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व्यंग्य: बिप्लब की बात में तो दम है, गलती लोगों की है उनकी बात ही नहीं समझ पा रहे

बापुरों को कौन समझाए कि सियासत में हर बात शास्त्र सम्मत नहीं होती बहुत सी बातें कथावस्तु पर आधारित होती हैं.

Updated On: Apr 19, 2018 09:14 AM IST

Shivaji Rai

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व्यंग्य: बिप्लब की बात में तो दम है, गलती लोगों की है उनकी बात ही नहीं समझ पा रहे

'नरो वा कुंजरो वा' यह उद्घोष आज किसी युधिष्ठिर के मुंह से नहीं निकला है. न किसी द्रोणाचार्य को भ्रमित करने की मंशा ही हुई है. आज नरो वा कुंजरो वा की हुवां-हुवां प्रतिध्वनि त्रिपुरा के नए मुख्यमंत्री बिप्लब देब के उद्धरण के बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर गूंज रही है. बिप्लब देब ने एक कार्यक्रम में कहा है कि भारत में डिजिटल युग की शुरुआत नई नहीं है, महाभारत काल से ही भारत इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है. मतलब गांधीगीरी से भी पुराने समय से डेटागीरी जारी है.

तभी तो संजय ने दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को युद्ध में होने वाली सारी घटनाओं का लाइव विवरण सुनाया था. बिप्लब देब ने पुरातन विरासत का बखान क्या किया लोग उनके ही चिरहरण पर उतारू हो गए. मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. कुछ तलवार लेकर निकले तो कुछ ने व्यंग्य के तीर छोड़े. लगा जैसे हास-परिहास का आईपीएल शुरू हो गया हो. हर कोई अपना स्ट्राइक रेट बनाने में लग गया.

बापुरों को कौन समझाए कि सियासत में हर बात शास्त्र सम्मत नहीं होती बहुत सी बातें कथावस्तु पर आधारित होती हैं. वैसे भी बिप्लब ने यह तो नहीं कहा कि महाभारत का युद्ध स्वयंसेवकों और भगवाधारियों ने लड़ा. उन्होंने यह भी नहीं कहा कि युद्ध में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष की अहम भूमिका थी. उन्होंने यह भी नहीं कहा कि पांडवों के पूरे युद्ध की रणनीति और संचालन नागपुर कार्यालय से हुआ था. उन्होंने तो केवल दंतकथा को विज्ञान की कसौटी दी. उन्होंने तो केवल तकनीक की कल्पना को पुष्टि का धरातल दिया. उन्होंने यह भी तो नहीं कहा कि बीआर चोपड़ा ने महाभारत की फाइल हस्तिनापुर राज्य की तिजोरी से चुराकर या उसके कंप्यूटर को हैक कर डाउनलोड की थी.

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विदेशी आभार के इंफेक्शन से ग्रसित इन कालिदासों को कौन समझाए कि कथावस्तु और किंवदंती की माने तो इंटरनेट तो तुच्छ है, महाभारत काल में क्लोन के विकास से लेकर डीएनए परीक्षण और लिंग परिवर्तन आम और सहज संभव था. सवाल उठता है कि क्या कुंती का संतान उत्पन्न करने में असमर्थ पति को 5 संतति का सुख उपलब्ध कराना क्लोन तकनीकी से आगे का विज्ञान नहीं? क्या गांधारी के गर्भ के मांस के अविकसित लोथड़े के सौ टुकड़े से सौ बच्चों का जन्म क्या आज के चिकित्सा विज्ञान के लिये चुनौती नहीं है? क्या द्रोण में संरक्षित प्रजनन द्रव से बिना गर्भ निर्धारण द्रोणाचार्य का जन्म चुनौती नहीं है? क्या भीष्म की मृत्यु के संकल्प में पांचाल राजकुमारी अम्बा का शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म और लिंग परिवर्तन, अंग प्रत्यारोपण और हार्मोन्स परिवर्तन आज के लिए भी का अहम उद्धरण नहीं है.

हास परिहास के केंद्र में रहने वाली द्रौपदी का विवाह भले ही आज की दृष्टि में असामान्य लगता हो पर असंतुलित लिंगानुपात के दौरान नारी जाति का पुरुष प्रधान की शुचिता के लिए त्याग न कहा जाय तो क्या कहा जाए. अवधू गुरु का तो कहना है कि बिप्लब देब की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने पुरातन मान्यताओं को सरकारी पुष्टि दी. व्यंग्य से नाराज गुरु का कहना है कि पहले की तरह सॉरी और एक्सट्रीमली सॉरी का वक्त नहीं होता तो आज सोशल मीडिया पर महाभारत का शंखनाद जरूर हो गया होता. कई कौरव आज ट्रोल को लेकर मानहानि का मुकदमा झेल रहे होते.

फिलहाल गुरु कृष्ण की तरह बिप्लब देब के साथ हैं. नारायणी सेना चाहे जितनी उत्पात मचाए जीत बिप्लब देव की ही होनी है. डेटा चोरी के इस युग में आखिर कौन सी चीज नहीं है जो महाभारत काल मे न रही हो. आज भी कितनी पांचाली भरी सभा में नंगी की जाती हैं. कितने अभिमन्यु गोरक्षा के नाम पर घेर कर मार दिए जाते हैं. कितने कर्ण बिना पिता के नाम घूम रहे हैं. कुछ भी नया नहीं है फिर इंटरनेट को मान लेने में क्या हर्ज...आखिर डिजिटल जो हैं हम...!!

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