विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

हजारीप्रसाद द्विवेदी: जिन्होंने गरीबी के बावजूद ठुकराई ज्यादा वेतन वाली नौकरी

उन्होंने बगैर किसी को नीचा दिखाए कबीर को उपदेशक, संत आदि की श्रेणी से निकालकर कवि के रूप में स्थापित किया.

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Aug 19, 2017 09:39 AM IST

0
हजारीप्रसाद द्विवेदी: जिन्होंने गरीबी के बावजूद ठुकराई ज्यादा वेतन वाली नौकरी

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आज अगर जीवित होते तो 110 साल के होते. बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस आचार्य के बारे में एक छोटे से लेख से बता पाना बहुत ही मुश्किल काम है. हजारीप्रसाद द्विवेदी एक आलोचक, उपन्यासकार, निबंधकार, इतिहासकार और विचारक थे. उन्होंने करीब 30 से अधिक किताबें लिखीं हैं. साथ ही नाथ सिद्धों की बानियां, संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, संदेश रासक, दशरूपक जैसी कई पुरानी रचनाओं को संपादित भी किया.

हिंदी साहित्य में हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘दूसरी परंपरा की खोज’ के लिए जाने जाते हैं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने बड़ी मुश्किल और गरीबी के हालात में बीएचयू से अपनी पढ़ाई पूरी की थी लेकिन उन्हें पढ़ाने का मौका गुरु रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन में मिला.

यूं मिली नई इतिहास दृष्टि

दरअसल शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर से हुई नजदीकी की वजह से ही उनके भीतर एक नई तरह की इतिहास दृष्टि का उदय हुआ. यह न सिर्फ उनके द्वारा लिखी गई इतिहास की किताबों में दिखता बल्कि उनके निबंधों और उपन्यासों में भी साफ-साफ देखा जा सकता है.

हजारीप्रसाद द्विवेदी के भीतर इस नई इतिहास दृष्टि के पैदा होने की एक रोचक घटना का जिक्र नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में की है. शांतिनिकेतन में एक बार एक विधवा अपनी बेटी का विवाह हिंदू विधि से करना चाहती थी और उसमें भाग लेना चाहती थी. हिंदू शास्त्रों के अनुसार विधवा को विवाह के दौरान होने वाले कई संस्कारों को करने की अनुमति नहीं है. इसी वजह से किसी ने कहा कि विधवा नांदी श्राद्ध नहीं कर सकती है. इस समस्या के हल और शास्त्रों के मत को जानने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर ने हजारीप्रसाद द्विवेदी को बुलाया. वे उस वक्त शांतिनिकेतन ने नए-नए ही आए थे.

यह भी पढ़ें: अमृता प्रीतम ने क्यों दी थी हानूश के मंचन पर भीष्म साहनी को बधाई

द्विवेदी जी ने इस समस्या के हल के लिए कई स्मृति ग्रंथों की छानबीन की. उन्होंने यह देखा कि पुराने हिंदू ऋषियों ने विधवा को इसकी अनुमति दी है और बाद के ऋषियों ने नहीं. उन्होंने यह समस्या टैगोर को बताई तो टैगोर ने उनसे हंसकर कहा उनसे सवाल के रूप में कहा कि पुराने ऋषि क्या कम पूज्य हैं, जिनका खंडन बाद के ऋषियों ने किया है?

हजारीप्रसाद द्विवेदी अभी तक जिस तरह से इतिहास को देखते समझते आए थे, उस समझ पर इस टिप्पणी ने एक चोट की. वे अब तक बाद के ऋषियों के कथनों को ही सही समझते आए थे. उन्होंने इससे पहले कभी नहीं सोचा था कि पहले के ऋषि-मुनि भी सही हो सकते हैं. यहीं से उन्हें एक नई इतिहास दृष्टि मिली.

hazariprasad_dwivedi_granthawali_1

बीएचयू में पढ़वाया कबीर और प्रेमचंद को

यही वजह थी कि उस वक्त हिंदी साहित्य के इतिहास ने जिन रचनाकारों या रचनाओं को जगह नहीं मिली थी, उनके बारे में विचार करना शुरू किया. उस वक्त हिंदी साहित्य के इतिहास में रामचंद्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि का बोलबाला था और काशी हिंदू विश्वविद्यालय इसका गढ़. द्विवेदी जी ने इस इतिहास दृष्टि से टक्कर लेने का साहस दिखाया. उन्होंने बगैर किसी को नीचा दिखाए कबीर को उपदेशक, संत आदि की श्रेणी से निकालकर कवि के रूप में स्थापित किया. हालांकि इसका नुकसान भी उन्हें उठाना पड़ा.

 हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गरीबी में अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी की थी. शांतिनिकेतन में नौकरी करने के दौरान भी वे आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे थे. उन्हें हमेशा पैसों की जरूरत रहती थी और वे हिंदी क्षेत्र में खासकर बीएचयू में पढ़ाना भी चाहते थे. उसी वक्त 1950 में उन्होंने बीएचयू और बिहार सरकार की तरफ से अधिक वेतन के साथ नौकरी का ऑफर आया. लेकिन उन्होंने सिर्फ इस वजह से इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया क्योंकि शांतिनिकेतन को उनकी अधिक जरूरत थी.

हालांकि बाद में वे बीएचयू में प्रोफेसर बनकर पढ़ाने गए. लेकिन अपनी इतिहास दृष्टि की वजह से वे लोगों की नजर में खटकते थे.उन्होंने ही बीएचयू में कबीर और प्रेमचंद को पढ़ाने की परंपरा की शुरुआत की थी. इसको लेकर दबे स्वर में पुरातनपंथी प्रोफेसरों ने उनकी आलोचना भी की थी. उनके खिलाफ दिन-ब-दिन नए-नए षड्यंत्र रचे जा रहे थे. इसी बीच 1957 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

यूं टली आजाद भारत में पहली पुरस्कार वापसी

1960 में उनपर कई तरह के आरोप लगाकर उन्हें बीएचयू ने निकाल दिया गया. इसमें एक आरोप यह भी था कि वे राजनीति करते हैं और पढ़ाते नहीं हैं. हजारीप्रसाद द्विवेदी इससे बहुत आहत हुए. उन्हें भारत सरकार द्वारा दिए पद्म भूषण पुरस्कार को लौटाने की कोशिश की. उनका कहना था कि भारत सरकार द्वारा उन्हें यह पुरस्कार उनकी सेवाओं के लिए दिया गया है और जब बीएचयू यह मानकर उन्हें निकाल रहा है कि वे पढ़ाते नहीं हैं तो उन्हें यह पुरस्कार रखने का कोई हक नहीं है.

हालांकि भारत के प्रथम और तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आग्रह के बाद उन्होंने यह पुरस्कार नहीं लौटाया. इसके बाद वे पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के हिंदी विभाग के प्रमुख बनकर वहां पढ़ाने लगे.

यह भी पढ़ें: जन्मदिन विशेष: ऐसा कवि जिसे राष्ट्रपिता ने राष्ट्रकवि कहा था

दरअसल हजारीप्रसाद द्विवेदी को अपनी उस इतिहास दृष्टि की कीमत चुकानी पड़ी जिसमें वे किसी शुद्ध आर्य संस्कृति वाले इतिहास बोध का विरोध करते थे. उनका मानना था कि इस देश की संस्कृति के विकास में जितना आर्य संस्कृति का योगदान है उतना ही आर्येतर संस्कृति का भी. उन्होंने मध्यकाल के इतिहास में इस्लाम के सकारात्मक योगदानों के ऊपर हिंदी साहित्य का ध्यान खींचा और भक्तिकाल के उदय में इस्लाम की आक्रमणकारी भूमिका के बारे में फैली भ्रामक धारणा को तोड़ने का भी कार्य किया.

वे इतिहास, साहित्य और संस्कृति को मनुष्य और मनुष्यत्व के दृष्टिकोण से देखने के पक्षधर थे. आज भले ही कबीर आदि पर उनके विचारों से लोग असहमत हों लेकिन हिंदी साहित्य को एक अलग दिशा दिखाने का काम तो उन्होंने जरूर किया है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi