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हमारे राष्ट्रपति: वाइस चांसलरी के लिए सिर्फ 80 रुपए लेते थे जाकिर हुसैन

1967 में डॉ. जाकिर हुसैन के रूप में पहली बार अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति इस आसन तक पहुंचा था

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jun 27, 2017 01:26 PM IST

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हमारे राष्ट्रपति: वाइस चांसलरी के लिए सिर्फ 80 रुपए लेते थे जाकिर हुसैन

कहा जाता है कि इतिहास अपने को दोहराता है पर संयोग के बारे में ऐसी बात सुनने में नहीं आती. अचरज कहिए कि इस बार राष्ट्रपति पद के चुनाव में एक संयोग थोड़े से हेर-फेर के साथ अपने को दोहरा रहा है और इस संयोग का रिश्ता प्राचीन लिच्छवी गणतंत्र की धरती रही बिहार से है.

संयोगों का सिलसिला

आज जैसे बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को सत्ताधारी दल ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है वैसे ही 1967 के मई महीने में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में तब के सत्ताधारी दल कांग्रेस ने बिहार के राज्यपाल (1957-1962) रह चुके डॉ. जाकिर हुसैन को अपना उम्मीदवार बनाया था.

जैसे आज विपक्षी दलों ने अपना साझा का उम्मीदवार लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार के रूप में खड़ा किया है वैसे ही तब विपक्ष के साझे के उम्मीदवार थे सुप्रीम कोर्ट के नौवें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस कोका सुब्बाराव जिन्होंने मशहूर गोलकनाथ मामले फैसला सुनाया कि संसद संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती.

शायद एक संयोग और घटे – 1967 के चुनाव में कानून के महारथी जस्टिस सुब्बाराव अर्थशास्त्र के डॉक्टरेट डॉ. जाकिर हुसैन से चुनाव में हार गए थे और चूंकि आंकड़ों का गणित इस बार भी सत्ताधारी दल के उम्मीदवार के ही पक्ष में है सो बहुत संभव है ‘कानून की पढ़ाई करके कोर्ट ना गईं’ मीरा कुमार कानून की प्रैक्टिस कर चुके रामनाथ कोविंद से चुनाव हार जाएं.

एकतरफा रहे थे 1967 से पहले के चुनावी मुकाबले

zakir hussian

हां, देखने वाली बात यह होगी कि मुकाबला एकतरफा रहता है या नहीं क्योंकि 1967 में डॉ. जाकिर हुसैन और जस्टिस सुब्बाराव के बीच मुकाबला एकतरफा ना था. डॉ. जाकिर हुसैन को 4 लाख 71 हजार वोट मिले थे और जस्टिस सुब्बाराव को 3 लाख 63 हजार.

इस मुकाबले से पहले राष्ट्रपति के पद के चुनाव के सारे मुकाबले एकतरफा ही रहे. 1962 में डॉ. राधाकृष्णन को 4 लाख 59 हजार वोट मिले तो उनके प्रतिद्वन्द्वी चौधरी हरिराम को बस 6341 वोट. यही चौधरी हरिराम 1957 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मुकाबले भी राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी थे. तब हरिराम को और भी कम (2672) वोट मिले थे.

हां, 1952 के राष्ट्रपति पद के चुनावी मुकाबले में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को चुनौती देने वाले प्रत्याशी को जरुर वोटों के सम्मानजनक आंकड़े तक पहुंचने में कामयाबी मिली थी. उस वक्त डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मुकाबले के लिए चुनावी मैदान में थे लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से पढ़े और समाजवादी सोच के प्रो. के.टी शाह. उन्हें कुल 92827 वोट मिले थे यानी देश के पहले राष्ट्रपति की तुलना में तकरीबन पांच गुना कम.

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि के. टी शाह ने संविधान-सभा में बिहार की नुमाइंदगी की थी और उसी वक्त उनकी कोशिश थी कि संविधान में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द आ जाए लेकिन संविधान बनाने वाली प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप डॉ. अंबेडकर ने प्रो. शाह के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था.

अगर रामनाथ कोविंद चुनाव जीतते हैं तो वे हमारे गणतंत्र के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठने वाले दलित समुदाय के दूसरे व्यक्ति होंगे, 1967 में डॉ. जाकिर हुसैन के रूप में पहली बार अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति इस आसन तक पहुंचा था.

देश की आजादी के बाद डॉ. जाकिर हुसैन की सियासी जिंदगी में राष्ट्पति के पद तक पहुंचने तक घटनाएं तेजी से घटीं. 1948 से 1956 तक वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे. कार्यकाल पूरा करने के तुरंत बाद राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए और एक साल बाद बिहार के राज्यपाल का पद संभाला.

1962 में उप-राष्ट्रपति बने तो इसके पांच साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए लेकिन भारतीय गणतंत्र के सबसे ऊंचे आसन पर रहकर बस दो साल तक ही देश को अपनी सेवाएं दे पाए थे कि काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया.

इस तरह एक संयोग और घटित हुआ- डॉ. जाकिर हुसैन पहले राष्ट्रपति थे जो मृत्यु के कारण अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए.

जामिया का जिक्र जाकिर हुसैन के बगैर अधूरा है

देश की आजादी के बाद के वक्त में डॉ. जाकिर हुसैन की जिंदगी में घटनाएं बहुत तेजी से घटी थीं लेकिन ठीक इसका उलटा हुआ था उनके के साथ आजादी से पहले के वक्त में. तब वक्त जैसे उनके लिए ठहर-सा गया था. अपने जिंदगी के दो दशक लगातार उन्होंने आधुनिक शिक्षा के एक संस्थान को दे दिए ताकि देश में आगे की पीढ़ियां रोशनख्याल जिंदगी जी सकें.

आज इस संस्थान को जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम जाना जाता है लेकिन अपनी स्थापना के वक्त (29 अक्तूबर 1920) इसका नाम नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी था और इस संस्थान की कल्पना डॉ. जाकिर हुसैन के बगैर नहीं की जा सकती.

बेशक मौलाना मौलाना अबुल कलाम आजाद, अली बंधु (मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली) और हकीम अजमल की कोशिशों से अलीगढ़ में इसकी नींव (1920) पड़ी थी लेकिन दिल्ली के करोलबाग से आज के ओखला तक के इसके सफर को डॉ. जाकिर हुसैन के जिक्र के बगैर समझना असंभव है.

वो फाकामस्ती के दिन और 80 रुपए की वाइस-चांसलरी

वह 1920 का वक्त था और महात्मा गांधी जानते थे कि आजादी के आंदोलन को एक व्यापक आधार देना जरुरी है. देश के मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों के विरुद्ध दो अलग-अलग रुझानों के लोग संघर्ष कर रहे थे.

कुछ की सोच थी कि अंग्रेजी राज इस्लाम विरोधी है, सो उसका हरचंद विरोध होना चाहिए जबकि कुछ पश्चिमी शिक्षा प्राप्त नवयुवक थे और बिल्कुल लोकतांत्रिक मिजाज से सोचते थे कि अंग्रेजों ने भारत को नाहक ही उपनिवेश बना रखा है, एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भारतीयों को अपने फैसले खुद करने का अख्तियार है.

मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों की मुखालफत करने वाला यह दोनों तबका गांधी की तरफ मुड़ा और गांधी ने इस मौके को अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में तब्दील कर दिया. गांधी के आह्वान था कि लोग अंग्रेजी राज के बनाये स्कूल-कॉलेज को छोड़ें, अंग्रेजियत की सीख से अपने दिमाग को धो डालें.

उनके आह्वान के असर में जिन छात्रों और शिक्षकों ने नौकरी या पढ़ाई छोड़ी उनमें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक छात्र जाकिर हुसैन भी थे. खिलाफत आंदोलन और अंग्रेजों से असहयोग की रणनीति से उभरे जन-ज्वार को स्थायी रूप देने के लिए जाकिर हुसैन जैसे कई छात्रों और विद्वानों के एक समूह ने नए तर्ज के तालीम का एक संस्थान बनाने का फैसला लिया. वही संस्थान आज जामिया मिलिया इस्लामिया कहलाता है लेकिन आज के रूप तक आने से पहले उसे अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ी.

एक तरफ सियासी संकट थे तो दूसरी तरफ आर्थिक मजबूरी. एक तो इस शिक्षा संस्थान के छात्रों और शिक्षकों ने सारे देश में चल रहे सत्याग्रह में हिस्सेदारी की और अंग्रेजों की जेल में बंद किए गए. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इस्लामी धारा इस विश्वविद्यालय को अपने वजूद के लिए खतरे की तरह देख रही थी.

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तुर्की के मुस्तफा कमाल पाशा ने 1924 में खिलाफत का खात्मा कर दिया और इससे पहले 1922 में गांधीजी भी असहयोग-आंदोलन वापस ले चुके थे. संस्थान के आगे चुनौती यह थी कि वो अपने को चलाए-बनाए रखे तो किस आधार पर. आर्थिक संकट अलग से थे. खिलाफत के जरिए मिलने वाली आर्थिक मदद खत्म हो चुकी थी. लेकिन गांधी डटे रहे, कहा कि विश्वविद्यालय चलेगा चाहे उसके लिए लोगों से भीख ही क्यों ना मांगनी पड़े.

ऐसे ही संकल्प के साथ जामिया अलीगढ़ से दिल्ली के करोलबाग में आया, कुछ दिनों तक संस्थान को स्वदेशी शिक्षा के पैरोकार हकीम अजमल खां का सहारा रहा, वे संस्था के सह-संस्थापक और पहले वाइस चांसलर भी थे लेकिन उनकी मौत के बाद सवाल खड़ा हुआ कि आखिर ऐसा कौन है जो जामिया मिलिया को बचाने के लिए अपनी जिंदगी होम कर सके.

संकट के ऐसे ही वक्त में बर्लिन में इकॉनॉमिक्स में पीएच.डी कर रहे जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया को चलाने का दायित्व अपने कंधे पर लेना (1925) स्वीकार किया. तय हुआ कि 150 रुपए की तनख्वाह पर वे जामिया का काम संभालेंगे लेकिन 1928 यानी हकीम अजमल खां की मौत के बाद उन्होंने अपनी तनख्वाह घटाकर 80 रुपए महीना कर ली.

जाकिर हुसैन की जिंदगी के इक्कीस साल इस संस्था को जिलाए रखने में लगे और यह उन्हीं के काबिल नेतृत्व की कामयाबी कही जाएगी जो रबीन्द्र नाथ टैगोर ने इस विश्वविद्यालय को ‘भारत के सबसे प्रगतिशील शिक्षा संस्थानों में एक’ करार दिया था.

जामिया को दिए इन 21 सालों ने ही जाकिर हुसैन को एक महान शिक्षाप्रेमी की शख्सियत अता की बल्कि यह कहना ठीक होगा कि जिन बातों को वे अपने बचपन से महसूस करते आ रहे थे, उन्हें जिंदगी के अमल और उसूल के रूप में साकार करना उनके लिए संघर्ष के इन सालों में संभव हो सका.

एक महान शिक्षाविद्

इटावा के हाईस्कूल से शुरुआती पढ़ाई की थी जाकिर हुसैन ने और इसी वक्त जब आठवीं जमात में थे तो सबक के रूप में छात्र-जीवन पर एक लेख मिला लिखने को. किशोर उम्र के जाकिर हुसैन ने उसमें लिखा था- ‘छात्र का काम है कि अपने सारे पूर्वाग्रहों और वहमों से ऊपर उठे, अच्छी आदत पाले. उसका फर्ज बनता है कि वह अपने अनपढ़ बंधु-बांधवों को पढ़ाए और उनकी पढ़ाई को अपनी पढ़ाई का ही हिस्सा माने. उसे इल्म की खातिर इल्म हासिल करना चाहिए और जिंदगी की जरुरतों का भी ख्याल रखना चाहिए.’

आठवीं क्लास के लेख का यही हिस्सा आगे चलकर उनकी जिंदगी के उसूल में तब्दील हुआ. महात्मा गांधी के बुनियादी तालीम की वर्धा वाली योजना का सिपहसालार डॉ. जाकिर हुसैन ही साबित हुए. बुनियादी तालीम के लिए 1937 में बनी समिति के अध्यक्ष थे डॉ. जाकिर हुसैन और कहते हैं कि बुनियादी तालीम की योजना को साकार करने की धुन में ही उनकी सेहत खराब हुई थी.

जुड़ाव चाहे बुनियादी तालीम की योजना से रहा हो या फिर जामिया मिलिया से लेकिन इस जुड़ाव के पीछे उनका यह विश्वास काम कर रहा था कि किताबी पढ़ाई से ज्ञान हासिल नहीं होता.

वे कहते थे बहुत दिनों के गौर-ओ-फिक्र के बाद, ‘इस विश्वास तक पहुंचा हूं कि सिर्फ काम के जरिए ही शिक्षा हासिल की जा सकती है. हां, यह काम हाथ से किया जाना वाला हो सकता है तो कभी हाथ से ना किया जाने वाला भी. हालांकि सिर्फ काम के जरिए ही शिक्षा हासिल हो सकती है लेकिन बहुत अनुभव और प्रयोग के बाद मैं इस विश्वास पर भी पहुंचा हूं कि हर काम शिक्षा देने वाला नहीं होता.’

शिक्षा के बारे में अपने ख्याल के हिसाब से वक्त से बहुत आगे थे डॉ. जाकिर हुसैन. अचरज कीजिए कि भारत सरकार ने शिक्षा के अधिकार के तहत जो बातें स्कूल और शिक्षक के बारे में 21वीं सदी के पहले दशक में सोचने की हिम्मत दिखायी ठीक-ठीक वही बातें शिक्षाप्रेमी राष्ट्रपति 20वीं सदी की छठे दशक या फिर उसके भी बहुत पहले तीसरे-चौथे दशक में सोच रहे थे, उसपर अमल कर रहे थे.

