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चाकू से चीरकर घावों में जब नमक-मिर्च भरा, मां समझ गई थी मैं 'खाड़कू' बनूंगी

संदीप कौर के एक आम बच्ची से खाड़कू बनाने की पूरी कहानी बेहद रोमांचकारी थ्रिलर धारावाहिक जैसी लगती है

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Jan 20, 2018 10:26 AM IST

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चाकू से चीरकर घावों में जब नमक-मिर्च भरा, मां समझ गई थी मैं 'खाड़कू' बनूंगी

खाड़कू (आतंकवादी) बनना उतना आसान है नहीं जितना दुनिया समझती है. अखबारों, टीवी-मीडिया-मैगजीनों में आतंकवादियों की कहानियां बस देखने पढ़ने में ही अच्छी और आसान-आम बात सी लगती हैं. इसके पीछे छिपा होता है शातिर दिमाग और खतरनाक इरादे. खाड़कू बनने के लिए ईमानदार होना अगर जरूरी था, तो तेजी से सोचने के लिए दिमाग और मजबूत जिगर का होना भी उतना ही जरूरी था, जितना निहत्थे का शेर से भिड़ने के लिए.

आप सोच रहे होंगे कि ये बातें तो किसी आध्यात्मिक गुरु या किसी उच्च शिक्षित इंसान के श्रीमुख की वाणी से होगी. ऐसा कतई नहीं है. ये अल्फाज हैं एक जमाने में पंजाब पुलिस की नाक में दम कर देने वाली आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा की खतरनाक महिला खाड़कू रही संदीप कौर खालसा के. यह अलग बात है कि जिंदगी के कई सुनहरे साल संदीप ने जेल की चहारदीवारी के भीतर अंधेरी सीलन भरी काल-कोठरियों में काट दिए.

जेल से बाहर कदम रखा तो दिल-दिमाग-सोच...सब कुछ बदल चुका था. फिलहाल संदीप अमृतसर (पंजाब) में एक बाल सेवा-आश्रम चला रही हैं. यहां वो अनाथ और गरीब बच्चों को पाल-पोस-पढ़ा लिखाकर उन्हें उनके पांवों पर खड़ा करने में जुटी हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चों के मां-बाप किसी जमाने में पंजाब पुलिस या सेना के साथ हुई मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं.

खूबसूरत लड़की के ‘खाड़कू’ बनने का खतरनाक सच

'उस वक्त मैं दसवीं में पढ़ रही थी. यही कोई 16-17 साल की उम्र थी. अखबारों में रोज पढ़ती थी कि मुठभेड़ में फलां जगह पर पुलिस ने कई-कई नौजवान खाड़कू (बब्बर खालसा के आतंकवादी) एक साथ पंजाब पुलिस ने मार डाले हैं. कभी पढ़ती थी कि खाड़कुओं ने एक साथ कई पुलिस वालों और आम इंसानों को मौत के घाट उतार दिया है. मुझे लगा यह आम इंसान पर पुलिस का अत्याचार है. मां को बताया कि मैं भी खाड़कू (बब्बर खालसा की आतंकवादी) बनना चाहती हूं.

मां ने डरा दिया. बोलीं पुलिस पकड़कर मारती है. जख्मों में नमक-मिर्च भर देती है. मां की इस बात से डरने के बजाए मैं निडर हो गई. चाकू लाई. दोनो हाथों की कलाइयों में लंबे-लंबे और खूब गहरे जख्म किए. दोनों हाथों के घावों से खून बहकर जमीन पर गिर रहा था. जख्मों के अंदर नमक-मिर्च भरकर मैं मां से बोली…'लो देखो, मुझे तो इन घावों में न जलन हो रही है. न कोई दर्द.' बस उसी दिन मां को अंदाजा हो गया था कि मैं एक दिन पक्का खतरनाक महिला खाड़कू बनूंगी.

पहली बार जब ‘खाड़कुओं’ से उनके अड्डे पर मिली

बात 1990 के दशक की है. दिन-तारीख महीना कुछ याद नहीं आ रहा है. दोपहर का वक्त था. मुझे पता था कि हमारे गांव के पास वाले गांव (झालों पर) में खाड़कू अक्सर आते हैं. उनकी सीक्रेट मीटिंग्स होती हैं. उस दिन मैंने खाड़कुओं (बब्बर खालसा के आतंकवादी) को अपने गांव के पास से गुजरकर दूसरे गांव में उनके अड्डे पर जाते देखा. मैं अकेली ही पीछे-पीछे उनके अड्डे पर जा पहुंची.

मुझे अपने अड्डे पर देख खाड़कुओं को पसीना आया

sandeep kaur

अनजान लड़की को अपने ‘टॉप-सीक्रेट’ अड्डे पर देखकर खतरनाक और हथियारबंद खाड़कुओं को एक बार पसीना आ गया. उनकी आंखें तन गईं. उन्हें शक था कि कहीं मैं पुलिस की मुखबिर तो नहीं हूं. वो मुझसे कुछ पूछते मैंने ही सब कुछ भांपकर उनसे कहा डाला...मैं पड़ोस के गांव में रहती हूं. खाड़कू बनने आई हूं. अपने साथ मिला लो. जो और जैसा कहोगे करूंगी. डरपोक नहीं हूं.

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कहकर मैंने चाकू से चीरे हुए अपने दोनों हाथ (कलाइयां) उनकी ओर करके दिखा दीं. मेरे गहरे जख्म देखकर और मेरी बात सुनकर अड्डे मे मौजूद औरतें-मर्द (झाले के मालिक) और खाड़कू बस नजरें मिलाकर मुझे देखते भर रहे. कुछ बोल नहीं पाए. तभी उनमें से एक खाड़कू बोला कि बिना खाड़कू से शादी किए कोई लड़की खाड़कू नहीं बन सकती है.

खाड़कुओं को विश्वास में लेना नहीं होता आसान

उन्हें मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ. वहां मौजूद अड्डे की कुछ औरतों को विश्वास में लेकर मैने खाड़कू सरदारों को यकीन दिला दिया कि मैं पुलिस-मुखबिर नहीं. मैं एक जूनूनी दिलेर और तेज-तर्रार सोच वाली लड़की हूं. उम्र भले ही क्यों न 16-17 रही हो मेरी. खाड़कू इसके बाद भी मुझे साथ मिलाने को तैयार नहीं हुए.

उनका हेड बोला कि खाड़कू किसी कुंआरी (अविवाहित) लड़की को अपने साथ नहीं रख सकते हैं. इससे एक तो पुलिस को खाड़कुओं के अड्डे तक पहुंचने में आसानी हो जाती है. दूसरे पंथ (धर्म) की नजरों में खाड़कुओं की छवि खराब हो जाती थी. इतना ही नहीं पहली बार मिले उन खाड़कुओं को यह भी डर था कि मेरे उनके साथ आते ही खाड़कूओं में फसाद न फैल जाए. अगर ऐसा हुआ तो या तो पुलिस हमें (खाड़कू और उनके शरणस्थलियों) को नेस्तनाबूद कर देगी या फिर गिरोह में खूबसूरत लड़की को लेकर फूट पड़ जाएगी. और हम-सब (खाड़कू) आपस में लड़ मरेंगे.

मुझे ‘खाड़कू-दूल्हा’ दो मैं अभी शादी करुंगी

खाड़कुओं की बात में मुझे दम नजर आया. मैंने उसी मीटिंग में खाड़कुओं के सरदार से कहा, अगर कुंआरी लड़की गिरोह में नहीं रख सकते हो, तो अभी कोई खाड़कू लड़का (जो मेरा दूल्हा बनने को राजी हो) मेरे सामने लाओ. तुममें से मुझसे कौन शादी करेगा? बोलो... मैं उससे यहीं और इसी वक्त शादी कर लूंगी.

इसके कुछ दिन बाद ही मार्च 1989 में खुद से 4-5 साल बड़े और उस समय पंजाब पुलिस के लिए सबसे बड़े सिर दर्द साबित हो रहे बब्बर खालसा खाड़कू सरदार धर्मसिंह काश्तीवाल से मैंने शादी कर ली. शादी होते ही मैं पूरी तरह से खाड़कू बन गई. खाड़कू बनने में थोड़ी बहुत जो कसर बाकी बची थी वो, खाड़कुओं के सरदार मेरे पति धर्म सिंह ने मुझे हथियार चलाने और हथगोला फेंकने की ट्रेनिंग देकर पूरी कर दी.

पसंदीदा असलहा 'माउजर', चलाए सब हथियार हैं

खाड़कू पति धर्म सिंह हर हथियार चलाने में माहिर थे. दोनों हाथों से दो अलग अलग हथियार चलाना भी पति धर्मसिंह की काबिलियत थी. मैं अपने पास हमेशा 'चाइनीज-माउजर' रखती थी. इसे चलाना और रखना दोनों आसान हैं. यह माउजर इतना छोटा था कि किसी को मुझ पर कभी इसका शक नहीं हुआ.

पति के बनाए ‘साइनाइड-कैप्सूल’ के सब कायल थे

मेरे पति धर्म सिंह काश्तीवाल की दूसरी काबिलियत थी, अपने साथियों के साथ-साथ बब्बर खालसा के बाकी खाड़कुओं के लिए भी उच्चकोटि का 'साइनाइड-कैप्सूल' बनाना. मेरे पति की पुलिस को खुली चुनौती थी कि उसका बनाया हुआ सायनाइड कैपसूल कभी भी लीक नहीं हो सकता था, जब तक कि उसे मुंह के अंदर रखने वाला खुद ही दांतों से चबाकर उसे मुंह में ‘लीक’ न करे. यही वजह थी कि हमारे गैंग के अलावा बाकी गैंग के खाड़कू भी मेरे पति के बनाए सायनाइड कैप्सूल पर ज्यादा विश्वास करके उन्हीं से बनवाते थे.

नहीं भूलूंगी पुलिस मुठभेड़ की वो काली अल-सुबह

अब तक पंजाब सहित देश के कोने-कोने के थाने पंजाब पुलिस ने मेरे फोटो से भर दिए थे. पुलिस को उस जमाने में मुझसे ज्यादा खतरनाक महिला खाड़कू दूसरी दिखाई ही नहीं दे रही थी. उस समय जालंधर का एसएसपी तो मेरी जान के पीछे हाथ धोकर पड़ गया था.

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जबकि और भी कई महिला खाड़कू उस वक्त पुलिस से जूझ रही थीं. मैंने चूंकि धर्म सिंह काश्तीवाल जैसे खतरनाक खाड़कू से शादी की थी. पंजाब पुलिस को यह भी बहुत अखर रहा था. जहां तक याद आ रहा है, वो 5 मई 1989 का दिन था. तड़के करीब 3 से 4 बजे का वक्त रहा होगा. मैं पति के साथ शाहजहांपुर (उत्तर-प्रदेश) में एक झाले (खाड़कूओं की शरणस्थली) पर छिपी थी. 3-4 थानों और कई राज्यों की पुलिस ने हमें तीन तरफ से घेर लिया. घंटों गोलियां चलीं. हमारी एक गोली से एक पुलिस वाला बुरी तरह जख्मी भी हो गया. इससे पुलिस और ज्यादा बौखला उठी. और पुलिस पार्टियों ने तीनों तरफ से हम पर हथगोलों और गोलियों की बौछार शुरू कर दी.

पति ने कहा सरेंडर कर दो, मैने कहा साथ मरेंगे

उस पुलिस मुठभेड़ में बुरी तरह फंसा देखकर पति ने कहा कि, तुम (संदीप) सरेंडर कर दो. मैं अगर मारा भी गया तो कम से कम तुम तो जिंदा बच जाओगी. मैंने साफ मना कर दिया. मैंने कहा कि सरेंडर करने के लिए नहीं, मैं मरने के लिए खाड़कू बनी हूं. मैंने तुमसे शादी जीने के लिए नहीं. तुम्हारे साथ मरने के लिए की है. इसके बाद हम दोनो एक नाले में कूद गए. नाले में पुलिस की गोलियों से बचते-बचाते, नाले के किनारे-किनारे भागना शुरू किया.

गोलियां चलाते-चलाते हाथ की उंगलियां सूज गई थीं

सूरज निकल आया था. गांव वालों की भीड़ जगह-जगह इकट्ठी हो चुकी थी. पुलिस टीमों और हम दोनो (पति-पत्नी) के बीच गोलियां चलते 4-5 घंटे हो चुके थे. गोलियां चलाते-चलाते उंगलियां सूज गईं. उंगलियों ने हथियारों के ‘ट्रिगर’ के अंदर फिट होना बंद कर दिया. मुठभेड़ के दौरान पैदा इन नई मुसीबतों से कई बार लगा कि मौत सामने खड़ी है.

कई बार हम लोग और पुलिस आमने-सामने भी हुए. गनीमत रही तो बस यह कि हम पुलिस के सामने होने के बाद भी उसकी रेंज से दूर थे. पैदल भागते-भागते हलक सूख गया. सांस लेने के लिए जैसे ही रुकते फिर पुलिस आगे से आकर हमें घेर लेती. उससे भयंकर हमारी पुलिस मुठभेड़ कभी नहीं हुई. फिर भी हम पुलिस को गच्चा देकर उस दिन साफ बच निकले.

मुझे पकड़ने को पुलिस ने शहर छावनी बना दिया

मैं तो खुद को खतरनाक नहीं मानती. पता नहीं फिर भी पुलिस क्यों मुझसे सबसे ज्यादा खौफ खाती थी. 21 जुलाई 1992 को मैं अमृतसर शहर में थी. सड़क पर निकली तो देखा पूरा शहर पुलिस ने छावनी में बदल दिया है. ऐसी कोई सड़क नहीं थी, जिस पर पंजाब पुलिस न खड़ी हो. हर बड़ी छोटी सड़क पर बैरिकेड्स लगे थे.

शहर में इतने पुख्ता पुलिस इंतजाम और किलेबंदी के बारे में कुछ समझ पाती उससे पहले ही मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद जब पंजाब पुलिस के ब्लैक कैट कमांडो मुझे पूछताछ के लिए ले गए तब पता चला कि यह सब इंतजाम तो पुलिस ने संदीप कौर यानी मेरी ही गिरफ्तारी के लिए ही किए थे. ताकि मैं किसी भी कीमत पर उस दिन फिर से पुलिस के हाथ से न निकल जाऊं. पुलिस ने मुझे पहले इसलिए गिरफ्तार किया, ताकि मेरे पति (खाड़कू धर्म सिंह काश्तीवाल) का मनोबल टूट जाए और वो सरेंडर कर दे. मैं गिरफ्तार तो हो गई. पति ने फिर भी सरेंडर नहीं किया.

पब्लिक-पुलिस के लिए खूबसूरत खतरनाक खाड़कू थी!

पब्लिक और पुलिस की नजरों में मैं खूबसूरत खतरनाक क्वालीफाइड खाड़कू थी. महिला खाड़कुओं में उस समय मैं अकेली मैट्रिक पास थी. उस पर भी धर्म सिंह काश्तीवाल जैसे खूंखार (मेरे तो पति थे मेरे लिए वो खूंखार नहीं थे. खतरनाक तो वो उन पुलिस वालों को लिए थे, जो बेकसूर नौजवानों का खून बहा रही थी) खाड़कू की बीबी थी. उन दिनों पंजाब पुलिस सबसे ज्यादा मुझसे और मेरे पति से परेशान थी.

