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पड़ताल: जिस अपराधी ने ली थी कल्याण सिंह की सुपारी, गर्लफ्रेंड के चक्कर में हुआ था एनकाउंटर

पुलिस जब-जब सब्र और समझदारी से काम लेती है, उसका ‘शिकार’ खुद अपने बुने जाल में ही आ फंसता है. 20 साल पहले यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने भी ऐसा ही किया था.

Updated On: May 10, 2018 05:08 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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पड़ताल: जिस अपराधी ने ली थी कल्याण सिंह की सुपारी, गर्लफ्रेंड के चक्कर में हुआ था एनकाउंटर
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पुलिस जब-जब सब्र और समझदारी से काम लेती है, उसका ‘शिकार’ खुद अपने बुने जाल में ही आ फंसता है. 20 साल पहले यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने भी ऐसा ही किया था. अपने जमाने में हिंदुस्तान के सबसे महंगे शार्प-शूटर ‘सुपारी-किलर’ का नाम अपराध के पन्नों से फाड़कर फेंकने के लिए. ‘पड़ताल’ की इस कड़ी में हम उस पुलिस एनकाउंटर का जिक्र उन्हीं आला पुलिस अफसरों की मुंहजुबानी कर रहे हैं, जो 1990 के दशक में देश के किसी राज्य की पुलिस के लिए सबसे महंगा (खर्चीला) और खून-खराबे के बाद भी ‘बेदाग एनकाउंटर’ साबित हुआ था.

1990 के दशक में जिसके नाम से ख़ौफ में थी खाकी

1997-98 में उत्तर प्रदेश में एक ही नाम का कोहराम मचा था...वह नाम था अपराध की दुनिया में तूफान की गति से सामने आ रहा 25-26 साल का शार्प-शूटर पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का ‘सुपारी किलर’ श्रीप्रकाश शुक्ला. श्रीप्रकाश और उसके पास मौजूद एके-47 से खाकी खौफ खाने लगी थी. श्रीप्रकाश खुलेआम एके-47 राइफल का इस्तेमाल करके भीड़ भरे बाजारों में यूपी की खाकी पर ठहाके लगा रहा था. बेबस उत्तर प्रदेश पुलिस उन ठहाकों को सुनने को मजबूर थी.

मालामाल श्रीप्रकाश, बेहाल लखनऊ की पब्लिक-पुलिस

‘मैं उन दिनों यूपी पीएसी में एडिश्नल डायरेक्टर जनरल पद पर नियुक्त था. एक दिन सीतापुर से लखनऊ लौटा. तो पता चला कि, श्रीप्रकाश शुक्ला ने हजरतगंज से स्टेशन की ओर जाने वाले रोड पर स्थित दिलीप होटल में घुसकर दो लोगों को गोलियों से भून डाला है. इस घटना के दो-तीन दिन बाद लखनऊ में ही श्रीप्रकाश ने एक दवा व्यापारी की गोली मारकर हत्या कर दी. साथ ही एक करोड़ की फिरौती के लिए उसके बेटे का अपहरण कर लिया. बेटा बाद में मोकामा (बिहार) से रिहा करा लिया गया. यह बात है जून-जुलाई 1998 की.’ बताते हैं 1966 बैच के पूर्व आईपीएस दिल्ली के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल अजय राज शर्मा. अजय राज शर्मा ही भारत के किसी राज्य की पुलिस में (यूपी पुलिस) सबसे पहले स्पेशल टास्क फोर्स के जन्मदाता भी रहे हैं.

इसलिए खौल उठा था लखनऊ पुलिस का खून

arun kumar

‘मैं उन दिनों लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) था. खून तो हम लोगों का उस दिन और खौल उठा जब, दिन-दहाड़े जनपथ मार्केट (लखनऊ) में हमारे (उत्तर प्रदेश पुलिस) दारोगा आर.के. सिंह की श्रीप्रकाश शुक्ला ने गोली मारकर हत्या कर दी. दारोगा आर.के. सिंह की हत्या हमारे लिए नाकाबिले बरदाश्त थी.’ बताते हैं 1985 बैच के आईपीएस लखनऊ में उस समय एसएसपी रहे और फिर यूपी एसटीएफ के पहले एसएसपी बने अरुण कुमार. वर्तमान में अरुण कुमार सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ हेडक्वार्टर दिल्ली) मुख्यालय में स्पेशल डायरेक्टर जनरल हैं.

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बकौल अरुण कुमार- ‘16-17 साल की उम्र में ही गोरखपुर में बहन से छेड़खानी करने वाले को श्रीप्रकाश ने मार डाला था. अरेस्ट होकर जेल गया. जेल से बाहर आया तो 18-19 साल का वही श्रीप्रकाश खूंखार हो चुका था.’

ऐसे बना देश का सबसे महंगा करोड़पति सुपारी किलर

अजय राज शर्मा के मुताबिक, ‘श्रीप्रकाश ने यूपी पुलिस की नींद तो तब उड़ा दी जब, उसने उस समय सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (अब राजस्थान के राज्यपाल) की हत्या का ठेका (सुपारी) ले लिया. सीएम की हत्या का सौदा तय हुआ था 5 करोड़ में. इसी के साथ गोरखपुर का नौसिखिया शार्प-शूटर देश का ‘करोड़पति सुपारी-किलर’ और यूपी पुलिस के लिए ‘चुनौती’ बन गया.’ एसटीएफ के जन्म और श्रीप्रकाश की दिल दहला देने वाली मौत की सच्चाई बयान करते हुए बताते हैं अजय राज शर्मा.

सीएम ने किलरका इलाज पूछा, डीजी ने अजयराजबता दिया

‘चीफ मिनिस्टर कल्याण सिंह ने पुलिस महानिदेशक कन्हैया लाल गुप्ता से श्रीप्रकाश शुक्ला को काबू करने का इलाज पूछा. जबाब में डीजी कन्हैया लाल गुप्ता ने सीएम को मेरा नाम (अजय राज शर्मा) बता दिया.’ बेसाख्ता हंसते हुए बताते हैं एसटीएफ के जन्मदाता अजय राज शर्मा. श्रीप्रकाश शुक्ला एनकाउंटर की यादों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं देश के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक अजय राज शर्मा, ‘मैंने श्रीप्रकाश को ‘ठंडा’ करने का प्लान चीफ मिनिस्टर को बताया. जिसे सुनकर मुख्यमंत्री भी हिल गए. सीएम के परेशान होने की दो वजह थीं. पहली वजह, प्लान करोड़ों का यानी बहुत खर्चीला और दूसरी वजह जोखिम भरा था. प्लान मगर था अद्भूत और अभेद्ध.

सीएम की हठ ने मेरे महंगे प्लानको अंजाम तक पहुंचाया

प्लान के तहत अजय राज शर्मा ने चीफ मिनिस्टर से एसटीएफ के लिए मांग की दस टाटा सूमो सफेद गाड़ियां. मनपसंद एक आईजी 1976 बैच के आईपीएस विक्रम सिंह, जो बाद में यूपी पुलिस महानिदेशक भी बने, एक एसएसपी (उस वक्त लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक 1985 बैच के आईपीएस और मौजूदा समय में सीमा सुरक्षा बल मुख्यालय दिल्ली में स्पेशल डायरेक्टर जनरल) अरुण कुमार, एक एसपी, 4 डिप्टी एसपी, 10 इंस्पेक्टर, 10 सब-इंस्पेक्टर सहित करीब 50 पुलिसकर्मी. करीब 25 एके-47 राइफल. खर्चीला प्लान होने के बाद भी, अपराध की किताबों से श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी का हर पन्ना फड़वाने की हठ किए बैठे मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने तुरंत ‘हां’ कर दी.’ बताते हैं अजय राज शर्मा. यहां उल्लेखनीय है कि, भारत में किसी राज्य की पुलिस और किसी पुलिस अधिकारी ने टाटा सूमो अगर सबसे पहले पुलिस बेड़े में शामिल कीं, वह थी यूपी पुलिस में नई-नई जन्मी एसटीएफ और आईपीएस अजय राज शर्मा.

