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गुजरात के शेरों के खिलाफ समय का पहिया घूमा, तो क्या होगा?

खिर इसी तरह का सीडी वायरस था, जिसने 90 के दशक में एक झटके में 1100 से ज्यादा शेरों को खत्म कर दिया था

Updated On: Oct 06, 2018 10:11 AM IST

Ajay Suri, Asif Khan

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गुजरात के शेरों के खिलाफ समय का पहिया घूमा, तो क्या होगा?

गिर नेशनल पार्क के इर्द-गिर्द सस्पेंस की चादर बेहद घनी है. 36 शेरों को तीन रेस्क्यू सेंटर में पूरी तरह अलग रखा गया है. रेस्क्यू सेंटर पार्क में हैं. इन शेरों के क्रियाकलापों पर हर वक्त सीसीटीवी कैमरों से नजर रखी जा रही है. शेरों के स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले नौ सीनियर डॉक्टर्स एक से दूसरे सेंटर लगातार आ जा रहे हैं. वे घातक वायरस सीडीवी के लक्षणों पर नजर रखे हुए हैं. इस वायरस की वजह से ही अब तक 23 शेरों की मौत हो चुकी है.

इस बीच पॉलीवैलेंट वैक्सीन के 300 शॉट्स दोपहर के वक्त जूनागढ़ पहुंच गए. इन वैक्सीन को दो दिन पहले अमेरिका से डिस्पैच किया गया था. इन वैक्सीन का इस्तेमाल किस तरह किया जा जाएगा, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ साफ नहीं है. यकीनन, ऐसा तो कतई संभव नहीं है कि एक बार में गिर के आजाद और जंगली शेरों के लिए इन वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा सके. विश्वस्त सूत्रों से जो पता चला है, उसके मुताबिक सबसे पहले उन शेरों के लिए वैक्सीन का इस्तेमाल होगा, जो तीन रेस्क्यू सेंटर में ऑब्जर्वेशन पर रखे गए हैं. ये तीन सेंटर जंबवला, जसाधा और बाबरकोट में हैं. ये सेंटर 50 किलोमीटर के रेडियस में फैले हुए हैं.

अच्छी बात यह है कि जिन 36 शेरों को गहन निरीक्षण में रखा गया है, उनमें अब तक सीडीवी के कोई लक्षण नहीं दिखाई दिए हैं. इसीलिए चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (वाइल्डलाइफ सर्कल, जूनागढ़) डीटी वासवडा उतने परेशान नजर नहीं आ रहे, जितने दो रोज पहले थे. अपने ऑफिशियल घर से दूर सासन गिर में उन्होंने डेरा डाला हुआ है. उनका कहना है कि जब तक पार्क और शेरों को लेकर हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक वो अपने इस होम-कम-ऑफिस में ही रहेंगे.

डीटी वासवडा

डीटी वासवडा

पिछले एक पखवाड़े में 22 हजार स्क्वायर किलोमीटर में फैले क्षेत्र में संसाधनों और मैन पावर का जबरदस्त प्रदर्शन देखने को मिला है. इन सबकी तलाश गिर नेशनल पार्क के आसपास अपने पसंदीदा शेरों में किसी अप्रत्याशित लक्षण की रही है. जैसा वासवडा बताते हैं, इस दौरान 146 फॉरेस्ट टीम शेरों के इलाके में हरेक कोना छान कर उन्हें सुरक्षित करने की कोशिश कर रही हैं. कुल 500 लोगों की टीम में ग्राउंड फॉरेस्ट स्टाफ है, जो गिर के शेरों के सबसे नजदीक मानवीय कड़ी माने जाते हैं. इनमें ट्रैकर्स, बीट गार्ड्स और फॉरेस्टर्स हैं.

इन लोगों से साथ मिलकर पूरे गिर नेशनल पार्क और उससे जुड़े इलाकों को खंगाल डाला है. वे बीमारी के या किसी भी चेतावनी भरे लक्षण की तलाश में घूमे. उन्होंने 600 से ज्यादा शेर देखे, उन्हें खतरे के लक्षण नहीं दिखे. ये बात उन्होंने उच्च स्तर के अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट में बता दी.

अभी तक सब ठीक दिख रहा है. लेकिन अगर गुजरात के शेरों के खिलाफ समय का पहिया घूमा, तो क्या होगा. आखिर इसी तरह का सीडी वायरस था, जिसने 90 के दशक में एक झटके में 1100 से ज्यादा शेरों को खत्म कर दिया था. यह बात तंजानिया के सेरेंगेटी की है. अगर ऐसा हुआ तो...?

इस बड़े स्तर पर ट्रैजेडी होना मुश्किल है. लेकिन बुरी चीजें होती हैं. बमुश्किल 70 साल ही हुए होंगे, जब भारत ने अपना आखिरी चीता खोया था. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का अस्तित्व मानो किसी महीन धागे से बंधा हुआ है. इसी तरह गैंगेटिक डॉलफिंस भी कुछ समय में विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं.

ये सारे सवाल तो उठते ही हैं. वासवडा जवाब देने से पहले इन सवालों को पचाते हैं. कहते हैं, ‘सबसे बुरी हालत में अथॉरिटी के पास गुजरात लायंस के जीन पूल्स का विकल्प है. ये जीन पूल्स राज्य के तीन अलग क्षेत्रों में बनाए और संरक्षित करके रखे गए हैं. एक दूसरे से इनकी दूरी इतनी है, ताकि खतरनाक वायरस अटैक से बचाया जा सके. एक पूल पोरबंदर के नजदीक बेर्डा में, दूसरा मोढ़ी जिले के रामपेडा और तीसरा जूनागढ़ के सक्करबाग जू में है.’

अमेरिका से मंगाई गई दवाएं

अमेरिका से मंगाई गई दवाएं

कुछ अधिकारी बताते हैं कि कैसे गिर में शेर की तादाद इतने कम समय में बढ़ी है, जो करीब एक शताब्दी पहले महज 12 रह गई थी. लेकिन सौ साल पहले हालात पूरी तरह अलग थे. उस वक्त जूनागढ़ में नवाब मोहम्मद खान का शासन था. उन्होंने तो सबसे सीनियर ब्रिटिश अधिकारियों को भी अपने अनमोल शेरों का शिकार करने से रोक दिया था. जांजीबार और युगांडा मूल के निवासियों को लाकर ‘गिर की शान’ को बचाया था.

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