाट प्लेस में ‘ब्लैक-डॉलर’ का गोरखधंधा और इलाके में बिकने वाली एक मशहूर ब्रांड की शराब बंद कराने का श्रेय भी तत्कालीन स्टेशन हाउस ऑफिसर भाटिया को ही जाता है. बकौल रमेश चंद्र भाटिया, ‘सन् 1966 से अगस्त 2000 तक मैंने दिल्ली पुलिस में करीब 34 साल नौकरी की. इस दौरान कनाट प्लेस, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, कमला मार्केट, पटेल नगर, तुगलक रोड, डिफेंस कालोनी, वसंत विहार में एसीपी, एसएचओ और थानेदारी की.’

चस्का जो बन गया ‘बवाल-ए-जान’

रमेश चंद्र भाटिया को विदेश में घूमने-फिरने का शौक बहुत था. ‘भारतीय विदेश मंत्रालय ने मेरे स्तर की एक पोस्ट लंदन में मौजूद भारतीय दूतावास में ‘क्रिएट’ कराई. सन् 1982 के फरवरी महीने में मैं लंदन की पोस्टिंग पर चला गया. वहां मैं 'डिप्लोमेटिक रेड पासपोर्ट होल्डर' जिसे 'अटेची' भी कहते हैं, बन गया. वेतन था 200 पौंड. पत्नी सुमन भी वहां साथ थीं मय पाँच साल के बेटे हितेश और 3 तीन साल की बेटी गीतिका के. लंदन में बात कुछ ऐसी बिगड़ी कि मैं ‘डिप्रेशन’ में चला गया. 200 पौंड में गुजारा नहीं होता था. मैं ‘अटेची’ रैंक का अफसर होने के बाद भी बस-स्टॉप्स पर ठंड में ठिठुरता था. सोचता था कहां बुरे आकर फंस गया हूं.’ करीब 36 साल पुरानी आपबीती बेबाक होकर सुनाते हैं रमेश भाटिया.

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन....पत्नी सुमन भाटिया के साथ मस्ती के क्षणों में आर सी भाटिया

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन....पत्नी सुमन भाटिया के साथ मस्ती के क्षणों में आर सी भाटिया

लंदन में पत्नी ने ‘लॉन्ड्री’ में की नौकरी

घर खर्च के लाले पड़े तो आर.सी.भाटिया ने लंदन से वापिस भारत लौटने का इरादा पत्नी को बताया. सुमन भाटिया बोलीं वापिस नहीं जायेंगे. लिहाजा उन्होंने लंदन में ही एक ‘लॉन्ड्री’ में नौकरी शुरु कर दी. तनख्वाह मिलती थी 20-23 पौंड हर सप्ताह. ले-देकर किसी तरह 4 चार साल (1982 से 1985) लंदन स्थित भारतीय दूतावास की पोस्टिंग काटी. लंदन की पोस्टिंग के दौरान आईपीएस वेद मारवाह (दिल्ली के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर) से जान-पहचान हो चुकी थी. वेद मारवाह उन दिनों कंद्रीय मंत्री शीला कौल के साथ नियुक्त थे. उम्मीद थी कि लंदन से भारत लौटने पर, वेद मारवाह दिल्ली में किसी थाने का एसएचओ लगवाने में मदद कर देंगे. जैसे सोचा हुआ उसका एकदम उल्टा. वेद मारवाह ने सन् 1986 में भाटिया को एसएचओ लगाने के बजाये स्पेशल सेल में लगा दिया.

शादी से पहले ही ‘लल्ला’ की सौ-सौ शर्तें!

शादी की बात पूछे जाते ही बताने लगते हैं, ‘सन् 1972 की बात है. मैं उन दिनों सीबीआई में पोस्टिड था. पिताजी राऊज एवन्यू (दिल्ली) निवासी एक लड़की का रिश्ता लेकर सामने बैठ गये. मैने पिताजी से कहा, शादी आपकी पसंद की लड़की से करुंगा, लेकिन न बारात का तामझाम होगा. न ढोल-बैंड-बाजा. न घोड़ी पर लड़की के दरवाजे जाऊंगा. शादी में खर्च के नाम पर ‘सवा-रुपया’ खर्च होगा. सिर पर मुकुट भी नहीं लगाऊंगा. बिना किसी सजावट शान-ओ-शौकत के शादी दिन में होगी. शादी वैसे ही हुई जैसे मैंने चाहा. दहेज में जो रुपये-जेवर-सामान मिला, वो सब वहीं (ससुराल) छोड़ आया. ऐसे लेते-देते 16 फरवरी सन् 1975 को इस अड़ियल मगर मनमौजी आला पुलिस अफसर की शादी भी हो गयी.’ अतीत के पन्नों को करीने से सजाते-संवारते हुए बताते-सुनाते हैं आरसी भाटिया.

