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कभी ‘नाव’ से डरने वाला बच्चा, ‘मुर्दों’ के ढेर के बीच हफ्तेभर बेखौफ अपने काम में जुटा रहा!

50 हजार से ज्यादा लाशों का पोस्टमॉर्टम करने वाले भरत सिंह खुद के पास आज मौजूद, मजबूत जिगर होने का पूरा श्रेय भी वो ‘मुर्दों’ को ही देते हैं

Updated On: Sep 02, 2018 09:47 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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कभी ‘नाव’ से डरने वाला बच्चा, ‘मुर्दों’ के ढेर के बीच हफ्तेभर बेखौफ अपने काम में जुटा रहा!

मैं आपको एक किसी उस शख्स से रु-ब-रु करवाऊं जो, बचपन में नाव में बैठने के नाम से ही हो जाता था खौफजदा. वही बच्चा कालांतर में, लगातार एक सप्ताह (दिन-रात) करीब तीन हजार से भी ज्यादा ‘मुर्दों’ के ढेर के बीच बैठा रहा होश-ओ-हवास में. क्षत-विक्षत लाशों के अंदर से भी कुछ ‘खास’ खोज लाने की उम्मीद पाले हुए! तो आप क्या कहेंगे! सब्र रखिए. सच यही है. सुनिए-पढ़िए. आज करीब 77 साल के एक ऐसे ही अजूबा इंसान की मुंह-जुबानी, जो 34 साल पहले महज 43 साल की उम्र में, कई दिन-रात तक वाकई बेखौफ बैठा रहा था, ‘मुर्दों’ के ढेरों के बीच. आखिर क्यों? सवाल के माकूल जवाब के लिए ध्यान से पढ़ने की कोशिश कीजिए, ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की यह रोमांचकारी किश्त.

सन् 1941: यूपी के जौनपुर जिले का बलइपुर गांव

जिला मुख्यालय से करीब 19 किलोमीटर दूर स्थित है बलइपुर गांव. उस जमाने में गांव से शहर जाने के लिए सड़क भी नसीब नहीं थी. गांव से शहर (जौनपुर) जाने के लिए साइकिल से गोमती नदी तक पहुंचना होता था. गोमती नदी पार करने के लिए एकमात्र साधन थी नाव की सवारी. इसी बलइपुर गांव में रहते थे सूर्यदेव सिंह पत्नी माता देवी के साथ. कालांतर में सूर्यदेव-माता देवी के यहां पारस नाथ सिंह, कमला देवी, भरत सिंह, हरिनाथ सिंह और बेटी शकुंतला देवी सहित 5 संतानों का जन्म हुआ. पारस नाथ सिंह टीडी कॉलेज (जौनपुर) से प्रोफेसर के पद से रिटायर हो चुके हैं. डॉ. भरत सिंह केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा में एडिश्नल डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर्ड हैं. जबकि बेटों में तीसरे नंबर के हरिनाथ सिंह यूपी गवर्मेंट में टीचर पद से रिटायर हो चुके हैं. पेश इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में मैं इन्ही सूर्यदेव सिंह-माता देवी की तीसरी संतान डॉ. भरत सिंह की दिल-दिमाग को झकझोर देने वाली मुंहजबानी बयान कर रहा हूं.

संसाधन ‘जीरो’ और समस्याएं सौ-सौ

गांव के रास्ते उबड़-खाबड़ थे. इस कदर खतरनाक कि गांव से शहर के अस्पताल तक लाते-ले-जाते मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते थे. परेशानियों का आलम यह था कि गांव के समझदार लोग बीमार को अस्पताल लाते-ले-जाते, सड़क के गढ्ढों में मार डालने के बजाय, घर में ही इलाज-दवाई के अभाव में कफन-दफन हो जाने देने को ज्यादा सुकून-समझदारी भरा मानते थे. 15 अगस्त सन् 1941को जन्मे भरत सिंह ने पांचवी जमात तक तो गांव के प्राथमिक विद्यालय में ही पढ़ाई की. आठवीं की पढ़ाई के लिए सूर्यदेव सिंह ने बेटे भरत का एडमीशन जौनपुर शहर के एक स्कूल में करा दिया. सूर्यदेव सिंह, बेटे भरत को गांव से साइकिल पर बैठाकर गोमती नदी के किनारे तक ले जाते.

दिल्ली में आयोजित एक सम्मान समारोह में डॉ. भरत सिंह

दिल्ली में आयोजित एक सम्मान समारोह में डॉ. भरत सिंह

‘मुर्दों’ का तारनहार अजूबा ‘भरत’

नदी पार करने के लिए जैसे ही पिता साइकिल को नाव में चढ़ाते, 12-13 साल के भरत सिंह बिलखकर रोने लगते थे. भरत को नाव में बैठने से बहुत डर लगता था. भरत को लगता था कि नाव में बैठते ही वो नदी में जाकर पलट जाएगी, तो मर जाएंगे. नाव के केवट (मल्लाह) और नाव में मौजूद सवारियां रोज भागीरथ-प्रयास से समझा-बुझाकर, भरत को नाव में बैठने को राजी करते. यही बालक भरत सिंह कालांतर में हिंदुस्तान का चर्चित फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट (पोस्टमॉर्टम-विशेषज्ञ) बना. जिसने पूरी नौकरी में 50 हजार से ज्यादा लाशों का पोस्टमॉर्टम करने का रिकॉर्ड कायम किया.

जहां पिता टीचर, वहीं बेटे प्रोफेसर-स्टूडेंट

सन् 1957 में भरत सिंह ने टीडी कॉलेज जौनपुर से साइंस विषय के साथ इंटरमीडिएट कर लिया. उसके बाद यहीं से उन्होंने बीएससी सन् 1959 में किया. सन् 1959 में ही भरत सिंह ने उच्च शिक्षा के लिए जी.एस.बी.एम. (गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल) मेडिकल कॉलेज कानपुर में एम.बी.बी.एस. में एडमीशन ले लिया. सन् 1964 में यहां से उन्होंने एम.बी.बी.एस. कर लिया. जबकि सन् 1966 में डिप्लोमा इन क्लिनिकल पैथोलॉजी किया. लखनऊ यूनिवर्सिटी से सन् 1969 में पैथोलॉजी एंडर बैक्टीरियोलॉजी में एम.डी. किया था. यह इत्तफाक ही रहा कि जिस, टीडी कॉलेज से भरत सिंह ने इंटर और बीएससी किया, पिता सूर्यदेव सिंह उसी कॉलेज में शिक्षक थे. कालांतर में भरत के बड़े भाई प्रो. पारस नाथ सिंह भी इसी टीडी कॉलेज से कई साल प्रोफेसरी करने के बाद रिटायर हुए.

भारत की खातिर ‘भरत’ ने ठुकरा दिया ‘लंदन’

सन् 1969 के मई महीने में भरत सिंह बजरिए यूपीएससी, सेंट्रल हेल्थ सर्विसेज में सलेक्ट हो गए. उसी दौरान भरत सिंह को लंदन से भी ‘इम्प्लाइमेंट-वाउचर’ आ गया. भरत सिंह के दोनों हाथों में लड्डू थे. कई दोस्तों ने कहा भी कि भारत में क्या रखा है? यहां तो कभी भी विदेश से वापिस लौटकर जम-रच-बस जाएंगे अपना देश है. विदेशी नौकरी, वो भी लंदन जैसे देश की बार-बार हाथ नहीं आएगी. दोस्तों की हर राय लंदन जाकर नौकरी करने की ही थी. भरत सिंह ने मगर सब्र और समझदारी से काम लिया. भ्रमित हुए बिना उन्होंने लंदन की नौकरी को ठुकरा दिया. हिंदुस्तान में ही रहकर कुछ खास कर गुजरने का मन बना लिया.

बायें से दायें डॉ. भरत सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल से हाथ मिलाते हुए.

बायें से दायें डॉ. भरत सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल से हाथ मिलाते हुए.

गांव का बालक बना देश का चर्चित ‘पुलिस-सर्जन’

सन् 1969 में सेंट्रल हेल्थ सर्विसेज ज्वाइन कर ली. पहली पोस्टिंग मिली जूनियर पैथोलॉजिस्ट की. राजपुर रोड स्थित दिल्ली पुलिस हास्पिटल में. वही दिल्ली पुलिस हास्पिटल अब दिल्ली के अरुणा आसफ अली हॉस्पिटल के नाम से मशहूर है. भरत सिंह चूंकि सर्वोच्च योग्यता प्राप्त थे लिहाजा, एक साल बाद ही उन्हें प्रमोशन देकर ‘पुलिस-सर्जन’ पद पर पदोन्नति दे दी गई. पुलिस सर्जन बनते ही जिम्मेदारी मिली, पुलिस द्वारा पंचनामा भरकर मोर्च्यूरी में लाई गई लाशों का पोस्टमॉर्टम करने की. सन् 1985 आते-आते डॉ. भरत सिंह को सिविल हॉस्पिटल (अरुणा आसफ अली अस्पताल) का मेडिकल सुपरिंटेंडेंट/मेडिको लीगल एक्सपर्ट बना दिया गया. 8 जून सन् 1995 को दिल्ली स्थित देश के मशहूर दीन दयाल अस्पताल का मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बनाए गए डॉ. भरत सिंह. दीन दयाल उपाध्याय (डीडीयू) से ट्रांसफर करके, अक्टूबर सन् 1996 को लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल (एल.एन.जे.पी) के चिकित्सा अधीक्षक बनाए गए.

‘मुर्दों’ ने मासूम को ‘जिंदादिल’ बना डाला!

सन् 1970 से 1995 तक अंग्रेजों के जमाने के (ब्रिटिश काल) पोस्टमॉर्टम हाउस (तीस हजारी कोर्ट के सामने मौजूद सब्जी मंडी मोर्च्यूरी) में फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट पद पर तैनात रहे. जहां दिन-रात डॉ. भरत सिंह का वास्ता सिर्फ और सिर्फ लाशों से ही पड़ा. एक दो साल नहीं पूरे 25 साल. इस समयावधि के बीच की नौकरी ने डॉ. भरत सिंह को जिंदादिल बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उन्हीं भरत सिंह को जो, 12-13 साल की उम्र में नाव में बैठेने से खौफ खाते थे. इस कदर कि नाव देखते ही वे, डर के मारे बिलख कर रोने लगते थे.

‘भरत’ ने किए पोस्टमॉर्टम जो बने ‘नजीर’

कालांतर में जब डॉ. भरत सिंह पोस्टमॉर्टम एक्सपर्ट बने तो, उनके हिस्से में आए कई ऐसे मामले जो देश-दुनिया भर में कोहराम मचाकर चर्चित हुए. मसलन दिल्ली के भाई-बहन संजय चोपड़ा-गीता चोपड़ा दोहरा हत्याकांड. पूर्व कांग्रेसी नेता नयना साहनी (तंदूर हत्याकांड). 1970 के दशक में प्रेम त्रिकोण को लेकर हुआ विद्या जैन हत्याकांड. दबंग कांग्रेसी नेता संजय गांधी और उनके पायलट अशोक कुमार सक्सेना की मौत का मामला. तिहाड़ जेल में बंद अंतरराष्ट्रीय गोल्ड तस्कर राजन पिल्लई (पिल्लै) के शव का पोस्टमॉर्टम डॉ. भरत सिंह ने ही किया था. इन सभी मामलों में से दो में चार लोगों को फांसी पर लटका दिया गया. जबकि बाकी तमाम को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. नरेंद्र मोदी सरकारी की एक केंद्रीय महिला मंत्री के पिता की लाश का पोस्टमॉर्टम भी डॉ. भरत सिंह ने ही किया था. महिला मंत्री के पिता की मौत गोली लगने से संदिग्ध हालातों में हुई थी.

लाखों की बेकाबू भीड़ पर भारी पड़े अकेले ‘भरत’

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दबंग राजनेता पुत्र संजय गांधी की हवाई जहाज हादसे में मौत के बाद राजधानी (घटनास्थल और आरएमएल हॉस्पिटल (जहां संजय गांधी और हवाई जहाज के पायलट अशोक सक्सेना का शव रखा हुआ था) में भीड़ बेकाबू होती जा रही थी. आरएमएल हॉस्पिटल में पोस्टमॉर्टम हाउस था नहीं. शवों को आरएमएल अस्पताल से करीब 8 किलोमीटर दूर सब्जी मंडी मोर्च्यूरी ले जाना भीड़ के बीच से किसी भी कीमत पर सुरक्षित नहीं था. लिहाजा पसीने से तर-ब-तर और दिल्ली की कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका से परेशान दिल्ली पुलिस को याद आए ‘तारनहार’ डॉ. भरत सिंह.

बो भी क्या दिन थे...दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री रह चुके डॉ. अशोक कुमार वालिया से हाथ मिलाते हुए डॉ. भरत सिंह

बो भी क्या दिन थे...दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री रह चुके डॉ. अशोक कुमार वालिया से हाथ मिलाते हुए डॉ. भरत सिंह

अनुभवी भरत सिंह ने जो कामयाब नुस्खा पुलिस को दिया, वह वाकई रामबाण साबित हुआ. संजय गांधी और अशोक सक्सेना की लाशें आरएमएल से शिफ्ट करने के बजाय डॉ. भरत सिंह खुद ही, राम मनोहर लोहिया अस्पताल के अंदर गुपचुप तरीके से पहुंच गए. उन्होंने संजय गांधी और अशोक सक्सेना के पोस्टमॉर्टम के लिए आरएमएल अस्पताल के आपातकालीन वार्ड के बराबर में ही एक कमरे में अस्थाई पोस्टमॉर्टम हाउस बना लिया.

चलता-फिरता इंसानी ‘पोस्टमॉर्टम-हाउस’!

भरत सिंह बताते हैं कि, ‘दक्षिणी दिल्ली के बियाबान जंगल में एक महिला की कई महीने पुरानी लाश के कुछ अंश ज़मींदोज (गहरे गढ्ढे में) पुलिस को मिले थे. लाश के नाम पर पुलिस मौके से कुछ भी सील करने की हालत में नहीं थी. पुलिस के आग्रह पर मैं जंगल में ही जा पहुंचा. उस दिन उसी बियाबान जंगल में ही पोस्टमॉर्टम किया.’ इसी तरह 1970 के दशक में डॉ. भरत सिंह को एक बार पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार इलाके में भी लाश मिलने वाली जगह पर ही अस्थाई पोस्टमॉर्टम-हाउस बनाना पड़ा था. उस मामले में एक केंद्रीय मंत्री के पीए की हत्या करके लाश को जमीन में गाड़ दिया गया था. छह महीने पुरानी लाश इस हद तक सड़ चुकी थी कि उसे मोर्च्यूरी पहुंचाना नामुमकिन हो गया था. हत्या अवैध संबंधों को लेकर की गई थी.

माफ करें ‘मुर्दाघर’ फुल है....!

बकौल डॉ. भरत सिंह, ‘बात है सन् 1984 की. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. राजधानी दिल्ली में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए. हालात बिगड़ते देखकर घायलों के इलाज के लिए सभी अस्पतालों में अलर्ट घोषित कर दिया गया. मैं उन दिनों देश और दिल्ली की सबसे पुरानी और बड़ी सब्जी मंडी मोर्च्यूरी में तैनात था. देखते-देखते मेरी मोर्च्यूरी लाशों के ढेर से पट गई. उस जमाने में लाशें रखने का कोई विशेष इंतजाम नहीं था. जगह भी बहुत कम थी. पुलिस वाले लाशों को ट्रकों में भर-भरकर लाए जा रहे थे. पोस्टमॉर्टम हाउस के अंदर-बाहर पुलिस वाहन और उनसे उतारी जा रही लाशें हीं दिखाई दे रही थीं. लाशों की बहुतायत का आलम यह था कि उन्हें रखवाने के लिए कर्मचारियों के साथ-साथ मुझे और अन्य डॉक्टरों को भी जुटना पड़ा. दो दिन में लाशों के ढेर लग गए. मुर्दाघर में नौकरी करने वाले मेरे किसी भी डॉक्टर ने जिंदगी में इतनी लाशों के ढेर एक साथ कभी नहीं देखे थे.’

सब्जी मंडी वाली मॉर्च्यूरी

सब्जी मंडी वाली मॉर्च्यूरी

‘लाशों’ के ढेरों के बीच वो जिंदा इंसान!

‘लाशों में शुरू हुई सड़ांध से कीटाणु फैलने लगे. फारेंसिक साइंस एक्सपर्ट्स को अजीब सा लगने लगा. कई की तो तबियत ही गड़बड़ाने लगी. कुछ एक्सपर्ट्स को नींद पूरी करने के लिए मैंने बारी-बारी से घर भेज दिया. वरना उनकी हालत बिगड़ सकती थी. मैं मगर 7-8 दिन मोर्च्यूरी से घर नहीं गया. दिन-रात पोस्टमॉर्टम करता रहा. इसलिए ताकि लाशें कम से कम सड़ने से तो बचाई जा सकें. दूसरे, सड़ने से पहले ही अगर लाशों का पोस्टमॉर्टम हो जा रहा था, तो इससे तमाम खास ‘क्लू’, कत्ल का असली तरीका और मौत की वाजिब वजह पकड़ में आ जाती थी.

टुकड़ा-टुकड़ा लाशें, तार-तार मन

लाशों की भीड़ और वीभत्सता का आलम यह था कि उन्हें, खिंचवाकर बेंच (पोस्टमॉर्टम करने वाली टेबिल या मेज) पर ले जाना नामुमकिन हो गया. लिहाजा ढेर से थोड़ा इधर-उधर हटाकर जो लाश जहां थी उसका, वहीं पोस्टमॉर्टम कर दिया जा रहा था.’ बचपन में जो बच्चा नाव की सवारी से पहले ही मौत के खौफ से रोने लगता था, वह इतने दिन लगातार इतनी लाशों के ढेर के बीच कैसे जीवित रहा बिना डरे हुए? पूछने पर बेसाख्ता हंसते हुए बताते हैं डॉ. भरत सिंह, ‘अहसास और अनुभव यानी तजुर्बा, दोनों में बहुत फर्क है. बचपन में नाव में बैठने से पहले मुझे नदी में डूबने का अहसास भर था. सो डरकर रोने लगता था. इस उम्मीद में कि शायद नाव में बैठने से बच जाऊं. लाशों के पोस्टमॉर्टम के वक्त तजुर्बा हासिल हो रहा था. लाशें सामने पड़ीं थीं. पोस्टमॉर्टम करने की मेरी जिम्मेदारी थी. सो भागकर भला कहां जाता?’

आज भी ढूंढ़ता हूं दिल्ली की भीड़ में गांव के बचपन की तमाम यादे ... पिता के मजबूत कंधे...पत्नी मालती सिंह के साथ डॉ. भरत सिंह

आज भी ढूंढ़ता हूं दिल्ली की भीड़ में गांव के बचपन की तमाम यादे ... पिता के मजबूत कंधे...पत्नी मालती सिंह के साथ डॉ. भरत सिंह

गांव-गलियारे की यादें ही साथ जाएंगीं

जौनपुर जिले के बलइपुर गांव से दिल्ली तक 77 साल के सफर की, एक-एक याद डॉ. भरत सिंह के जेहन में आज भी रची-बसी है. अतीत की यादों को करवट दिलाते-दिलाते कहीं खो से जाते हैं बीते कल के बलइपुर गांव के बालक और आज दिल्ली के 77 साल के बुजुर्ग भरत सिंह, ‘बलइपुर की सोंधी मिट्टी, गली-गलियारों ने ही पाल-पोसकर दिल्ली के काबिल बनाया. गांव में अम्मा मातादेवी द्वारा जबरिया गोद में घेरकर दूध-मिजी रोटी खिलाना कैसे भूल जाऊं? और कैसे आने से रोक दूं आज भी, पिता सूर्यदेव सिंह के कंधे पर बैठकर खेत-खलिहानों की सुबह-शाम की सैर! कैसे भुला दूं पिताजी के गांव पहुंचने के इंतजार में, एक सप्ताह तक चौपालों पर बाट जोहते, उन बुजुर्गों के उम्मीदों से लबरेज मगर बूढ़े हो चुके जर्जर बदन और चेहरों को, जिन्हें मेरे पिता से पढ़वाने का रहता था इंतजार, शहर से आए टेलीग्राम (तार) और पीले पोस्टकार्ड-नीले अंतर्देशीय पर लिखकर आई, गांव से मीलों दूर बसे ‘अपनों’ की खैर-खबर की चिट्ठियां? क्योंकि पिता जी ही गांव के इकलौते पढ़े-लिखे बाशिंदे थे.’ बताते-बताते सोई हुई यादों को झकझोर कर जगाने लगते हैं भरत सिंह.