उप-राष्ट्रपति पद पर रहते 25 नवंबर 1962 के दिन एक स्कूल के स्थापना दिवस के जलसे में तकरीर करते हुए उन्होंने कहा कि हर विद्यार्थी अपने मन-मिजाज से एकदम अनोखा होता है तो स्कूल का पहला काम है उसके मन-मिजाज को समझना, माहौल से हासिल उसके पसंद-नापसंद, काबिलियत और कमजोरियों की बेहतर समझ बनाना ताकि स्कूली सबक छात्र के व्यक्तित्व के हिसाब से तैयार किए जा सकें.

इसी क्रम में उन्होंने स्कूल और शिक्षक का दूसरा काम बच्चे के मन के विकास की अवस्था को देखते हुए स्कूली कार्यक्रम बनाने की बात कही. उन्होंने इस भाषण में खुद करने और इसी क्रम में सीखने की पद्धति की याद दिलाते हुए कहा कि ऐसी शिक्षा का उद्देश्य यह रहे कि छात्र का व्यक्तित्व तो निखरे ही, उसे अपने सामाजिक जिम्मेवारियों का बोध भी हो सके.

अगर आप शिक्षा के अधिकार कानून में शिक्षा, शिक्षक और स्कूल से पाली गई उम्मीदों से डॉ. जाकिर हुसैन के भाषण की इन बातों की तुलना करें तो पाएंगे कि दोनों में अद्भुत समानता है.

‘बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

‘हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है/ बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा’- शेर तो यह मीर तकी मीर का है लेकिन भारत के राष्ट्रपतियों में अगर किसी शख्सियत पर अपनी पूरे मायने में सच्चा उतरता है तो डॉ. जाकिर हुसैन पर!

ना उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अदने और अव्वल के बीच भेद किया ना निजी जिंदगी में. हर चीज और हर बात के अनोखेपन की पहचान रखने वाले डॉ. जाकिर हुसैन अगर एक तरफ इकॉनिमिक्स से डॉक्टरेट कर सकते थे तो उसी घड़ी गालिब के नायाब शेरों का संकलन भी तैयार कर सकते थे. वे बड़ों के लिए प्लेटो के रिपब्लिक उर्दू भाषा में अनुवाद कर सकते थे तो बच्चों के लिए कछुआ और खरगोश जैसी कहानी भी लिख सकते थे.

ग्रीस के शाह के हाथ से हासिल रंगीन पत्थर पर की गई महीन नक्काशी को देखकर घंटों मुग्ध हो सकते थे और राष्ट्रपति-भवन के माली के बच्चे को अपने हाथों पूरे जतन से कपड़ा सीलकर पहना सकते थे. सूफीयाना तबियत का मालिक यह इंसान अच्छाई को उसके हर रंग-रूप में पहचान और सराह सकता था, उसपर न्यौछावर हो सकता था.

ऐसे कई किस्से हैं जब उनके जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी लेकिन जामिया के वाइस चांसलर रहते अगर किसी ने कुछ मांग लिया तो दूसरों से उधार लेकर भी उसकी मांग का मान रखा.

राष्ट्रपति भवन का ही वाकया है- उन्हें हार्ट-अटैक आया था. डाक्टर की सलाह थी कि तबियत सुधरने पर कुछ टहलना जरुरी है लेकिन कुछ कदम टहल लेने के बाद आराम की भी हिदायत थी. डाक्टर और दो सहायकों के साथ मुगल-गार्डन में उन्होंने टहलना मंजूर किया. सहायकों ने देखा कि बुजुर्गवार टहल तो रहे हैं लेकिन सामने की कुर्सी पर बैठ नहीं रहे.

डाक्टर ने ऐतराज जताया कि महामहिम, ऐसी हालत में आराम की आपको सख्त जरुरत है फिर भी आप कुर्सी पर बैठे क्यों नहीं. डॉ. जाकिर हुसैन का जवाब था- ‘कैसे बैठता, कुर्सियां तीन हैं और हम चार! कोई मेरे सामने खड़ा रहे और मैं बैठ जाऊं यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’

बचपन में एक सूफी की संगत में रहे और ताउम्र हरएक की जिंदगी में उसी एक नूर को झलकता देखते रहे जिसके बारे में कहा गया है- ‘उसके फरोग-ए-हुस्न से झमके है सबमें नूर,शम्मे हरम हो या के दीया सोमनाथ का.’

हिंदुस्तानियत की इस बेनजीर मिसाल को देश जब भी याद करेगा गुजरी सदियों की सारी मीठी तहजीबें मुस्कुराएंगी.

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