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जब हत्यारों की ‘ऐलान-ए-गिरफ्तारी’ के लिए पुलिस जिप्सी के बोनट पर चढ़ गया दबंग डिप्टी पुलिस कमिश्नर!

1993 के मई-जून महीने में नजफगढ़ मार्केट में हुए दो भाइयों के कत्ल ने माहौल काफी गरमा दिया था, जिसे शांत करना काफी मुश्किल साबित हो रहा था

Updated On: Aug 05, 2018 09:15 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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जब हत्यारों की ‘ऐलान-ए-गिरफ्तारी’ के लिए पुलिस जिप्सी के बोनट पर चढ़ गया दबंग डिप्टी पुलिस कमिश्नर!

लिखने, पढ़ने, सुनने और देखने में ‘दबंग’ शब्द जितना हद से पार बहादुर होने की ओर इशारा करता है. हकीकत में ‘दबंग’ बनने और ‘दबंगई’ करने के लिए उससे भी कहीं ज्यादा ‘जिगर’ या ‘माद्दे’ की जरूरत होती है. पेश इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में मैं, देश और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) की मशहूर एक ऐसी ही शख्सियत की सच्ची कहानी पढ़वा रहा हूं, जो कभी शोहरत की मोहताज नहीं रही. खुद तो कुल-खानदान-संस्कार से जन्म-जात दबंग था ही. अब से करीब तीन दशक पहले सन् 1990 के दशक में जिसने, खुद को देश के कई नामी ‘एनकाउंटर-स्पेशलिस्ट्स’ का ‘जन्मदाता’ भी सिद्ध कर दिया. हम बात कर रहे हैं भारत में ‘एनकाउंटर-स्पेशलिस्ट’ बनाने वाली दिल्ली पुलिस की, चलती-फिरती-सुनती-बोलती इसी ‘इंसानी-मशीन’ के उस हैरतंगेज कारनामे की जब, हत्यारों की ऐलान-ए-गिरफ्तारी के लिए वो पुलिस की जिप्सी पर ही चढ़कर खड़ा हो गया. मातहत पुलिस कर्मियों की मौजूदगी में हजारों की भीड़ में...भरे बाजार के बीच-ओ-बीच.

1990 के दशक में दक्षिण-पश्चिम दिल्ली का नजफगढ़ इलाका

यह उस जमाने की बात है जब, दिल्ली और उसके आसपास (राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली) इलाके में महेंद्र फौजी, बलराज-नरेंद्र, किशन पहलवान, बृज मोहन त्यागी, सतबीर गूजर, केशव दयालपुरी (केशौ) या जैसे खूंखार शार्प-शूटर्स की तूती बोलती थी. पुलिस और इन बदमाशों के जाने-अजनाने मिल जाना, मतलब उस सड़क पर गोलियां की तड़तड़ाहट जमाने को कानों में गूंज उठना तय माना जाता था. पुलिस और बदमाश हमेशा एक-दूसरे की तलाश में रहते थे. मुकाबला होने पर बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं थी. सिर्फ और सिर्फ गोली ही तय करती थी कि कौन जीता कौन हारा! सन् 1993 के मई-जून महीने में नजफगढ़ मार्केट में हुए दो भाइयों के कत्ल ने उस माहौल को और भी डरावना बना दिया.

दिन-दिहाड़े भाईयों के कत्ल ने पुलिस-पब्लिक को हिला दिया

मई या जून का महीना था. दिन-दहाड़े कुछ बदमाशों ने सर-ए-आम भीड़ भरे बाजार में दो व्यापारी भाइयों को गोलियों से भून डाला. वजह थी रंगदारी से इंकारी. लंबे समय से एक कुख्यात गैंग दोनों व्यापारी भाइयों को धमका रहा था. बदमाश चाहते थे कि दोनों व्यापारी भाई जिंदा रहने के लिए उन्हें ‘रंगदारी’ (हर महीने एक बंधी बंधाई रकम) देना शुरू कर दें. जिंदादिल दोनों भाइयों ने बदमाशों को दो टूक कह दिया कि उनसे जो करा जाए कर लें. रंगदारी किसी भी कीमत पर नहीं देंगे. यह बात बदमाशों को इस कदर नागवार गुजरी कि उस वक्त वे खून का घूंट पीकर चले गए, लेकिन किसी बेकसूर की जान लेने के इरादे बनाकर. जैसे ही एक दिन मौका मिला बदमाशों ने दोनों व्यापारी भाइयों को दिन-दहाड़े गोलियों से भून डाला.

बेखौफ बदमाश, गुस्साई पब्लिक और परेशान-हाल पुलिस

दिन-दहाड़े हुए दोहरे हत्याकांड का मामला नजफगढ़ थाने में दर्ज कर लिया गया. उस घटना को लेकर इलाके के व्यापारियों और पब्लिक में गुस्सा भर गया. स्थानीय निवासी और व्यापारी दोहरे हत्याकांड के लिए सीधे तौर पर इलाका (नजफगढ़ थाना) पुलिस के ढीले सुरक्षा इंतजामों को जिम्मेदार ठहरा रहे थे.

गुस्साए व्यापारियों ने तो यहां तक आरोप लगा दिया कि बदमाश पुलिस को पाल-पोसकर इलाके में इस तरह की वारदातें कराकर मोटी कमाई कर रही है. व्यापारियों ने इलाके का मार्केट पूरी तरह से जब बंद कर दिया, तो जिला पुलिस के आला-अफसरों की नींद खुली. समस्या यह थी कि दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के जिला पुलिस उपयुक्त (डीसीपी) यू.एन.बी. राव उन दिनों छुट्टी पर थे. जबकि जिले के मौजूदा आला पुलिस अफसरों का नाराज व्यापारियों को समझाने शांत कराने में दम फूल चुका था. उनकी हर मिन्नत को गुस्साए लोग ठुकरा चुके थे.

जब पुलिस कमिश्नर ने चला ‘तुरुप का पत्ता’

थाना नजफगढ़ पुलिस के खिलाफ जनता के सड़कों पर उतर आने की बात, ब-जरिये मीडिया उस वक्त पुलिस कमिश्नर रहे मुकुंद बिहारी कौशल (एम.बी.कौशल) तक पहुंची. पुलिस कमिश्नर ने आनन-फानन में दक्षिण-पश्चिमी जिले (यूएनबी राव के छुट्टी में जाने के कारण) के डीसीपी का कामकाज देखने के लिए सूझबूझ वाले दबंग आईपीएस दीपक मिश्रा का लगा दिया. इस उम्मीद में कि हो न हो, दीपक साम-दाम-दण्ड-भेद से जैसे भी होगा, बिगड़े हालात को काबू करके, आगे बिगड़ने वाली संभावित स्थिति को भी नजर में लेने में, सक्षम साबित होंगे.

पब्लिक से किया वायदा पूरा किया...वक्त से पहले हत्यारे हवालात में डालकर- दिल्ली सीजीओ कॉम्पलेक्स स्थित केंद्रीय पुलिस सुरक्षा बल मुख्यालय में दीपक मिश्रा.

पब्लिक से किया वायदा पूरा किया...वक्त से पहले हत्यारे हवालात में डालकर- दिल्ली सीजीओ कॉम्पलेक्स स्थित केंद्रीय पुलिस सुरक्षा बल मुख्यालय में दीपक मिश्रा.