डीजी साहब बोले पुलिस के भीतर पुलिसबना डाली!

‘मुख्यमंत्री की सहमति से मैंने ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ बना ली. एसटीएफ का चीफ मैं खुद बना. एसटीएफ का ‘ब्लू-प्रिंट’ देखते ही पुलिस महानिदेशक कन्हैया लाल गुप्ता मुझसे बोले- ‘तुमने तो पुलिस के भीतर एक और ‘पुलिस’ बना डाली!’ मैंने कहा, परेशान मत होइए. पुलिस के भीतर बनी यही पुलिस (स्पेशल टास्क फोर्स) बड़े और असली काम करेगी. आप सब्र कीजिए और हमारा साथ दीजिए.’ 20 साल पहले जन्मी एसटीएफ की यादों में खोए हुए बताते हैं दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा.

सीएम बोले कब तक पकड़ोगे? मैं बोला गोलियांबरसेंगीं!

पूर्व आईपीएस और यूपी पुलिस में स्पेशल टास्क फोर्स के जन्मदाता अजय राज शर्मा (फोडो सौजन्य अशोक सक्सेना दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी)

पूर्व आईपीएस और यूपी पुलिस में स्पेशल टास्क फोर्स के जन्मदाता अजय राज शर्मा

‘एसटीएफ की खुद मॉनिटरिंग कर रहे मुख्यमंत्री ने एक दिन मुझसे पूछा, ‘श्रीप्रकाश शुक्ला को कब तक पकड़ लोगे?’ मैंने कहा, ‘बहुत खतरनाक है वो. उसे पकड़ने की बात करना बेमानी सा होगा. आमना-सामना होने पर श्रीप्रकाश शुक्ला एके-47 राइफल से पुलिस पर गोलियां बरसाने में शरमाएगा नहीं. मैंने एसटीएफ भी सिर्फ गोलियां झोंकने के लिए ही गठित की है. विश्वास रखिए मुझ पर. आपको मैं 30 सितंबर (1998) से पहले अच्छी खबर देने की कोशिश करुंगा.’ बेबाकी से बताते हैं यूपी कैडर के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पूर्व आईपीएस अजय राज शर्मा.

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श्रीप्रकाश की ‘मौत’ यूपी एसटीएफ के लिए ‘वरदान’ बनी बकौल आईपीएस अरुण कुमार, ‘जब श्रीप्रकाश शुक्ला एके-47 राइफल, पेजर और मोबाइल यूज कर रहा था, उस वक्त पुलिस में शायद ही किसी ने एके-47 राइफल जैसा स्वचालित हाथियार कभी चलाकर देखा हो. मोबाइल महकमे में थे मगर गिने-चुने. लिहाजा मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि, श्रीप्रकाश, पुलिस से कहीं ज्यादा तेज रफ्तार दौड़ने वाला क्रिमिनल था. हां यह जरूर है कि, अगर श्रीप्रकाश शुक्ला कोहराम न मचाता तो, शायद यूपी पुलिस क्या? हिंदुस्तान में किसी भी राज्य की पुलिस में एसटीएफ की परिकल्पना नहीं बनती. जैसा की उस जमाने में अजय राज शर्मा साहब ने सोचा. श्रीप्रकाश शुक्ला एनकाउंटर में ‘सूत्रधार’ की भूमिका में रहे एसटीएफ के पहले एसएसपी अरुण कुमार बताते हैं कि, ‘श्रीप्रकाश शुक्ला के ठिकाने लगने के बाद, वही ‘एसटीएफ फॉर्मूला’ यूपी और तमाम अन्य राज्यों की पुलिस की रीढ़ की हड्डी साबित होकर देश की पुलिस के लिए एक नजीर बना.’

