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कहानी उस जांबाज सब इंस्पेक्टर की जिसे डाकुओं के बीच छोड़कर भाग गए थे साथी

सब्र के साथ पढ़िए, एक खुद्दार पूर्व पुलिस अफसर/एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की बदन में सिहरन पैदा कर देने वाली मन को झकझोर देने वाली 'पड़ताल'

Updated On: Sep 08, 2018 11:37 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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कहानी उस जांबाज सब इंस्पेक्टर की जिसे डाकुओं के बीच छोड़कर भाग गए थे साथी
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'थाने-चौकी या पुलिस-दफ्तर में बैठकर कागज पर 'कलम-घिसाई' से कभी कोई 'पुलिसिया-पड़ताल' कामयाब नहीं हो सकती है. असल पड़ताल तो मौके पर यानी घटनास्थल पर ही होती है. मौका चाहे आपराधिक घटना का हो, या फिर खूंखार अपराधी से आमने-सामने मोर्चाबंदी / मुकाबले का. दौरान-ए-मुठभेड़ सामने अगर खूंखार अपराधी है तो फिर, पड़ताली-पुलिस अफसर की गोली, अपराधी के सीने या माथे के भीतर घुसी हुई मिलना ही 'असली-तफ्तीश' है.'

'पड़ताल' की इस किश्त में मैं यहां, आपसे उसी बहादुर, तीव्र-बुद्धि, पूर्व पुलिस-अफसर की रोंगटे खड़ी कर देने वाली एक अद्भूत 'पड़ताल' और पुलिसिया जीवन के पहले मगर हैरतंगेज एनकाउंटर का जिक्र कर रहा हूं.

ये वो पुलिस अधिकारी है जो पुलिस की पूरी नौकरी में ऊपर लिखे अल्फाजों पर ही अमल करता रहा. अब से करीब 50 साल पहले यानी 1960-70 के दशक में, वही बहादुर पुलिस अफसर जिसे, करीब 45 साल पहले उसके गद्दार-डरपोक साथी सिपाही डाकूओं की गोलियों से 'छलनी' हो चुका समझकर, उसकी 'लाश' घने जंगल में छोड़कर भाग गये थे!

अतीत की यादों में खोये रामचरन सिंह

अतीत की यादों में खोये रामचरन सिंह

जिला पुलिस सुपरिटेंडेंट लाव-लश्कर के साथ जब, इस बहादुर की लाश उठाने/तलाशने पहुंचे तो उन्हें आधी रात को बियाबान जंगल में यही थानेदार तीन डाकूओं की लाश की रखवाली करता हुआ 'जिंदा' मिला.

आखिर कैसे? सब्र के साथ पढ़िए, एक खुद्दार पूर्व पुलिस अफसर/एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की बदन में सिहरन पैदा कर देने वाली मन को झकझोर देने वाली 'पड़ताल'.

ट्रेनिंग में ही 'टांग' लिए थे दबंग नेताजी:

सन् 1966-67 की यूपी के मुरादाबाद जिले की बात है. उत्तर प्रदेश पुलिस के डायरेक्ट सब-इंस्पेक्टर भर्ती थानेदारों को, प्रैक्टिकल-ट्रेनिंग पर थाने-चौकी में पोस्टिंग दी जा रही थी. सब-इंस्पेक्टर रामचरन सिंह को मुगलपुरा थाने में तैनाती दी गई. एक दिन असालतपुरा पुलिया इलाके में बबाल हो गया. मौके पर पहुंचे नौसिखिये रामचरन सिंह को पता चला कि फसाद कराने में शहर के एक नामी-दबंग नेताजी का शातिराना-दिमाग शामिल है. रामचरन सिंह ने बवाली नेताजी को ठोक-पीटकर बंद कर दिया. नतीजा कुछ घंटे बाद ही रामचरन के सामने आ गया. शहर में बवाल कराने पर उतारु नेताजी को बंद करके, नेता को उसकी हैसियत बता देने वाले दारोगा रामचरन सिंह का अफसरों ने मुरादाबाद से बिजनौर जिले में ट्रांसफर कर दिया.

