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DP की DIARY (Part 2): बार-बार क्यों लेती है जिंदगी इम्तिहान? जीने से पहले ही कोई ठोक-बजाकर देख ले

इस 'संडे क्राइम स्पेशल' में पेश 'DP की DIARY: PART-2' में. बजरिए ‘फर्स्टपोस्ट हिंदी’ और ‘ब-कलम’ डीपी यानी धर्मपाल’

Updated On: Nov 11, 2018 09:57 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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DP की DIARY (Part 2): बार-बार क्यों लेती है जिंदगी इम्तिहान? जीने से पहले ही कोई ठोक-बजाकर देख ले

‘शनिवार यानी कल ‘पड़ताल’ में ‘DP की DIARY: PART-1’ में आपने पढ़ा कि कैसे दुर्दिनों और दुश्वारियों में गुजरा था मेरा बचपन? आखिर क्यों तड़के 4 बजे ही जागने और पूरा दिन इंतजार में खाली गुजारने के बावजूद मुझे मयस्सर नहीं हुआ था बचपन में रेलगाड़ी देखने का मौका. हर महीने जबरदस्ती नाई की दुकान पर ले जाकर क्यों और कौन, उस्तरे से कटवाकर मेरे सिर के सब बाल मुझे 'गंजा' करवाने पर था आमादा? और जिस सर्फाबाद गांव में, 1900 ईस्वी के शुरू में पीने का साफ पानी तक नसीब नहीं था. मेरे गांव के कुंए में आखिर आधी रात को क्यों कूद गई एक औरत? कौन थी कुंए में कूदने वाली वो महिला? कुंए में कूदने के बाद भी वो बच पाई या नहीं? आज करीब 60 साल बाद मैं क्यों मजबूर हुआ हूं यहां, गांव में घटी उस दिल-दहला देने वाली घटना का जिक्र करने के लिए?....और आखिर जमाने भर की नजर में आज का ‘दबंग डीपी’ यानि मैं भी... क्यों एक दिन भरी भीड़ में रह गया सा सहमकर? जैसे तमाम सवालों के बेबाक जवाब पढ़िये अब इस 'संडे क्राइम स्पेशल' में पेश 'DP की DIARY: PART-2' में. बजरिए ‘फर्स्टपोस्ट हिंदी’ और ‘ब-कलम’ डीपी यानी धर्मपाल.’

खेत में खेलते थे कुश्ती-कबड्डी

8 मई, 2017 तड़के सुद्धोवाला जेल: ‘बचपन में गरीब और अल्हड़ ठेठ किसान पिता की संतान जरूर था, मगर बेवकूफ कतई नहीं. पढ़ने वाले सोचेंगे कि मैं खुद को ही अक्लमंद कैसे कह सकता हूं? मैं नहीं कह रहा हूं. मेरे मास्साब (स्कूल टीचर) मुझे शरारती होने के बाद भी औसत दर्जे का छात्र कहते थे. इसलिए लिख रहा हूं. बचपन में खेलने का शौक तो था, मगर आज के से मंहगे और सुविधा-सम्पन्न प्ले-ग्राउंड या स्टेडियम नसीब में नहीं थे. सो गांव के कुछ लड़कों ने मिलकर एक जुता हुआ खेत तलाश लिया. फिर क्या था, उसी खेत में रात के वक्त और अल-सुबह कुश्ती, कबड्डी का खेल खेलने लगे. आंख-मिचौली खेलने के लिए गांव में वो चौपाल तलाश लेते थे जिस पर, कोई बुजुर्ग बैठा हुक्का न पी रहा हो. उस वक्त मेरी उम्र रही होगी यही कोई 7-8 साल की. खेतों में खेलने-कूदने के बाद नहाने के लिए घर के सामने मौजूद जोहड़ (पुश्तैनी तालाब) में सब बच्चे कूद पड़ते थे.’

पहले किसान पुत्र बाद में बाकी सब

‘खूब अच्छे से आज भी याद है कि जब, हम सब भाई थोड़े बड़े यानी समझदार होकर नौवी-दसवीं जमात में जाने के काबिल हुए. तभी पिताजी ने हमें काबू रखने की खातिर हमारे हाथों में थमाने के लिए एक नई जिम्मेदारी तलाश ली. वो जिम्मेदारी थी जब भी हम भाई स्कूल जाए उससे पहले या फिर स्कूल से लौटते वक्त पशुओं के लिए खेत से चारा जरूर काट लायें. चारा काटने के लिए बाकायदा हमें हाथों में दरांती (चारा काटने का छोटा देशी हथियार जिसे हंसिया भी कहते थे) थमा दी जाती. स्कूल के दिनों में उस मेहनत मशक्कत का ही परिणाम है जो, मैं आज तक कभी भी किसी उस मुसीबत में नहीं हारा जिनके चलते, अक्सर कांच के घरों में रहने वालों पर 'मुर्दानगी' छा जाती है. अस्पतालों में भर्ती होकर जिन्हें, ‘किराये की सांसों’ (आईसीयू, वेंटीलेटर) का सहारा लेना ही शेष बचता है.. संभव है कि मेरी जुझारू प्रवृत्ति ने ही मुझे अपने आप में मजबूत बनाया हो.’

