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जब एक विदेशी बैंक में डूब गए थे दरभंगा के जौहरी मोहसिन के अरबों रुपए

हैदराबाद निजाम के जौहरी रहे मोहसिन ने 77 अरब रुपए की कीमत के हीरे जवाहरात एलजीमिन बैंक की कोलकाता शाखा में 21 अगस्त 1923 को जमा कराए थे, जो उन्हें कभी वापस नहीं मिल पाए

Updated On: Mar 08, 2018 11:27 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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जब एक विदेशी बैंक में डूब गए थे दरभंगा के जौहरी मोहसिन के अरबों रुपए

हीरा व्यापारी नीरव मोदी पर तो भारतीय बैंकों के पैसे मार लेने का आरोप है लेकिन, दरभंगा के दिवंगत जौहरी मुहम्मद मोहसिन की कहानी ठीक उल्टी है. मोहसिन के उत्तराधिकारी का आरोप है कि एक विदेशी बैंक ने उसके 77 अरब रुपए के वो हीरे जवाहरात मार लिए जो उसने 1923 में जमा किए थे.

77 अरब रुपए की कीमत 1985 के अनुसार है. हैदराबाद निजाम के जौहरी रहे मोहसिन ने 77 अरब रुपए की कीमत के हीरे जवाहरात एलजीमिन बैंक की कोलकाता शाखा में 21 अगस्त 1923 को जमा कराए थे. उसकी रसीद भी उसके उत्तराधिकारी के पास है. हालांकि बाद में बैंक ने लिख दिया कि ‘मोहसिन ने जो 21 करोड़ रीशमार्क (जर्मन मुद्रा) जमा किया था, उसका अब कोई विनिमय मूल्य नहीं है.’

भारत सरकार ने मोहसिन की कोई मदद नहीं की थी जबकि अस्सी के दशक में भारतीय संसद में भी यह मामला उठा था. बिहार के दरभंगा के मूल निवासी मोहसिन कई साल तक बैंक से मुकदमा लड़ते रहे. मोहसिन की तरफ से केस लड़ने वाले वैद्यनाथ मिश्र ने अस्सी के दशक में इस लेखक को बताया था कि बैंक ने मूल मुद्दे को कभी अदालत के सामने आने ही नहीं दिया. वैद्यनाथ मिश्र अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब इस बात की भी कोई जानकारी नहीं है कि इस केस को आगे बढ़ाने वाला कोई है या नहीं. लेकिन यह अपने आप में अद्भुत मामला है.

क्या है कहानी?

वैद्यनाथ मिश्र के अनुसार एक विदेशी बैंक में किसी भारतीय के खरबों रुपए डूबने की यह कहानी है. मोहसिन ने मरने से पहले शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र को दान पत्र के जरिए इस विदेशी बैंक में जमा धन का उत्तराधिकारी बना दिया था. मोहसिन, मिश्र परिवार के कर्जदार थे.

मोहसिन हैदराबाद निजाम के यहां जौहरी का काम करते थे. कहते हैं कि वहां से उन्होंने किसी-न-किसी तरीके से काफी हीरे-जवाहरात लाए थे. मोहसिन ने उन हीरे-जवाहरात को नीदरलैंड ट्रेडिंग एजेंसी की कोलकाता ब्रांच में जमा किया था. बाद में ट्रेडिंग सोसायटी एक बैंक में बदल गई, जिसका नाम पड़ा एल्जीमीन बैंक नीदरलैंड एन.वी.

उन हीरे-जवाहरात की कीमत आंक कर ट्रेडिंग सोसायटी ने मोहसिन को 21 अगस्त, 1923 को 21 करोड़ रीशमार्क  की रसीद दे दी थी. पर जब मिश्र ने इस धन को विदेश से वापस लाने के लिए उस बैंक से पत्र-व्यवहार शुरू किया, तो एल्जीमीन बैंक ने कभी तो लिखा कि वह लौटाने को तैयार है, तो कभी कहा कि उस राशि मार्क का अब न तो कोई विनिमय मूल्य है और न ही कोई कीमत.

मिश्र ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और बाद के अन्य सत्ताधिकारी नेताओं से बारी-बारी से गुहार लगाई. देश भर में चक्कर काटते रहे. पर सफलता नहीं मिली.

सरकार से कितनी मिली मदद?

27 जुलाई, 1989 को सीपीआई के चतुरानन मिश्र ने यह मामला राज्य सभा में उठाया. केंद्र सरकार ने सीधा हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. पर चतुरानन मिश्र ने 18 जुलाई 1990 को संसद में धरना देने की धमकी दी, तो भारत सरकार ने जांच करके बताया कि यह मामला सिर्फ 70.80 गिल्डर (2002 तक चली नीदरलैंड की करेंसी) का है. इतने छोटे मामले में भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी.

15 अगस्त, 1990 को भी हुकुम देव नारायण यादव सहित 14 सांसदों ने तत्कालीन प्रधान मंत्री वीपी सिंह को पत्र लिखा और धन की वापसी के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया. दिल्ली हाई कोर्ट के वकील आरके जैन ने 1999 में मुख्य सतर्कता आयुक्त को लिखा कि वह इस बात की जांच कराएं कि इस धन के विदेश से वापस लाने में भारतीय सरकारी बैंकों ने किस तरह की लापरवाही बरती है.

वैद्यनाथ मिश्र के साथ इस लेथक की 1984 में हुई लंबी बातचीत का विवरण यहां पेश है.

सवाल: आपके दावे में कोई दम भी है? क्योंकि यह रकम तो अविश्वसनीय लगती है.

जवाब: मेरी हर बात ठोस सबूतों के आधार पर है. यदि एल्जीमीन बैंक समझता है कि मेरे दावे में दम नहीं है, तो वह मूल मुद्दे को अदालत के सामने क्यों नहीं आने दे रहा है? पर बैंक तकनीकी आधार पर प्रारंभिक दौर में ही इस मामले को खत्म करा देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है.

सवाल: इसका तकनीकी आधार क्या है?

जवाब: यही कि मैंने कोर्ट फीस जमा नहीं की है और दावे के मामले में तमादी (वक्त समाप्त) हो चुकी है.

सवाल: जब आपके दावे में इतना दम है, तो फिर कोर्ट फीस की रकम जमा कर देने के लिए कोई फाइनेंसर मिल जाना चाहिए था?

जवाब: इस मुकदमे के बारे में अभी लोगों को मालूम ही नहीं है. अन्यथा कोई फाइनेंसर मिल जाता. वैसे तो इस केस को खुद भारत सरकार को लड़ना चाहिए था. क्योंकि हासिल होनेवाली रकम में कानूनन 80 फीसदी तो भारत सरकार को ही मिलनी है.

सवाल: क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मोहम्मद मोहसीन ने एल्जीमीन बैंक में वही जर्मन रीशमार्क जमा किया हो, जो उन दिनों हजारों में देने पर एक कप चाय मिलती थी?

जवाब: असंभव! बिलकुल असंभव! ! मरते समय मोहसिन ने मुझे बताया था कि उसने हीरे-जवाहरात ही जमा किए थे और मरते समय सामान्यतः कोई झूठ नहीं बोलता. साथ ही आपको तो मालूम ही होगा कि जर्मनी एक देश है और नीदरलैंड दूसरा देश. नीदरलैंड पर कुछ वर्षों को छोड़कर कभी किसी देश का अधिकार नहीं रहा.

पड़ोस का देश होने के कारण नीदरलैंड के भारत स्थित बैंक को यह मालूम था कि जर्मन रीशमार्क को उसी देश के लोग लेने से इनकार कर रहे थे. यहां तक कि जर्मन सरकार ने रीशमार्क अस्वीकार करने के जुर्म में अपने कुछ नागरिकों को फांसी भी दे दी थी. रीशमार्क उन दिनों जर्मनी के निजी छापाखानों में भी छपने लगे थे. जर्मन सरकार भी जो नोट छाप रही थी, उस पर भी सरकार की ओर से ऐसा कोई वादा नहीं होता था जैसा कि भारतीय नोट पर रिजर्व बैंक के गवर्नर की तरफ से लिखा रहता था कि ‘मैं धारक को ......रुपए अदा करने का वचन देता हूं.

ऐसी स्थिति में ऐसा हो ही नहीं सकता कि जो रीशमार्क जर्मनी में ही अस्वीकृत हो रहा हो, उसे साढ़े 4 प्रतिशत ऊंचे ब्याज पर कोई दूसरा देश लेता. फिर बात यह भी है कि जो मोहसिन कभी विदेश नहीं गया, वह इतना अधिक जर्मन रीश मार्क लाता कहां से? सबसे बड़ी बात यह है कि एल्जीमीन बैंक के पास यदि मोहसिन का दिया हुआ जर्मन रीशमार्क है, तो उसने 1968 में लिखित वायदा करने के बावजूद उस जमाकर्ता को लौटाया क्यों नहीं?

दरअसल बात यह है कि जौहरी मोहसिन ने हीरे-जवाहरात जमा किए थे, जिसकी कीमत मार्क में लगा कर बैंक ने रसीद दे दी थी. इतिहास बताता है कि उन दिनों मार्क नीदरलैंड में मनी आॅफ एकाउंट था.

सवाल: क्या आपने नीदरलैंड का आर्थिक इतिहास भी पढ़ा है?

जवाब: इस मामले को लेकर मैंने इस देश के लगभग सभी पुस्तकालयों को छान मारा है. विदेशों से भी कुछ सहित्य मंगाया है. यहां तक कि मैंने जर्मन रीशमार्क का एक नोट भी जर्मनी से मंगाया है, जो उन दिनों प्रचलित था. (मिश्र ने वह नोट भी इस लेखक को दिखाया.)

सवाल: क्या यह जर्मन नोट वही नोट है, जिसे मोहसिन द्वारा जमा करने की बात एल्जीमीन बैंक कर रहा है?

जवाब: इसमें भी घपला है. मोहसिन ने 21 अगस्त, 1923 को जमा किया. जर्मन रीशमार्क सितंबर, 1923 में पहली बार छपा. उसी पर यह भी लिखा हुआ है कि यह दो वर्षों के बाद प्रचलन में आएगा, तो फिर ऐसे रीशमार्क को एल्जीमीन बैंक कैसे स्वीकार कर सकता था, जो अभी प्रचलन में नहीं था और छपा भी नहीं था?

सवाल: इस बात के आपके पास और क्या प्रमाण हैं कि मोहसिन ने नोट नहीं, बल्कि हीरे-जवाहरात ही जमा किए थे?

जवाब: एल्जीमीन बैंक इतना अधिक सूद (साढ़े चार प्रतिशत प्रति वर्ष) किसी कीमती सामग्री पर ही दे सकता है. मोहसिन जौहरी थे और और बाद में ‘नवाब’ हो गए थे. इसलिए उनके पास इतने हीरे-जवाहरात होना नामुमकिन नहीं था.

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