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हमारे राष्ट्रपति: आर. वेंकटरमण सियासी संकट के वक्त का 'इमरजेंसी लाइट'

वेंकटरमण ने कहा था कि राजीव गांधी अनुभव की कमी के कारण बोफोर्स कांड से नहीं निपट पाए.

Updated On: Jul 05, 2017 05:01 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता हैं

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हमारे राष्ट्रपति: आर. वेंकटरमण सियासी संकट के वक्त का 'इमरजेंसी लाइट'

जिसके चाहने से आप राष्ट्रपति बने उसी प्रधानमंत्री का कुछ किया आपको अच्छा ना लगे- सोचिए कभी ऐसा हो तो क्या हो?

आप कहेंगे, ऐसा सोचना दिमाग की फिजूलखर्ची है क्योंकि संविधान का निर्देश तो बड़ा साफ है कि प्रधानमंत्री की सदारत में एक मंत्रिपरिषद होगी और राष्ट्रपति इनकी सलाह और सहायता से अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन करेंगे.

लेकिन अचरज कीजिए कि संविधान की ऐसी व्यवस्था के बावजूद अपने देश में दो बार ऐसा भी हुआ है जब प्रधानमंत्री का एक ना एक काम राष्ट्रपति को अच्छा नहीं लगा. राष्ट्रपति का यह अच्छा ना लगना अखबार की सुर्खियों में तब्दील हो गया.

प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति की तकरार

ऐसा एक वक्त आया था 1994 में. तब 15 अगस्त यानी हमारे आजादी के दिन के समारोह की तैयारियां चल रही थीं. इस मौके को भुनाने के खयाल से एक प्रकाशक ने गणतंत्र के एक पूर्व प्रधान के संस्मरणों की किताब के लोकार्पण की सोची. किताब के लोकार्पण का मौका एकबारगी सियासी नाटक में तब्दील हो गया.

इस किताब में स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जिक्र था और जिक्र से नाराज होकर कांग्रेस के एक सांसद सी के कुप्पुस्वामी लोकार्पण के जलसे में ही विरोध पर उतारू हो गए.

राजीव गांधी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रह चुके अंग्रेजी के प्रोफेसर और शेक्सपियर के नाटक के संवादों के सहारे अपनी बात कहने वाले के. के. तिवारी ने किताब के लेखक पूर्व राष्ट्रपति पर निहायत नागवार आरोप लगाए. तब के राज्यसभा के सदस्य एस. एस. अहलूवालिया ने तो यह तक कह दिया कि राजीव गांधी ने ही आपको राष्ट्रपति के पद तक पहुंचाया था लेकिन आप इस नेकी का बदला अपने नाशुकराने से चुका रहे हैं.

जिस किताब पर यह हंगामा खड़ा हुआ था उसका नाम था ‘माय प्रेसिडेंशियल इयर्स’ और संस्मरणों की इस किताब के लेखक थे पूर्व राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण. कांग्रेस के सदस्यों को यह दुख साल रहा था कि किताब ने स्व. राजीव गांधी की नेतृत्व-क्षमता पर सवाल उठाया है.

दरअसल, किताब के लोकार्पण से चंद रोज पहले एक टेलीविजन इंटरव्यू में देश के आठवें राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने कह दिया था कि संसदीय कामकाज के अनुभव की कमी के कारण राजीव गांधी बोफोर्स कांड के मसले से सही ढंग से नहीं निपट पाए.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रामास्वामी वेंकटरमण को प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कोई बात अच्छी नहीं लगी तो इसके बारे में उन्होंने अपना इजहार-ए-खयाल उस वक्त नहीं किया जब वे देश के सर्वोच्च पद पर थे. जो कहा वह रिटायरमेंट के बाद कहा यानी जब उनकी बात अकादमिक दिलचस्पी का विषय भर थी, किसी सरकार पर सीधे असर के लिहाज से बेमायने हो चुकी थी.

राजीव गांधी और जैल सिंह के रिश्तों की गांठ

लेकिन आर. वेंटकरमण के राष्ट्रपति बनने के तुरंत पहले ऐसी बात नहीं थी. आर. वेंकटरमण ने 25 जुलाई, 1987 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली और इस घड़ी तक प्रधानमंत्री राजीव गांधी से ज्ञानी जैल सिंह के तकरार के किस्से अखबारों में आम हो चुके थे.

Giani Zail SIngh

लेफ्टिनेंट जनरल (वेस्टर्न कमांड) पी.एन हूण की किताब 'द अनटोल्ड स्टोरी' में तो यह तक लिखा गया है कि ज्ञानी जैल सिंह के राष्ट्रपति पद पर रहते राजीव गांधी का तख्तापलट करने की कोशिश हुई थी. तख्तापलट को अंजाम देने के लिए तब अर्धसैन्य बल के तीन बटालियन दिल्ली रवाना हुए थे. यह बात राष्ट्रपति भी जानते थे और राजीव गांधी से नाराज कुछ और राजनेता भी.

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किताब ‘अनटोल्ड स्टोरी’ आपको बताती है कि 1984 के कत्ल-ए-आम के बाद जैल सिंह और राजीव गांधी के बीच विश्वास का रिश्ता नहीं रह गया था. वे नहीं मानते थे कि 1984 के दंगे के दोषियों की जांच राजीव गांधी निष्पक्षता से होने देंगे. दोनों के बीच अविश्वास इतना गहरा था कि जैल सिंह ने एक सभा में खुलेआम कहा कि मैं राजीव गांधी को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मानता हूं.

दूसरी तरफ राजीव गांधी को लगता था कि राष्ट्रपति के फोन से लेकर मुलाकातियों तक पर नजर रखना जरुरी है. इसके लिए उन्होंने जैल सिंह की जासूसी करवायी.

अब लेफ्टिनेंट जनरल की बातों में सच्चाई चाहे जितनी हो लेकिन उस वक्त के अखबार और पत्रिकाओं में यह जरूर छपा कि राजीव गांधी और ज्ञानी जैल सिंह के बीच सुलह की एक लंबी कोशिश हुई. 1987 मार्च महीने के आखिरी हफ्ते में दोनों के बीच 130 मिनट की लंबी बातचीत हुई.

राष्ट्रपति के पद को सियासत और विवादों से बचाकर रखे

इस बातचीत से पहले अखबारों में राजीव गांधी का यह बयान छप चुका था कि ‘हर नेकनीयत आदमी का फर्ज है कि वह राष्ट्रपति के पद को भेद पैदा करने वाली सियासत और विवादों से बचाकर रखे’. जवाब में जैल सिंह बता चुके थे कि 'दरअसल (राष्ट्रपति के पद) के राजनीतिकरण की शुरुआत सत्ताधारी दल के ही एक सदस्य ने अप्रैल, 1985 में की और उसे बाद में मंत्री भी बनाया गया.'

RajivGandhi

दोनों के बीच क्या बातचीत हुई होगी इसका हू-ब-हू ब्यौरा तो खैर कभी नहीं जाना जा सकता लेकिन इसे लेकर कयास खूब लगे. कहा जाता है कि इस बातचीत के बाद राजीव गांधी और ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति भवन से दोस्ताना भाव से बाहर निकले. मानो जताना चाह रहे हों कि रिश्तों के उलझाव की गांठ हमेशा के लिए सुलझा ली गई है. लेकिन एक पत्रिका ने लिखा कि दरअसल दोनों के बीच मामला पूरी तरह से सुलझा नहीं है क्योंकि दोनों ही ने अपनी-अपनी बात जायज ठहराने के लिए तर्क पूरी तरह तैयार कर रखे थे. पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक...

‘राजीव गांधी ने कहा कि मैं आपका (जैल सिंह) सम्मान करता हूं लेकिन हर मामले की आपको सूचना देना मेरे लिए जरूरी नहीं क्योंकि संविधान ऐसा करने के लिए मुझे बाध्य नहीं करता. मुझे लगता है कि राष्ट्रपति भवन से सूचनाएं लीक हुई हैं और अगर ठक्कर आयोग आयोग की रिपोर्ट की बातें लीक हुईं तो इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में चल रही अदालती कार्यवाही पर असर पड़ेगा.’

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पत्रिका की उस रिपोर्ट के मुताबिक ‘राजीव गांधी ने राष्ट्रपति से अपना यह एतराज भी जताया कि आप कांग्रेस से भीतरघात करने वाले नेताओं (वीपी सिंह?) और विपक्षी राजनेताओं से बहुत ज्यादा मेल-मुलाकात कर रहे हैं.’

राजीव गांधी के इन तर्कों के जवाब में राष्ट्रपति जैल सिंह ने कहा कि ‘अगर मैं कोई सूचना मांगू तो सरकार यह सूचना देने से इनकार नहीं कर सकती. उन्होंने खरे शब्दों में प्रधानमंत्री से कह दिया कि जहां तक सूचनाओं के लीक होने की बात है तो 1985 में पर्दाफाश हो ही चुका है कि जासूसी प्रधानमंत्री के कार्यालय से करवाई जा रही है. उस वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय के एक निजी स्टाफ को जासूसी करवाने के इनाम में हाई कमिश्नर भी बनवाया गया.’

ऊपर के इन दो किस्सों में ही इस सवाल का जवाब छुपा है कि जुलाई, 1987 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने रामास्वामी वेंकटरमण को अपना उम्मीदवार क्यों बनाया. इस जवाब तक सीधे-सीधे पहुंचने से पहले हमें इस लेख के शुरुआती सवाल पर लौटना होगा कि क्या राष्ट्रपति हर हाल में प्रधानमंत्री तथा उसके मंत्रिमंडल की सलाह मानने को बाध्य है?

कौन कितना बड़ा-- क्या कहता है संविधान

बेशक संविधान का निर्देश है कि राष्ट्रपति राष्ट्र के प्रधान के रुप में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् की सहायता तथा सलाह से अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम देगा. लेकिन यहां लाख टके का सवाल तो यह है कि क्या राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री या उसके मंत्रिपरिषद् की हर सलाह हर हाल में मान लेना होता है? क्या वह ऐसा करने के लिए मजबूर है?

यह सवाल संविधान सभा में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के मन में उठा था. उन्होंने कहा मुझे इस बात पर संशय है कि अनुच्छेद 74 (1) राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह मानने को बाध्य करते हैं. उन्होंने संविधान-सभा के सदस्यों से पूछा कि क्या प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी बनाने में कोई समस्या है?

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जाहिर है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यह मानकर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति को हर हाल में मान लेनी चाहिए. उनका ऐसा सोचना बेजा ना था. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां इतनी व्यापक हैं कि इस पद पर बैठा व्यक्ति अगर निरंकुश होना चाहे तो उसके रास्ते निकाल सकता है.

खैर, संविधान सभा का एक अनकहा अकीदा था कि चाहे जितनी कोशिश कर लो, आगे की सारी स्थितियों को सोचकर एक हर तरह से मुकम्मल किस्म का संविधान बनाना संभव नहीं. सो आगे का राजकाज बहुत हद तक इस बात से भी चलना है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर बैठे लोग उसे चलाना कैसे चाहते हैं.

संविधान सभा ने राजनेताओं की नेकनीयती का यकीन किया और उसने अपने वक्त में अनुच्छेद 74 (1) के प्रावधान को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं बनाया. इस अनुच्छेद के प्रावधान संविधान के 42वें संशोधन के जरिए बाध्यकारी बने इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी के दौर में. इस संशोधन ने ढेर सारी बातों के साथ यह भी कहा कि राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल की बात हर हाल में माननी ही होगी.

अचरज कीजिए कि ज्ञानी जैल सिंह से बिगड़ते अपने रिश्तों से सबक लेते हुए 1987 के राष्ट्रपति के चुनावों में कांग्रेस ने आर. वेंकटरमण के रुप में अपना एक ऐसा प्रत्याशी खड़ा किया जो शब्द के सटीक अर्थों में संविधान के एक-एक शब्द का मुहाफिज साबित हुआ.

कानून के दो दिग्गजों का मुकाबला

जैसे अभी के राष्ट्रपति पद के चुनाव में मुकाबला कानून के दो जानकार रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार के बीच है वैसे 1987 में इस पद के लिए कानून के दो महारथियों के बीच में भिड़ंत हुई. सत्ताधारी पार्टी ने तत्कालीन उप-राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण को अपना प्रत्याशी बनाया तो विपक्ष ने जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर को.

दोनों के बीच अंतर यह था कि आर. वेंकटरमण कानून का इस्तेमाल व्यवस्था को बनाये रखने के लिए ढाल की तरह करते आये थे. तो जस्टिस कृष्णअय्यर ने व्यवस्था को और ज्यादा बेहतर बनाने के लिए कानून का इस्तेमाल तलवार की तरह किया था.

जनहित याचिकाओं के लिए राह खोली

जस्टिस कृष्णअय्यर ही थे जिन्होंने जस्टिस भगवती के साथ मिलकर जनहित याचिकाओं के लिए राह खोली. अगर आज जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में साफ हवा-पानी और सेहतमंद भोजन का अधिकार शामिल है तो इसकी भी नींव मशहूर मेनका गांधी वाले मामले (पासपोर्ट की जब्ती) में फैसला सुनाते वक्त उन्होंने ही डाली थी. कहा था कि मौलिक अधिकार अलग-अलग नहीं होते कि एक पर असर हो तो दूसरा एकदम अप्रभावित रहे, मौलिक अधिकारों में निर्भरता का रिश्ता है सो उनमें से किसी एक को भी राजसत्ता चोट नहीं पहुंचा सकती.

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उनके कई कथन मशहूर हैं जैसे कैदियों के अधिकारों के बारे में उनका यह कहना कि ‘संविधान जेल की सलाखों के पीछे भी आजादी की बात कहता है... अगर जंग इतने अहम हैं कि उन्हें सिर्फ सिपहसालारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता तो फिर कैदियों के अधिकार भी इतने बेशकीमती हैं कि उन्हें सिर्फ जेलरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

जस्टिस कृष्ण अय्यर के फैसले में आया ऐसा ही एक दिलचस्प वाक्य यह भी है— ‘बेल (जमानत) इज द रूल (नियम), एंड जेल, द एक्सेप्शन (अपवाद).’

खैर दोनों के बीच राष्ट्रपति पद का मुकाबला एकतरफा साबित हुआ और जस्टिस कृष्ण अय्यर चुनाव हार गए. उन्हें 2 लाख 81 हजार वोट मिले तो आर. वेंकटरमण को 7 लाख 40 हजार.

वकालत की राह और सियासत का सफर

मद्रास प्रेसिडेंसी के तंजौर जिले में बीसवीं सदी की पहली दहाई के आखिरी साल और अंतिम माह (4 दिसंबर, 1910) में जन्मे आर. वेंकटरमण के बारे में अगर कहें कि कानून के अपने ज्ञान के ही कारण वह राष्ट्र-निर्माताओं की पंक्ति में शामिल किए जा सकते हैं तो यह कतई गलत ना होगा.

वकालत उनके समय में सबसे चमकता हुआ पेशा था सो पढ़ाई कानून की ही की लेकिन कानून की यह पढ़ाई धीरे-धीरे प्रेम में तब्दील हो गई. फिर कानून की पढ़ाई से पैसा कमाने की बात बहुत पीछे छूट गई और कानूनी पेचीदगियों को सुलझाकर व्यवस्था कायम करना उनके लिए पहला काम बन गया.

कार्यपालिका बड़ी आसानी से पक्षपाती फैसले ले सकती है

इसका एक उदाहरण तो उनकी 'माय प्रसिडेन्शियल इयर्स' ही है जिसमें बताया गया है कि भरपूर अहमियत के तकरीबन दर्जन भर मामले ऐसे हैं जिनको लेकर संविधान का कोई स्पष्ट रुख नहीं है और उनको आधार बनाकर कार्यपालिका बड़ी आसानी से पक्षपाती फैसले ले सकती है. यह भी लिखा है कि सांसदों और विधायकों सहित देश के ज्यादातर लोगों को राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमा के बारे में पता नहीं है.

