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जिन पुलिस वाले ‘भगतजी’ के पांव छूते थे लोग, असल में भी वो हैं साधारण इंसान और असाधारण डिप्टी एसपी!

भगत जी के नाम से जाने जाने वाले सुरेंद्र सिंह लौर 31 अगस्त सन 2004 को यूपी पुलिस (पीएसी डिप्टी कमांडेंट) डिप्टी एसपी पद से रिटायर हो चुके हैं

Updated On: Aug 12, 2018 09:13 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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जिन पुलिस वाले ‘भगतजी’ के पांव छूते थे लोग, असल में भी वो हैं साधारण इंसान और असाधारण डिप्टी एसपी!

खाकी वर्दी यानी पुलिस, जिसे सड़क पर देखते ही जन-मानस सिहर उठता है. तमाम घटिया विचार दिल-ओ-दिमाग में आने लगते हैं. शरीफ और पढ़ा-लिखा इंसान, जिस पुलिस के सामने पड़ने से कतराता है. जिस पुलिस और अपराधियों की ‘जुगल-जोडियां’ सर-ए-आम आज गली-कूचों, थाने-चौकी में कहीं भी हैवानियत का नंगा-नाच करते दिखाई दे जाती हों! जिस पुलिस (कुछ को छोड़कर) की बेहयाई की खबरों से सुबह के अखबार बदसूरत और बासी से लगते हों. जिस खाकी वर्दी को बदन पर ओढ़े, 10-20 रुपए की ‘उगाही या वसूली’ की उम्मीद में पुलिस वाला या होमगार्ड, सर-ए-राह ट्रक-टैक्टर की खिड़की-दरवाजे पर लटकने में शर्म न खाता हो. जो पुलिस आज बेगुनाह की दुश्मन, गुनाहगार की ‘हम-प्याला हम-निवाला’ बनने को किसी भी हद तक गिरने को तुली बैठी हो! क्या ऐसी पुलिस में भी आप किसी ‘साधू-संत-महात्मा’ या फिर ‘भगत-जी’ की मौजूदगी की उम्मीद कर सकते हैं?

नहीं...कतई नहीं. मतलब ही नहीं.......पेश है इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में इस सबके इतर, संत से साधारण आला पुलिस उपाधीक्षक के ध्रुव-सत्य सी ‘असाधारण’ कहानी. जो पुलिस की आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘रोल-मॉडल’ या किताब से कहीं आगे निकलकर एक खूबसूरत इतिहास लिख चुका है.

बदनाम पुलिस के नामी ‘भगत-जी’ यानि...!

सब्र रखिए. जब कांटों में गुलाब और चंदन के पेड़ से लटके काले-भुजंग (सांप) मिल सकते हैं तो फिर इस कदर खौफनाक चेहरे वाली खाकी में भला कोई, ‘भगत-साधू-संत-महात्मा’ सा क्यों नहीं मिल सकता? जिसने खाकी-वर्दी पहनी तो 40 साल, लेकिन खाकी का रंग दिल-ओ-दिमाग और लिबास पर कभी नहीं चढ़ने दिया. दिल्ली, लखनऊ, नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, कानपुर, बागपत, देहरादून आदि तमाम शहरों का चार महीने में करीब दो हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर पूरा करके कभी खाकी वर्दी पहनने वाले ‘भगत-जी’ को मैने खोज ही निकाला. उस शख्सियत को जिसका खौफ, हमेशा खाकी वर्दी पर काबिज रहा था न कि, जनमानस के ऊपर.

उस इंसान को जिसे, उत्तर प्रदेश पुलिस महकमा आज भी ‘भगत-जी’ के ही नाम से जानता-पहचानता है. सिपाही-हवलदार-थानेदार-दारोगा या जन-मानस ही नहीं. कई सूबों (राज्यों) के तमाम पूर्व और मौजूदा डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के आला हुक्मरान (आईपीएस) भी अपने इस मातहत को ‘भगत-जी’ के ही नाम से बुलाने में खुद को गौरवांवित महूसस करते हैं.

थानाध्यक्ष के रुप में भीड़ द्वारा कंधों पर उठाये गये पुलिस महकमे के भगत-जी यानी सुरेंद्र सिंह लौर, जिनकी पब्लिक छुआ करती थी पांव.

