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BJP के सियासी संगीत में ‘राग शत्रु’ को खामोश करने वाला नहीं कोई साज

पर्दे की बेबाकी शत्रुघ्न सिन्हा के निजी जीवन में भी झलकती है. उनके बयानों से विवादों के तूफान उठते हैं

Updated On: Dec 09, 2017 12:46 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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BJP के सियासी संगीत में ‘राग शत्रु’ को खामोश करने वाला नहीं कोई साज

आज की राजनीति में जहां शत्रुघ्न सिन्हा खड़े होते हैं वहां से लाइन शुरू नहीं बल्कि खत्म होती है. इसकी बड़ी वजह ये है कि वो पार्टी लाइन के खिलाफ ही बोलने के लिए जाने जाते हैं.

बॉलीवुड में अपनी अदाकारी और संवाद डिलीवरी से बड़ों बड़ों को खामोश कर देने वाली ये ‘शॉट गन’ सियासत के स्क्रीन पर तोप बन जाती है.

यही वजह है कि बीजेपी के इस बड़े नेता को लेकर खुद शत्रुघ्न से उनकी तन्हाई अक्सर ये पूछा करती होगी कि ‘बीजेपी के शत्रु आखिर दोस्त किसके हैं’?

पर्दे की बेबाकी शत्रुघ्न सिन्हा के निजी जीवन में भी झलकती है. उनके बयानों से विवादों के तूफान उठते हैं. लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने खुद को उस भूमिका में ढाल लिया है कि ‘एक बार जो कह दिया तो कह दिया’. कहते हैं कि शत्रुघ्न बार बार अपने कहे की ही कीमत चुकाते आए हैं.

राजनीति में नेताओं की वफादारी ही उनके सियासी कद को बढ़ाने का काम करती है लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा के साथ ग्रहों का दोष ऐसा है कि वो जिसका साथ देते हैं वो ही उनकी रुसवाई की वजह बन जाता है.

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बीजेपी के लिए समझ पाना मुश्किल है कि शत्रुघ्न की सियासी स्क्रिप्ट कौन लिखता है? शत्रुघ्न अपने डायलॉग की वजह से ही पार्टी के भीतर शत्रु की तरह नजर आने लगे हैं.

कभी वो नरेंद्र मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने पर सवाल उठाते हैं तो कभी उनके पीएम बन जाने पर. कभी वो नोटबंदी और जीएसटी पर सवाल उठाते हैं तो कभी वो लालू के जन्मदिन पर केक खाने पहुंच जाते हैं. वो नीतीश कुमार से उस वक्त गले मिलने पहुंच जाते हैं जब बिहार विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी अपनी रैलियों में दिनभर नीतीश के डीएनए पर सवाल उठा रहे होते हैं. इसके बावजूद शत्रुघ्न सिन्हा शाम को नीतीश को विकास पुरुष बता कर एक बेहतर मुख्यमंत्री होने का ऐलान भी करते हैं.

इसकी बड़ी वजह ये थी कि बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त स्टार प्रचारकों की लिस्ट से उनका नाम गायब था तो पोस्टरों-बैनरों में भी वो लापता थे. शत्रुघ्न ने पार्टी के इस कदम का हिसाब बराबर करने के लिए लालू और नीतीश की तारीफों का सहारा लिया था और कहा कि ‘किसी की तारीफ करना गलत बात नहीं है’.

इसी तरह उनकी सियासी स्क्रिप्ट के कई प्लॉट ऐसे रहे हैं कि बीजेपी उनके अंतर्मन में झांकने की बजाए उनकी नाराज़गी में बगावत का बिगुल सुनती है क्योंकि शत्रुघ्न सबको खामोश करने के लिए खुद खामोश रहना नहीं जानते हैं.

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शत्रुघ्न के बयानों से विवाद होना लाजिमी भी है. वो बीजेपी के उन कद्दावर नेताओं में शामिल रहे हैं जो भीड़ के नायक होते थे. शत्रुघ्न की रैलियों में जमकर भीड़ उमड़ती थी. शत्रुघ्न के बोलने की अदा के लोग कायल थे तभी उन्हें बीजेपी ने नब्बे के दशक में पार्टी का झंडा थमाया था.

1996 में वो पहली दफे राज्यसभा से सांसद बने. साल 2002 में भी उन्हें राज्यसभा में एन्ट्री दी गई. तत्कालीन एनडीए सरकार में वो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री भी बने. साल 2004 में उन्हें जहाजरानी मंत्रालय भी मिला. शत्रुघ्न की पार्टी से वफादारी पर ईनामों के सिलसिले कभी रुके नहीं. लेकिन उनके बागी तेवरों से पार्टी के भीतर स्टारडम धीरे धीरे घटने लगा. हाथ आए मौकों से अपनी अलग और मजबूत छवि बनाने में शत्रुघ्न नाकाम रहे क्योंकि वो बॉलीवुड के स्टारडम से बाहर निकल ही नहीं सके थे.

