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इस रिसर्चर ने 100 रेप दोषियों से की बातचीत, ज्यादातर की नजरों में पीड़िता की ही गलती थी

एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के क्रिमिनोलॉजी डिपार्टमेंट में अपनी डॉक्टरल थीसिस लिख रहीं मधुमिता ने तिहाड़ जेल में 100 ऐसे अपराधियों से बातचीत की, जो रेप के आरोप में सजा काट रहे हैं

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Aug 11, 2018 09:15 PM IST

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इस रिसर्चर ने 100 रेप दोषियों से की बातचीत, ज्यादातर की नजरों में पीड़िता की ही गलती थी

वो सारी बुराइयां जिसके लिए एक मनुष्य ने खुद को ज़िम्मेवार माना है, उनमें से कोई भी बुराई इतनी अपमानजनक और स्तब्ध करने वाली नहीं है, जितनी उसके द्वारा इंसानियत की आधी आबादी यानी महिलाओं के साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार है.

-महात्मा गांधी

इस बात को लगभग साढ़े पांच साल हुए हैं जब निर्भया का सामूहिक बलात्कार किए जाने के बाद, उसे मरने के लिए एक व्यस्त सड़क पर छोड़ दिया गया था. उस घटना के बाद वो लड़की हमारे समाज की सामूहिक हताशा बनकर उभरी, उन बुराइयों के खिलाफ़ जिसे हमारे इस समाज ने न सिर्फ़ जन्म दिया है, बल्कि उसे पोसा भी है.

16 दिसंबर 2012, को हुई उस घटना के बाद, रेप जैसी समस्याओं से निपटने के लिए देश में मौजूद कानून की समीक्षा के लिए जस्टिस जेएस वर्मा कमिटी की स्थापना की गई थी. इस कमिटी ने इस कानून की समीक्षा करने के अलावा, उनमें ज़रूरी बदलाव के सुझाव भी दिए. हालांकि, 644 पन्नों में दिए गए कमिटी के सभी सुझावों को माना भी नहीं गया था. लेकिन, इन सुझावों ने रेप से संबंधित कानून के संशोधन में सहायता ज़रूर की, जहां एक बलात्कारी को दोषी पाए जाने पर 7 साल से कम की सज़ा दिए जाने के प्रावधान को खत्म कर दिया गया, बलात्कार के लिए दी जाने वाली सज़ा को और ज़्यादा सख़्त कर दिया गया.

इस संशोधन में, कंसेन्ट यानी कि ‘सहमति’ की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित किया गया-जहां ये साफ़ किया गया कि ऐसे मामलों में ‘सहमति’ न सिर्फ़ स्पष्ट होनी चाहिए बल्कि साफ़-साफ़ प्रेषित भी. इतनी ही नहीं, ऐसे मामलों के जल्द निपटारे के लिए फास्टट्रैक कोर्ट भी बनाए जाने की सख़्त ज़रूरत है. किसी भी रेप केस की सुनवाई चार्जशीट दाख़िल किए जाने के दो महीने के भीतर पूरा कर लिया जाना चाहिए. इसके साथ ही अब भारत में, अब किसी भी तरह के यौनिक हमले से निपटने के लिए कई तरह के नए कानून बना दिए गए हैं. इनमें स्टॉकिंग यानि किसी का पीछा करना, ज़बरदस्ती सेक्सुअल व्यवहार करना, छूना और व्यॉयरिज़्म मुख्य रूप से शामिल हैं, जिन्हें आईपीसी की धारा 354 A-D के तहत अपराध घोषित किया गया है. ये सभी अपराध पहले धारा 354 का हिस्सा थे, जिसे एक महिला के सतीत्व या शीलता का हनन माना गया था.

लेकिन, इन नए संशोधनों और कानूनों के बन जाने के बाद क्या भारत में रहने वाली महिलाएं पहले से ज़्यादा सुरक्षित हो गई हैं? बिहार के मुज़फ़्फरपुर और यूपी के देवरिया के शेल्टर होम्स में जिस तरह से नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण का मामला सामने आया है, वो कुछ और ही कहानी बयां करता है.

