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दोबारा चंबल लौटना चाहती थीं डकैत सीमा परिहार...रिश्तों ने रोक लिया

एनकाउंटर के बाद अपने भाई की लाश देखकर सीमा परिहार का खून खौल उठा था. वो दोबारा जंगलों में बदला लेने के लिए वापस लौट जाना चाहती थीं

Updated On: Feb 17, 2018 04:54 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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दोबारा चंबल लौटना चाहती थीं डकैत सीमा परिहार...रिश्तों ने रोक लिया

जेलर साहब मर्द होकर औरतों से मेरी तलाशी कराते हो...तुम्हें डर है कि, मैं जेल में बम-हथियार ला सकती हूं. जेल की चार-दीवारी को तोड़कर फरार हो सकती हूं. जेलर होकर भी तुम बुजदिलों की तरह मुझसे घबरा रहे हो. मुझे तुम पर हंसी और तुम्हारी मर्दानगी पर शर्म आ रही है. मर्द होकर औरतों की सी हरकतें करना बंद करो. मैं औरत होकर भी, कभी भी जेल के भीतर रिवॉल्वर लाकर तुम्हें दिखा और समझा दूंगी कि एक औरत के भीतर छिपा मर्द कितना बहादुर होता है?

....यह बॉलीवुड या फिर हॉलीवुड की किसी मसालेदार फिल्म की बंद कमरे में लिखी गई स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि चंबल के खुले और डरावने बीहड़ से बिग-बॉस तक का सफर पूरा कर चुकी दस्यु सुंदरी सीमा परिहार के शब्द हैं.

रूह कंपा देने वाली यह नसीहत सीमा परिहार ने इटावा जेल के जेलर को खुलेआम दे डाली थी. जिस सीमा परिहार की खूबसूरती के चलते चंबल घाटी के खतरनाक बागी (डाकुओं) सरदारों में खून-खराबा होता रहा. जिस सीमा परिहार के नाम से पुलिस माथे पर आया पसीना पोंछना भूल जाती थी. जिस सीमा परिहार की बंदूक की गड़गड़ाहट और बुलंद आवाज बीहड़ के जंगली जानवरों की आवाजों को दबा देती हो. आज वही सीमा परिहार दो जून की रोजी-रोटी के जुगाड़ में दर-ब-दर भटक रही हैं.

अपने जमाने की सबसे खतरनाक और बागी (डकैत) जीवन को चंबल के खुले जंगल में दबंगई के साथ बिताने वाली, वही सीमा परिहार, आज 5 गज चौड़ाई वाले एक छोटे से सीलन और दीमक भरे संकरे मकान में जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं ?

वह डरावनी बरसाती रात और बंदूकों की गर्जना

'मूसलाधार बरसात हो रही थी. वह चौमास (जुलाई) की रात थी. 9 या 10 बजे का वक्त रहा होगा. दिन तारीख याद नहीं. हां, सन् 1983 रही होगा. हम चारों बहन और दो भाई, मां-बाप के साथ बरसात की कड़कड़ती डरावनी बिजली से डरे-सहमे हुए कच्चे मकान में दुबके बैठे थे. तेज हवाएं उस रात को और भी डरावना बना रही थीं.'

'बारिश और बिजली कड़कने की आवाज के सिवाय बबाइन गांव ( थाना अजीतमल, उस वक्त जिला इटावा अब थाना अयाना जिला औरैया) में और दूसरी कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी. अचानक हमारे कच्चे मकान के दरवाजे पर गोलियां चलने लगीं. उन दिनों चंबल के डाकू इसी तरह रात के अंधेरे में किसी के भी घर में घुस पड़ते थे. गोलियों की आवाजें सुनकर हम सब भाई-बहन कोठरी के कोने में छिप गए. इतने में हथियारबंद तीन-चार डकैत एक महिला के साथ हमारे सामने आ धमके. उन सबने मुझे जबरन परिवार वालों के बीच से घसीटा और साथ ले जाने लगे. मैं, मेरे छोटे-छोटे भाई-बहन, मां-बाप लाख गिड़गिड़ाए. डाकुओं के पांवों से लिपट गए हम सब. उन्होंने फिर भी रहम नहीं खाया और मेरा अपहरण करके चंबल के बीहड़ में ले गए.'

देखने-सुनने में किसी हॉरर फिल्म की सी कहानी लगने वाली आपबीती सुनाते-सुनाते पूर्व दस्यु सुंदरी सीमा परिहार की आंखे भर आती हैं और मुठ्ठियां गुस्से से भिंच जाती हैं.

रात भर भागी, यमुना नदी पार कर चंबल के बीहड़ में पहुंची

गांव से डाकू पैदल ही दौड़ाते, मारते-पीटते और जान से मार डालने की धमकियां देते हुए बीहड़ ( चंबल घाटी) में ले गए. मात्र 13 साल की उम्र और बरसाती रात में घर से चंबल के जंगल में डाकुओं के अड्डे तक पहुंचने के लिए करीब 35 किलोमीटर का पैदल का सफर तय किया. बागियों के अड्डे पर पहुंची तो पता चला अपहरण करने वाला चंबल घाटी का कुख्यात लाला राम बागी (डाकू) था. मेरा अपहरण करने में लाला राम के साथ उस रात महिला डकैत कुसुमा नाइन, सुरेश लोधी और मुखमल सिंह भी थे.

पहली बार जब बीहड़ में चलाई बंदूक

अपहरण के बाद चंबल में पहुंची तो सोचा कि घर वालों ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करा दी होगी. आज नहीं तो कल...पुलिस डाकुओं के कब्जे से छुड़ा लेगी. इसी इंतजार में दिन, महीने और साल गुजर गए. धीरे-धीरे पता लगा कि  पुलिस ने मुझे डाकुओं के अड्डे से छुड़ाने के बजाए, मेरे मां-बाप को ही जेल में डाल दिया है. उन पर आरोप लगाया कि मैं (सीमा परिहार) डाकू बन गई हूं. घर की कुर्की कर दी गई. जब पुलिस ने मुझ जैसी कम उम्र लड़की को छुड़ाने के बजाए डाकू बना डाला, तो फिर घर-परिवार, समाज सब भुला दिया.

seema parihar

एक दिन डाकूओं के गिरोह के साथ जालौन जिलान्तर्गत चंबल के जंगल में मौजूद शिव मंदिर पर पहुंची. शाम के आठ बजे का वक्त रहा होगा. रात घिर आई थी. शंकर जी के मंदिर पर खड़े होकर पहले दुनाली बंदूक से चार हवाई फायर किए. हिम्मत बढ़ी तो साथी डाकू से उसकी 315 बोर की राइफल लेकर दो राउंड राइफल से फायर किए.

पुलिस की रूह कंपा देने वाली सीमा परिहार को भी डर लगता है

चंबल घाटी के डाकुओं को देखने की बात तो दूर...उनके नाम से ही आम इंसान की घिघ्घी बंध जाती है. घाटी में जब कभी पुलिस का इन डाकुओं से मुकाबला होता तो पसीना पुलिस को ही आता था. सीमा परिवार के नाम का खौफ 17 साल तक चंबल के जंगल में बरकरार रहा.

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इसके बाद भी आपको हैरत होगी यह जानकर कि सीमा परिहार को भी किसी से डर लगता है. बकौल सीमा- ‘मैंने बीहड़ में ऐसा कोई हथियार नहीं है, जो न चलाया हो...मुठभेड़ों के दौरान पुलिस पर हथगोले भी खूब फेंके....मुठभेड़ों के दौरान कई बार अपने साथी डकैतों को गोलियों से मरते देखा....कई बार हमारी (डाकुओं) गोलियों से पुलिस वालों की लाशें बिछते देखीं...मगर यह तो डाकू जीवन का हिस्सा था. जब बीहड़ में पहुंच ही गई तो फिर मौत का खौफ खत्म हो गया. हां, बीहड़ की जिंदगी में मुझे सबसे ज्यादा डर देसी हथियारों मसलन देसी तमंचे, राइफल और बंदूकों से लगा. देसी हथियार कभी भी धोखा देकर चलाने वाले की ही जान ले लेते हैं. मैंने हमेशा पुलिस से लूटे या फिर फैक्टरियों में बनाए गए हथियारों का ही इस्तेमाल किया.

पहली बार गरीब पिता ने थाना देखा...वहां भी पुलिस ने दीं गालियां

बेटी के अपहरण की शिकायत दर्ज कराने मेरे गरीब पिता अगली सुबह थाने पहुंचे. वहां मेरे अपहरण का साजिशकर्ता और उस वक्त गांव का सरपंच पहले से थाने में मौजूद था. आरोपी सरपंच से मिलीभगत के चलते थाने में मौजूद दारोगा जितनी बेइज्जती मेरे पिता की कर सकता था की. जी-भर के गालियां भी दीं. मेरे पिता ने थानेदार के सामने लाख हाथ-पैर जोड़े. मिन्नतें कीं. मगर उन्हें वहां पुलिस से सिवाए गालियों और धमकियों के कुछ नहीं मिला.

बीहड़ में प्यार, शादी और फिर मां बनने वाली पहली महिला डकैत

बकौल सीमा परिहार- ‘चंबल की जिंदगी को जब अपनाया तो फिर न आगे की सोची न पीछे की. अपहरण करने वाले डाकू लाला राम से प्यार हुआ. लाला राम से गर्भवती हुई. और चंबल में किसी डाकू से गर्भवती होकर बिन ब्याही मां बनने वाली पहली महिला डकैत भी बनी.’

सीमा परिहार और लाला राम का यह बेटा इन दिनों चल रही यूपी बोर्ड इलाहबाद से बारहवीं की परीक्षा औरैया जिले के एक परीक्षा केंद्र पर दे रहा है. सीमा के मुताबिक उसके अपहरण में शामिल महिला डाकू कुसुमा नाइन और डाकू फक्कड़ की सलाह पर मेरा विवाह मेरे प्रेमी डाकू लाला राम गैंग के कुख्यात डाकू निर्भय गुर्जर से कर दिया गया. निर्भय और मेरे बीच पति-पत्नी का रिश्ता यूं तो आज तक बरकरार है. हां, निर्भय की ओछी हरकतों से तंग आकर मैने उसे मारपीट कर अपने गैंग से भगा दिया था.

प्यार और पति मिला सब कुछ, मगर बचा कुछ नहीं

प्यार के रूप में सीमा परिहार को यूं तो उसका मुख्य अपहरणकर्ता और चंबल में सबसे खतरनाक गैंग का लीडर लाला राम ही उसका प्रेमी बना. पति के रूप में गैंग का जूनियर डाकू निर्भय गुर्जर भी मिला. आज सीमा के पास न प्रेमी है न पति. दोनों को ही पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया. पति और प्रेमी के पुलिस मुठभेड़ में ढेर किए जाने पर भी उंगली सीमा परिहार की ओर ही उठी थी. कहा गया था कि दोनों की मुखबिरी सीमा ने पुलिस से की, तभी पुलिस ने उन्हें मार डाला. हालांकि सीमा इन आरोपों से इंकार करती हैं.

सीमा परिहार से भयभीत पुलिस ने डाकू पति की लाश रात में ही फूंक दी

आम आदमी से ज्यादा खौफ सीमा परिहार का पुलिस पर था. इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब, मुठभेड़ के बाद सीमा परिहार के पति डाकू निर्भय गुर्जर की लाश देने की हिम्मत भी यूपी पुलिस नहीं जुटा पाई. यूपी पुलिस के जेहन में सीमा के भय का आलम यह था कि पुलिस ने सीमा के मौके पर पहुंचने से पहले ही डाकू निर्भय गुर्जर की लाश का आनन-फानन में दाह-संस्कार कर दिया. पुलिस को आशंका थी कि सीमा परिहार पुलिस के कब्जे से लाश छीनने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.

 दूसरी जेल की रोटी खाने से जेलर को साफ मना कर दिया

सीमा के मुताबिक दिसंबर 2000 में सरेंडर कर दिया. उसके बाद कोर्ट-कचहरी-थाने-चौकी के चक्कर काटना शुरू हुआ. तीन साल, तीन महीने इटावा जेल में रही. एक बार ऐसा भी मौका आया जब अदालत में पेशी से वापसी में लेट हो गयी. लिहाजा कानपुर जेल में एक रात के लिए बंद किया गया. जेलर ने रोटी भिजवाई. मैंने जेलर से साफ कह दिया कि एक रात के लिए मैं इटावा के बजाए कानपुर जेल की रोटी क्यों खाऊं? मुकद्दर की तेज थी. इटावा जेल में ही तीन साल तीन महीने का वक्त काटकर 7 मई 2004 को जेल से बाहर आ गई.

जब सोचा बंदूक उठाकर दोबारा चंबल के बीहड़ में कूद जाऊं

4 अक्टूबर 2006 की बात है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने मेरे भाई राम कुमार को गाजियाबाद में कथित मुठभेड़ में मार डाला. आधी रात को मैं हिंडन नदी किनारे मौजूद पोस्टमार्टम हाउस पहुंची. भाई की क्षत-विक्षत लाश पोस्टमार्टम हाउस में बिना कपड़े के पड़ी थी. उसका पेट फटा हुआ था. दोनों हाथ कुल्हाड़ियों से काटे हुए से दिखाई पड़ रहे थे. मेरे पास भाई के कफन के लिए पैसे नहीं थे. एक दारोगा के कमरे से मंगाई चादर में लपेट कर भाई की लाश दिबियापुर (जहां अब सीमा रह रही हैं) लाई. रास्ते में सोच रही थी कि, क्यों न पुलिस को सबक सिखाने के लिए फिर से बंदूक लेकर चंबल के बीहड़ में कूद जाऊं. जंगल में उतरने का पूरा प्लान बना लिया. भाई की लाश लेकर जब घर पहुंची तो घर में उसके 10 महीने के मासूम बेटे को देखा. बस उसका चेहरा देखकर सोचा कि, अगर मैं दोबारा चंबल में उतर गई तो यह बच्चा और आने वाली पीढ़ियां भी बर्बाद हो जाएंगी.

सीमा को जिंदा या मुर्दा लाने वाले को 40 लाख

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पुलिस बदमाश के सिर और बदमाश द्वारा पुलिस के सिर पर तो मोटी इनामी राशी की घोषणा करने के किस्से तो अक्सर देखे सुने पढ़े जाते रहे हैं. मगर डाकू के परिवार ने दस्यु सुंदरी सीमा परिहार के सिर पर ही 40 लाख का इनाम रख दिया. यह परिवार था सीमा परिहार के मुख्य अपहरणकर्ता और बाद में सीमा का प्रेमी और सीमा की संतान का पिता बना डाकू लाला राम का.

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लाला राम के परिवार को आशंका थी कि सीमा परिहार की मुखबिरी पर ही लाला राम मारा गया. लिहाजा उन्होंने सीमा को जिंदा-मुर्दा उनके हवाले किए जाने पर ऐसा करने वाले को 40 लाख की मोटी रकम की घोषणा कर दी थी. यह भी सीमा परिहार का ही दावा है.

बीहड़ के बाहर निकली तो माया मिली न राम

जिस सीमा परिहार के नाम से अच्छे-अच्छों को पसीना आता था. वक्त के साथ सब कुछ बदल गया. जंगल से बाहर आई तो एक दो टीवी सीरियल में काम किया. सलमान खान फेम बिग-बॉस में गईं. खुद पर बनी फिल्म ‘वुंडेड’ में काम किया. फिल्म की शोहरत लंदन तक हुई. सरेंडर के वक्त सरकार ने दोनों भाइयों को सरकारी नौकरी, सीमा परिहार को सुरक्षा के लिए हथियार का लाइसेंस और रहने के लिए घर देने का वायदा किया गया. यह अलग बात है कि नौकरी देने के बजाए, एक भाई को पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया. हथियार का लाइसेंस अब तक नहीं मिला. अगर अब मिल भी जाए तो सीमा के पास हथियार खरीदने तक को पैसे नहीं हैं.

दीमक और सीलन भरे मकान में रहने को मजबूर

सरकार कब मकान रहने को देगी भविष्य के गर्भ में है. हां, दिबियापुर (जिला औरैया) के जिस छोटे और संकरे 5 गज चौड़े मकान में सीमा फिलहाल अपने दो भाइयों के परिवार के साथ रह रही हैं, उसमें कई वर्ष से गरीबी के चलते रंगाई-पुताई नहीं हुई है. दीवारों पर दीमक और सीलन लग गई है. बिग-बॉस से जो रकम हासिल हुई थी उससे कुछ कर्जा निपटा दिया...बाकी रकम दो जून की रोटी के जुगाड़ में खर्च हो गई. अब उधार की जिंदगी का सहारा भर बचा है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

(सभी तस्वीरें सीमा परिहार ने भेजी हैं.)

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