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सोनल मानसिंह: नृत्य की दीवानगी को घर वालों की नाराजगी भी न खत्म कर सकी

घरवालों की नाराजगी को नजरअंदाज कर इस कलाकार ने 1963 में अपना घर छोड़ दिया और अपने गुरु के पास चली गईं

Updated On: Apr 30, 2018 11:14 AM IST

FP Staff

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सोनल मानसिंह: नृत्य की दीवानगी को घर वालों की नाराजगी भी न खत्म कर सकी
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1965 के अप्रैल महीने की बात है. देश की एक बहुत जानी मानी नृत्यांगना का 21वां जन्मदिन था. ये नृत्यांगना देश के एक बेहद प्रतिष्ठित परिवार से थीं. उनके दादा जी मंगलदास पकवासा राज्यपाल थे. श्री पकवासा कलाप्रेमी थे. लिहाजा उनके घर पर एक से बढ़कर एक कलाकारों का आना जाना था.

सिद्धेश्वरी देवी, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद फैयाज हुसैन खान, मोइनुद्दीन डागर, उस्ताद विलायत खान जैसे कलाकार अक्सर आते थे और उनकी बैठकियां हुआ करती थीं. ऐसे सांगीतिक माहौल में इस कलाकार का भी बचपन और तरुणाई बीत रहा था. उसने भी नृत्य और संगीत की परंपरागत शिक्षा लेना शुरू कर दिया था.

21वें जन्मदिन से करीब चार साल पहले 1961 में उनके गुरु प्रोफेसर यू.एस. कृष्णराव और पत्नी श्रीमती चंद्रभागा देवी के निर्देशन में बैंगलोर के राजभवन में उनका ‘अरंग्रेत्रम्’ हो चुका था. इसके बाद उनकी अपनी ख्याति फैलने लगी थी. इतने संपन्न परिवार की होने के बाद भी इस कलाकार ने घर छोड़ने का फैसला किया.

ये बड़ी दिलचस्प कहानी है. हुआ यूं कि जब इन्होंने कहा कि मुझे सिर्फ नृत्य करना है तो घर वाले नाराज हो गए. उनकी नाराजगी को नजरअंदाज कर इस कलाकार ने 1963 में अपना घर छोड़ दिया और अपने गुरु के पास चली गईं. बाद में उस कलाकार ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर जबरदस्त शोहरत कमाई. जीवन में तरह तरह की चुनौतियां आईं लेकिन उन्होंने हमेशा जीत हासिल की.

उन्हें पद्मभूषण, पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. यहां तक कि जब मौजूदा सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए नवरत्न चुने तो उसमें इन्हें भी जगह दी गई. चलिए अब आपको इस विश्वविख्यात कलाकार का नाम बता ही देते हैं. वो कलाकार हैं प्रख्यात भरतनाट्यम और ओडिसी नृत्यांगना डॉ. सोनल मानसिंह.

उनके 21वें जन्मदिन पर एक और दिग्गज कलाकार आए थे. वो कलाकार थे- पंडित जसराज. पंडित जसराज सोनल जी से उम्र में यही कोई 13-14 साल बड़े हैं. तब तक उन्हें भी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बड़ी पहचान मिल चुकी थी. उन्होंने सोनल के 21वें जन्मदिन पर बड़े स्नेह के साथ एक शास्त्रीय राग गाया. वो राग था- कौशिक कांहड़ा.

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