अगर हमें आज की सही तस्वीर समझनी है तो हमें सिर्फ़ नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा महिला सुरक्षा से संबंधित आंकड़ों पर नज़र डालने की ज़रूरत है. इन आंकड़ों को देखने के बाद हमें ये अच्छी तरह से समझ में आ जाएगा कि ये आंकड़े अपवाद नहीं हैं. गृहमंत्रालय का ही एक विभाग, एनसीआरबी है, जो देशभर में साल भर अपराध की जो भी घटनाएं होती हैं, उससे जुड़ा सालाना आंकड़ा जारी करता है, उसके मुताबिक साल – 2016 में एक साल पहले यानी की 2015 की तुलना में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराधों में 2.9% की बढ़त दर्ज की गई है. रेप के मामलों में 12.4% की बढ़ोत्तरी हुई है. क्योंकि साल 2015 में महिलाओं के साथ रेप के कुल 34,6451 मामले हुए थे जबकि साल 2016 में ये संख्या बढ़कर 38,947 हो गया.

निर्भया, कठुआ रेप पीड़िता और मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम में रहने वाली 46 मासूम बच्चियों को इंसाफ दिलाने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है, वो तब तक बेमायने है, जबतक कि हम बार-बार होने वाले इस तरह के अपराध की वजह को न समझ सकें, उसके जड़ तक न पहुंच सके. ऐसा होने की एक बहुत बड़ी वजह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था और समाज और देश की व्यवस्था में विपरीत जेंडर के प्रति संवेदनहीनता के कारण पैदा होती है?

ब्रिटेन के शेफील्ड हैलम यूनिवर्सिटी में क्रिमिनॉलिजी की लेक्चरर मधुमिता पांडेय के मुताबिक – इस संबंध में जो सज़ायाफ्ता क़ैदी या रेपिस्ट हैं, वो इस समय ऐसे अपूर्व पोजिशन में हैं, जहां वे ऐसी जानकारी दे सकते हैं, जिसके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं गया था. एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के क्रिमिनोलॉजी डिपार्टमेंट में अपनी डॉक्टरल थीसिस लिख रहीं मधुमिता इन दिनों भारत में हैं. इस दौरान वे दिल्ली के तिहाड़ जेल गईं और वहां उन्होंने 100 ऐसे अपराधियों से बातचीत की, जो रेप के आरोप में सज़ा काट रहें हैं. एक ईमेल- इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने फील्ड वर्क से संबंधित जानकारियां हमसे बांटीं. उसी इंटरव्यू का एक अंश हम यहां आपके सामने रख रहे हैं-

मधुमिता पांडेय

मधुमिता पांडेय

आप इस विषय की तरफ कैसे आकर्षित हुईं?

ज्योति पांडेय के रेप केस के बाद, जितना भी और जिस भी तरह गुस्सा चारों तरफ देखा जा रहा था, उसमें एक बात जो सबके दिमाग में घूम रहा था वो ये कि ‘आखिर इन चार-पांच लोगों के समूह ने आख़िर क्यों इतने जघन्य वारदात को अंजाम दिया?’ या फिर ये कि ‘आखिर इन लोगों ने ऐसी घिनौनी हरकत की क्यों?’ ये सब देखते हुए मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि एक तरफ सभी लोग टीवी न्यूज़ चैनल से लेकर, संसद और सड़क पर चल रही बहस में जहां इन सवालों से जूझ रहे थे, वहीं किसी ने ये सोचने की कोशिश नहीं कि, इस सवाल का सीधा जवाब उस घटना को अंजाम देने वाले अपराधियों से से ही हमें सीधा-सीधा मिल सकता है.....इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही उनसे ये सवाल पूछ लूं. मेरी रुचि मुझे महिलाओं के साथ किए जाने वाले शारीरिक और यौनिक हिंसा के बारे में शोध करने में है, ख़ासकर भारत में और वो भी अपराधियों के नज़रिए से.

ऐसा क्यों ज़रूरी है कि यौन हमलों के अपराधियों के पूर्वाग्रहों या उनकी सोच-समझ को जाना जाए?

