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तमिलनाडु आत्महत्या: बच्चों से ज्यादा हमारे टीचर्स को सबक की जरूरत है

Updated On: Nov 27, 2017 04:39 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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तमिलनाडु आत्महत्या: बच्चों से ज्यादा हमारे टीचर्स को सबक की जरूरत है

तमिलनाडु में चार स्कूली छात्राओं ने कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली. उन्हें उनकी टीचर ने डांटा था. इनमें से एक संकरी के माता-पिता दैनिक मजदूर हैं. बाकी तीनों के परिवार भी इसी आर्थिक स्तर के हैं. संकरी की मां सुबह 6 बजे मजदूरी पर निकल जाती हैं और शाम 6 बजे आती है. उनके पास मोबाइल नहीं है. वो जब शाम को वापस आईं तो बेटी के मरने की खबर मिली.

संकरी और उसकी साथी लड़कियां स्कूल में परीक्षा में मिले नंबर एक दूसरे से पूछ रही थीं. टीचर ने इसे अनुशासनहीनता माना. उन्हें सबके सामने अपमानित किया. मां-बाप को लेकर आने के लिए कहा ताकि लड़कियों को सस्पेंड किया जा सके. इसके बाद लड़कियां स्कूल के गेट से रोती हुई बाहर चली गईं. कहा जा रहा है कि इसके बाद भी प्रिंसिपल ने कोई ध्यान नहीं दिया. कुछ देर बाद लड़कियों की चप्पलें कुएं में तैरती मिली.

हमारे स्कूल सिस्टम को बदलाव की जरूरत है

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अंग्रेजी में एक शब्द है बुलिंग हिंदी में इसका सबसे नजदीकी शब्द कोसना कहा जा सकता है. डांटने और कोसने में एक बुनियादी फर्क होता है. अगर किसी ने गलती की है तो आप उसको डांटते हैं. ज्यादातर मौकों के बाद उसको समझाते हैं कि आगे से ऐसी गलती न हो. जबकि कोसने में किसी को उसकी हर सही गलत बात के लिए ताने ही मारे जाते हैं. उससे नकारात्मक सुर में ही बात की जाती है. किसी भी स्तर पर किसी भी व्यक्ति का आत्मविश्वास खत्म करने में बुलिंग या कोसने का सबसे बड़ा हाथ होता है.

2007 में भारत में 12 से 18 साल के हर तीसरे बच्चे को बुली किया जाता था. पिछले दस सालों में ये आंकड़ा तेजी से बढ़ा है. आज की तारीख में सोशल मीडिया पर मौजूद बच्चों में 90 प्रतिशत ने बुलिंग को अपने या किसी और के साथ होते देखा है. स्कूल की बुलिंग में तीन तरह की घटनाएं होती हैं, शारीरिक नुकसान पहुंचाना, बार-बार एक बात कहकर या नाम बदलकर इमोशनली नुकसान पहुंचाना और सामाजिक रूप से अलग-थलग कर के बुली करना.

भारतीय स्कूलों में ये तीनों घटनाएं ही खूब होती हैं. और खराब बात ये है कि इनमें से कई बातों को अक्सर लोग गंभीरता से नहीं लेते. किसी का नाम बिगाड़ने से जुड़ी कोई घटना हम सबने देखी होगी. कब ये बात मजाक से बढ़कर परेशान करने में पहुंच जाती लोग समझ ही नहीं पाते.

इस बुलिंग का एक दूसरा पहलू भी जिस पर कम ही बात होती है. छात्रों को बुली करने में कई बार अध्यापक भी शामिल हो जाते हैं. दरअसल पिछले दो दशकों में बच्चों को पीटने और शारीरिक सजा देने पर काफी सख्ती की गई है. जिसके बाद सजा देने के कई नए तरीके इस्तेमाल होने लगे हैं जिनमें से बहुत से बच्चों के आत्मविश्वास को खत्म करने के साथ-साथ उन्हें कुंठित भी करते हैं.

मिसाल के तौर पर कई बार स्कूलों में टीचर बच्चों को पूरे दिन फर्श पर बैठने या असेंबली में पूरे स्कूल के सामने कान पकड़कर खड़े होने जैसी सजा देते हैं. इससे बार-बार पूरे स्कूल के सामने बेइज्जत होने, हर क्लास के बच्चों के सामने गलत साबित होने का असर पड़ता है.

हमारे स्कूलों में और खासतौर पर निजी स्कूलों में अनुशासन के नाम पर चुप रहने और रखने की बात होती है. अगर किसी बच्चे को डिस्लेक्सिया जैसी समस्या है या कोई और डिसऑर्डर है तो ज्यादातर अध्यापकों को पता ही नहीं होता है कि ऐसे मामलों को कैसे डील करें.

इसी तरह से किशोरों या प्यूबर्टी पर पहुंच रहे बच्चों को शारीरिक शोषण, गुड टच-बैड टच के बारे में ‘डर्टी टॉक्स’ कह कर चुप करा दिया जाता है. यहां तक कि लड़कियों के पीरियड्स के बारे में नकारात्मक माइंडसेट बनाने की शुरुआत अक्सर हमारे स्कूलों में अनुशासन के नाम पर ही होती है.

इसका असर बाद तक रहता है

एक बार याद करिए, स्कूल के अलावा आपने कितनी जगह इस तरह की बुलिंग देखी है. एक बॉस का बार-बार किसी एंप्लॉई को कोसना. घर में काम करने वाले नौकरों से अमानवीय व्यवहार, जातिगत, प्रदेश और भाषा के आधार पर होने वाली छींटाकशी, किसी प्रेमी जोड़े में एक का दूसरे पर हर समय हावी होना (इसमें दोनों जेडर समान रूप से शामिल हैं) या शादी के समय लड़केवाले बनाम लड़की वालों के बहाने किसी को नीचा दिखाना.

ये सारी घटनाएं ऐसी हैं जो हमसब ने कई बार अपने आस-पास होती देखी हों. मुमकिन है कि इसका शिकार भी रहे हों. देश में पिछले दो-तीन दशकों में सामाजिक मूल्य तेजी से बदले हैं. रहन-सहन का पूरा ढांचा बदल गया है. हमें अपने स्कूली शिक्षा के पूरे ढांचे में कई सुधार करने की जरूरत है, जिसपर शायद बिलकुल ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

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