थानाध्यक्ष के रुप में भीड़ द्वारा कंधों पर उठाये गये पुलिस महकमे के भगत-जी यानी सुरेंद्र सिंह लौर, जिनकी पब्लिक छुआ करती थी पांव

1940 के दशक में अलीगढ़ के टप्पल का गौरौला गांव

दलीप सिंह, गौरौला गांव के मूल निवासी थे. आसपास के चार-पांच और गांवों की जमींदारी भी थी. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. दलीप सिंह की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने बेटे उदय सिंह लौर के नाम उस जमाने में 200 बीघा जमीन करा दी थी. कालांतर में उदय सिंह और दलेल कौर के क्रमश: 6 संतान दयावती, जगवती, विमला, सुरेंद्र सिंह लौर, जगदेव सिंह लौर और सबसे छोटी संतान के रूप में धर्मवीर सिंह लौर का जन्म हुआ. जगदेव सिंह लौर अलीगढ़ में वकालत करने लगे. धर्मवीर सिंह दिल्ली सरकार के मयूर विहार फेज-1 स्थित स्कूल में अध्यापन (पीजीटी) कार्य करने लगे. पिता चाहते थे कि 2 अगस्त सन 1944 को जन्मी संतानों में चौथे नंबर के सुरेंद्र सिंह भी पढ़-लिखकर शिक्षक बन जाए और गांव में खेतीबाड़ी संभाल ले.

पिता चाहते थे शिक्षक बने, बेटा ‘टॉपर’ थानेदार बन बैठा

सन 1964 में बाजना इंटर कॉलेज मथुरा से बारहवीं पास करने के बाद सुरेंद्र सिंह लौर ने सन 1966 में ग्रेजुएशन अलीगढ़ के बारह सैनी डिग्री कॉलेज से कर लिया. उसी साल उत्तर प्रदेश पुलिस में डायरेक्टर थानेदार की पोस्ट निकली. जिसमें एग्जाम देकर सुरेंद्र सिंह यूपी में उस बैच के ‘टॉपर’ बन गए. अंडर ट्रेनिंग पहली पोस्टिंग मिली 10 मार्च 1967 को मेरठ में. उस जमाने में गाजियाबाद मेरठ की तहसील हुआ करता था. पहली तनख्वाह थी 198 रुपए (148 रुपये वेतन और 50 रुपए वर्दी के). एक साल बाद वेतन-वृद्धि हुई 7 रुपए की. 1972 में देहरादून (अब उत्तराखंड का हिस्सा) में पोस्टिंग मिली. 1975 में मुजफ्फरनगर में 7-8 थानों के इंचार्ज रहे. मुरादाबाद, शाहजहांपुर जिलों की तैनाती काटने के बाद 1983 में इंस्पेक्टर बन गए.

‘जिद’ ने किसी जिले में जमने ही नहीं दिया!

लखनऊ जोन (परिक्षेत्र) में रहते हुए सीतापुर में पोस्टिंग हुई. सीतापुर में सिर्फ 2 दिन ही नौकरी कर सके. सीतापुर से हटाकर रायबरेली भेजे गए. वहां भी जिद्दी स्वभाव और अड़ियल-ईमानदार छवि ने नहीं जमने दिया. सो 5 दिन रायबरेली की नौकरी करके वहां से भी रुखसती थमा दी गई. रायबरेली से ट्रांसफर करके लखनऊ भेज दिए गए. वहां कुछ समय नाका हिंडोला थाने के इंस्पेक्टर रहे. कुछ समय बाद इटावा भेजे गए तो, खुद ही एप्लीकेशन देकर मुरादाबाद ट्रांसफर करा ले गए. जैसे-तैसे खींचतान करके कुछ वक्त बरेली, शाहजहांपुर, रामपुर में काटा.

74 साल बाद धुन के धुनी यूपी पुलिस के रिटायर्ड डिप्टी एसपी सुरेंद्र सिंह लौर.

74 साल बाद धुन के धुनी यूपी पुलिस के रिटायर्ड डिप्टी एसपी सुरेंद्र सिंह लौर

सीधे पहुंच गये पुलिस महानिदेशक से ट्रांसफर कराने

पुलिस महकमे में शायद ही किसी इंस्पेक्टर की हिम्मत होगी कि वह सही-सलामत दिमागी हालत में भी अपने ट्रांसफर के लिए डायरेक्ट महकमे के मुखिया (डीजी) के सामने पेश होने पहुंच जाए. जब कहीं लंबे समय तक का मुकाम हासिल नहीं हुआ तो, सुरेंद्र सिंह लौर सीधे लखनऊ स्थित राज्य पुलिस महानिदेशालय जा पहुंचे. खुद का ट्रांसफर कराने के लिए. उस वक्त यूपी के पुलिस महानिदेशक थे बी.एस. माथुर. पुलिस महानिदेशक से मेरठ एंटी-करप्शन ब्रांच का ट्रांसफर करा लाए. सन 1999 में वक्त आने पर उन्हें महकमे ने डिप्टी एसपी (पुलिस उपाधीक्षक) बना दिया. उस वक्त तैनाती थी लखनऊ एंटी-करप्शन में. तैनाती मिली पुलिस महानिदेशक के शिकायत-प्रकोष्ठ में.

फोर्स के कायदे-चेहरे बदलते रहेंगे, लौर नहीं बदलेंगे

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व महानिदेशक और यूपी के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल पुलिस प्रकाश सिंह की अधीनस्थी में भी सुरेंद्र सिंह लौर ने नौकरी की है. रिटायरमेंट के बाद भी तमाम उम्र पुलिस वेलफेयर की लड़ाई लड़ते रहने वाले श्री प्रकाश सिंह के मुताबिक, ‘फोर्स के चेहरे-कायदे-कानून’ वक्त-वक्त पर बदलते रहेंगे. सुरेंद्र सिंह लौर लेकिन खुद को कभी नहीं बदल सकते हैं. आज भी मनमौजी सुरेंद्र लौर जब दिल करता है मुझसे मिलने साइकिल से ही चले आते हैं. शहर की भीड़ में उनका साइकिल से आना मुझे डरा जाता है. लौर को मगर अपनी कोई चिंता नहीं है. लौर की ईमानदारी, मेहनत पर फोर्स में मैं क्या, किसी भी जायज अफसर-अधीनस्थ ने कभी सवालिया निशान लगा पाने की हिम्मत नहीं की होगी.’

सुरेंद्र सिंह लौर सा अफसर न बदला न बदलेगा कभी...बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के पूर्व डायरेक्टर जनरल और यूपी के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक आईपीएस प्रकाश सिंह के साथ सुरेंद्र सिंह लौर (बायें से दायें)

सुरेंद्र सिंह लौर सा अफसर न बदला न बदलेगा कभी...बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के पूर्व डायरेक्टर जनरल और यूपी के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक आईपीएस प्रकाश सिंह के साथ सुरेंद्र सिंह लौर (बाएं से दाएं)

डीजी बोले मत बदलना, तुम्हारा ट्रांसफर खुद हो जाएगा!

वहीं सुरेंद्र सिंह लौर बताते हैं कि, ‘एक बार मैंने प्रकाश सिंह साहब से गुजारिश की थी कि वे मेरा तबादला सिविल पुलिस से कहीं सूखी जगह पर कर दें. इस पर प्रकाश सिंह साहब बोले, 'लौर साहब जिस मेहनत ईमानदारी से पुलिस की नौकरी में काम कर रहे हो, वैसे ही डटे रहो. टस से मस मत होना. जब तुम खुद को नहीं बदलोगे तो, तुम्हारे आसपास मौजूद दुश्मन या फिर पुलिस मुख्यालय तुम्हें खुद ही कहीं न कहीं बाहियाद समझी जाने वाली ‘पनिश्मेंट-पोस्टिंग’ पर ट्रांसफर करके भेज देगा. जो तुम्हारे मन-माफिक होगी. तुम खुद को कभी बदलना मत. जैसे हो वैसे ही मुझे बेहतर लगते हो.'

'बेबस हूं मैं वरना लौर की जगह ‘लौह’ लिख देता'

यूपी के दबंग पूर्व चर्चित पुलिस महानिदेशक (नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के मौजूदा प्रो. चांसलर) 1974 बैच यूपी कॉडर के आईपीएस डॉ. विक्रम सिंह, सुरेंद्र सिंह लौर को खुद से भी बड़ा ‘गुरु-तुल्य’ मानते हैं. भले ही सुरेंद्र सिंह लौर पुलिसिया हिसाब-किताब में कहीं से कहीं तक विक्रम सिंह के साथ ‘फिट’ नहीं बैठते हैं. सुरेंद्र सिंह लौर, विक्रम सिंह की इस जर्रानवाजी के लिए उनका बड़प्पन, कुल-खानदान से खून में हासिल संस्कारों का प्रतिफल और खुद की खुशनसीबी मानते हैं. जबकि विक्रम सिंह, लौर की मेहनत, ईमानदारी के प्रति उनके अड़ियल रवैये के समक्ष सिर झुकाते हैं. विक्रम सिंह के शब्दों में, ‘सुरेंद्र सिंह लौर के नाम में ‘लौर’ की जगह अगर मेरा वश चलता तो मैं ‘लौह’ लगाने से भी नहीं चूकता. मैं भले ही आईपीएस और डीजी के पद से रिटायर हुआ हूं, लेकिन मुझे अपने ही मातहत एक डिप्टी एसपी या पूर्व इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह लौर को ‘गुरू’ स्वीकार करने में जो सुकून हासिल हुआ, पुलिस की नौकरी में वह सुकून हर किसी को नसीब नहीं होता.’

सुरेंद्र सिंह लौर जैसे ईमानदार मातहत को अपना 'गुरु' कहने में मुझे फख्र होता है और खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं...यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह.

सुरेंद्र सिंह लौर जैसे ईमानदार मातहत को अपना 'गुरु' कहने में मुझे फख्र होता है और खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं...यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह

'टपकाते होंगे लार! मुझे नहीं जमी थाने-चौकी की नौकरी'

सुरेंद्र सिंह लौर सा ही कोई सनकी या जिद्दी बिरला पुलिस वाला होगा जिसे, पुलिस महकमे का मुखिया थाने-चौकी की नौकरी दे. वो लेकिन उस मलाईदार पोस्टिंग को ठुकरा दे, जिसके लिए आज तमाम आईपीएस से लेकर सिपाही-हवलदार तक ‘साहिबों’ की देहरी पर एड़ियां रगड़ते हैं. उस वक्त सूबे के पुलिस महानिदेशक थे श्रीराम अरुण (1963 बैच यूपी कॉडर के आईपीएस). पुलिस मुख्यालय ने सिविल पुलिस में भेज दिया. बकौल सुरेंद्र सिंह लौर, ‘पता नहीं कैसे होते होंगे वे पुलिस वाले जो, थाने-चौकी और सिविल पुलिस की पोस्टिंग को लार टपकाते हैं. मैंने तो अपना ट्रांसफर सिविल पुलिस से जोनल अफसर इंटेलीजेंस गाजियाबाद में करा लिया था. ताकि थाने-चौकी की चिल्ल-पों वाली फजीहत से खुद को महफूज रख सकूं.’

एक अफसर में पुलिस की सभी चार ‘उम्मीदें’ मौजूद

सुरेंद्र सिंह लौर के बारे में, यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक (31 जुलाई सन 2000 को रिटायर हो चुके) और लंबे समय से कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे श्रीराम अरुण (यूपी पुलिस एंटी टेररिस्ट सेल के मौजूदा आईजी आईपीएस असीम अरुण के पिता) के मुताबिक, ‘सन् 1987 की बात है. मुझे मेरठ रेंज का डीआईजी बनाकर भेजा गया. उसी दौरान इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह लौर को आमने-सामने पहली बार देखा था. उनकी कैफियत के बारे में काफी कुछ सुन तो मिलने से बहुत पहले ही चुका था. एक लौर में मैंने वे चार खासियतें मौजूद पाईं, जो पुलिस महकमे की नौकरी के लिए परमावश्यक होती तो हैं, मगर एक साथ शायद ही किसी बिरले पुलिस अफसर या कर्मचारी में ब-मुश्किल मुझे अपनी पूरी नौकरी के दौरान देखने को नसीब हुई हों! पहली खासियत कार्य-दक्षता, दूसरी चरित्र, तीसरी ईमानदारी, चौथी और अंतिम ओवरऑल परफॉरमेंस.’

सुना बहुत था लौर के बारे में, मुलाकात हुई तो लगा एक इंसान में पुलिस की चारों खासियतें मौजूद हैं...यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्रीराम अरुण.

सुना बहुत था लौर के बारे में, मुलाकात हुई तो लगा एक इंसान में पुलिस की चारों खासियतें मौजूद हैं...यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्रीराम अरुण

एसपी सिटी के सामने ही सीओ से हो गई झड़प

‘सन 1991 की बात है. मैं लखनऊ के नाका हिंडोला थाने का थानाध्यक्ष था. यूपी के पुलिस महानिदेशक थे श्री प्रकाश सिंह साहब. उन दिनों लखनऊ के एसएसपी आर.के. तिवारी (यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक) और एसपी सिटी अनिल कुमार रतूड़ी (मौजूदा वक्त में उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक). बम विस्फोट मामले की केस डायरी दाखिल कर दी थी. मेरा सर्किल ऑफिसर (क्षेत्राधिकारी) इस बात पर मुझसे जला-भुना बैठा था. एक रात एसपी सिटी एके रतूड़ी सर थाने में पेंडिंग पड़तालों की जांच के लिए (अर्दली रूम) आए हुए थे. तभी सीओ ने एसपी सिटी साहब के आगे रोना-धोना शुरू कर दिया. मैं पहले से ही ताड़ में था. सो थाने में ही मैं बुरी तरह से बिफर गया. एसपी सिटी के सामने ही सीओ की जितनी उतार सकता था उतार दी.'

अपने ही थाने के बाहर थानाध्यक्ष बैठ गया धरना देने!

'जब मामला बढ़ा और मुझे लगा कि सीओ साहब, आसानी से बाज नहीं आएंगे तो मैं खुद पर काबू नहीं रख सका क्योंकि मैं अपनी जगह दुरुस्त था. मैंने थाने में अपने कमरे से एक चादर निकाली और पहुंच गया नाका हिंडोला थाने के मुख्य द्वार पर. थानाध्यक्ष होकर भी मैं अपने ही थाने के बाहर एक बाहियाद पुलिस सर्किल ऑफिसर के खिलाफ धरने पर बैठने वाला था. बात थाने में मौजूद एसपी सिटी साहब तक पहुंची. मैं चादर बिछाकर धरना शुरू कर पाता, तब तक एसपी सिटी साहब आकर मेरे सामने अड़ गए. बोले क्या तमाशा कर रहे हो? अपने थाने के सामने ही थानाध्यक्ष होकर धरने पर बैठ रहे हो. अपनी नौकरी भी गंवाओगे और मुझे भी शहर में बेइज्जत करवाओगे.'

'नहीं चाहता मेरी खुबूसरत जिंदगी का सच दीमक चाटे'

‘लौर के किस्सों की किताबें लिख तो दोगे मगर, रखने को देश की पुलिस लाइब्रेरियों में अलमारियां कम पड़ जाएंगी.’ बताते हैं खुद यूपी पुलिस के खुद्दार रिटायर्ड डिप्टी एसपी सुरेंद्र सिंह लौर. उनके मुताबिक, ‘शायद यही वजह है कि मैंने, आज तक 74 साल की उम्र में कभी किसी पत्रकार को न तो इंटरव्यू ही दिया. न ही कहीं कभी अपनी जिंदगी के दो अल्फाज किसी कागज पर उतारे. मैं नहीं चाहता कि मेरी, जिंदगी का शानदार अतीत कहीं किताबों में बंद हो और उसे दीमक चाटा-खाया करें. मेरी तो गिनती क्या है? मैंने बड़े-बड़े मशहूर लोगों की किताबों में कैद जिंदगी को रद्दी में बिकते हुए देखा है कबाड़ियों के हाथो में. ’

थाने-चौकी में सोते वक्त लगाते थे पत्थर का तकिया

लखनऊ में सन 1991 में सुरेंद्र सिंह लौर के एसपी सिटी रहे 1987 बैच के आईपीएस (पहले यूपी बाद में उत्तराखंड कॉडर) और अब उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार रतूड़ी से मैने बात की.

सुरेंद्र सिंह लौर मेरी अब तक की आईपीएस की नौकरी में यूपी पुलिस का मेरा वो मातहत अफसर जिसके साथ नौकरी करने से मैं गौरवांवित हुआ... ..उत्तराखंड के मौजूदा पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार रतूड़ी

सुरेंद्र सिंह लौर मेरी अब तक की आईपीएस की नौकरी में यूपी पुलिस का मेरा वो मातहत अफसर जिसके साथ नौकरी करने से मैं गौरवानवित हुआ... उत्तराखंड के मौजूदा पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार रतूड़ी

बकौल अनिल कुमार रतूड़ी, ‘सुरेंद्र सिंह लौर पुलिस फोर्स के रोल मॉडल थे हैं और रहेंगे. आप तो एक नाका हिंडोला थाने पर उनके धरने की बात कर रहे हैं, वो तो कुछ खास बात नहीं थी. ईमानदारी, खुद्दारी, कर्तव्य परायणता, सहनशीलता, शालीनता, जाबांजी के लिए सुरेंद्र सिंह लौर यूपी पुलिस के असाधारण अफसर और समाज के साधारण इंसान हैं. मनमौजी जिंदगी जीने के अभ्यस्त सुरेंद्र सिंह खुद के बारे में उतना कभी नहीं बताएंगे, जितना खुलकर मैं उनके बारे में आपको बता रहा हूं, या बता सकता हूं. लौर सा मजबूत इंसान और कानून का 24 कैरेट का ‘पहरेदार’ मुझे अपने पुलिस करियर में नहीं टकराया है. यह वही सुरेंद्र सिंह लौर हैं जो, पूरी पुलिस सर्विस के दौरान जमीन पर सोने के लिए अपनी एक चटाई और खाना बनाने के लिए अपना स्टोव साथ लेकर चलते रहे. लौर साहब को तुरई-लौकी जैसी सस्ती और सेहतमंद रखने वाली सब्जियां खूब पसंद थीं. इससे भी बढ़कर लौर में मैने जो देखा वो था, सोते वक्त सिरहाने (तकिया) के रूप में पत्थर लगाना. यह सब लौर के सनकी होने के लक्षण नहीं बल्कि, कानून के रखवाले एक दबंग और ईमानदार पुलिस अफसर के साधारण इंसान होने के हैरतंगेज सबूत थे.'

लौर से मातहत का ‘बॉस’ बनने पर डीजीपी को है गर्व

‘सूबे का डीजीपी होने के बाद भी गर्व है मुझे अपनी पुलिस सर्विस पर कि मुझे सुरेंद्र सिंह लौर जैसे मातहत के साथ नौकरी का मौका हाथ लगा. लखनऊ के नाका हिंडोला थाने के यह वही थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह लौर हैं जिन्हें, मैने सुबह से शाम तक ब-वर्दी एक अदद हाथ में डंडा लेकर कभी ड्यूटी पर हर वक्त मुस्तैद ही देखा था. भारतीय कानून में गिरफ्तारी से लेकर गोली चलवाने तक के सर्वाधिक अधिकार थाना इंचार्ज को मिले हैं. इस सबके बावजूद तमाम थानों की पोस्टिंग काटने वाले सुरेंद्र सिंह ने कभी खुद की जानकारी में कानून को कहीं किसी मोड़ पर बेइज्जत और नीलाम नहीं होने दिया होगा, इतना मुझे विश्वास है.’ बताते हैं उत्तरांचल (उत्तराखंड) के मौजूदा पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार रतूड़ी.

सुरेंद्र सिंह लौर के बारे में चलते-चलते...

यूं तो आने वाले वक्त मे मैं आपको सुरेंद्र सिंह लौर की हैरतंगेज जिंदगी की उस किताब के तमाम पन्ने पढ़वाता रहूंगा, जो लौर साहब ने आज तक लिखी ही नहीं है. फिर भी ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस कड़ी में यह बताना जरूरी है कि सुरेंद्र सिंह लौर 31 अगस्त, 2004 को यूपी पुलिस (पीएसी डिप्टी कमांडेंट) डिप्टी एसपी पद से रिटायर हो चुके हैं. उस वक्त गाजियाबाद पीएसी गाजियाबाद 47वीं वाहिनी के कमांडेंट थे- यूपी पुलिस के आईजी असीम अरुण.

बायें से दायें सुरेंद्र सिंह लौर पुत्र धर्मेंद्र सिंह लौर और पत्नी सुरेंद्री लौर के साथ.

बायें से दायें सुरेंद्र सिंह लौर पुत्र धर्मेंद्र सिंह लौर और पत्नी सुरेंद्री लौर के साथ

जून 1966 में सुरेंद्र सिंह लौर की शादी गांव खंजरपुर (मोदी नगर) की सुरेंद्री लौर के साथ हो गई. लौर दंपत्ति की बेटी लीना लौर पंजाब यूनिवर्सिटी में ‘डीन’ हैं. बेटे डॉ. धर्मेंद्र लौर एमबीए करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में निदेशक हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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