जो लोग रेप के मामलों में सज़ायाफ्ता कैदी हैं, वो जानकारी देने के लिहाज़ से एक बेहद ही रोचक पोजीशन में होते हैं, जिसके बारे में हमने पहले कभी सोचा नहीं था. हम उनसे बात करके काफी कुछ जान और समझ सकते हैं, मसलन – उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिलती है, वे किस तरह से अपराध को अंजाम देते हैं, अपने शिकार (पीड़ित) का चुनाव कैसे करते हैं.....आदि. इसके अलावा हम उनके निजी जीवन के बारे में काफी कुछ जान पाते हैं- जैसे, आखिर ऐसे कौन से कारण हैं, जिस वजह से वे ऐसा अपराध कर बैठते हैं, उनकी सोच, भावनाएं, निजी रिश्ते इत्यादि.

आपने जिन 100 कैदियों से मुलाक़ात की, उनमें से एक ऐसा है जिसने आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया...क्यों?

मुझे याद है कि मैंने जितने से केस के बारे में जानने की कोशिश की, उनमें से सभी अपने आप में अलग और अनूठे हैं, और अलग-अलग तरह से मेरी रिसर्च में काफी मददगार भी साबित होंगे. लेकिन एक केस जो मैं आपके साथ बांटना चाहती हूं वो पार्टिसिपेंट नंबर 49 का है.

इस 23 साल के क़ैदी ने प्राइमरी स्कूल तक की शिक्षा पूरी की है और एक मंदिर में साफ़-सफाई का काम करता था. उसे साल 2010 में एक पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के आरोप में सज़ा हुई थी. उसने बताया कि उसकी शिकार बच्ची एक भिखारन थी, जिसने उसे तब उकसाया जब वो अपने काम में व्यस्त था. जब मैंने उससे विस्तार से इस ‘उकसाने’ के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि ‘वो मुझे ग़लत तरीके से छू रही थी, तो मैंने सोचा कि मैं उसे सबक सिखाऊंगा....उसकी मां भी उसी की तरह है, उसके चरित्र को लेकर भी तमाम बातें होती हैं.’ ऐसे सभी मामलों में 'पीड़ित पर दोष मढ़ने का चलन बहुत ही आम बात है, लगभग सभी यौन अपराधी इस तरह की बातें करते हैं और ये केस भी उससे अलग नहीं था.'

जिस बात ने मुझे परेशान किया वो इस हमले से जुड़े विवरण को जानकर हुआ. और ये कि उस लड़के को ऐसा लगता था कि वो अपनी ग़लती या अपराध को जेल से छूटने के बाद, लड़की से शादी करके खत्म कर सकता है या उससे मुक्त हो सकता है.

मुझसे मिलकर बात करने से पहले, उस लड़के को दो प्रश्नावली भरने को दिया गया था. उसने प्रश्नावली में महिलाओं के प्रति मनोभाव वाले सेक्शन में काफी कम नंबर पाए थे, जो महिलाओं के प्रति उसकी रूढ़िवादी और पारंपरिक सोच को दर्शाती थी. मल्टी-कल्चरल मैस्कुलिनीटी आईडियोलॉजी स्केल में भी, ये साबित हुआ कि उसके अंदर महिलाओं के प्रति यौनिक ज़िम्मेदारी का अभाव है, वो उनके प्रति संवेदनशील भी नहीं है. उसके अलावा- पुरुषों के शारीरिक बल या ताक़त के स्केल पर उसे काफी ज़्यादा अंक मिले, जो ये बताता है कि उसने अपने भीतर समाज में मर्दों और औरतों को लेकर जो सांस्कृतिक सोच बना हुआ उसे अपने आत्मसात कर लिया है. जैसे- ‘पुरुषों को कब और कैसे बर्ताव करना चाहिए और एक 'मर्द और मर्दानेपन' का मतलब क्या होता है?’

मुझसे हमेशा पूछा गया है, अगर इस कहानी ने मुझपर सबसे ज़्यादा असर डाला है, या सबसे ज़्यादा परेशान किया है. मैंने इस केस के बारे में लिखने का इसलिए सोचा क्योंकि- (1) ये सज़ायाफ्ता क़ैदी मेरे अंतिम रिसर्च सैंपल का हिस्सा नहीं था, इसलिए मुझे इस बात की चिंता नहीं थी कि मैं अपने रिसर्च के नतीजों को समय से पहले लोगों तक लेकर आ रही हूं, और (2) मैं बच्चों के साथ होने वाली यौन हिंसा के बारे में एक आर्टिकल लिख रही थी, और ये युवक उन कुछ लोगों में से एक था जो एक बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी थी, इसलिए मेरे लिए उसके केस का इस्तेमाल करना सुरक्षित था.

इसके अलावा इस लड़के ने जिस तरह से उस बच्ची के साथ शादी करके अपने आप को पाप मुक्त करने की प्लानिंग कर ली थी, वो कहीं न कहीं हमारे देश के कई प्रभुत्व लोगों ने भी कहा था- मसलन मद्रास हाईकोर्ट के जज पी देवदास ने हाल ही में एक बलात्कारी को सिर्फ़ इसलिए जेल से बाहर जाने की अनुमति दे दी, ताकि वो अपनी विक्टिम/पीड़िता के साथ मध्यस्था कर सके. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगर देखें तो पाएंगे कि मलेशिया के एक पूर्व शरिया जज दातुक शाहबुद्दीन ने भी ये सुझाव दिया था कि बलात्कारियों को अपने द्वारा बलात्कार की गई पीड़ित महिला के साथ शादी कर लेनी चाहिए, जिससे उन महिलाओं को कम से कम एक ‘पति’ तो मिल जाएगा.

ठीक इसी तरह, पिछले साल पश्चिम के कई देशों ने अपनी यहां के उस कानून में फेरबदल किया, जिसके तहत पहले उन बलात्कारियों को माफ़ कर दिया जाता था जो अपने विक्टिम या शिकार महिलाओं के साथ शादी कर लिया करते थे. लोग ये भूल जाते हैं कि बलात्कार का असर हमारे शरीर से ज्य़ादा हमारे मन-मस्तिष्क पर होता है. इतना कि कई रेप सर्वाइवर के साथ वैसे ही बर्ताव किया जाता है जैसे किसी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के मरीज़ के साथ.

बलात्कार के जिन दोषियों से आपने बातचीत की, क्या उनमें से किसी ने अपनी करनी को लेकर पछतावा व्यक्त किया?

जितने भी लोगों से मैंने बात की, उनमें से बहुत कम लोगों ने अपने द्वारा किए गए अपराध की ज़िम्मेदारी ली. लेकिन यहां हमें दो बात को ध्यान में रखना चाहिए: पहला ये कि एक बलात्कारी अपने अपराध को लेकर पछताए या उसके अंदर पश्चाताप की भावना हो, उसके लिए उसे पहले ये समझना और मानना होगा कि उसने जो किया वो ग़लत था. क्योंकि मेरे रिसर्च सैंपल के ज्य़ादातर मर्दों ने अपने द्वारा किए गए अपराध को गलत माना ही नहीं है. (क्योंकि उनमें से ज़्यादातर को ये पता ही नहीं था कि कन्सेंट यानी कि सहमति किसे कहते हैं). उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं था कि उन्होंने क्या ग़लत किया है. उन्होंने कहा कि गलती उनकी नहीं है, वे दोषी नहीं है. दूसरा, ये कि पछतावा अलग-अलग तरह से व्यक्त किया जा सकता है. कुछ पुरुषों ने सीधे-सीधे कह दिया कि उन्हें अपनी करनी पर पछतावा है और वे ये नहीं चाहेंगे कि उनकी बहन या बेटी के साथ कोई भी ऐसा करे, जिससे ये साबित होता है कि कहीं न कहीं वे इस बात को समझ रहे हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया वो काफी ग़लत था.

इन सभी लोगों में से, मुझे एक वो व्यक्ति याद है, जिसने मुझसे कहा कि उसकी एक बड़ी बहन है और अगर किसी ने उसकी उस बहन को किसी तरह से नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, तो उसे नहीं पता कि वो क्या कर देगा. थोड़ी देर बाद वो रुककर बोला कि, ‘वो यानी कि वो पीड़ित लड़की भी किसी की बहन रही होगी मैडम.’ तो जहां एक तरफ कुछ प्रतिभागियों ने जहां खुलकर अपनी ग़लती नहीं मानी या पछतावा व्यक्त नहीं किया, वहीं उनके कुछ जवाबों से ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि खुद को दोषी मान रहे हैं. लेकिन, उनमें से कुछ लोगों ने ही इसे खुलकर स्वीकार किया.

एक औसत दिमाग वाले व्यक्ति के भीतर, आख़िर वो ऐसा कौन सा कारण होता है जो उसे इस तरह का कृत्य करने के लिए उकसाता है? क्या बलात्कार सिर्फ़ इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है या इसके पीछे कुछ और स्याह सच्चाई होती है?

हमें ऐसा लगता है कि जो लोग बलात्कार करते हैं, उनमें जन्म से (जैविक या मनोवैज्ञानिक) तौर पर गलत होता है– ‘डार्क डिजायर्स’ जैसा आपने कहा, लेकिन वैसा कुछ है नहीं. रेप एक बहुत ही जटिल अपराध है और उसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण काम करते हैं. मैंने इसके पीछे के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष को जानने की कोशिश की है. हालांकि, हम किसी भी तरह की यौन हिंसा से सेक्स को बाहर नहीं कर सकते हैं, लेकिन फिर भी हर बलात्कार सिर्फ़ सेक्स या वासना के कारण नहीं होता. मैंने ज़्यादातर मामलों में देखा कि जो भी आदमी बलात्कार का दोषी होता है, वो ये अपराध सिर्फ़ इसलिए कर देता है क्योंकि वो ऐसा कर सकता था. उनके पास इरादा और मौका दोनों ही मौजूद था. सेक्स हमेशा मुख्य वजह नहीं रहा, लेकिन जब वो सुलभ था तो उसको लेकर एक किस्म का अधिकार भी देखा गया. कई अन्य मौकों पर, बलात्कार की वजह ताक़त और अपना अधिपत्य स्थापित करना भी रहा.

अपने रिसर्च के दौरान आपने सभी या ज़्यादातर रेप के अभियुक्तों में कौन सी समानता पाई?

पीड़ित पर दोषारोपण करना और कन्सेंट यानी सहमति की अवधारणा को लेकर भ्रमित होना.

सेक्स अपराध के लिए आप हमारी शिक्षातंत्र को किस हद तक दोषी मानती हैं? क्या आपको लगता है कि स्कूलों में बच्चों को सेक्स एजुकेशन न मिल पाना इसकी एक बड़ी वजह है?

हां, भारत में सेक्स एजुकेशन का होना बहुत ज़रूरी है. अगर हमलोग सेक्स के बारे में ही खुलकर बात नहीं पाएंगे तो सेक्सुअल वॉयलेंस यानी यौनिक हिंसा के बारे में कैसे बात करेंगे?

सेक्स एजुकेशन पर एक विस्तृत कार्यक्रम को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने से न सिर्फ़ हम किशोर होने बच्चों को उनके शरीर और उम्र बढ़ने के साथ उसमें होने वाले शारीरिक बदलावों के बारे में बता सकते हैं, बल्कि उन्हें रज़ामंदी और एक-दूसरे की निजी स्पेस की इज्ज़त करना भी सिखा सकते हैं. मेन्सट्रुएशन, शारीरिक संभोग, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियों, गर्भधारण के ख़तरे के अलावा, युवाओं को शारीरिक शोषण और दुर्व्यवहार के बारे में भी पता होना चाहि,. जिससे उन्हें भी इन अपराधों के बारे में जानने और समझने का मौका मिलेगा. वे ‘सेक्स क्राइम’ को पहचानना शुरू कर देंगे. ताकि, वे इससे खुद का भी बचाव कर सकें और दूसरों का भी. जब कभी उनके साथ ऐसा हो रहा हो तो वे इसे पहचान कर, मदद के लिए भी आवाज़ उठा सकते हैं. बच्चों को सेक्स के प्रति संवेदनशील बनाकर, और उन्हें इसके बारे में बात करने के लिए सुरक्षित वातावरण देकर ही हम यौन हिंसा से निपटने के लिए सभी को तैयार कर सकते हैं.

कुछेक साल पहले मैंने अपने स्कूल के एक सीनियर निकिता गुप्ता का लिखा एक आर्टिकल देखा, निकिता इस समय स्कूल ऑफ लाइफ़ फाउंडेशन से जुड़ी हैं, और जिस तरह से उसकी वो संस्था माता-पिता, बच्चों और टीचर के साथ मिलकर वर्कशॉप कर रही थी, उसे देखकर मैं बेहद उत्साहित हो गई. उस वर्कशॉप में उन बच्चों को ‘सुरक्षित और असुरक्षित टच यानी स्पर्श’ के बारे में बताया जा रहा था. एक ऐसे देश में जो लगातार बच्चों के साथ होने वाली यौन हिंसा की समस्या से जूझ रहा है वहां उनको उनके शरीर और शरीर के अंगों के बारे में बतलाना, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में समझाना काफी मायने रखता है. इस तरह की बातों के लिए कोई सही उम्र नहीं होती. मां-बाप और शिक्षक 3-4 साल की कम उम्र से भी बच्चों से इस बारे में बात करना शुरू कर सकते हैं. लेकिन, अफसोस की बात है कि भारत में आज भी जेंडर स्टीरियोटाइप यानि लैंगिक रूढ़ीवादिता को दूर करने और महिलाओं के खिलाफ़ होने वाली यौन हिंसा के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है.

भारत में लगभग 90 % रेप के मामलों की रिपोर्ट की ही नहीं जाती, इसे कैसे सुधारा जा सकता है?

प्रोत्साहन और मदद हर कोने और हर वर्ग से आना चाहिए. निजी स्तर पर, परिवार और दोस्तों को इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि अगर बात बाहर आ जाए तो इससे परिवार की ‘साख़’ और ‘इज्जत’ पर क्या असर पड़ेगा, साथ ही साथ उन्हें पीड़ित को ये भी बार-बार याद दिलाना चाहिए कि जो भी हुआ उसके लिए वे दोषी नहीं हैं. संस्था के स्तर पर, ऐसी वारदात होने पर पीड़ित को जल्द से जल्द मेडिकल और मनोवैज्ञानिक मदद दी जानी चाहिए. पुलिस और लीगल टीम को भी ऐसे मामलों को संवेदनशील तरीके से हैंडल करने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. पीड़ित को पुलिस के पास जाने में और वहां अपनी शिकायत करने में हिचक नहीं होनी चाहिए. सामाजिक स्तर पर हमें ऐसे मामलों के प्रति लोगों को जागरूक करना होगा, ताकि लोग सदियों से चली रही परंपरा के अनुसार पीड़ित को दोषी ठहराना छोड़ दें और पुरूषों के कृत्य का समर्थन करना.

इन दिनों हम सब काफी हद तक सोशल मीडिया पर आश्रित हो गए हैं, जो आधुनिक दुनिया के लिए काफी ज़रूरी भी है, लेकिन भारत में इसका प्रयोग काफी हद तक सीमित है क्योंकि वो दूर-दराज़ के गांव और देहाती इलाकों तक लोगों के बीच पहुंच नहीं पाया है. ऐसे इलाकों में अक्सर होने वाले इस तरह के अपराध पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते, या फिर अगर बहुत हुआ तो स्थानीय ख़ाप पंचायत बिठा दी जाती है, जो अपना फैसला सुना देती है. मुझे ये भी लगता है कि सेक्स को लेकर सहमति, महिलाओं के प्रति लोगों के व्यवहार, यौन हिंसा से संबंधित जागरुकता अभियान क्षेत्रीय भाषाओं में चलाए जाने की बेहद ज़रूरत है. सरकार को भी इस मसले पर सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है. उन्हें इसको लेकर गंभीर होने की ज़रूरत है न कि यौन हिंसा को हल्के में लेने की. एनसीआरबी द्वारा जो आंकड़े जारी किए गए हैं, क्या हमें उसे खतर की घंटी समझना चाहिए, जिसमें थाने में रिपोर्ट की जाने वाली यौन हिंसा के मामलों में बढ़त दिखाई गई है ?

एकबारगी देखने में ये आंकड़े हमें खतरे की घंटी लग सकते हैं, लेकिन उसके पीछे कुछ अच्छी बातें भी छिपी हैं. पहला, ये कि कैसे अब पहले से कहीं ज्य़ादा लोग, चाहे वो रेप पीड़िता हो या उसका परिवार, वो बलात्कार के मामलों पर चुप बैठने के बजाए आवाज़ उठा रहे हैं. सख़्त कानून होने, मीडिया में रिपोर्टिंग, लोगों में जागरूकता के बढ़ने के कारण अब बलात्कार या यौन हिंसा को लेकर समाज में पहले जो कलंक या दाग लगने वाली भावना हुआ करती थी, वो कम हुई है. दूसरा, ये कि इससे पुलिस विभाग की तरफ से भी बलात्कार के मामलों की शिकायत लेने, उन्हें रजिस्टर करने में बेहतर बदलाव आए हैं, जिससे लोगों में विश्वास बढ़ा है.

कठुआ और उन्नाव रेप केस के बाद, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख़्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती और केंद्रीय महिला एवं बालकल्याण मंत्री मेनका गांधी ने नाबालिग से रेप करने वालों को फांसी की सज़ा की मांग की है. क्या आपके हिसाब से ये सही होगा?

मैं मौत की सज़ा को लेकर अलग राय रखती हूं. मैं सुधार और पुनरुद्धान की बड़ी हिमायती हूं. किसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत के लिए कठोर दंड या प्रतिशोध सही रास्ता नहीं होता. इसके विपरीत हमें हमारा ध्यान समाज में संरचनात्मक सामाजिक बदलाव लाने की दिशा में काम करना होगा. ताकि, उसकी मदद से हम हमारे समाज में औरत और मर्द के बीच जो असंयमित पॉवर इक्वेशन व्याप्त है, उसे खत्म किया जा सके.

आपके रिसर्च की सबसे महत्वपूर्ण खोज क्या है?

मैंने हमेशा कहा है कि ये जो पुरुष हैं वो कोई राक्षस नहीं हैं. हम सबके दिमाग में उनको या उनके अमानवीय रूप को लेकर एक हौआ बना हुआ है, ये एक ऐसी सोच है जो हमारे और उनके बीच एक फासला बना देती है. ‘हम’- वो लोग हो जाते हैं जो बहुत अच्छे हैं, समाज और कानून के हर नियम का पालन करते हैं और ‘वे’ वो होते हैं जो दुष्ट और बुरे होते हैं. इस फर्क के ज़रिए हमने एक ऐसा रास्ता खोज निकाला है, जिसके तहत समाज में जो कुछ भी बुरा है या हो रहा है उसके लिए हम बड़ी ही आसानी से उन्हें दोषी ठहरा देते हैं. ये करते हुए हम एक बार भी अपने भीतर झांककर देखने की कोशिश नहीं करते हैं.

आत्मनिरीक्षण और जागरूकता दोनों का होना बहुत ही ज़रूरी है. और इसी कारण मेरी रिसर्च के पीछे का उद्देश्य उस सोच को बदलना है, जो हमें पुरूषों के एक पूरे समूह को अकेला करने, उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग करने को प्रेरित करता है. ऐसा करते हुए हम उन मर्दों का नामकरण भी कर देते हैं, उन्हें ‘राक्षस’ करार देते हैं. ये जानने और समझने की कोशिश किए बगैर कि आखिर वो कौन सी वजहें हैं जिस कारण, एक पूरे समाज का नज़रिया या व्यवहार ऐसा हो गया है – वो समाज जिसका हिस्सा ये मर्द भी हैं.

भारत में होने वाला बलात्कार भी अपने आप में विचित्र है, ऐसा हमारे देश की विविधता के कारण है जो- धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर तो हैं ही- कई अलग मानदंडों पर भी हम अलग हैं. उसपर हमारी बड़ी आबादी भी एक समस्या है. ऐसे में ये पता लगा पाना बहुत ही मुश्किल होता है कि इस तरह की हिंसा के पीछे की असली वजह क्या है. संपूर्णता में अगर देखा जाए तो ये कहा जा सकता है कि मेरे काम की सबसे बड़ी खोज इस बात को स्थापित करना है कि- यौन हिंसा हमेशा एक निरंतरता में घटने वाली हिंसा है. चूंकि, रेप या बलात्कार एकदम से दूसरे छोर की चीज़ है, जो कहीं ज़्यादा गंभीर और दर्दनाक है, इसलिए हम उसपर ज्य़ादा ध्यान देते हैं और उसे ज़्यादा कष्टप्रद मानते हैं. जबकि, चरम हिंसा की ये वारदात होतीं हीं इसलिए हैं क्योंकि हम रोज़मर्रा के दिनों में पूरी निरंतरता के साथ होने वाली यौन हिंसा को नज़रअंदाज़ करने के आदी हो गए हैं. जैसे- ईव टीज़िंग, लैंगिकतावादी चुटकुले, महिलाओं के प्रति इस्तेमाल की जाने वाली घटिया भाषा, गाली और उत्पीड़न- जिन्हें एक खतरे के तौर पर देखा भी नहीं जाता है. और बड़ी आसानी से हमारे समाज में उसे स्वीकार्यता मिल गई है.

हमारी प्राथमिकता इन रोज़मर्रा के दिनों में होने वाली ‘कम खतरनाक घटनाओं’ पर ज्य़ादा होनी चाहिए. क्योंकि यही वो मामले हैं जो अंत में हिंसात्मक व्यवहार के शीर्ष पर पहुंच जाती है, या फिर लोगों को उसे बर्दाश्त करने के लिए तैयार कर देती है. मैं ऐसा मानती हूं कि हमें ज्य़ादा साध्य और व्यवहारिक लक्ष्य की तरफ ज्य़ादा ध्यान देना चाहिए, ताकि हम इस समस्या का दूर तक सामना कर सकें.

संक्षेप में कहें तो, एक मल्टी-डिसिप्लीनरी रिसर्च के ज़रिए हमें ये पता चलता है कि बलात्कार की एक घटना के पीछे कई कारण होते हैं. जो कहीं से पैदा हो सकता है– इसमें व्यक्ति का बायोलॉजिकल, कॉगनिटिव़, साईकोलॉजिकल, सिचुएशनल, क्रिमिनॉलिजिकल और सामाजिक क्षेत्र या बैकग्राउंड सभी कुछ मायने रखता है. मेरे काम के ज़रिए मैंने सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष और असर को समझने की कोशिश की है. मैंने अपने रिसर्च के ज़रिए विपरीत जेंडर की पारंपरिक भूमिका को घरेलू काम के बंटवारे, सांस्कृतिक संदर्भों में नारीत्व का आदर्श और पुरूषत्व के ज़हरीले और विकृत रूप को समझने की कोशिश की है.

इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है कि 'बलात्कारी वो क्यों करते हैं, जो वो करते हैं', क्योंकि बलात्कार एक बहुत ही जटिल अपराध है. बलात्कार की हर कहानी न सिर्फ़ अलग होती है, बल्कि काफी हद तक वैयक्तिक भी– कुछ मर्द गैंगरेप की घटना में शामिल थे, कुछ अपने शिकार को पहले से जानते थे तो कुछ ने बिल्कुल ही अंजान महिलाओं के साथ ये घृणित कार्य किया था. इसके अलावा बलात्कारियों के भी कई प्रकार हैं– कुछ गुस्सैल रेपिस्ट हैं, कुछ परपीड़क तो कुछ सीरियल रेपिस्ट. लेकिन, अपराध के तरीकों या स्वभाव में फर्क के बावजूद, जो एक बात सबमें सामान्य था, वो था उनके भीतर महिलाओं को लेकर हक़ और अधिकार की भावना, जो एक बार फिर से हमारे समाज में मर्दों को जो ऊंचा स्थान दिया गया है, उसे ही साबित करती है. हर केस में आरोपी ने विक्टिम यानी पीड़ित पर खूब सारा दोषारोपण भी किया, जो बिल्कुल भी नई बात नहीं थी क्योंकि जिस तरह से हमारे समाज में बलात्कार और औरतों को लेकर लोगों की सोच को भ्रमित किया गया है, उसमें ऐसा होना ही था. अंत में- ये कि जो बात लगभग हर केस में महसूस किया गया कि– किसी भी दोषी को स्त्री की ‘सहमति’ का मतलब ही नहीं पता था.

इस समस्या से निकलने के लिए ज़्यादा ज़रूरी ये है कि हम हमारे समाज में कुछ सुव्यवस्थित संरचनात्मक बदलाव लेकर आएं, जो रोज़मर्रा के दिनों में होने वाली इस तरह की मर्दवादी और स्त्रीविरोधी घटनाओं को कम कर सकें. न कि एकाएक सोचें कि किसी जादू की छड़ी को घुमाते ही बलात्कार की समस्या को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए या कर देंगे.

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