अपनी किताब ‘एनीथिंग बट खामोश’ के विमोचन के मौके पर शत्रु ने तो बीजेपी की अंतरात्मा को इस तरह से झकझोरा कि कांग्रेसियों के भी कान खड़े हो गए. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तारीफ में कशीदे गढ़ते हुए कह डाला कि ‘आज अगर इंदिरा ज़िंदा होतीं तो वो कांग्रेस में होते’. उन्होंने कहा कि वो ‘इंदिरा गांधी के नैतिक मूल्यों को आज भी मानते हैं और उनसे बहुत प्रभावित थे’.

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बेबाक और बागी अंदाज़ ही शत्रुघ्न सिन्हा की पहचान बन चुका है तभी उनके आलोचक उन्हें अवसरवादी करार देते हैं. उन पर आरोप है कि नई सरकार में उनके साथ ‘सियासी डील’ न होने की वजह से ही शत्रुघ्न अपना आपा खो बैठते हैं और पार्टी के भीतर रह कर ही पार्टी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का काम करते हैं.

हाल ही में जब फिल्म ‘पद्मावती’ पर विवाद सारी हदों को पार कर गया तो शत्रुघ्न ने एक बार फिर पीएम मोदी पर सवाल उठाया और पूछा कि पीएम खामोश क्यों हैं?

यहां तक कि उन्होंने पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर खुला हमला करते हुए कहा कि केंद्र की सरकार ‘एक आदमी की सेना’ और ‘दो आदमी का शो’ है जहां 90 प्रतिशत मंत्रियों को कोई नहीं जानता. उन्होंने ये तक कह दिया कि आजकल के माहौल में या तो आप एक शख्स का समर्थन करें या देशद्रोही कहलाने के लिए तैयार रहें. उनका इशारा किस तरफ था ये सब जानते हैं.

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राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के चयन का जब दौर शुरू हुआ था तो उस वक्त शत्रुघ्न अपने दिल की बात बोलने से रुक नहीं सके थे. उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि राष्ट्रपति पद के लिए लाल कृष्ण आडवाणी ही सबसे योग्य हैं. लाल कृष्ण आडवाणी से शत्रुघ्न सिन्हा की आत्मीयता की वजह ये भी है कि माना जाता है कि आडवाणी ने ही शत्रुघ्न को राजनीति में एन्ट्री दिलाई थी. राम जन्म भूमि आंदोलन के वक्त पार्टी को भीड़ जुटाऊ चेहरे के रूप में शत्रुघ्न सिन्हा मिले थे. शत्रुघ्न के स्टारडम को बीजेपी ने जमकर भुनाया भी. शत्रुघ्न सिन्हा की स्टार वैल्यू ने उन्हें बीजेपी का स्टार प्रचारक तक बना दिया था.

लेकिन साल 2009 में बीजेपी की हार के बाद उन्होंने पार्टी के भीतर सर्जरी की जरूरत बता कर तूफान खड़ा कर दिया था.

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2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार की तस्वीर. (रायटर इमेज)

साल बदलते रहे लेकिन शत्रुघ्न के तेवर तीखे ही होते रहे. उनकी धार कुंद नहीं पड़ी. साल 2013 में पीएम उम्मीदवारी के नाम पर वो बार बार वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का ही नाम लेते रहे जबकि तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह नरेंद्र मोदी के नाम पर सहमति बना चुके थे.

आज किसी न किसी मौके पर  शुत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा को मार्गदर्शक बनाए जाने पर पीएम मोदी पर निशाना साधने में देर नहीं करते हैं.

हाल ही में उन्होंने यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी की तरफदारी कर बता दिया कि एनडीए के पुराने चावल अभी भी राजनीति की हांडी में उबल रहे हैं.

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लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतने विवादास्पद बयानों के बावजूद बीजेपी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं करती?  बीजेपी को आइना दिखाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा को शायद बीजेपी नवजोत सिंह सिद्दू वाली सजा देकर सियासत में अमर नहीं बनाना चाहती है.

फिल्म प्रेम पुजारी में एक छोटी सी भूमिका के साथ शत्रुघ्न ने बॉलीवुड में दस्तक दी थी. उन्हें निर्माता-निर्देशक ने शुरुआत में विलेन के तौर पर आजमाया और बाद में हीरो बनाया. लेकिन राजनीति में वो पहले हीरो की तरह बीजेपी में आए और अब बीजेपी में वो बेबाकी की वजह से विलेन की तरह दिखाई देते हैं. शत्रुघ्न सिन्हा का आज जन्मदिन है. देखने वाली बात होगी कि उन्हें बधाइयां देने वाले वो नाम शामिल होते हैं या नहीं जिन पर शत्रुघ्न सिन्हा साल भर निशाना लगाते आए हैं.

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