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इसीलिए जब मैं गिरफ्तार हुई तो देश के मीडिया ने प्रमुखता से मेरे फोटो और नाम को खूब उछाला. देश में कहीं पुलिस मुझे लेकर जाती तो हर कोई मेरी एक झलक पाने को बेताब था. पुलिस मुझे छिपाकर और मुंह ढककर, भेष बदलवाकर थाने-चौकी कोर्ट ले जाती थी. मेरे काफिले के आगे पीछे 10-15 से भी ज्यादा पुलिस वाहन और ऑटोमेटिक हथियारों से लैस ब्लैक कैट्स चला करते थे.

डर के कारण कोई जेल मुझे बंद करने को राजी नहीं थी

हां, यह सुनकर आज हंसी आती है कि जिस महिला खाड़कू संदीप कौर खालसा की झलक पाने को तमाम लोग बेताब थे, उसी संदीप कौर को गुरदासपुर, पटियाला, अमृतसर जेल वालों ने मुझे ज्यादा समय तक रखने से इंकार कर दिया था. क्योंकि उन्हें भय था कि मुझ जैसी खूंखार खाड़कू कहीं गच्चा देकर जेल तोड़कर भाग न जाए. या इस महिला आतंकवादी (संदीप कौर) को छुड़ाने के लिए खाड़कू कहीं जेल पर हमला न बोल दें.

अंतत: कई दिनों की मशक्कत के बाद और कोर्ट के हस्तक्षेप पर मुझे संगरूर जेल में बंद किया गया. संगरूर जेल में चार साल से ज्यादा समय बंद रही. यहीं से फिर बरी होकर बाहर आई. गिरफ्तारी के बाद मुझ पर टाडा की सभी धाराओं सहित हत्या, पुलिस पर हमला, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, देशद्रोह सहित करीब 22 मामले दर्ज किए गए. मैं कानून की नजर में कितनी बड़ी खाड़कू बन चुकी हूं, इसका एहसास मुझे गिरफ्तारी के बाद हुआ.

खाड़कुओं के बीच जब खून-खराबा होते-होते बचा

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खाड़कू जीवन का एक किस्सा सुनाते हुए संदीप बताती हैं कि एक बार उनके खाड़कू ग्रुप का दूसरे खाड़कू ग्रुप के साथ खून-खराबा होते-होते बच गया. बात सन् 1992 की थी. बब्बर खालसा के खतरनाक खाड़कू तस्वीर सिंह चंधेर ने अमृतसर-गुरदासपुर जिले की सीमा पर भंगाली गांव के पास 9 हिंदुओं को गोलियों से भून डाला.

यह इलाका मेरे पति खाड़कू धर्म सिंह काश्तीवाल का था. धर्म सिंह ने चंधेर से पूछा कि उसने बेकसूर हिंदुओं को क्यों मारा? इस पर चंधेर ने कहा कि ये हमारे दुश्मन हैं. तब धर्मसिंह काश्तीवाल ने चंधेर को वार्निंग दी थी कि आईंदा वो किसी बेगुनाह का खून नहीं बहाएगा. अगर मारना है तो पुलिस, फौज और उन नेताओं को मारो, जो हमारे असली दुश्मन हैं. यह सुनकर चंधेर मौके से चुपचाप चला गया. संदीप के मुताबिक उस दिन लगा था कि कहीं खाड़कूओं के बीच ही मार-काट न मच जाए.

‘काल-कोठरी’ की यादें, जेल में एक महीना ज्यादा रुकी

जेल गई तो मैट्रिक पास थी. संगरूर जेल से ही इंटर किया. उसके बाद एक साल में ज्ञानी और उसके बाद ग्रेजुएशन का एक साल जेल में ही पूरा किया. सन 1996 में जेल से रिहाई का आदेश हुआ. चूंकि परीक्षा में कुछ दिन बाकी थे. इसलिए अदालत की परमीशन से वो एग्जाम देने के लिए एक महीने ज्यादा जेल में रहने की विशेष परमीशन ली. लिहाजा मैं जेल में एक महीने ज्यादा रही अपनी मर्जी से.

जेल में ही मिली पति की मौत की खबर

27 या 28 दिसंबर 1992 का दिन था. हर रोज की तरह जेल में उस दिन मुझे अखबार पढ़ने को नहीं दिया गया. जेल वालों से पूछा तो वे अखबार की बात को टाल गए. उसी दिन कुछ समय बाद मेरी सास और मेरी बहन संगरूर जेल में मुझसे मिलाई करने पहुंची. उन्होंने जेल में ‘मिलाई’ के दौरान बताया कि रास्ते में उन्होंने अखबार पढ़ा है. अखबार में धर्मसिंह के जलंधर (पंजाब) में पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की खबर और उनकी लाश की फोटो छपी थी. सुनकर मैं सन्न रह गई और चुपचाप रोने लगी.

पति की वो अमानत आज भी मेरे पास महफूज है

बकौल संदीप कौर खालसा, जिस दिन जेल में रहते हुए मुझे सास और बहन से पति की मौत की पुलिस मुठभेड़ में मौत की खबर मिली, मैं बुरी तरह टूट गई. मिलाई करके जाने के वक्त उन लोगों ने (सास और बहन) ने मुझे जेल में ही एक पैकेट दिया. उस पैकेट को मैंने खोलकर देखा तो उसमें लाल रंग का सूट था. पति की वह अमानत आज भी मेरे पास बा-हिफाजत महफूज है.

जख्म हरे हैं, वक्त के साथ सोच की जमीन बदल गई

कभी खतरनाक और खून-खराबे पर उतरी संदीप कौर खालसा के जख्म अभी भी हरे हैं. समय बदला तो सोच की जमीन भी बदल सी गई. पति और देवर पुलिस मुठभेड़ में मारे गए. जिंदगी के तमाम खूबसूरत बन सकने वाले साल संदीप ने जेल की चहारदीवारी और सीलनभरी काल-कोठरियों में बिता दिए. जेल से बाहर आईं तो दुनिया बदल चुकी थी.

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पंजाब में आतंकवाद और बब्बर खालसा दम तोड़ चुका था. या यूं कहें कि पंजाब में आतंकवाद अंतिम सांसें गिन रहा था. तमाम घर उजड़ चुके थे. तमाम बच्चों के सिर से मां-बाप का साया और बूढ़े मां-बाप के बुढ़ापे के सपने और सहारे गोलियों से छलनी करके मौत के घाट उतार दिए गए थे.

संदीप ने लोगों को मरते देखा. तबाही के तमाम मंजर उम्र भर के लिए आंखों में बस गये. जिस उम्र में लड़कियां खूबसूरत जिंदगी के सपने बुनती हैं. उस उम्र में संदीप कौर ने थाने-चौकी-गोलियों की तड़तड़ाहट, पुलिस मुठभेड़ें, खून-खराबा, कम उम्र में ही मांग का सिंदूर पुछता हुआ देखा लिया.

जेल से निकलने पर पांवों के नीचे जमीन तो थी, मगर पांवों को अपने नीचे जमीन होने का अहसास तो था ही नहीं. चलते-चलते कब कितना रास्ता गुजर जाता, मंजिल पर पहुंचकर ठहरते वक्त ही इसका एहसास होता. बीती जिंदगी में क्या कुछ खोया-पाया का गुणा-भाग करके गणित लगाया...तो सामने रिजल्ट ‘जीरो’ आया.

लिहाजा सोचा कि जिन बच्चों के सिर से मां-बाप का साया उठ चुका है. जो बच्चे बड़े होकर बाप को पहचानने के काबिल होंगे और उन्हें मां-बाप सामने नहीं मिलेंगे, ऐसे यतीम और मासूमों के लिए ही अब बाकी जिंदगी में कुछ किया जाए, तो शायद बेहतर होगा. लिहाजा इन दिनों संदीप कौर अब ऐसे ही सैकड़ों बच्चों की परवरिश एक चैरिटेबिल ट्रस्ट की मदद से कर रही हैं.

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