गर्लफ्रेंड और मोबाइल ने श्रीप्रकाश शुक्ला ठंडाकराया

पूर्व एसटीएफ चीफ के मुताबिक, ‘तय हुआ कि 30 सितंबर 1998 तक श्रीप्रकाश को एसटीएफ घेर लेगी. जैसे ही हमने उसका मोबाइल इंटरसेप्ट करना शुरू किया वो, स्पेशल टास्क फोर्स के करीब आता गया. वजह थी श्रीप्रकाश का मोबाइल पर गर्लफ्रेंड से घंटों बात करना. और रहीसों से मोटी ‘रंगदारी’ वसूलने के लिए उसका फोन पर घंटों बातचीत करना.’ उन दोनों के मुताबिक श्रीप्रकाश और एसटीएफ के बीच अगर लड़की (श्रीप्रकाश की गर्लफ्रेंड) न आई होती, तो एसटीएफ को पता नहीं कितने और पापड़ बेलने पड़ते.

अजय राज-अरुण कुमार हैं कोई जो पैसे से सेट नहीं होंगे

‘श्रीप्रकाश शुक्ला का मोबाइल सर्विलांस पर लगा रखा था. श्रीप्रकाश की बातचीत अरुण कुमार और बाकी एसटीएफ टीम भी सुन रही थी. श्रीप्रकाश एक दिन मोबाइल पर किसी से कह रहा था कि, एसटीएफ में यह कोई अजय राज और अरुण कुमार हैं. दोनों ही पैसे से सेट नहीं हो पाएंगे. इनका कुछ इलाज ही करना पड़ेगा.’ बताते हुए अजय राज शर्मा जोर से हंस पड़ते हैं. आगे बताते हैं कि, ‘इस बातचीत को सुनने के बाद अरुण ने मुझे (अजय राज शर्मा) सतर्क हो जाने का मशविरा दिया था. कहा था सर कहीं यह लोग (श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग) मौका पाकर आपसे न उलझ जाएं.’

श्रीप्रकाश की पीठ देख उम्मीद जागी कल चेहरा देख लेंगे

‘सितंबर 1998 की रात थी. ग्यारह बज चुके थे. लखनऊ में मैं अपने सरकारी आवास पर सोने की तैयारी में था. घर पर मेरे परिचित डॉक्टर एक बिल्डर के साथ पहुंचे. श्रीप्रकाश उस बिल्डर से मोबाइल पर करोड़ों की ‘रंगदारी’ मांग रहा था. रात में ही अरुण को (एसटीएफ एसएसपी अरुण कुमार) मैंने घर बुलाया. अरुण कुमार ने बताया ‘इसके बाद लखनऊ में एसटीएफ ने पहली बार श्रीप्रकाश को घेरा भी, लेकिन वो भाग गया. ‘उस दिन उसके भाग जाने से हम हताश नहीं हुए. हमारी हिम्मत बढ़ी कि, चलो आज श्रीप्रकाश की पीठ देखी है. किस्मत ने साथ दिया तो आने वाले कल आमना-सामना होने पर उसका चेहरा भी देख सकेंगे.’

सुपारी किलर यूपी का, बुरे दिन दिल्ली में शुरू हुए

पीछा करते-करते अगले ही दिन 21-22 सितंबर 1998 को एसटीएफ दिल्ली पहुंच गई. एसटीएफ टीम के पीछे-पीछे हवाई जहाज से अजय राज शर्मा भी दिल्ली जा पहुंचे. बकौल अजय राज शर्मा, ‘श्रीप्रकाश की दिल्ली में मौजूदगी को लेकर मैंने उस समय दिल्ली के पुलिस कमिश्नर वीरेंद्र नारायण सिंह से बात की. 21- 22 सितंबर 1998 को श्रीप्रकाश को दिल्ली से गोरखपुर गर्लफ्रेंड से मिलने जाना था. दिल्ली पुलिस और यूपी पुलिस की एसटीएफ दिल्ली हवाई अड्डे पर श्रीप्रकाश को दबोचने की उम्मीद पाले घंटों डटी रही.

जबकि श्रीप्रकाश घर में आराम से सोता रहा. लिहाजा फ्लाइट छूटने के कारण उस दिन वो गोरखपुर नहीं जा सका. दिल्ली पुलिस कमिश्नर वीएन सिंह ने तुरंत दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) राजवीर सिंह (राजवीर की सन् 2008 में दिल्ली से सटे हरियाणा के गुड़गांव (अब गुरुग्रम) में संदिग्ध हालातों में गोली मारकर हत्या कर दी गई) को हमारी एसटीएफ के साथ जोड़ दिया.’ खतरनाक और खूनी श्रीप्रकाश शुक्ला के दिल दहला देने वाले अंत के ‘पड़ताल’ की फाइलों में झांकते हुए अजय राज शर्मा के भीतर एक नई ऊर्जा सी आ जाती है.

शार्प शूटर श्रीप्रकाश की जिंदगी का वो आखिरी दिन

यूपी एसटीएफ के पहले आईजी पूर्व आईपीएस विक्रम सिंह

यूपी एसटीएफ के पहले आईजी पूर्व आईपीएस विक्रम सिंह

‘23 सितंबर 1998 को हम लोग दिल्ली से ही श्रीप्रकाश के पीछे लग गए. वो तीन-चार दिन से नीले रंग की ही सियलो कार में दिल्ली और आसपास के इलाके में घूम रहा था. दोपहर बाद यूपी एसटीएफ ने दिल्ली से सटे गाजियाबाद के वसुंधरा-इंदिरापुरम इलाके में श्रीप्रकाश शुक्ला को दो गुर्गों सहित गोलियों से भूनकर आगे-पीछे का सब हिसाब बराबर कर लिया हमने.’ बताते हैं यूपी एसटीएफ के पूर्व एसएसपी और अब सीमा सुरक्षा बल के विशेष महानिदेशक आईपीएस अरुण कुमार.

एसटीएफ क्या बला है? जानने को उत्सुक था मीडिया

बकौल अजय राज शर्मा, ‘मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को हमेशा के लिए ‘शांत’ करने के बाद आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय में यूपी एसटीएफ और दिल्ली पुलिस कमिश्नर की संयुक्त प्रेस-कॉन्फ्रेंस हुई. प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद पत्रकारों की भीड़ की उत्सुकता श्रीप्रकाश से ज्यादा यह जानने में थी कि आखिर यह एसटीएफ चीज क्या है? क्योंकि तब तक भारत में किसी भी राज्य की पुलिस के पास ‘एसटीएफ’ के जैसे किसी हैरतंगेज चिराग का उदय (जन्म) नहीं हुआ था, जिसकी तेज रोशनी सिर्फ खूंखार अपराधियों की ही जिंदगी और आंखों में ‘धुप्प अंधेरा’ फैलाने के लिए ही जलाई गई थी.’

श्रीप्रकाश के ढेरहोने से यूपी एसटीएफ मशहूर हो गई

श्रीप्रकाश शुक्ला एनकाउंटर के प्रमुख ‘पड़ताली’ अजय राज शर्मा बताते हैं कि, ‘जिस श्रीप्रकाश शुक्ला के लिए एसटीएफ बनी थी. उसे मारने के बाद ही उस एसटीएफ को शोहरत मिली. वरना हिंदुस्तान की पुलिस में एसटीएफ शब्द ही कोई नहीं जानता था. श्रीप्रकाश के निपटने के बाद तो मानो पुलिस में ‘एसटीएफ’ ही ‘असली-पुलिस’ बनकर रह गई. बाद में हर राज्य की पुलिस ने एसटीएफ का गठन किया. मुझ जैसे एक साधारण से आईपीएस के लिए पुलिस सेवा में भला इससे बड़ा इनाम-इकराम और क्या हो सकता है?’ सवाल करते हैं अजय राज शर्मा.

वो सवाल जो आज भी विक्रम सिंह मुझसे पूछते हैं...

‘मेरे साथ एसटीएफ में पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) रहे विक्रम सिंह अक्सर एक सवाल मुझसे करते रहे, कि मैंने चीफ मिनिस्टर को 30 सितंबर 1998 तक श्रीप्रकाश को घेर लेने का वायदा किस आधार पर कर दिया था? और फिर किए गए वायदे से 6-7 दिन पहले ही 23 सितंबर 1998 को श्रीप्रकाश ढेर भी कर दिया? आखिर कैसे? मैं तो बस यही कहूंगा कि, मेरी जुबान पर सरस्वती बैठी थी और ईश्वर एसटीएफ की मदद कर रहा था.’ बताते हैं अजयराज शर्मा.

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जबकि उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह जोर से हंस पड़ते हैं, बकौल विक्रम सिंह, ‘अजय राज साहब ने जब श्रीप्रकाश जैसे खूंखार क्रिमिनल को तय तारीख तक घेर लेने का वायदा सीएम के सामने कर दिया तो, मैं क्या पूरी टीम चोरी-छिपे हंस रही थी. पूरी एसटीएफ हैरत में थी. यह सोचकर कि, श्रीप्रकाश का हमारे पास दूर-दूर तक अता पता नहीं है. और एसटीएफ चीफ (अजय राज शर्मा), श्रीप्रकाश से निपट लेने का ‘टाइम बाउंड’ वायदा चीफ मिनिस्टर से कर आए हैं. हां आज कह सकता हूं कि, सितंबर 1998 में एसटीएफ के साथ ईश्वर और अजय राज साहब का जज्बा ही था, जिसने एसटीएफ से श्रीप्रकाश को निपटवाकर हमें (एसटीएफ) पुलिस की भीड़ से हटकर अलग मुकाम दिया.’

कहानियां जो कभी लिखी नहीं गईं, सुनीं मगर सबने!

कहा जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला मारे जाने से कुछ महीने पहले कई महीने तक नोएडा सेक्टर 27 स्थित गवर्मेंट फ्लैट्स के आसपास एक कोठी में भी बतौर किराएदार रहा. जिस फ्लैट में श्रीप्रकाश किरायेदार बनकर रहा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) गौतमबुद्धनगर का कैंप कार्यालय उससे चंद कदम की दूरी पर ही मौजूद था. नोएडा पुलिस उस फ्लैट पर जब तक पहुंची श्रीप्रकाश रफूचक्कर हो चुका था.

दूसरी कहानी के मुताबिक, यूपी एसटीएफ को पता चल चुका था कि, श्रीप्रकाश दिल्ली के भीकाजी कामा पैलेस और ग्रेटर कैलाश एम-ब्लॉक में घूम रहा है. ग्रेटर कैलाश एम ब्लॉक मार्केट के ही तमाम पब्लिक टेलीफोन बूथों (एसटीडी बूथ) से वो गर्लफ्रेंड और बाकी तमाम नेटवर्क को फोन करता था. हर टेलीफोन बूथ का चिट्ठा एसटीएफ की जेब में था.

कहा तो यह भी जाता है कि, यूपी एसटीएफ ने (एनकाउंटर से दो-तीन दिन पहले) श्रीप्रकाश को ग्रेटर कैलाश के ही बूथ से काफी देर तक टेलीफोन पर लंबी बात करते हुए अपनी आंखों से जीभरकर देखा. जबकि बूथ के पास में ही नीले रंग की सियलो कार में उसके दो साथी (इनमें एक बदमाश यूपी पुलिस के एक दारोगा का बेटा निवासी जमुनीपुर कोटवा थाना सराय इनायत जिला इलाहाबाद और एक गोरखपुर का बदमाश बैठे थे, बाद में उसी सियलो कार में 23 सितंबर 1998 को दोपहर के वक्त श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर हुआ) मौजूद थे.

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