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हमारे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी: एक राष्ट्रपति जिसने नजीर कायम की

रेड्डी ने अपने कार्यकाल में तीन प्रधानमंत्रियों को पद की शपथ दिलवाई

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jul 02, 2017 10:36 AM IST

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हमारे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी: एक राष्ट्रपति जिसने नजीर कायम की

राष्ट्रपति यानी राष्ट्र का सांवैधानिक प्रधान, तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर और संविधान का मुहाफिज. सीधे शब्दों में कहें तो सबसे ऊंचा पद और सबसे बड़ी जिम्मेदारी!

ऐसे ऊंचे आसन पर बैठे व्यक्ति के लिए सबकुछ पहले से जानना जरूरी है, लेकिन हर जरूरी निर्देश संविधान में लिखा हुआ मिले यह मुमकिन नहीं, आखिर वह ईश्वर की नहीं मनुष्यों की बनाई किताब है. बेशक वह एक पवित्र किताब है, लेकिन इसी अर्थ में कि वह एक बनती हुई किताब है.

चूंकि संविधान में हर जरुरी निर्देश का लिखा हुआ मिलना नामुमकिन है सो कभी-कभी हमारे गणतंत्र में बड़ी विचित्र स्थिति खड़ी हो जाती है. ऐसा एक बार हुआ था जब राष्ट्रपति पद पर रहते डॉ. जाकिर हुसैन की मौत हुई.

1969 की मई में डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद राष्ट्रपति की भूमिका तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि निभा रहे थे लेकिन इसी बीच 1969 की जुलाई में उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया और उप-राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया.

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सवाल उठा उपराष्ट्रपति की गैर मौजूदगी में राष्ट्रपति की भूमिका कौन निभाए? संविधान में इस बाबत तब स्पष्ट निर्देश नहीं थे.

आखिर, संसद में द प्रेसिडेंट (डिस्चार्ज ऑफ फंक्शन्स्) एक्ट बनाकर तय किया गया कि कार्यवाहक राष्ट्रपति की गैर-मौजूदगी (इस्तीफा, बीमारी या मृत्यु) में यह भूमिका सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस निभाएंगे और चीफ जस्टिस का पद खाली हो तो फिर सबसे वरिष्ठ जज कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी निभाएंगे.

नजीर कायम करने वाले नीलम संजीव रेड्डी

कई बार ऐसा भी हुआ है जब राजनेताओं ने भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक जज्बे को समझते हुए खुद ही पेशकदमी की, अपने आचरण से पद की अच्छाई के नए मानक गढ़े और वह आचरण संविधान में तो किसी नियम की दर्ज नहीं हुआ लेकिन आगे के वक्तों के लिए नजीर बन गया.

हमारे गणतंत्र के छठे राष्ट्रपति (25 जुलाई 1977- 25 जुलाई 1982) नीलम संजीव रेड्डी का नाम पद पर रहते हुए अपने नेतृत्व-कौशल से आगे के लिए नजीर कायम करने वाले ऐसे ही राजनेताओं में शुमार किया जाता है.

उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में तीन प्रधानमंत्रियों मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और इंदिरा गांधी को पद की शपथ दिलवाई. तेज सियासी बदलाव के उस वक्त में बतौर राष्ट्रपति उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा जब संविधान में स्पष्ट निर्देश नहीं थे, पहले से चली आ रही कोई रिवायत भी नहीं थी कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं लेकिन हालत की मांग थी कि निर्णय अभी के अभी लेना पड़ेगा.

ऐसे वक्त में राष्ट्रपति के रुप में नीलम संजीव रेड्डी ने जिस सियासी सूझ-बूझ का परिचय दिया उसे हमारे राजनीतिक इतिहास के संस्मरणों में सराहना के शब्दों में दर्ज किया गया है.

जनता पार्टी की सरकार और संकट

इमर्जेंसी के बाद के वक्त में कांग्रेस का एकक्षत्र राज करते आने की रिवायत टूटी, उत्तर भारत में उसकी भारी हार हुई और मोरारजी देसाई की अगुवाई में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी जनता सरकार बनी. लेकिन जनता-सरकार अलग-अलग दल के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की सिर फुटौवल और विचारधाराओं की टकराहट का मंच भी साबित भी हुई.

दलगत निष्ठाओं और नेताओं के निजी महत्वाकांक्षाओं के आपसी घमासान में मोरारजी देसाई की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया और इस अविश्वास प्रस्ताव का संसद में सामना किए बगैर मोरारजी देसाई ने इस्तीफा दे दिया.

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‘जनता-सरकार’ के संकट का यह लम्हा अपनी पूरी नाटकीयता के साथ ‘फ्रॉम फार्म हाऊस टू राष्ट्रपति भवन’ नाम की किताब में इन शब्दों में दर्ज है- 'इसके पहले कि सदन में अविश्वास प्रस्ताव बहस और मतदान के लिए पेश हो, जनता संसदीय दल के एक घटक भारतीय लोकदल के नेता राजनरायण सत्तापक्ष की कुर्सी से उठकर दूसरी तरफ आ गये, स्पीकर हेगड़े (रामकृष्ण) से कहा कि हमें विपक्षी दल की तरफ बैठने के लिए अलग सीट दी जाए, हमलोग अब से जनता दल (सेक्युलर) कहलाएंगे. दिलचस्प बात यह हुई कि भारतीय लोकदल के प्रमुख चरण सिंह जनता-सरकार में उप-प्रधानमंत्री के रुप में बने रहे, उनके पास वित्त मंत्रालय भी था...’

'स्थिति अपने निरालेपन की हद लांघते जा रही थी आखिरकार मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, इसके बाद चरण सिंह जनता पार्टी छोड़कर जनता (सेक्युलर) में आ गए और लोकसभा में इसके नेता बन गए.'

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इंदिरा गांधी के एवं अन्य लोगों के साथ नीलम संजीव रेड्डी

इसके बाद ही देश की सियासत में एक ऐसा संकट खड़ा हुआ जिसका सामना नीलम संजीव रेड्डी से पहले किसी राष्ट्रपति ने नहीं किया था. इससे पहले केंद्र में बहुमत की स्थिर सरकार बनती आयी थी लेकिन नीलम संजीव रेड्डी का सामना एक ऐसी सरकार से हुआ जिसमें दल-बदल के बीच सरकार अपने कार्यकाल की आधी दूरी ही चलकर अल्पमत में आ गई थी. पहले की कोई नजीर सामने ना थी, संविधान में ऐसी स्थिति के लिए राष्ट्रपति को स्पष्ट निर्देश नहीं थे.

लेकिन राष्ट्र के सिरमौर के रुप में नीलम संजीव रेड्डी ने सांवैधानिक संकट की स्थिति का सामना बड़ी मजबूती के साथ किया.

जब एक नजीर कायम हुई

नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत के बाद उन्होंने ब्रिटिश रिवाज के मुताबिक पहले विपक्ष के नेता वाय बी चव्हाण को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. विपक्ष को इसकी बिल्कुल ही उम्मीद नहीं थी, सो उसकी कोई तैयारी भी नहीं थी. चार दिन की सियासी मेल-मुलाकात और बैठकों के कई दौर के बाद नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हम सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा सकते.

अद्भुत यह भी था कि प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके मोराजी देसाई जनता पार्टी के संसदीय दल के नेता बने हुए थे. उन्होंने जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर और कुछ और नेताओं को राष्ट्रपति के पास भेजा कि मैं अब भी संसदीय दल का नेता हूं, सो मुझे सरकार का बनाने का फिर से मौका दिया जाए.

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जयप्रकाश नारायण के जीवन की चंद सांसे ही शेष थीं अब और ऐसे वक्त में मोरारजी देसाई को उन्होंने समझाया कि प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया है तो पार्टी के संसदीय दल के नेता का पद भी छोड़ दो और अपनी जगह जगजीवन राम को नेता बनाओ लेकिन मोरारजी ने जेपी की बात नहीं मानी.

मोरारजी देसाई का यह दावा ना तो आम नागरिक समझ पा रहा था ना ही उसे राष्ट्रपति को ही समझ में आना था. चरण सिंह ने ठीक कहा कि वाय बी चव्हाण के अविश्वास प्रस्ताव का सामना किए बगैर इस्तीफा देने वाले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का दोबारा सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति के सामने दावा पेश करना एकदम अनैतिक है.

चरणसिंह को पटखनी देने के लिए मोरारजी देसाई ने एक दाव और खेला. कहा जाता है कि उन्होंने जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रेशेखर को अपने विश्वास में लिया, चंद्रशेखर यह कहने को राजी हो गए कि मोरारजी को संसदीय दल का नेता नहीं बनाया जाता तो फिर इस पद के लिए चुनाव में एक प्रत्याशी मैं भी हूं.

संक्षेप में यह कि जनता-सरकार में चल रहे भितरघात के बीच स्थिति एकदम से बेबूझ हो रही थी. संविधान के विशेषज्ञ राष्ट्रपति को नहीं बता पा रहे थे कि ऐसी घड़ी में क्या किया जाए? विपक्ष के पास सरकार बनाने का बहुमत नहीं था, सरकार अल्पमत में थी और उसके भीतर प्रधानी के एक से ज्यादा दावेदार थे और इन दावेदारों में आपसी सिर फुटौव्वल ऐसी थी कि कोई भी यकीन के साथ नहीं कह सकता था कि बहुमत हमारे पास है, सो सरकार हम बनाएंगे.

नीलम संजीव रेड्डी ने एक नाटकीय घटनाक्रम में चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई दोनों से कहा कि अपने समर्थक सांसदों की सूची दीजिए. दोनों सूचियों में 50 सांसदों के नाम कॉमन थे.

ऐसे में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति से लिखित रुप में कहा कि उनकी पार्टी चौधरी चरण सिंह के पक्ष में है, सो राष्ट्रपति के रुप में चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. राष्ट्रपति ने शर्त रखी कि चौधरी चरण सिंह को अगस्त से पहले अपना बहुमत साबित करना होगा.

देश के सियासी इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब राष्ट्रपति ने तमाम विकल्पों और संभावनाओं को अपने विवेक की कसौटी पर परखा और संतुलन साधते हुए कहा कि त्रिशंकु सदन की स्थिति है तो भी सरकार बनाइए, हां बहुमत जितनी जल्दी हो साबित करके दिखाइए. यह अलग बात है कि बहुमत साबित करने के लिए जब सभा बैठी तो ऐन घड़ी में इंदिरा गांधी ने कह दिया चौधरी चरण सिंह को हमारा समर्थन सरकार बनाने के लिए था, बहुमत साबित करने के लिए नहीं.

आगे के लिए नीलम संजीव रेड्डी का यही फैसला एक नजीर साबित हुआ. राष्ट्रपति के रूप में आर. वेंकटरमण ने अपने कार्यकाल में चार प्रधानमंत्री देखे और तीन (वीपी सिंह, चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव) को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवायी तो इसी नजीर का पालन किया.

जब लोकसभा स्पीकर बनने पर दिया पार्टी से इस्तीफा 

‘फ्रॉम फार्म हाऊस टू राष्ट्रपति भवन’ के लेखक आईवी चेलापति राव के मुताबिक उस घड़ी पहली बार सबकी नजरें राष्ट्रपति भवन की ओर लगी थीं, राष्ट्रपति को सचमुच पहली बार राष्ट्र के प्रधान के रूप में निर्णायक ढंग से काम करना था और नीलम संजीव रेड्डी ने शब्द के सटीक अर्थों में उस शपथ का पालन किया जो राष्ट्रपति अपना पदभार संभालते हुए लेते हैं कि मैं मन, वचन और कर्म से बिना किसी भय या भेदभाव के देश और संविधान की संरक्षा और सुरक्षा करुंगा.

नीलम संजीव रेड्डी ने ऐसी ही एक नजीर राष्ट्रपति बनने से पहले कायम की थी. तब (1967) में वे लोकसभा के स्पीकर थे. संविधान नहीं कहता कि लोकसभा के स्पीकर के पद पर नियुक्त व्यक्ति को अपनी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देना चाहिए. लेकिन संविधान का जज्बा कहता है कि स्पीकर को बिना भेदभाव के दलीय प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर सदन की कार्यवाही चलानी चाहिए.

संविधान के इस जज्बे का ही ख्याल रहा होगा जो उन्होंने स्पीकर पद संभालने पर पार्टी से 34 साल से लगातार चला आ रहा रिश्ता औपचारिक रुप से तोड़ा और पार्टी की सदस्यता छोड़ दी. आगे सी.एम बालयोगी और सोमनाथ चटर्जी ने भी स्पीकर पद पर रहते नीलम संजीव रेड्डी के इस फैसले से झांकते ऊंचे आदर्श को एक नजीर करार दिया.

कई संयोग हैं एन.संजीव रेड्डी के नाम

राष्ट्रपति को फर्स्ट सिटीजन कहा जाता है और देश के इस फर्स्ट सिटीजन के साथ ‘फर्स्ट’ लगातार जुड़ा रहा. नीलम संजीव रेड्डी पहले राष्ट्रपति हैं जो निर्विरोध चुने गए.

सबसे कम उम्र में राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य भी नीलम संजीव रेड्डी को ही मिला. वे 65 साल की उम्र में राष्ट्रपति बने. राजेन्द्र प्रसाद और ज्ञानी जैल सिंह 66 साल की उम्र में राष्ट्रपति बने थे और फखरुद्दीन अहमद उम्र के 69वें साल में.

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तस्वीर: speakerloksabha.nic.in से साभार

दो दफे (1967 और 1977) लोकसभा का स्पीकर बनने का रिकार्ड भी उन्हीं के नाम है और 1969 में पहली दफा ऐसा हुआ कि सत्ताधारी पार्टी ने उप-राष्ट्रपति की जगह लोकसभा के स्पीकर यानी नीलम संजीव रेड्डी को अपना उम्मीदवार बनाया.

एक संयोग यह भी है कि जब वे पहली दफा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने तो उनका सामना किसी वैचारिक प्रतिद्वन्द्वी से नहीं बल्कि कठिन समय के सबसे गहरे साथियों में एक रहे अपनी ही पार्टी के वी.वी गिरि से हुआ. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी के बाद अमरावती जेल में उनका वक्त टी प्रकाशम, एस सत्यमूर्ति, के. कामराज और वीवी गिरि जैसे साथियों के साथ कटा था.

शायद, हार की यह घटना उनके मन पर एक गहरे आघात की तरह थी, उन्होंने सक्रिय राजनीति से एकबारगी संन्यास ले लिया. लौट गए आंध्र प्रदेश के उसी अनंतपुर जिले के इल्लुरु में जहां कभी (1913) एक किसान परिवार के घर में उनका जन्म हुआ था. राजनेता से किसान होने में उन्हें उन्हें जरा भी देर नहीं लगी.

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अठारह साल की उम्र रही होगी उनकी जब (1929) महात्मा गांधी अनंतपुर आए थे और गांधी की इस यात्रा ने तब छात्र रहे नीलम संजीव रेड्डी की जिंदगी बदल दी थी. पढ़ाई छोड़कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़ने वाले नीलम संजीव रेड्डी ने इसके बाद से कभी राजनीति से मुंह ना मोड़ा था. बस एक अवसर (1952) ऐसा आया था जब उन्होंने निजी कारणों (5 साल के बेटे की मौत) से उन्होंने आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमिटी से इस्तीफा देकर राजनीति छोड़ने की सोची.

तब उनका इस्तीफा वापस हो गया लेकिन वी.वी. गिरि से हार का पूरा प्रसंग इतना भारी पड़ा कि चार दशकों की राजनीतिक जिंदगी से उन्होंने एकदम से नाता तोड़ लिया. जयप्रकाश नारायण की कोशिशों से 1975 में राजनीति में फिर उनकी वापसी हुई. एक संयोग तब भी घटा जब इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में वे आंध्रप्रदेश के नांदयाल से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे. दरअसल आंध्र प्रदेश से गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार के रुप में एकमात्र उन्हीं को जीत हासिल हुई थी.

राष्ट्रपति पद पर अपनी भूमिका निर्वाह के बाद वे फिर से उसी अनंतपुर लौटे जहां से कई दफे उन्होंने चुनाव जीता और हारा था. यह कहना मुश्किल है कि नीलम संजीव रेड्डी के अनंतपुर लौटने पर लोगों ने क्या सोचा होगा. क्या उनके मन में संजीव रेड्डी को लेकर यह याद उठी होगी सूबे के पहले मुख्यमंत्री के रुप में इसी व्यक्ति ने आधुनिक आंध्र प्रदेश की नींव रखी या वे उन्हें एक किसान परिवार के बेटे के रूप में देख रहे होंगे जो हमेशा के लिए अपनी मिट्टी के ओर लौट आया था.

अपनी माटी और अपने लोगों से नीलम संजीव रेड्डी का यह अटूट जुड़ाव ही था जो राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी ने जन्म शताब्दी वर्ष के मौके पर उन्हें याद करते हुए कहा वे ‘आखिर सांस तक किसान’ बने रहे.

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