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जब गुड़ ने सब ‘गड़बड़’ कर दिया

‘बचपन में देसी गुड़ खाने की आदत पड़ गई. इस हद तक कि ज्यादा गुड़ खाने से दाढ़ (दांतों) में अक्सर दर्द रहने लगा. यह बात होगी 8-10 साल की बाल्यावस्था की. कुछ साल बाद ही आठवीं की बोर्ड-परीक्षा देने तहसील सिकंदराबाद जाना पड़ा. परीक्षा के दिनों में भी दाढ़ में ना-काबिल-ए-बर्दाश्त दर्द हो रहा था. आज के से मंजन-पेस्ट का नाम-ओ-निशान नहीं था. सो बबूल या नीम की हरी लकड़ी की दातून से काम चला लेता था. परीक्षा के दिनों में कई विद्यार्थी एक साथ हेड-मास्साब (प्रधानाध्यापक) रामफल शर्मा जी (पंडित जी) के घर रहते थे. सुबह उठकर कोल्ड-स्टोर वाले ट्यूबवैल (खेत में पानी देने की पूर्व प्रचलित देसी मशीन या मैकेनिज्म) पर सब नहा लेते थे. दांत के दर्द में ही परीक्षा देकर आठवीं कर ली. तो उसके बाद जैसे-तैसे खींचतान करके गाजियाबाद के महानंद मिशन कॉलेज में 9वीं में दाखिला हो गया. वो मेरे पैतृक गांव सर्फाबाद से 10-12 किलोमीटर दूर नदी-नाले और बियाबान जंगलात के पार स्थित था.’

बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना!

‘उन्हीं दिनों बड़े भाई श्याम सिंह (प्रधान)’ की शादी बहलोलपुर की शांति देवी से हो गई. उन्हें दहेज में ससुराल से हीरो साइकिल मिली. दहेज में साइकिल बड़े भाई श्याम सिंह प्रधान को मिली. दिलचस्प यह कि खुशी से मैं फूला नहीं समाया. मेरी बेइंतहाई खुशी की वजह थी, सर्फाबाद गांव से मेरा रोजाना गाजियाबाद 10-12 किलोमीटर दूर नदी-नाले-घना जंगल पार करके पैदल ही पढ़ने जाना-आना. इसलिए साइकिल की खुशी भाई से ज्यादा मुझे होना लाजिमी था. अगर भाई को दहेज में मिली वो साइकिल मेरे हाथ न लगती तो, शायद पढ़ाई भी मंझधार में फंस जाती.’

पिता के साथ डीपी यादव (फाइल फोटो)

पिता के साथ डीपी यादव (फाइल फोटो)

फावड़े से खेत में किस्मत की लकीरें खींचने लगे

‘गांव से साइकिल पर मेरे साथ पढ़ने वीर सिंह जाटव भी जाने लगे. कुछ दूर साइकिल वीर सिंह खींचते मैं बैठता. उसके बाद किलोमीटर तक वीर सिंह को बैठाकर मैं साइकिल चलाता. रास्ते में (बहलोलपुर-हैवतपुर गांव के पास) नाव पर साइकिल चढ़ाकर हम पार पहुंचते थे. श्याम सिंह भाई साहब की शादी के बाद हम सब भाईयों को अहसास होने लगा कि, अब हम लोग पिता के साथ हाथ बंटाने के काबिल हो चुके हैं. खेती-किसानी के काम में बैलों का इस्तेमाल होता. मुझे हल चलाना नहीं आता था. लिहाजा हम चारों भाई भी पिता के साथ खेतों में जाकर फावड़ों से वहां अपनी किस्मत की लकीरें खींचने लगे.’

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आधी रात को जब ‘वो’ कुंए में कूद गईं

‘यह किस्सा उन दिनों का है, जब मैं बहुत छोटा था.. एक रात गुस्से में मेरी ताई जमनी अचानक घर से गायब हो गईं. गांव में कोहराम मच गया. वजह थी मेरी ताई का कुंए में कूद जाना. मुझ सहित गांव के तमाम बालक तमाशा देखने कुंए पर पहुंच गये. पता चला कि ताई घर में किसी बात को लेकर टिनक (नाराज) गईं थीं. जिसके बाद वे ताव में डूब कर मरने के इरादे से गांव के कुंए में जाकर कूद गयीं. इस वक्त 70 साल की उम्र में ताई के पति का नाम याद नहीं आ रहा है. ताई जमनी के जेठ का नाम शायद लाल सिंह था. गांव में लाल सिंह के भाई कन्हैया लाल, उस जमाने में भी पैसे वाले रहीस बाशिंदों में शुमार थे. हमारी जमनी ताई, गांव के ही जग्गन और प्रकाश की चाची थीं. यह खूब याद है आज भी. कई घंटों के भागीरथ प्रयासों के बाद जैसे-तैसे गांव वालों ने जमनी ताई को कुंए से बाहर निकालकर जिंदा बचाया.’

बिना सरकारी मुलाजिम का सर्फाबाद

‘मुझे खूब याद है कि मेरे बचपन के दिनों में गांव में एक भी सरकारी मुलाजिम नहीं था. एक अदद पंडित भोजराज और प्रहलाद के पिता पूरे गांव में सर्वज्ञ समझे जाते थे. पंडित जी दिल्ली में किसी लाला के यहां पत्रा (जन्म कुंडली) देखने चले जाते थे. उसी 'आय' में उनका घर-परिवार चलता था. बाद में गांव के अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी शारीरिक रूप से बलिष्ठ एक-दो लड़के (भागमल व राजपाल) फौज में भर्ती हो गए. वे दोनों फौजी साल बाद जब छुट्टी पर गांव आते तो, उन्हें देखने वालों का हमारे जैसे बालकों का तांता (भीड़ या लंबी लाइन) लग जाता था. हां हमारे ही खानदान के मुझसे उम्र में बहुत बड़े मैसराम जरुर उन दिनों रेलवे में खल्लासी (खलासी) थे. कालांतर में वो आरपीएफ यानि रेलवे सुरक्षा बल में भर्ती हो गए.’

जब मेरी मस्ती किसी और पर भारी पड़ी

‘भरे चौमास (सावन यानी जुलाई-अगस्त-सितंबर) के दिन थे. उम्र ने अल्हड़ बना रखा था. आता-जाता नहीं था फिर भी, एक दिन खेत में हल चलाने पहुंच गया. हल में मेरी ही गायों के दोनो नए-नए बछड़े, बैल के रूप में जुते हुए थे. खुशगवार आसमान में छायी काली-बदरिया देखकर गीत गुनगुनाते वक्त हल चलाने से ध्यान हट-बंट गया. जिसका खूनी परिणाम सामने था. नौसिखिए किसान-पुत्र ने (यानी मैंने) हल में जुते बैल में से एक का पांव, अनजाने में ही हल की तेजधार यानी ‘फाल’ से कटवा डाला. खून की धार बैल के पांव से बह रही थी लेकिन, बदन में खून खुश्क मेरे हो चुका था डर के मारे. पूरा अंदाजा लगा लिया कि, घर पहुंचते ही चाचा (पिता महाशय तेजपाल सिंह) मेरी हालत, घायल बैल से बदतर करने में रहम नहीं खाएगे.’

भय भारी है या फिर इंसान कमजोर

‘चिंता थी और निश्चित भी था कि नए बैल का पांव कटने पर चाचा (पिता) माफ नहीं करेंगे. सो सजा से बचने की उम्मीद में मैने, घायल बैल मय जुए के (जिसमें दो बैल जोते-बांधे जाते हैं) पड़ोस वाले खेत में काम कर रहे दूसरे किसान के हवाले कर दिए, जिसे मेरी कारस्तानी का सपने में भी अंदाजा नहीं था. इस मान-मनुहार के संग कि वो घर में जाकर बैल पिताजी के हवाले कर दे. मेरे बारे में बता दे कि मैं शहर चला गया हूं. उस दिन अहसास हुआ कि जीवन में इंसान से झूठ बुलवाने की कुव्वत डर या भय भी खुद में रखता है. या यह कहूं कि इंसान पर कभी-कभी भय बहुत भारी भी साबित होता है.’