भीड़ में खोजता हूं पिता के मजबूत कंधे

डॉ. भरत सिंह के दिमाग में हू-ब-हू आज भी रची-बसी-समाई है, रोटी बनाने के बाद चौका समेटते वक्त अम्मा की की गई चूल्हे की लिपाई से निकलने वाली मिट्टी की सोंधी खुश्बू. बकौल डॉ. भरत सिंह, ‘चूल्हे की वो सोंधी मिट्टी की मन हर लेने वाली खूश्बू, आज नहीं आती है किसी भी बेशकीमती लाखों की कीमत से तैयार ‘मॉड्यूलर-किचन’(रसोई-घर) के अंदर से. बूढ़ी आंखें बहुत तलाशती हैं, दिल्ली की भीड़ में तेज रफ्तार दौड़ने वाली मेट्रो-ट्रेन की रेलम-पेल भीड़ के बीच, पिता की शाही गोद. वही गोद जिसमें, उनकी बाहों पर बचपन में कभी झूला था हम सब भाई-बहनों ने जी-भर के झूला. दिल्ली के दरियागंज-कनाट-प्लेस की भीड़ भरे रंगीन बाजारों में तलाशता हूं, पिता के से वे मजबूत कंधे जिन पर बचपन में चढ़कर, कभी मैंने मचाई थी बदन-तोड़ू धमाचौकड़ी, चौपाल पर, गांव के खेत-खलियान, गलियारों और गांव के लंबे चौड़े आंगन में.’

बचपन से बुढ़ापे तक की यादें साथ ले जाऊंगा....डॉ. भरत सिंह, पत्नी मालती सिंह के साथ.

बचपन से बुढ़ापे तक की यादें साथ ले जाऊंगा....डॉ. भरत सिंह, पत्नी मालती सिंह के साथ.

‘मुर्दों’ के बीच मजबूत हुआ ‘दिल’ भी बिलखा है...

सन् 2001 में 31 अगस्त को एडिश्नल डायरेक्टर जनरल (भारत सरकार की स्वास्थ्य सेवा) पद से डॉ. भरत सिंह रिटायर हो चुके हैं. 50 हजार से ज्यादा लाशों का पोस्टमॉर्टम करने वाले भरत सिंह खुद के पास आज मौजूद, मजबूत जिगर होने का पूरा श्रेय भी वो ‘मुर्दों’ को ही देते हैं. उनके मुताबिक पोस्टमॉर्टम एक्सपर्ट की नौकरी ने दिल को मजबूत कर दिया. जो भरत सिंह कभी वीभत्स लाशों को देखकर नहीं डगमगाए, वे भी मगर अक्सर रोया करते थे. खुद को कमजोर महसूस करते थे. पता कब? जब सन् 1988 में उनकी माँ माता देवी का निधन हो गया.

पिता सूर्यदेव सिंह पत्नी की मौत के बाद खुद को बेबस और तन्हा महसूस करने लगे. पिता की वो तड़फन और उनकी तन्हाई का आलम, भरत सिंह की पलकों को अक्सर गीला कर दिया करता था. यह सिलसिला पिता के देहावसान यानी सन् 1995 तक बदस्तूर जारी रहा. सन् 1960 में आजमगढ़ की मालती सिंह से भरत सिंह का विवाह हो गया. भरत और मालती सिंह के एक बेटे अनिल सिंह दिल्ली में ही नौकरी करते हैं. छोटे बेटे आलोक सिंह डॉक्टर हैं, जबकि बेटी अलका सिंह (वकील) का विवाह भूपेंद्र सिंह चौहान और छोटी बेटी अर्चना सिंह का विवाह भारतीय सेना में कर्नल रोहित कुशवाह से हुआ है. अर्चना सिंह दिल्ली के मिरांडा कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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