हिसाब-किताब ‘मंगेतर’ से भी था साफ

खाने-कमाने के शौकीन ऐसे जिंदादिल आर.सी.भाटिया को अगर कोई, ‘कंजूस’ कहे तो अब तक की उनकी मुहँजुबानी कहानी पढ़/सुन चुके पाठकों को यह तथ्य आसानी से गले नहीं उतरेगा. सच लेकिन यही है. बकौल आर.सी.भाटिया, ‘शादी का रिश्ता सुमन से तय हो चुका था. उन दिनों सुमन ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स दिल्ली) में नौकरी करती थीं. शादी तय होने के बाद हम लोग मिलने-जुलने लगे थे. कहीं अगर बातचीत के लिए बैठते, तो चाय-पानी का जो खर्च होता था, उसे एक दिन वे (होने वाली पत्नी सुमन) और एक दिन मैं वहन करता था.दोस्ती शादी-रिश्ते अपनी जगह थी. खर्चा-हिसाब-किताब अपनी जगह.’

कौन कहता है इंसान 73 साल की उम्र में बूढ़ा हो जाता है....जवांदिल दिल्ली के पूर्व आला पुलिस अफसर आर.सी. भाटिया का एक यह भी रंग-रुप.

कौन कहता है इंसान 73 साल की उम्र में बूढ़ा हो जाता है....जवांदिल दिल्ली के पूर्व आला पुलिस अफसर आर.सी. भाटिया का एक यह भी रंग-रुप.

बेगम की हसरत ने उतरवाई बदन से ‘खाकी-वर्दी’!

बकौल आर.सी.भाटिया, ‘सन् 1998 के आस-पास की बात है. एक दिन पत्नी सुमन बोलीं कि, मेरा (पत्नी सुमन का) लेदर का विदेशों तक फैला बिजनेस बढ़ता जा रहा है. अगर मैं आपको अपने साथ बिजनेस में लगा लूं तो! उनके इस हैरतंगेज सवाल की मुझे कतई उम्मीद नहीं थी. मुझे निशब्द देखकर वे बोलती चली गई. 'मैं तुम्हें दिल्ली पुलिस से अच्छे और मंहगे कपड़े पहनाऊंगी. पुलिस की जिप्सी से बड़ी और मंहगी कार दिलवाऊंगी. सरकारी पुलिसिया बंगले से बड़ी कोठी और उससे बड़े दफ्तर सहित तमाम शान-ओ-शौकत हासिल करा दूंगी. तुम्हें इसके बदले बस चांदी के सितारों वाली खाकी वर्दी (एसीपी की पोस्ट-वर्दी) को बदन से हटाना होगा.' पत्नी की वो बात दिल को कुछ ऐसी लगी कि मैंने अगस्त 2000 में दिल्ली पुलिस को स-सम्मान अलविदा कर दिया. वायलेंट्री रिटायरमेंट लेकर.’

धन्नासेठ बनाने वाली बीबी का ‘शव’ दान दे आया

रमेश चंद्र भाटिया फिलहाल पुत्र हितेश और पुत्रवधू निधि के साथ दिल्ली के वसंतकुज में रह रहे हैं. बेटी गीतिका-दामाद पावस भी पड़ोस में ही रहते हैं. कालांतर में सवा रुपए में शादी करने वाले, पत्नी की खुशी के लिए चांदी के सितारे जड़ी खाकी-वर्दी को उतार देने वाले, मंगेतर से भी चाय-पानी का हिसाब-किताब बराबर रखने वाले रमेश चंद्र भाटिया आज करोड़पति बिजनेसमैन हैं. वे लेदर के भारत के नामी-गिरामी निर्यातकों में शुमार हैं. देश की मशहूर सिक्योरिटी एजेंसी चलाते हैं. एक अदद उस अद्धांगिनी की बदौलत जिसने, अब से करीब 18 साल पहले आरसी भाटिया का खाकी वर्दी और उसके रुतबे-हनक से मोह भंग करा दिया था.

पुलिस बैंड की धुन पर डांस करते और 73 साल की उम्र को खुली चुनौती देते मनमौजी पूर्व पुलिस अफसर आरसी भाटिया.

पुलिस बैंड की धुन पर डांस करते और 73 साल की उम्र को खुली चुनौती देते मनमौजी पूर्व पुलिस अफसर आरसी भाटिया.

12 दिसंबर सन् 2012 को वही जीवन-संगिनी सुमन भाटिया उनका साथ छोड़ गईं. मजबूत जीवट वाली सुमन भाटिया सन् 2003 से कैंसर से पीड़ित थीं. जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले आरसी भाटिया उन्हीं सुमन भाटिया को अमर कर आए. उनके शव को उसी ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) को दान देकर, जहां कभी वे नौकरी किया करती थीं. इस उम्मीद में कि, पत्नी के अंगों से शायद कोई और इंसान ‘लाश’ में तब्दील होने से बचा लिया जाये.

...73 की उम्र में डिस्को जाता हूं ताकि जमाना

इन तमाम झंझावतों से जूझते रहने वाले रमेश चंद्र भाटिया की आज भी बेफिक्री का आलम देखकर जमाना और उन्हें जानने वाले हैरत में पड़ जाते हैं. मौका मिलते ही वे डांस करने डिस्को पहुंच जाते हैं. अपने से भी आधी उम्र के नौजवानों के साथ. जब मन करता है तो बैठ जाते हैं चार यार लेकर ताश के पत्ते फेंटने. शायद इस उम्मीद में कि, तमाम उम्र जिंदादिली से जीने वाले रमेश चंद्र भाटिया को जमाने वाले कहीं, जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर ‘दुखी’, ‘बूढ़ा’ और ‘तन्हा’ जैसी तोहमतें न भेजने लगें.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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