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जेएनयू वाली आजादी नहीं, बचपन से सीखे हैं स्व-तंत्र के मायने

गांधी, नेहरू, मोरारजी, राजेंद्र प्रसाद जैसी शख्सियतों को देखते हुए बीता मेरा बचपन

Sonal Mansingh Updated On: Aug 14, 2017 07:02 PM IST

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जेएनयू वाली आजादी नहीं, बचपन से सीखे हैं स्व-तंत्र के मायने

ये आजादी तो जेएनयू के कन्हैया कुमार के बाद प्रचलित हुआ शब्द है. हम लोग तो स्वतंत्रता जानते थे. हमने स्वातंत्र्य संग्राम सुना था. घर में भी और स्कूल में भी. स्वतंत्रता क्या है? स्व का तंत्र. इसका मतलब स्वार्थ से नहीं है. इसका मतलब है कि मेरे देश में, मेरे समाज में, हम लोगों का ही तंत्र चले. किसी विदेशी का नहीं.

हमारे स्कूल के मैदान से ही भारत छोड़ो आंदोलन का नारा दिया गया था. हमारे स्कूल में टैगोर, गांधी, डॉ. एनी बेसेंट आए. वहां से स्व-तंत्र की जो भावना मिली, उससे हमेशा ओत प्रोत रहे. इसके बाद भी देश में होने वाली तमाम राजनीतिक घटनाओं पर हमेशा हमारी नजर रहती थी.

जब मेरा जन्म हुआ, तो बंबई (अब मुंबई) में ‘रेड्स बॉम्ब’ पड़ने की आशंका थी. पूरे घर के खिड़की-दरवाजों पर काले कागज लगा दिए गए थे. मेरे जन्म के लिए मां को कोई आया भी नहीं मिली थी. उन दिनों हमारे घर में कामकाज के लिए रत्नागिरी से जो भीमाजी आए थे, उन्होंने बचपन में मेरी देखभाल की.

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आजादी से एक रोज पहले यानी 14 अगस्त 1947 की जो मेरी पहली याद है, वो है जब हम बंबई से नागपुर एक विशेष विमान से उतरे थे. नागपुर में हाथी की सवारी हुई थी. सबसे आगे के हाथी पर मेरे दादा जी थे. उसके बाद वाले पर मैं, मेरी बड़ी बहन और मां थे. उस वक्त मेरे छोटे भाई का जन्म नहीं हुआ था. कुछ देर बाद मैं रोने लगी. मां ने जब मेरे रोने की वजह जाननी चाही तो उन्हें अंदाजा लगा कि मुझे बुखार था. उसके बाद हाथी को थोड़ा अलग ले जाकर मुझे वहां से उतारकर कार से घर ले जाया गया.

गांधी समेत बड़े नेताओं का था घर में आना-जाना

मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहां गांधी जी से लेकर तमाम बड़े राजनेताओं का आना-जाना था. आजादी के पहले भी. आजादी के बाद भी. मेरे दादा श्री मंगलदास पकवासा आजादी के बाद जो पांच प्रॉविन्स बनाए गए, उनमें से एक सेंट्रल प्रॉविंस के गवर्नर थे. सेंट्रल प्रॉविन्स पांचों में से सबसे बड़ा था.

मुझे याद है कि आजादी के बाद भारत छोड़ने से पहले लॉर्ड माउंटबेटन ने पूरे देश का दौरा किया था. उन्हें दादा जी के पास भी आना था. दादा जी ने जानकारी भिजवाई कि उनके आने पर शाकाहारी भोजन परोसा जाएगा और शराब का इंतजाम नहीं होगा. मैंने बाद में सुना कि नेहरू जी इस बात से नाराज हुए थे. उनको गांधी जी ने यह कहकर समझाया कि जो अपने आदर्शों पर टिका है उसे वैसे ही रहना चाहिए.  इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन आए और तीन दिन तक हमारे यहां ठहरे. मां के हाथ के बने अलग अलग व्यंजनों का उन्होंने खूब आनंद लिया.”

उन दिनों पंडित रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उनके अलावा द्वारका प्रसाद मिश्र जो ब्रजेश मिश्र (पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रिंसिपल सेकेट्री) जी के पिता जी थे. ये लोग अक्सर राजभवन आया करते थे, लगभग रोज ही.

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भारत विभाजन के मुद्दे पर बैठक करते हुए नेहरू, माउंटबेटन और जिन्ना

दादा जी के साथ इन लोगों की जो मीटिंग होती थी वो एक तरफ, हम लोग भी वहां धमाचौकड़ी करते रहते थे. मुझे याद है कि कभी भी हम लोगों को वहां से जाने के लिए नहीं कहा गया, बल्कि दादा जी गोद में बिठा लेते थे. मुझे लड्डू खिलाते रहते थे और वो लोग अपनी जरूरी बातें करते रहते थे.

शुक्ला जी भी ऐसे ही लड्डू खिलाया करते थे. मेरे पास कुछ ऐसी तस्वीरें भी रखी हैं. मिश्रा जी बड़े विद्वान थे, कूटनीतिज्ञ भी थे. उनकी हिंदी बहुत शुद्ध और काव्यात्मक थी. मां उनके पास बैठकर कोविद विशारद का अभ्यास करती थीं. मेरा भी वहां बैठे रहने में बड़ा मन लगता था.

मेरी भाषा के शुद्ध होने के पीछे शायद यही वजह है कि जो ध्वनि बचपन से कान में पड़ी उसने जड़ाऊ गहने की तरह गहरा असर छोड़ा. उनकी कुछ कविताएं मुझे अब भी याद हैं.

लगा रहता था कलाकारों का भी आना-जाना

राजनेताओं से अलग कलाकारों का भी राजभवन में आना जाना था. मुझे याद है कि बड़े गुलाम अली खां, पंडित ओंकार नाथ ठाकुर, सिद्धेश्वरी देवी, एमएस सुब्बलक्ष्मी, बिस्मिल्लाह खान जैसे बड़े बड़े कलाकार वहां ‘स्टेट गेस्ट’ के तौर पर आमंत्रित किए जाते थे और लगभग रोज ही दरबार हॉल में महफिल लगती थी. ऐसी महफिलों में लगभग पूरी कैबिनेट, हाईकोर्ट के जज इत्यादि लोग आया करते थे.

ये सारी बातें अब भी मेरे जेहन में ताजा हैं. कलाकारों को जो आदर, सत्कार, स्नेह उस वक्त मिला करता था अब वैसा नहीं है. अब तो कलाकार ज्यादातर मौकों पर शो-पीस की तरह हैं.

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विकीपीडिया से साभार

बाद में जब हम लोग बंबई आ गए तब भी राजनेताओं का आना जाना था. उस समय ऐसा नहीं था कि जब तक आप कुर्सी पर बैठे हैं तो लोग आपको पहचान रहे हैं. उन दिनों पहचान कुर्सी की नहीं थी बल्कि व्यक्ति की थी. पंडित गोविंद बल्लभ पंत, मोरारजी देसाई, बाबू राजेंद्र प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, प्रिंस अली खान (आगा खां के पिताजी) काफी बाद तक हमारे घर आते जाते थे. मोरार जी देसाई को तो दादा जी ही राजनीति में लेकर आए थे.

जब इमरजेंसी का किया विरोध

इन लोगों के अलावा सभी धर्मों के गुरुओं का हमारे यहां आना जाना था. कई बड़े मुद्दों पर दादा जी की राय ली जाती थी. दादा जी की बात हर कोई मानता था. तमाम विचार विमर्श हम लोगों के सामने हुआ करते थे. इसीलिए हमारे भीतर एक सोच पैदा हुई. उसी सोच के चलते मैंने 1975 में इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के फैसले का विरोध किया. इमरजेंसी की तारीफ में किए गए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से मना कर दिया.

मुझे याद है उस वक्त ‘अनुशासन पर्व’ और ‘बीस सूत्रीय कार्यक्रम’ जैसे आयोजन किए जा रहे थे. जिसका नतीजा ये हुआ कि 70 के दशक में जब मेरे समकालीन कलाकारों को पद्मा सम्मान दिया गया तब मुझे नहीं दिया गया. 1992 तक मुझे पद्म अवॉर्ड नहीं मिला. फिर 1992 के आखिरी महीनों में मुझे पद्मभूषण दिए जाने का ऐलान किया गया. 2003 में मुझे पद्मविभूषण मिला.

स्वतंत्रता के 70 साल बाद भी जो एक बात मुझे कचोटती है वो है समाज का संतुलन. ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ तो बहुत सुंदर अभियान है. महिला सशक्तीकरण भी हो रहा है. महिलाएं आर्म्ड फोर्सेस में आ रही हैं, राजनीति में हैं... लेकिन ये बातें गिनानी क्यों पड़ती हैं? गिनाने का मतलब है कि कुछ नया हो रहा है. महिलाओं को लेकर जो तहजीब होनी चाहिए, जो शिष्टता होनी चाहिए वो समाज में गायब हो चुकी है. समाज एक बार फिर बहुत पुरुष प्रधान होता जा रहा है. इसमें संतुलन आना चाहिए.

(शिवेंद्र कुमार सिंह के साथ बातचीत पर आधारित)

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