सिपाही की जानकारी नहीं, ‘डबल-मर्डर’ सुलझाने भेज दिया

दीपक मिश्रा के साथ समस्या यह थी कि वे दक्षिण-पश्चिम जिले के सिपाही तक को नहीं जानते-पहचानते-समझते थे. उस पर भी ‘टारगेट’ था गुस्से से उबली पड़ी मार्केट एसोसिएशन और पब्लिक को शांत कराने का. कई दिनों से बंद इलाके के रास्तों और मार्केट को खुलवाना था. यह तभी संभव था जब दोनों व्यापारी भाइयों के हत्यारों को दबोचा जाए. कुल जमा अगर यह कहा जाए कि दबंग दीपक मिश्रा पर उस वक्त, ‘मरता क्या न करता’ वाली कहावत लागू हो रही थी तो गलत नहीं होगा. उम्मीद पब्लिक की और हुक्म एम.बी.कौशल जैसे तेज-तर्रार आईपीएस पुलिस कमिश्नर ‘बॉस’ का.

उनका वजन और अपने कंधे!

डबल मर्डर दक्षिण-पश्चिम जिले के नजफगढ़ थाना इलाके में हुआ था. जिसके भूगोल से दीपक मिश्रा और उनके मातहत पुलिसकर्मियों का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. ऐसे में माथापच्ची करते-करते दीपक मिश्रा ने एक युक्ति खोजी. युक्ति थी कि जिस जिले और थाना इलाके में मर्डर हुआ है, उसका स्टाफ जांच-पड़ताल में लगाया ही न जाए. लिहाजा उन्होंने अपने ही जिले के (पश्चिमी दिल्ली जिला जिसके दीपक मिश्रा उस वक्त डीसीपी थे) दो ऐसे दबंग इंस्पेक्टरों को चुना जो, कालांतर में दिल्ली पुलिस में उन्हीं की ‘खोज’ कहलाए. दोनों ही इंस्पेक्टर जांबाजी का प्रदर्शन करके ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन लेकर दारोगा (सब-इंस्पेक्टर) से इंस्पेक्टर बने-बने ही थे. उनसे नजफगढ़ दोहरे हत्याकांड की उलझी हुई गुत्थी सुलझवाने की योजना बनाई.

डबल मर्डर की वारदात में इम्तिहान रवि-राव का

यह दोनों दबंग और दीपक मिश्रा के पसंदीदा इंस्पेक्टर थे पश्चिमी जिले के थाना तिलक नगर एसएचओ एल.एन. यानी लक्ष्मी नारायण राव और पश्चिमी जिला स्पेशल स्टाफ प्रमुख इंस्पेक्टर रवि शंकर कौशिक (दोनों ही देश के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड डीसीपी). दोनों मातहत इंस्पेक्टरों को लेकर दीपक मिश्रा नजफगढ़ में उस जगह पहुंचे जहां, डबल मर्डर हुआ था. भीड़ ने घेर लिया. नाराज व्यापारियों का एक ही सवाल था....तुम लोग (डीसीपी दीपक मिश्रा और साथ पहुंचे दोनों इंस्पेक्टर राव और रवि) को तो इलाके की ही जानकारी नहीं है. बदमाश पकड़ने के नाम पर सिर्फ वक्त जाया मत करो. व्यापारी किसी भी कीमत पर उन तीनों गुरू-शिष्य को खुद के बीच से तुरंत भगाने पर तुले हुए थे.

दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर युद्धवीर सिंह डडवाल के साथ देश के नामी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड डीसीपी (दिल्ली पुलिस) रवि शंकर कौशिक.

दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर युद्धवीर सिंह डडवाल के साथ देश के नामी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड डीसीपी (दिल्ली पुलिस) रवि शंकर कौशिक.

जब चल ही दिया जिताने वाला ‘दांव’

गुस्साए व्यापारियों को भड़कता देख कर भी दीपक मिश्रा ने आपा नहीं खोया. न ही वे मौके पर गुस्साए और उन्हें वापिस भगाने पर आमादा भीड़ से उलझे. उन्होंने भीड़ के सामने ही खुलेआम दोनों इंस्पेक्टरों से पूछा.... ‘बोलो राव-रवि क्या, हम लोग डबल मर्डर खोल लेंगे? और कब तक....? तुम दोनों आज इस जनता के सामने जो कहोगे वही मेरी ‘जुबान’ कहलाएगी! हां..या न!’. एक डीसीपी स्तर के आला-आईपीएस पुलिस अफसर की मुंहजुबानी यह सब सुनकर नारे लगाकर सड़कें जाम कर रही पब्लिक ठंडी पड़ गई.

पुलिसिया नौकरी में हमेशा कुछ न कुछ नया कर गुजरने के लिए मशहूर दीपक मिश्रा ने आव-देखा-न-ताव. पब्लिक से वे कई कदम आगे का दांव चलने की सोच चुके थे. सो देखते-ही-देखते वे भीड़ के बीच में मौके पर मौजूद पुलिस की जिप्सी के बोनट के ऊपर चढ़ कर खड़े हो गए और फिर जिप्सी के बोनट पर खड़े-खड़े ही ऐलान किया कि, ‘मैं और मेरी टीम (एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर रवि-राव) को अगर आप लोग एक महीने का वक्त दें, तो दोनों व्यापारियों के कातिल जिंदा या मुर्दा कानून के शिकंजे में होंगे! ’

तब खून खुश्क दिमाग सुन्न था, आज हंसी आती है

पुलिसिया नौकरी में गुजरे उस अजीब-ओ-गरीब वाकये पर, इस वक्त केंद्रीय सुरक्षा बल (सेंट्रल रिजर्व पुलिस बल) मुख्यालय (दिल्ली सीजीओ कॉम्प्लेक्स) में स्पेशल डायरेक्टर दीपक मिश्रा जोरदार ठहाका मारकर हंसते हैं. कमोबेश यही स्थिति उस वाकये का जिक्र आने पर लक्ष्मी नारायण राव की है. उस वाकये से सीधे-सीधे जुड़े दोनों ही आला पुलिस अफसर खुलकर बात करते हैं. बकौल, दीपक मिश्रा, ‘टारगेट टेढ़ा था. मेरे निशाने पर हत्यारे थे. जबकि पुलिस कमिश्नर की नजरें मुझ पर और मेरी टीम पर थीं. अगर मैं जिप्सी पर चढ़कर पब्लिक को विश्वास न दिलाता तो, नजफगढ़ क्या दक्षिण-पश्चिम जिले में ही व्यापारी और पब्लिक कानून व्यवस्था में बड़ी बाधा डाल सकते थे. उनका गुस्सा अपनी जगह जायज था. दिन-दहाड़े व्यापारियों का डबल-मर्डर. वो भी दिल्ली जैसे शहर में भीड़ भरे बाजार में. मजाक नहीं, समाज के लिए सनसनी और दिल्ली पुलिस के लिए ‘ओपन-चैलेंज’ था.’

मेरी जुबान की इज्जत रखवा देना!

करीब 25 साल बाद उस दिन की जिक्र छेड़ने पर एल.एन.राव बताते हैं कि ‘वाकई ‘गोल’ टफ और हमारी जेब में हत्यारों की जानकारी 'जीरो' थी.’ इस हकीकत को मानने में मुझे कोई संकोच नहीं है. यही वजह थी कि दीपक सर (डीसीपी दीपक मिश्रा) भीड़ में ही पुलिस जिप्सी पर चढ़ गए. यह हिम्मत, जज्बा या समझदारी जो भी समझिए, उन्हीं में (डीसीपी दीपक मिश्रा) थी कि वे मौका-ए-हालात भांप चुके थे. जिसके फलस्वरूप जिप्सी पर खड़े होकर हत्यारों की ऐलान-ए-गिरफ्तारी का उनका फार्मूला उस वक्त ‘नायाब’ साबित हुआ.

घटनास्थल से वापिस लौटने पर मुझे (एल.एन.राव)और रवि कौशिक को बुलाकर पूछा, 'हां बच्चो, बताओ क्या इरादा है? इज्जत बचा लोगे कि नहीं! मैं हत्यारों को एक महीने में पकड़ने की मुनादी (ऐलान) तो खुलेआम कर आया हूं. अब दिल्ली पुलिस की नाक बचाना तुम दोनों (रवि-राव) के हाथों में हैं.' बताते हुए जोरदार ठहाका मारकर हंस पड़ते हैं लक्ष्मी नारायन राव.

टारगेट टफ था और जानकारी जीरो- रिटायर्ड डीसीपी लक्ष्मी नारायण राव.

टारगेट टफ था और जानकारी जीरो- रिटायर्ड डीसीपी लक्ष्मी नारायण राव.

‘टाइम’ से पहले ‘टारगेट’ पूरा, हत्यारे हवालात में

हत्यारों की ऐलान-ए-गिरफ्तारी के बाद राव-रवि की टीम ने 20-25 दिन के अंदर ही डबल मर्डर के हत्यारोपी मितराऊं गांव के बलराज, जोंती गांव का नरेंद्र, राजेश नाहरी और ढिचाऊं कला का किशन पहलवान सहित आठ बदमाश धर दबोचे थे. इसके बाद बढ़े विश्वास के बलबूते ही एल.एन. राव की टीम ने दीपक मिश्रा के ही निर्देशन में उस जमाने में आतंक का नाम रहे केशव (केशौ) गूजर उर्फ केशै दयालपुरिया को दबोच लिया था. पुलिस सूत्र बताते हैं कि, मौजूदा समय में किशन पहलवान और केशौ राजनीति के साथ-साथ अपने-अपने काम धंधे में लगे हैं.

पुलिस को ‘दीये’ सा रोशन करने वाले दीपक?

दीपक मिश्रा 1984 अग्मू कॉडर (अरुणाचल प्रदेश गोवा मिजोरम एंड यूनियन टेरीटरी) के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी हैं. केंद्र सरकार ने उन्हें अप्रैल 2016 में एडिश्नल डायरेक्टर जनरल बनाकर केंद्रीय सुरक्षा बल (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स मुख्यालय, दिल्ली) में भेज दिया. मौजूद समय में वे सीआरपीएफ में विशेष महानिदेशक हैं. सीआरपीएफ मुख्यालय में उनका कार्यकाल (तैनाती) फिलहाल नवबंर 2018 तक का माना जा रहा है. इस वक्त दीपक मिश्रा जिस सीआरपीएफ में नंबर दो की पोजीशन पर तैनात हैं, उसका जन्म अब से करीब 80 साल पहले ब्रिटिश काल में (सन् 1939) बतौर ‘क्राउन रिप्रजेंटेटिव्स पुलिस’ हुआ था. भारत के आजाद होने के बाद सन् 1949 में सीआरपीएफ एक्ट अमल में लाया गया.

मौजूदा समय में सीआरपीएफ 3 लाख जवानों और 228 बटालियंस वाली विश्व की सबसे बड़ी कोई पार्लियामेंट्री फोर्स होने का खिताब अपने नाम लिखाए हुए है. अप्रैल 2016 के तक दीपक मिश्रा दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर थे. भारतीय पुलिस सेवा में दीपक मिश्रा वो शख्सियत हैं जिसे, ‘इंटरपोल’ जैसे विश्वव्यापी संस्था में दो बार काम करने का मौका मिला. हजारीबाग (बिहार) के मशहूर डॉक्टर (स्व.) जी.के. मिश्रा के पुत्र दीपक मिश्रा की काबिलियत का लोहा भारत सरकार ने तब भी माना था जब उनके नेतृत्व में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) टीम ने गुजरात में अक्षरधाम मंदिर के हमलावरों को घेरकर ठिकाने लगा दिया था.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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