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कानून की गुत्थियों से उनकी अंतरंगता की शुरुआत पहले (1935) मद्रास हाईकोर्ट में वकील के रूप में हुई, फिर सुप्रीम कोर्ट (1951) में. इसी बीच भारत छोड़ो आंदोलन में भी शिरकत की और दो साल अंग्रेजी जेल में रहे. उनकी कानून की जानकारी की ही धाक रही होगी जो संविधान सभा के सदस्य के रूप में भी चुने गए.

आजादी के बाद अंतरिम सरकार में सर्वसम्मति से चुने गए. बाद में लोकसभा के लिए चार बार निर्वाचित हुए और उप-राष्ट्रपति (1984) बनने से पहले वित्त मंत्री (1980) और रक्षा मंत्री (1982) बने. बीच की अवधि में कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समितियों के सदस्य रहे. रक्षा मंत्री के रूप में देश के पहले मिसाइल प्रोग्राम इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की शुरुआत का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. तब यह आर. वेंकटरमण ही थे जिन्होंने एक और भावी राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को इस कार्यक्रम का प्रधान चुना.

जब कानून से नहीं विवेक का सहारा लेना

देश के राजनीतिक इतिहास का दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जो राष्ट्रपति कानून से अपने इश्क के मामले में शायद सबसे अव्वल गिना जाएगा उसे ही ऐन वक्त पर अपने फर्ज को अंजाम देने के लिए कानून का नहीं बल्कि विवेक का सहारा लेना पड़ा.

उनके राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद का समय देश में गठबंधन की राजनीति के उभरने का दौर है. उन्होंने अपने कार्यकाल में राजीव गांधी सहित चार प्रधानमंत्री देखे. इनमें से तीन वी पी सिंह, चंद्रशेखर और पी वी. नरसिम्हाराव को पद की शपथ दिलाई.

1989 में पहली बार देश में त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति पैदा हुई. तब राष्ट्रपति के रुप में आर. वेंकटरमण के पास अपने विवेक का ही सहारा था कि सरकार किसकी बनवाई जाए. 1989 के चुनावों में बोफोर्स सौदे को लेकर उठा भ्रष्टाचार का भूत कांग्रेस पर बहुत भारी पड़ा. कांग्रेस को 197 सीटें मिलीं और विपक्षी दलों की एकता के आगे वह 39.5 फीसदी वोट शेयर के बावजूद खुद के बूते सरकार बना सकने लायक सीटें नहीं ला सकी. राजीव गांधी को कहना पड़ा कि हम सरकार बना सकने की स्थिति में नहीं हैं.

राष्ट्रपति को सोचना पड़ा कि सरकार बनाने के लिए किसको कहें

बीजेपी और वामदलों ने कहा कि वे नेशनल फ्रंट की सरकार को बाहर से समर्थन देंगे. नेशनल फ्रंट को 146 सीटें थी और उसे वाम धड़े के 52 और बीजेपी के 86 सांसदों का बाहर से समर्थन हासिल था. ऐसे में राष्ट्रपति को सोचना यह था कि सरकार बनाने के लिए किसको कहें. सबसे ज्यादा सीट लाने वाले दल ने तो कह दिया था कि हम सरकार नहीं बना सकते.

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आर. वेंकटरमण ने विवेक का सहारा लिया और दूसरी बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दिया. वी पी सिंह की अगुवाई में सरकार बनी लेकिन यह सरकार इमर्जेंसी के दौर के बाद बनी गैर-कांग्रेस सरकार की ही तरह अंतर्विरोध की शिकार थी. चौधरी देवीलाल और चंद्रशेखर जैसे नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की टकराहट थी. तो दूसरी तरफ विचाराधारा के लिहाज से एक दूसरे से एकदम उत्तर-दक्षिण पड़ते बीजेपी और वामदल से मिलने वाले समर्थन का भरोसा कर के चलना था.

वी पी सिंह ने अपनी राजनीतिक हैसियत मजबूत करने के खयाल से मंडल कमीशन की रिपोर्ट की सिफारिशों लागू कीं तो सामाजिक आंदोलन खड़ा हो गया. संदेश यह गया कि सरकार जातिवादी राजनीति पर उतारू है और आरक्षण-विरोधी सवर्ण तबका आक्रोश में आया.

मौका भांपकर बीजेपी ने हिंदुत्व की राजनीति को नई धार देते हुए लाकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी राम रथयात्रा शुरू की. घनघोर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की उस घड़ी में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी हुई और बीजेपी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.

सरकार अल्पमत में आ गई और सवाल उठा कि आगे किस दल को सरकार बनाने का न्योता दिया जाए? इस बीच चंद्रशेखर और देवीलाल ने जनता पार्टी से निकलकर 64 सांसदों के साथ नई पार्टी बना ली थी. वी पी सिंह सदन में 7 नवंबर, 1990 को विश्वास मत हार गए.

बिना प्रधानमंत्री की सलाह के लोकसभा भंग कर दी जाए

राष्ट्रपति को फैसला करना था कि सरकार बनाने के लिए राजीव गांधी को कहा जाए जिनकी पार्टी के पास सर्वाधिक सीटें हैं या मौका चंद्रशेखर की दावेदारी को दिया जाए. या इन दोनों बातों से परे बिना प्रधानमंत्री की सलाह के लोकसभा भंग कर दी जाए.

राष्ट्रपति ने संदेशा भेजा कि सबसे बड़ी पार्टी के अगुआ होने के नाते सरकार राजीव गांधी बना सकते हैं लेकिन राजीव गांधी ने इनकार कर दिया. उन्होंने कहा हमारा पूरा समर्थन चंद्रशेखर की पार्टी को है. राजीव गांधी के इनकार के बाद न्योता बीजेपी को मिला फिर वाम मोर्चे को लेकिन इन दोनों ने भी अपनी असमर्थता जताई.

सियासी एतबार से निहायत नाजुक जान पड़ती ऐसी हालत में चंद्रशेखर ने कहा मुझे जनता दल सहित अन्य दलों के 50 और सांसदों का समर्थन हासिल है. राष्ट्रपति ने उनकी बात मानी, संदेशा जारी किया कि पहली नजर में चंद्रशेखर का दावा ठीक जान पड़ता है. उनका समूह देश में एक टिकाऊ सरकार बना सकता है. चंद्रशेखर को सरकार बनाने का न्योता मिला और कहा गया कि 30 नवंबर, 1990 तक बहुमत साबित कीजिए.

चंद्रशेखर की सरकार बनी और चली भी लेकिन राजीव गांधी का समर्थन उसे जारी नहीं रह सका. 6 मार्च, 1991 को चंद्रशेखर को इस्तीफा देना पड़ा लेकिन वी पी सिंह के उलट उन्होंने तब राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने की सलाह दी. और, राष्ट्रपति ने सरकार गंवा चुके प्रधानमंत्री की बात मान ली.

अगला चुनाव राजीव गांधी की दर्दनाक हत्या (21 मई, 1991) के बाद के माहौल में हुआ, लेकिन एक बार फिर से कांग्रेस बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई. तब कांग्रेस को 225 सीटें मिली थीं, बीजेपी को 118 और जनता दल को 55 तथा वाम मोर्चे को 47 सीटें.

जनता दल, वाम मोर्चे की गैर-मौजूदगी में विश्वास-मत हासिल किया

इस बार राष्ट्रपति ने नरसिम्हा राव को सरकार बनाने का न्योता दिया. शर्त रखी कि चार हफ्ते में सदन में अपना बहुमत साबित कीजिए. नरसिम्हा राव ने जनता दल और वाम मोर्चे की सदन में गैर मौजूदगी में विश्वास-मत हासिल किया. दोनों ही नहीं चाहते थे कि एक बार फिर से चुनाव का सामना करना पड़े.

संक्षेप में यह कि राष्ट्रपति के रुप में आर. वेंकटरमण का कार्यकाल विवेक की परीक्षा लेने वाला सिद्ध हुआ लेकिन राष्ट्रपति ने दलगत प्रतिबद्धताओं और निजी महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सरकार गठन के अपने फर्ज का अंजाम दिया.

आर. वेंकटरमण कहा करते थे कि 'राष्ट्रपति का काम का एक इमरजेंसी लाइट की तरह होता है, जब संकट खड़ा होता है तो यह अपने आप जल उठती है और संकट के खत्म होने के साथ यह खुद ब खुद बुझ जाती है.'

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