'सांपनाथ' ने डसकर गले में 'नागनाथ' डाल दिए:

जून 1968 में मुरादाबाद से ट्रांसफर होकर रामचरन सिंह बिजनौर पहुंच गए. पुलिस के नए-नए खिलाड़ी सब- इंस्पेक्टर रामचरन सिंह 'खाकी का खेल' नहीं समझ पाए. रामचरन सिंह को भला क्या मालूम था कि, मुरादाबाद में उन्हें नागनाथ (दबंग गुंडा नेताजी और महाभारत के कृष्ण से चतुर आला जिला पुलिस अफसर) ने डसा था. बिजनौर (नगीना थाना) पोस्टिंग में उनका मुकाबला 'सांपनाथ' से हो गया है. नगीना थानाध्यक्ष को न मालूम रामचरन सिंह की 'शक्ल' में ऐसा क्या दिखाई देने लगा कि रामचरन अक्सर थाना-प्रभारी के निशाने पर रहने लगे. रामचरन सिंह ने सोचा महकमे में नया हूं. पुलिसिया कामकाज की कम समझ है. शायद इसीलिए उन्हें थानाध्यक्ष के कोप का भाजन बनना पड़ रहा है.

ठेठ देसी था मगर 'ठसक' में नहीं:

रौबीला और बेइंतहा लंबी कद-काठी वाले रामचरन सिंह स्वभाव से 'हेकड़' नौसिखिया थानेदार थे. बुद्धिमानी, चातुर्य और सब्र रखने में उससे भी कहीं ज्यादा आगे. बीएससी तक पढ़े रामचरन सिंह 'पुलिसिया' अंदाज के 'अक्खड़पन' से कोसों दूर थे. इसकी वजह उनका उच्च-शिक्षित होना. पश्चमी उत्तर-प्रदेश ( बुलंदशहर का चिरोरा गांव) के ठेठ देसी रहन-सहन के चलते, रामचरन सिंह की भाषा-शैली भले ही ‘खड़ी या अक्खड़’ थी. इसके बावजूद उनमें स था. लीकेदारी/ तहजीब/उच्चकोटि के संस्कार कूट-कूट कर भरे हुए थे. शायद इसलिए क्योंकि यह सब रामचरन सिंह को, मां मुखत्यार कौर और पिता चौधरी रिसाल सिंह से खून में मिला था. यही कारण था कि, नगीना थाना-प्रभारी द्वारा रोज-रोज परोसे जा रहे, नये-नये झंझटों का, रामचरन सिंह ने खुद की जिंदगी पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ने दिया.

.....इसलिए मंत्री की 'अगवानी' में लगा दिया:

एक रात भोगली गांव में दबंग और धनाढ्य नरेंद्र सिंह चौहान के घर डाकूओं ने धावा बोल दिया. भोगली गांव नगीना थाना क्षेत्र में ही आता था. डकैतों कई घंटे तक नरेंद्र के घर में रहे और नकदी-जेवर लूटे. एक महिला सहित तीन लोगों की हत्या भी कर दी. पहले से ही जले-भुने बैठे नगीना थाना प्रभारी ने उस रात दारोगा रामचरन सिंह को शहर में आ रहे एक मंत्री की स्टेशन पर 'अगवानी' करने का हुक्म सुना दिया.

थानाध्यक्ष इस तिहरे हत्याकांड-डाके वाले गांव भोगली में खुद चला गया. रामचरन सिंह स्टेशन से मंत्री जी को उनके अड्डे पर छोड़कर कमरे पर सोने चले गए. खुद को जरुरत से ज्यादा चतुर और काबिल समझने वाला थानाध्यक्ष सिर्फ तीन थानेदारों के साथ आधी रात से लेकर सुबह होने तक तिहरे हत्याकांड वाले घटनास्थल पर ठलुआ बैठा 'पड़ताल' के नाम पर वक्त 'जाया' करता रहा.

देहरी पर दूधिया दे गया दमदार 'खबर':

भोगली गांव में डकैती-तिहरे हत्याकांड वाली सुबह, करीब सात बजे दूधिया रोज की तरह दूध लेकर सब-इंस्पेक्टर रामचरन सिंह के कमरे पर पहुंचा. दूधिया को पता था कि रामचरन सिंह नया-नया दबंग दारोगा है. और उनकी पोस्टिंग नगीना थाने में ही है. बातों-बातों में ही दूधिया ने रामचरन सिंह को बताया कि गढ़ी गांव के एक घर में उसने चार-पांच हथियारबंद डकैत/बदमाश कुछ देर पहले ही बैठे देखे हैं. बकौल रामचरन सिंह, 'दूधिया की सूचना से मेरा माथा ठनका. गढ़ी गांव उस भोगली गांव से मात्र 4-5 किलोमीटर ही दूर था जहां, बीती रात ही डाके की घटना में तिहरे हत्याकांड को अंजाम दिया गया था.'

खबर खास और हालात विपरीत थे:

दूधिया से मिली खबर बहुत काम की थी. लेकिन दारोगा रामचरन सिंह उस महत्वपूर्ण सूचना को पाकर भी खासे पसोपेश में थे. वजह, खुद को जरुरत से ज्यादा काबिल और अनुभवी पड़ताली समझने वाला नगीना थानाध्यक्ष थाने में मौजूद पूरा फोर्स लेकर रात से ही भोगली गांव में डेरा डाले हुए था. रामचरन सिंह ने सोचा कि, पांच हथियारबंद डकैतों के सामने वे एक रिवाल्वर के बलबूते कब तक टिकेंगे? लिहाजा सब-इंस्पेक्टर रामचरन सिंह ने नगीना थाने की रेलवे बाजार पुलिस चौकी से अलाउद्दीन, अबरार सहित तीन सिपाही 'थ्री-नॉट-थ्री' राइफलों के साथ ले लिए. उसके बाद बिना किसी को कुछ बताए, वे लोग साइकिलों से ही गढ़ी गांव में मौजूद डाकूओं के संभावित अड्डे की ओर चल दिए.

गोली चलाता तो पुलिस टीम मारी जाती:

रिटायर्ड इंस्पेक्टर रामचरन सिंह के मुताबिक, 'गढ़ी गांव में तो हम लोग पहुंच गए, लेकिन डाकू जिस घर में मौजूद थे उसका पता लगाना टेढ़ा काम था. हम किसी और मकान में घुसने ही वाले थे कि उसी समय वहां गोबर डालने आई एक महिला ने हमें उंगली के इशारे से वो घर बता दिया. मेरे पास अपना सर्विस रिवाल्वर था. मैंने दीवार में मौजूद छेद से झांककर मकान के अंदर देखा तो लगा कि रिवाल्वर से गोली चलाते ही बात बिगड़ सकती है. गोली चलने की आवाज आते ही गांव वाले इकट्ठे होकर नई मुसीबत खड़ी कर सकते थे. संभव था कि पुलिस की गोली का जबाब हथियारबंद डाकू भी गोली से ही देने लगते.'

लाठी के बलबूते डाकू काबू कर लिए:

करीब 50 साल पहले अंजाम तक पहुंचाई गई उस दिल दहला देने वाली पुलिसिया जीवन की पहली 'पड़ताल' का जिक्र करते हुए 75 साल के पूर्व इंस्पेक्टर रामचरन सिंह बताते हैं, 'मैंने सिपाही अलाउद्दीन के पास मौजूद लाठी ले ली. मुझे लगा कि मकान का मुख्य दरवाजा खुलवाने की कोशिश मेरी टीम के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. घर के आंगन में बेफिक्री से बैठे डाकू हमारे दरवाजा खटखटाते ही सतर्क हो जाएंगे. संभव था कि हड़बड़ाए डाकू, जवाब में हम पर गोलियां चलाना शुरु कर देते. लिहाजा मैंने दरवाजे के बजाए दीवार कूदकर उन तक पहुंचने की योजना बनाई.

मकान के अंदर पहुंचते ही मैंने सिपाहियों की मदद से तौफीक, रफीक, सीताराम और हरकिशन सहित सभी 5 डाकू लाठियों से ही पीट-पीटकर काबू कर लिया. डाकुओं के पास भोगली गांव में डाली गयी डकैती और तिहरे हत्याकांड की जघन्य वारदात में लूटी गई सोने की 22 मुहरें, 4- 5 किलो चांदी और नकदी भी बरामद कर ली. बीती रात ही भोगली गांव में डाली गई डकैती में इस्तेमाल दो बंदूक, तीन रिवाल्वर (तमंचे) भी डाकूओं ने मेरे हाथों में डाल दिये.'

पुलिस कप्तान 'कायल' और 'बॉस' बेकाबू!

खाकी के खेल से पूरी तरह अनजान नौसिखिया सब-इंस्पेक्टर रामचरन सिंह, पांचों डाकू और उनसे बरामद माल के साथ सीधे भोगली गांव जा पहुंचे. खुशी में गांव वालों ने उन सबका जोरदार स्वागत किया. पुलिस अधीक्षक राजकुमार सक्सेना भी नए बेखौफ युवा पड़ताली थानेदार की काबिलियत के कायल हो गए. उन्होंने रामचरन सिंह को 100 रुपये का नगद इनाम और प्रशस्ति-पत्र भी दिया. खुद के सामने गांव वालों और जिला पुलिस कप्तान द्वारा नौसिखिया मातहत दारोगा की आवभगत पहले से ही जले-भुने बैठे थानाध्यक्ष को बदहजमी कर गई!' ये बताते हुए रामचरन सिंह खूब हंसते हैं. उन दिनों रामचरन सिंह की उम्र 25-26 साल की रही होगी. पुलिसिया नौकरी में यह उनकी पहली मगर बेहद कामयाब पड़ताल थी.

थानेदार की 'ठसक' से ठनका थानाध्यक्ष:

भोगली गांव में पड़ी डकैती और तिहरे हत्याकांड के खुलासे से पूरा बिजनौर जिला बेहद खुश था. सूबे के तमाम जिलों से लेकर लखनऊ में बैठे सरकारी हुक्मरानों तक की जुबान पर रामचरन सिंह का नाम रट चुका था. यह अलग बात है कि उस समय के नगीना थाना प्रभारी रामचरन सिंह की शुरु हो रही 'बादशाहत' से खासे परेशान थे. लिहाजा भोगली तिहरा हत्याकांड रामचरन सिंह द्वारा खोल दिये जाने से बेहाल, नगीना थाना-प्रभारी ने इस दबंग दारोगा को रात में साइकिल से 'तार-गश्त' जैसी सख्त ड्यूटी पर लगा दिया.

बिजनौर जिले का नगीना थाना

बिजनौर जिले का नगीना थाना

कायर सिपाही हथियार चलाना भूल गए!

एक रात रामचरन सिंह नगीना से बुंदकी रेलवे स्टेशन तक रेल लाइन के किनारे बियाबान जंगल में साइकिल से 'रात्रि-तार-गश्त' कर रहे थे. साथ में दो सिपाही भी थे. आधी रात के आसपास गांव त्रिलोकावाला (तिरलोका) के जंगल के भीतर बदमाशों की मौजूदगी की आहट हुई. जंगली घास पर पेट के बल लेटी पुलिस पार्टी ने सुना कि जंगल के अंदर से बदमाश 'पुलिस है भाग लो' कह रहे हैं. इस पर पुलिस वालों के कान खड़े हो गए. बकौल रामचरन सिंह, 'हम पुलिस वाले कुछ समझ पाते, उससे पहले ही घुप्प अंधेरे जंगल में से हमारे ऊपर फायरिंग शुरु कर हो गई. उस रात असली मुठभेड़ में मेरे साथ मौजूद दोनों बुजदिल सिपाही, हाथों में मौजूद हथियार चलाना भूल गए.

'बुजदिल' सिपाही, 'दिलेर' को मरा समझ भागे:

अपनी उस पहली खुनी मुठभेड़ के बारे में रामचरन सिंह आगे बताते हैं, 'तभी एक सिपाही को लगा कि शायद मुझे गोली लग गई है. मैं मर गया हूं. वो सिपाही जोर से चीखा 'अरे दारोगा जी मारे गए'. लेकिन मैं सही-सलामत था. साथी सिपाहियों की ओर से कोई हलचल न होती देख मैंने इधर-उधर मुड़कर देखा. तब तक वे दोनों गद्दार-कायर और 'खाकी के कलंक' सिपाही मोर्चे से गायब हो चुके थे.'

खुद की मौत का जब मुंह मोड़ दिया:

बकौल रामचरन सिंह, 'उन कायरों के भागने के बाद भी मैं अकेला ही एक गढ्ढे में छिपकर डाकूओं से मुकाबला करता रहा. महज 20-25 फुट दूर मौजूद जंगली घास में छिपे डाकू मुझे साफ दिखाई दे रहे थे. मैं चूंकि गहरे गढ्ढे में छिपकर रिवाल्वर से डाकूओं के ऊपर रुक-रुक कर फायरिंग कर रहा था. इसलिए उनका नुकसान ज्यादा हुआ. तीन डकैत उस रात मैने अकेले ही मार डाले. कई डाकू मौके से भागने में कामयाब भी रहे. 26-27 साल की उम्र में पुलिस की नई-नई थानेदारी में रामचरन सिंह द्वारा किया गया वो पहला खतरनाक एनकाउंटर था. उसके बाद 24 साल की नौकरी में रामचरन सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. चाहे वो एटा में काशी बाबा को ठिकाने लगाने वाली मुठभेड़ रही हो या फिर पोथीराम जैसे खूंखार एक लाख के इनामी डाकू से सीधा मुकाबला.

'लाश' लेने पहुंचे एसपी 'जिंदा' देख चकरा गए!

रामचरन सिंह जैसे होनहार और दबंग सब-इंस्पेक्टर के शहीद होने की खबर फैलते ही बिजनौर जिला पुलिस में हड़कंप मच गया. रामचरन सिंह के मुताबिक, 'मुठभेड़ में मेरे मारे जाने की खबर से हड़बड़ाए पुलिस अफसर (मय पुलिस अधीक्षक राजकुमार सक्सेना) लाव-लश्कर सहित रात में ही जंगल के अंदर मेरी 'लाश' खोजने पहुंच गए. आधी रात को घुप्प अंधेरे जंगल में मैं पुलिस अधीक्षक को ठंड और जंगली जानवरों से बचने के लिए अलाव (आग) जलाए, हाथ में लोडेड सरकारी रिवाल्वर के साथ पास पड़ी तीन लाशों की रखवाली करता मिला. एसपी साहब के दल-बल के साथ मौजूद वे दोनों कायर सिपाही भी मेरी 'लाश' के बजाए, मुझे 'जिंदा' देखकर हैरत में थे.

पत्नी रामवती और छोटे बेटे शैलेंद्र सिंह के साथ रामचरन सिंह

पत्नी रामवती और छोटे बेटे शैलेंद्र सिंह के साथ रामचरन सिंह

शागिर्द को 'गुरु' बनाने वाला अजूबा आईपीएस!

कई गंभीर एक्सीडेंट के शिकार होने पर रामचरन सिंह ने सीबीसीआईडी (बरेली) में रहते हुए सन् 1991 में यूपी पुलिस से स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति ले ली थी. यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक वरिष्ठ आईपीएस विक्रम सिंह के मुताबिक, '1970 से 1990 के दशकों में शायद ही ऐसा कोई खूंखार डाकू रहा होगा, जिसके माथे या सीने पर इंस्पेक्टर रामचरन सिंह की गोली का घाव मौजूद न हो. भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी में मैंने अगर कुछ पाकर आत्मिक संतुष्टि हासिल की तो वह था रामचरन सिंह जैसे बहादुर और 24 कैरेट के ईमानदार 'मातहत' को अपना 'गुरु और बड़ा भाई' बना लेना. 36 साल की मेरी आईपीएस की नौकरी एक तरफ और जिंदादिल मेरे इंस्पेक्टर 'गुरु' रामचरन सिंह एक तरफ. इसे ही मेरी जिंदगी का फलसफा समझिये.'

अपने जमाने में दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे विक्रम सिंह के इस कथन के जवाब में रामचरन सिंह बस इतना ही कहते हैं कि, 'मां-बाप ने मुझे जन्म दिया था. पुलिस में पाल-पोसकर अब तक की मेरी हर सांस को ऑक्सीजन देने वाले विक्रम सिंह साहब ही हैं.'

कौन है 'खाकी का खुद्दार' पड़ताली रामचरन सिंह?

दिल्ली से सटे यूपी के बुलंदशहर जिलांतर्गत आगाह थाना क्षेत्र के गांव चरोरा के मूल निवासी हैं रामचरन सिंह. मां मुखत्यार कौर और पिता चौधरी रिसाल सिंह की पांच संतानों में सबसे छोटे हैं. बीएससी पास. 1966 बैच यूपी पुलिस के सब-इंस्पेक्टर (रिटायर्ड इंस्पेक्टर, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट) रामचरन सिंह का जन्म 3 जनवरी सन् 1943 को हुआ था. रामचरन सिंह की शादी 16 जून सन् 1967 को अलीगढ़ के चौधरी देवी सिंह की बेटी रामवती से हुई थी. दिल का दौरा पड़ने से सन् 2007 में रामवती की मृत्यु हो गई.

पोते पोती के साथ रामचरन सिंह

पोते पोती के साथ रामचरन सिंह

रामचरन सिंह और रामवती के तीन संतान बेटा शाकेंद्र सिंह, बेटी चेतना सिंह और शैलेंद्र सिंह हैं. फिलहाल रामचरन सिंह लंबे समय से पुत्र शाकेंद्र सिंह, पुत्र-वधू ईवा (पोलैंड की मूल निवासी) एवं छोटे बेटे शैलेंद्र सिंह और उनकी पत्नी एकता सिंह तथा पोता-पोती गुरुष गैवरियल सिंह चौधरी, दिग्विजय सिंह चौधरी, आराध्या गुनगुन चौधरी और सिद्धांत सिंह सिद्धू के साथ जिला ऊधमसिंह नगर (उत्तराखंड) के किच्छा (किछा) में रह रहे हैं.

जबकि रामचरन सिंह की बेटी चेतना सिंह बेटी वीजल और पति संजीव कुमार (भारतीय सेना में कर्नल) के साथ श्रीनगर (कश्मीर) में रह रही है.

इस 'संडे क्राइम स्पेशल' में पढ़ना न भूलें..

'थानेदारी में कभी 'घूस' मत लेना! हराम की कमाई से बनी 'हवेलियां' मैने ढहती देखीं हैं', मां के इन्हीं अल्फाजों ने दबंग एनकाउंटर-स्पेशलिस्ट बेटे को 'कर्जदार' तो बनाया, मगर पुलिस की नौकरी में जिंदगी भर 'खैरात' कुबूल नहीं करने दी!'

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