S M L

जन्मदिन विशेष: सबकुछ खोकर साज की पवित्रता बचाने वाले कलाकार की कहानी

उस्ताद मुश्ताक अली खान जब अपनी लोकप्रियता हासिल कर चुके थे तब पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान ने सितार वादन की दुनिया में मजबूती से कदम रखा

Updated On: Jun 20, 2018 08:20 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

0
जन्मदिन विशेष: सबकुछ खोकर साज की पवित्रता बचाने वाले कलाकार की कहानी
Loading...

ये सन 1927 के आसपास की बात है. सिर्फ सोलह साल की उम्र में एक लड़का बनारस से भागकर कलकत्ता (अब कोलकाता) चला गया. सोलह साल की इस उम्र में करीब ग्यारह बरस की संगीत साधना भी शामिल थी. घर परिवार में संगीत का माहौल हर तरफ था. पिता से लेकर चाचा-दादा तक सब संगीत की सेवा करने वाले थे. लेकिन उस 16 साल के नवयुवक को संगीत में किसी तरह का बंधन नहीं चाहिए था. वो खुलकर बजाना चाहता था. सितार पर जब उसकी ऊंगलियां दौड़ती थीं तो लगता था कानों में कोई रस घोल रहा हो.

कलकत्ता पहुंचने पर उस कलाकार की मुलाकात एक दूसरे सितार वादक से हुई. ऐसा कहा जाता है कि वो सितार बजाने वाले एक साधु थे. उसी साधु ने इस उभरते हुए कलाकार को पंडित विजय मुखर्जी से मिलवाया. पंडित विजय मुखर्जी की गिनती उस वक्त के बड़े गायकों में होती थी. पंडित विजय मुखर्जी ने 16 साल के उस कलाकार को सुना तो बड़े खुश हुए.

उन्होंने उस कलाकार की मुलाकात उस वक्त कलकत्ता आकाशवाणी के असिसटेंट स्टेशन डायरेक्टर से कराई. उस अधिकारी के पास उस दौर के तमाम बड़े कलाकारों का आना जाना था. उन लोगों ने भी बनारस से कलकत्ता भाग कर गए उस 16 साल के कलाकार को सुना. दो साल बाद ही यानी 1929 में उस कलाकार को रेडियो से कार्यक्रम मिलने शुरू हो गए. 16 साल के उस कलाकार को बाद में दुनिया विश्वविख्यात सितार वादक उस्ताद मुश्ताक अली खां के नाम से जानती है. जिनका आज जन्मदिन है.

मुश्ताक खान के पुरखे मुगल दरबार में दरबारी संगीतज्ञ हुआ करते थे

मुश्ताक अली खान का जन्म 20 जून 1911 को बनारस के शिवाला मुहल्ले में हुआ था. परिवार में संगीत की परंपरा पहले से थी. उनके पुरखे मुगल दरबार के दरबारी संगीतज्ञ हुआ करते थे. मुश्ताक अली खान को सेनिया घराने के तानसेन का वंशज माना जाता है और मसीतखानी गत की खोज करने वाले उस्ताद मसीत खां की सातवीं पीढी का कलाकार बताया जाता है. 17वीं शताब्दी के आखिरी सालों में मुश्ताक अली खान के पुरखे बनारस आ गए थे. यहां उन सभी ने बादशाह बहादुरशाह जफर के बेटे जहांदार शाह के दरबार में गाते बजाते थे.

मुश्ताक अली खान के पिता उस्ताद आशिक अली खान भी बड़े नामी सितार वादक हुए. उनके परिवार में ध्रुपद गायक, बीनकार और ख्याल गायकी के बड़े दिग्गज कलाकार हुए. इस माहौल में पैदा होने वाले मुश्ताक अली खान ने 5 साल की उम्र में ही सितार पकड़ लिया. पिता की देखरेख में संगीत सीखने की शुरूआत हो गई.

यह भी पढ़ें- लता मंगेशकर ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए पहली बार गाया था कौन सा शास्त्रीय राग?

सितार के साथ साथ मुश्ताक अली खान ने पखावज की शिक्षा भी हासिल की. इसके बाद जब उनकी उम्र करीब 16 साल थी तो वो कलकत्ता भाग गए. जिसका किस्सा हम आपको सुना चुके हैं. खैर, 1929 में आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग के बाद मुश्ताक अली खान 1931 के आस पास जौनपुर के महाराज के दरबारी संगीतज्ञ भी रहे. अब तक संगीत के जानकारों में मुश्ताक अली खान का नाम गूंजने लगा था.

ustadmustaqNEW

1934 के बाद मुश्ताक अली खान के जीवन में कई घटनाएं घटी

वो 1934 का साल था जब इलाहाबाद में एक म्यूजिक कॉन्फ्रेंस हो रही थी. उस म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में बुंदू खान, हीराबाई बड़ोदकर, पंडित नारायण राव व्यास जैसे दिग्गज कलाकारों को शामिल होना था. वहीं आयोजकों ने मुश्ताक अली खान को भी कॉन्फ्रेंस में बुलाया. 30 के दशक में ही मुश्ताक अली खान के जीवन में और भी कई अहम घटनाएं घटीं. 1934 में मुश्ताक अली खान का 23 साल की उम्र में विवाह हुआ. अगले ही साल उन्होंने अपने पिता को खो दिया.

घर की सारी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ गई. मां के अलावा घर में एक बहन और भतीजे थे. बहन के पति की भी मौत हो चुकी थी. लिहाजा सभी लोगों की देखभाल का जिम्मा मुश्ताक अली खान पर ही था. इन्हीं तमाम मुश्किलों में और गहरा सदमा तब लगा जब उनकी इकलौती संतान को भी नियति ने उनसे छीन लिया.

3-4 साल के बीच किस्मत का पहिया ऐसा घूमा कि मुश्ताक अली खान का पूरा जीवन ही बदल गया. वो कलकत्ता में ही बस गए. इन तमाम चुनौतियों के बीच मुश्ताक अली खान का संगीत सफर चलता रहा. देश के कई कोने से उनके कार्यक्रम के न्योते आने लगे. धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आ गई. 1940 और 50 के दशक में वो देश के सबसे नामी सितार वादकों में गिने जाते थे.

यह भी पढ़ें- जन्मदिन विशेष: जब हेमंत कुमार के बनाए गीत ने दी थी लता मंगेशकर को नई जिंदगी

उस्ताद मुश्ताक अली खान से पहले सितार वादन में अगर किसी कलाकार का जलवा था तो वो थे- उस्ताद इनायत खान. उस्ताद इनायत खान की मौत बहुत जल्दी हो गई थी. जिसके बाद उस्ताद मुश्ताक अली खान सितार वादन की परंपरा को मजबूती से आगे बढ़ा रहे थे. उस्ताद मुश्ताक अली खान, पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान साहब के बीच करीब 8-10 साल का फर्क होगा. उस्ताद मुश्ताक अली खान जब अपनी लोकप्रियता हासिल कर चुके थे तब पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान ने सितार वादन की दुनिया में मजबूती से कदम रखा. उस्ताद विलायत खान, उस्ताद इनायत खान के ही बेटे थे. जल्दी ही पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान को पहचान मिली.

सितार वादन में प्रयोग के खिलाफ थे उस्ताद मुश्ताक अली खान

दिलचस्प बात ये भी है कि कलकत्ते में पंडित रविशंकर को पहली बार जिस कार्यक्रम में श्रोताओं के सामने पेश किया गया वो कार्यक्रम उस्ताद मुश्ताक अली खान ने ही आयोजित किया था. बाद में पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान ने सितार वादन में कुछ नए प्रयोग भी किए. लेकिन उस्ताद मुश्ताक अली खान प्रयोगों के खिलाफ थे. वो परंपरागत सितार-वादन पर ही टिके रहे. उन्होंने हमेशा 17 परदों वाला सितार ही बजाया. अपने कार्यक्रमों में शास्त्रीय संगीत की शुद्धता को हमेशा कायम रखा. उस्ताद मुश्ताक अली खान की सबसे बड़ी खूबी उनके कार्यक्रमों में शास्त्रीयता का पालन था.

1960 के दशक में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. हालांकि अपने समकालीन कलाकारों में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद सादिक अली खान, उस्ताद अमीर खां और उस्ताद रहीमुद्दीन खान में बेहद लोकप्रिय होने के बाद भी उस्ताद मुश्ताक अली खान उन पुरस्कारों ने वंचित रहे जो उनके समकालीन कलाकारों को मिले. 21 जुलाई 1989 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा. उनके तमाम शिष्यों में पंडित देबू चौधरी का नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है. पंडित देबू चौधरी अपने गुरू की याद में एक एकेडमी भी चलाते हैं.

(मशहूर सितार वादक उस्ताद मुश्ताक अली खान के जन्मदिन पर खास)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi