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सर्चलाइट: जिसके संपादक आजादी के पहले और बाद भी जेल गए

सर्चलाइट की कहानी पत्रकारिता ही नहीं दुनिया भर के लिए एक मिसाल है

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Sep 27, 2017 11:54 AM IST

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सर्चलाइट: जिसके संपादक आजादी के पहले और बाद भी जेल गए

‘सर्चलाइट’ पटना का एक ऐसा दैनिक अखबार था जिसके एक संपादक  आजादी की लड़ाई के दिनों में जेल गए तो दूसरे संपादक आजादी के बाद. पहले संपादक मुरली मनोहर प्रसाद थे तो दूसरे थे टी.जे.एस.जॉर्ज.

इसके अलावा भी उस अखबार ने सच उजागर करने के कारण काफी कुछ सहा. कई बार राज्य सरकार ने न सिर्फ उसके सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए बल्कि 1974 में तो सर्चलाइट बिल्डिंग में अराजक तत्वों ने आग तक लगा दी. यह अंग्रेजी अखबार 1918 में शुरू होकर 1986 में बंद हो गया.

पत्रकारिता में बनाया मिसाल

इस अखबार के संस्थापकों में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद प्रमुख थे. बाद में इसे बिड़ला बंधुओं ने खरीद लिया था. इस बीच ‘सर्चलाइट’ ने पत्रकारिता के क्षेत्र में मील के कई पत्थर गाड़े. डा.एन.एम.पी. श्रीवास्तव ने 700 पृष्ठों में सर्चलाइट का इतिहास लिखा है.

किसी अखबार का इतिहास 700 पृष्ठों में ?

इसी से इसकी ऐतिहासिकता का पता चलता है. मशहूर इतिहासकार डा.के.के.दत्त के अनुसार तो ‘सर्चलाइट का इतिहास आजादी की लड़ाई का इतिहास है.’

सर्चलाइट का प्रकाशन 1918 में द्वि-साप्ताहिक अखबार के रूप में शुरू हुआ था. 1920 में यह त्रि-साप्ताहिक बना. 1930 से यह दैनिक के रूप में छपने लगा. बीच में कई कारणों से इसका प्रकाशन पांच बार बंद हुआ. सर्चलाइट के पहले संपादक सैयद हैदर हुसैन और दूसरे महेश्वर प्रसाद थे.

उसके बाद सी.एस.आर.सोमयाजुलु और एस.रंगा अय्यर भी बारी -बारी से संपादक बने. सबसे लंबे समय तक मुरली मनोहर प्रसाद संपादक रहे. के. रामाराव, एम.एस.एम.शर्मा, डी.के. शारदा, टी.जे. एस.जॉर्ज, सुभाष चंद्र सरकार, एस.के.राव और आर.के.मक्कर संपादक बने.

बंद हुआ सर्चलाइट

1986 में बिड़ला समूह ने सर्चलाइट की जगह पटना से हिन्दुस्तान टाइम्स निकालना शुरू कर दिया. आजादी के बाद भी सर्चलाइट का तेवर बना रहा था. साठ के दशक में टी.जे.एस.जार्ज ने बिहार सरकार के भ्रष्टाचार और ज्यादतियों को उजागर करना शुरू किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री के.बी.सहाय ने जॉर्ज को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया. के.बी.सहाय के खिलाफ जनता उठ खड़ी हुई थी.

नतीजतन 1967 के चुनाव में पहली बार बिहार से कांग्रेस की सत्ता चली गई थी. उससे पहले के.बी.सहाय चाहते थे कि अखबार जनता की नाराजगी की खबरें न छापे. जॉर्ज इसके लिए तैयार नहीं थे.

जेपी आंदोलन में भूमिका

1974 के जेपी आंदोलन के समय सही खबरें देने के कारण बौखलाई बिहार सरकार ने सर्चलाइट-प्रदीप का सरकारी विज्ञापन ही बंद कर दिया था.

याद रहे कि सर्चलाइट ग्रुप के ही  दैनिक ‘प्रदीप’ की भूमिका भी सर्चलाइट से कोई अलग नहीं थी. जेपी आंदोलन के दिनों में तो आंदोलन से जुड़ी खबरें देने में प्रदीप सबसे आगे था. पर सर्चलाइट को सर्वाधिक शोहरत बाढ़ के सती केस पर मिली.

उन दिनों अंग्रेजों का शासन था. पटना जिले के बाढ़ में एक महिला ने अपने पति की चिता पर जल कर अपनी जान दे दी. पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों पर केस चलाया. उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था. अदालत ने उन लोगों को सजा दे दी.

कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क को नहीं माना कि ‘जब महिला अपने पति की चिता पर बैठी तो एक चमत्कार हुआ. चिता से अपने आप चमत्कारिक आग निकल आई और वह जल गई. किसी ने उसे नहीं जलाया.’

सर्चलाइट के वकील बने मोतीलाल नेहरू

उस वक्त पटना हाईकोर्ट के अधिकतर जज अंग्रेज थे. इस केस के फैसले के दौरान एक जज ने ऐसी टिप्पणी कर दी जिससे भारतीय खास कर हिंदू भावना को ठेस पहुंचती थी.

इस पर 1928 और 1929 में सर्चलाइट ने कई लेख लिखे. इन लेखों को हाईकोर्ट ने अदालत की अवमानना माना. अवमानना का केस चला. उस वक्त संपादक मुरली मनोहर प्रसाद थे. सर्चलाइट के बचाव में पटना हाईकोर्ट में वकील के रूप में मोती लाल नेहरू, सर तेज नारायण सप्रू और शरतचंद्र बोस उतरे.

सरकार की तरफ से सर सुलतान अहमद ने वकालत की. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में 5 जजों की खंडपीठ बनी. अखबार को अवमानना का दोषी माना गया. सर्चलाइट पर 200 रुपए का जुर्माना हुआ. अखबार प्रबंधन या संपादक जुर्माना भरने का तैयार नहीं थे.

किसने भरा जुर्माना?

किसी अनाम व्यक्ति ने जुर्माना भर दिया. क्योंकि अदालत एक संपादक को जुर्माने के बदले जेल नहीं भेजना चाहती थी. उन दिनों यह चर्चा थी कि जुर्माना खुद मुख्य न्यायाधीश ने अपनी तरफ से भर दिया है.

बाद में डा.सच्चिादानंद सिन्हा के आवास पर मुख्य न्यायाधीश और मुरली मनोहर प्रसाद की मुलाकात हुई. मुख्य न्यायाधीश संपादक की निष्ठा से प्रभावित थे. बाद में मुख्य न्यायाधीश एक भारतीय नाम से सर्चलाइट में लेख लिखने लगे.

उनका लेख भारत की आजादी के पक्ष में होते थे. यह बात सिर्फ संपादक जानते थे. बाद में मुरली मनोहर प्रसाद के एक रिश्तेदार ने एक बार मुझे बताया था कि अंग्रेज मुख्य न्यायाधीश द्वारा लेख लिखे जाने की बात सही है. वह मुख्य न्यायाधीश सर कोर्टनी टेरेल थे जो लगातार दस साल तक पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे. यह था एक अखबार का असर!

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