ज़िंदगी के मसले बोझिल हैं, कैसे इनको निपटायेंगे,ऐसा लगता है अब तो हम कहते-कहते थक जाएंगे. डीपी द्वारा लिखित किताब उड़ान-एक-हौसला से ली गईं वो पंक्तियां जो मुसीबत में उन्हें हौसला देती हैं

ज़िंदगी के मसले बोझिल हैं, कैसे इनको निपटायेंगे,ऐसा लगता है अब तो हम कहते-कहते थक जाएंगे. डीपी द्वारा लिखित किताब उड़ान-एक-हौसला से ली गईं वो पंक्तियां जो मुसीबत में उन्हें हौसला देती हैं

शहर की भीड़ में बस मैं ‘खाली जेब’

‘बैल और हल दूसरे किसान के हवाले करने के बाद. मैं पैदल ही शहर की ओर चल दिया. भूखे-प्यासे पेट चलते-चलते सिहानी गेट पुलिस चौकी के पास मौजूद जरीफ हेयर ड्रेसर की दुकान पर मैं पहुंच गया. पढ़ने के दिनों में वहां अक्सर दोस्तों के संग बाल कटवाने जाता रहता था. जरीफ नाई की दुकान रात 9-10 बजे बंद होनी थी. सो कई घंटे पास ही मौजूद पार्क में बैठा रहा. आसपास से आ-जा रहे लोगों को देखकर मुझे अहसास हुआ कि उस अजनबी शहर (गाजियाबाद) में बस मैं ही खाली-जेब था. जैसे-तैसे वो रात नाई की दुकान में भूखे-पेट सोकर गुजार दी. सुबह वहां से चल दिया उस रास्ते की ओर, जो आगे जाकर किधर मुड़ेगी कहां जाएगी? खुद मुझे ही नही पता था.’

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मैं बच गया, वो बेकसूर-बेजुबां मर गया!

‘नाई की दुकान से भूखा-प्यासा चलता-चलता पहुंचा सिहानी गेट की बस्ती चंद्रपुरी में. इच्छाराम चौहान और जगन के कमरे पर. दोनों लड़के सर्फाबाद के पास मौजूद ममूरा गांव (नोएडा) के रहने वाले थे. शहर में किराए का कमरा लेकर वे दोनों पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने एक गिलास दूध और कुछ बिस्कुट खाने को दिए, तब लगा कि मैं भी जिंदा हूं. दो-तीन दिन बाद लौटकर घर पहुंचा. पता चला घायल बैल इलाज के अभाव में बुरी तरह लंगड़ा हो चला था. कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई. समझ नहीं आता कि, इसे मैं क्या समझूं? खुद की बदकिस्मती या फिर वक्त का खेल क, दूध और बिस्कुट से खुद की जिंदगी बचाकर मैं तो गांव में जिंदा पहुंच गया और बेजुबां-बेकसूर बैल मगर मौत के मुंह में चला गया.’

पतंगे सा जलकर मर गया जो ख्वाब

‘एक दिन मैं दादी अमरी और चाचा (पिता महाशय तेजपाल सिंह) से जिद कर बैठा कि रेलगाड़ी देखनी है. तब तक बस सुना ही था कि रेलगाड़ी से बहुत तेज कानफोड़ू आवाज आती है. रेलगाड़ी देखने की खुशी में तड़के चार बजे ही मैं सोकर उठ बैठा. पिताजी ने गाजियाबाद मंडी जाने को बैलगाड़ी में अनाज भरा. उस अनाज के ऊपर ही मैं भी बैठ गया. मंडी में अनाज बेचते-करते शाम ढल आई. पूरे दिन तो मैं इस इंतजार में बैठा रहा कि पिताजी अब रेलगाड़ी दिखाएंगे तब दिखाएंगे. शाम ढलते ही, पिताजी ने बच्चों को बैलगाड़ी में बैठा दिया. यह कहते हुए कि, रात हो चुकी है. रास्ते में घने जंगल और हिंडन नदी पार करनी है. भेड़िया भी मिल सकता है. रेलगाड़ी बाद में दिखा दूंगा. दूर से ही सही रेलगाड़ी देखने का वो ख्वाब भी उस दिन, जलते दीए के इर्द-गिर्द मंडरा रहे किसी बेचैन ‘पतंगे’ सा, फड़फड़ाकर जल-भुन कर मर गया.उस दिन पिता ने मगर, अनाज मंडी से मिली रकम में से दो रुपए खर्च करके जलेबी और केला जरूर खिलाया था हमें. जिसे खाकर हम बच्चे बहुत खुश थे.’

कट्टर आर्य समाजी विचारधारा के अनुयायी डीपी के पिता और प्रेरणास्रोत स्वर्गीय महाशय तेजपाल सिंह यादव, डीपी को बचपन में ही जिन्होंने खेतों में फावड़े से जमीन खोदकर खुद अपना रास्ता बनाना सिखाया

कट्टर आर्य समाजी विचारधारा के अनुयायी डीपी के पिता और प्रेरणास्रोत स्वर्गीय महाशय तेजपाल सिंह यादव, डीपी को बचपन में ही जिन्होंने खेतों में फावड़े से जमीन खोदकर खुद अपना रास्ता बनाना सिखाया

याद है किसान के साथ ‘आढ़ती’ की बत्तमीजी

‘एक दिन पिता जी के साथ मंडी जाने का मौका मिला. मंडी में मैंने देखा कि वहां मौजूद बनिया (आढ़ती) गांव के किसानों को कैसे दुत्कार रहा है? उसी किसान को जिसके, रहम-ओ-करम पर उसका 'धंधा' चल रहा था. वह आढ़ती अनाज मंडी में पहुंचे किसानो से जिस, अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा था. वो थी तो ना-काबिल-ए-बरदाश्त. मैं मगर बच्चा था. सो चाहकर भी विरोध की जुर्रत नहीं कर सका. हां, उस घटिया आढ़ती का वो क्रूर चेहरा और मेहनतकश किसान के प्रति उसका ओछा रवैया आज भी जेहन से नहीं मिटा है. आज महसूस होता है कि, परमाणु ताकत होने के बाद भी हम आज इसीलिए तो दुखी नहीं हैं क्योंकि हमारा किसान आज भी सुखी नहीं है.’

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मुझे ‘गंजा’ कराना उनकी जिद थी या मजबूरी?

9 मई, 2017 सुद्धोवाला जेल देहरादून: ‘मुझे भली-भांति याद है कि पिता जी, जिन्हें हम भाई-बहन घर में चाचा के संबोधन से बुलाते थे. कभी भी अपने बेटों के सिर पर बढ़े हुए बाल देखना बर्दाश्त नहीं करते थे. सो महीने भर में जैसे ही हम भाइयों के बाल सिर में निकलते यानी उगते दिखाई देते. चाचा की त्योरियां (नजर) चढ़नीं शुरू हो जातीं. उन्हें चिंता सताने लगती कि कब बेटों के बाल नाई से कटवाने का वक्त निकाला जाए. पिता जी हम चारों भाइयों को इकट्ठा करके गांव के ठेठ देसी नाई बिहारी सिंह के अड्डे पर पहुंच जाते. सिर घुटवाने (गंजा) के लिए. ऐसा नहीं है कि, यह पिताजी शौक में या किसी जिद के चलते करते थे. इसके पीछे उनका वाजिब तर्क था.

आर्य समाजी विचारधारा के अनुयायी पिताजी का मानना था कि ब्रह्मचार्य अवस्था के दौरान सिर के बाल छोटे हों. ताकि बुद्धि और बल का संपूर्ण विकास हो सके. यही वजह थी कि हम सब भाई 10वीं क्लास में पहुंचने तक, पूरे गांव में सिर घुटवाए (गंजा कराके) घूमते रहे.’ अब जेल में कैसी गुजर रही है जिंदगी? के जवाब में डीपी लबों में ही हंस लेना ज्यादा मुनासिब समझते हैं. शायद यह सोचकर कि, 'वे बोले तो आवाज फिर दूर तलक जाएगी'

...और गुनगुनाने लगते हैं जेल की सलाखों में लिखी खुद की ही चंद लाइनें...

'वक्त ने जब भी मुझे यूं जीने का अवसर दिया

ज्यूं सागर की लहरों पे कोई घर बनाके देख ले

बार-बार क्यों लेती है ज़िंदगी मेरा इम्तिहान

जीने से पहले ही कोई ठोंक बजाकर देख ले!!'

अगले शनिवार को ‘पड़ताल’ में पढ़ना न भूलें

(‘DP की DIARY: PART-3’: पढ़ने का ज्यादा शौक नहीं था. फिर भी घरवालों को दिखाने की खातिर ग्रेजुएशन कर लिया... शरीर से मजबूत था. ऐसे में शैतान होना भी लाजिमी था... वो फिल्म जिसने घुमा दी बचपन में बुद्धि. फीस के पैसों में से चोरी कर के फिल्म देखने पहुंच गया सिनेमा हॉल... जारी)

(लेख डीपी यादव की जेल में लिखी डायरियों और उनसे हुई बातचीत पर आधारित है. ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी और लेखक किसी भी दावे या बयान की पुष्टि नहीं करते. लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं)

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