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पटेल जयंती: योग्यता रहने के बावजूद सरदार पटेल ने वंश की राजनीति नहीं की

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने जीवनकाल में अपनी संतान को न तो सांसद बनवाया और न ही कोई मंत्री

Updated On: Oct 31, 2018 09:27 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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पटेल जयंती: योग्यता रहने के बावजूद सरदार पटेल ने वंश की राजनीति नहीं की
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आज जबकि अपने वंश और परिजन को, योग्यता नहीं रहने के बावजूद, राजनीति में ऊंचे से ऊंचा पद दिलाने के लिए बड़े-बड़े नेताओं में होड़ मची हुई है, ऐसे समय में सरदार बल्लभ भाई पटेल अधिक याद आते हैं.

सरदार साहब ने अपने जीवनकाल में अपनी संतान को न तो सांसद बनवाया और न ही कोई मंत्री. हालांकि उनके कुछ समकालीन नेताओं ने अपने वंश को आगे बढ़ाने का काम तभी से शुरू कर दिया था. पर सरदार तो कुछ अलग ढंग के नेता थे. आजादी के समय उनकी पुत्री मनीबेन और पुत्र दाह्या पटेल वयस्क और योग्य थे. उन्होंने आजादी की लड़ाई में जेल यातना भी भुगती थी. सरदार साहब के निधन के बाद वो जरूर सांसद बने. दाह्या भाई पटेल की गिनती तो देश के सर्वोत्तम सांसदों में होती है.

वंशवाद की राजनीति कर लोकतांत्रिक व्यवस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं

सरदार पटेल के परिवार पर भ्रष्टाचार का भी कभी कोई आरोप नहीं लगा. लेकिन आज इस देश के कई बड़े नेता अपने अयोग्य परिजन को ऊंचे पदों पर बिठाकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.

सरदार बल्लभ भाई पटेल की दो संतानें थीं. दोनों देश सेवा और समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत थीं. वो योग्य पिता की योग्य संतानें थीं. उनको लेकर कभी कोई विवाद भी नहीं सुना गया. पर शब्द के सही अर्थों में गांधीवादी सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में इनमें से किसी को मंत्री कौन कहे, सांसद तक नहीं बनने दिया.

हां, सरदार की देखभाल के लिए उनकी पुत्री मनीबेन उनकी सेवा में साथ रहती थीं. निजी सहायक के रूप में काम करती थीं. 15 दिसंबर, 1950 को 75 वर्ष की आयु में सरदार पटेल का निधन हो गया. सरदार के निधन के बाद उनकी पुत्री मनीबेन पटेल बंबई चली गईं. उन्होंने वहां सरदार पटेल ट्रस्ट और अन्य दातव्य संस्थाओं के लिए काम किया. तब गुजरात भी बंबई राज्य का ही हिस्सा था.

सरदार पटेल के पास कांग्रेस का कोष रहता था. सरदार के निधन के फौरन बाद मनीबेन ने पैसों से भरे बक्से को जवाहर लाल नेहरू को ले जाकर दे दिया था. मनीबेन का जन्म 3 अप्रैल, 1903 को हुआ था. मनीबेन 1918 में 15 वर्ष की छोटी उम्र में ही महात्मा गांधी के प्रभाव में आ गई थीं. वह अहमदाबाद स्थित गांधी आश्रम में काम करने लगीं. उन्होंने असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया. वह 1942 से 1945 तक येरवडा जेल में रहीं.

Jawahar Lal Nehru and Sardar Patel

जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की साथ की तस्वीर (फोटो : फेसबुक से साभार)

अपनी डायरी लिखी जिसमें उन्होंने सच्ची बातें लिखी

मनीबेन 1930 में अपने पिता की निजी सहायक बन गई थीं. यह भूमिका उन्होंने 1950 में उनके निधन तक निभाई. इस दौरान मनीबेन ने अपनी डायरी लिखी. इसमें उन्होंने सच्ची बातें लिखीं, जो बाद में ‘इनसाइड स्टोरी आॅफ सरदर पटेल: द डायरी आॅफ मनीबेन पटेल’ नाम से पुस्तक के रूप में छपी.

उस डायरी में साल 1936 से 1950 तक का विवरण है. निजी सहायक के रूप में काम करते समय वह इस बात का ध्यान रखती थीं कि किसी के साथ अनावश्यक बात करते-करते सरदार साहब थक न जाएं. सरदार के पुत्र दाह्या भाई पटेल का जन्म 28 नवंबर, 1905 को हुआ था.

दाह्या भाई ने गुजरात विद्यापीठ में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाई. उन दिनों पूरे देश में विद्यापीठें थीं. वो स्वतंत्रता आंदोलन का ही हिस्सा मानी जाती थीं. तब स्वतंत्रता सेनानी अपनी संतानों को उन्हीं विद्यापीठों में शिक्षित करते थे. दाह्या भाई पटेल पहले ओरिएयंटल इंश्योरेंस कंपनी में काम करते थे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और राजनीति में शामिल हो गये.

साल 1942 से 1944 तक दाह्या भाई जेल में थे. 1957 और 1962 में वो लोकसभा के सदस्य बने. वह राज्यसभा में भी रहे. पहले वो कांग्रेस पार्टी में थे पर बाद में वो स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गए. पूर्व गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी ने 1960 में इस पार्टी की स्थापना की थी. 1967 में लोकसभा में यह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी थी.

दाह्या भाई पटेल दक्षिण पूर्व एशिया की राजनीति के विशेषज्ञ माने जाते थे. लोग उन्हें उच्च कोटि के सांसद कहते थे. 11 अगस्त, 1973 को उनके निधन के बाद राष्ट्रपति वी.वी.गिरी ने उन्हें देशभक्त और कुशल सासंद कहा था. यानी इतनी योग्यता रहते हुए भी सरदार पटेल की संतान संसद में तभी पहुंची जब सरदार पटेल इस दुनिया में नहीं रहे.

एक बार डॉ. नामवर सिंह ने मुझसे कहा कि वह अपने बेटे को गोद में लेकर दुलारने की इच्छा पूरी नहीं कर सके थे. ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय गांवों के संयुक्त परिवारों में ऐसी परंपरा नहीं होती थी कि कोई अपनी संतान को गोद में ले. वह दूसरे की संतान को गोद में लेगा और उसकी अपनी औलाद को परिवार का कोई दूसरा सदस्य खेलाएगा.

सरदार वल्लभ भाई पटेल अपने परिवार के साथ (फोटो : फेसबुक से साभार)

सरदार वल्लभ भाई पटेल अपने परिवार के साथ (फोटो : फेसबुक से साभार)

 

अनेक नेता मौजूद थे जो अपनी संतान को राजनीति में नहीं बढ़ाते थे

स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ी मेंं ऐसे अनेक नेता मौजूद थे जो उसी परंपरा का पालन करते हुए अपनी संतान को राजनीति में नहीं बढ़ाते थे. हालांकि उनमें भी कई अपवाद थे. सरदार पटेल कुछ अलग ढंग के थे.

आज तो देश के अधिकतर नेताओं के सामने यही सबसे बड़ी चिंता होती है कि किस तरह वो अपनी संतान को अपनी जगह स्थापित कर दें. नेता की संतान का राजनीति में आना परिवारवाद नहीं है. बल्कि प्रधानमंत्री की संतान को सीधे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की संतान को सीधे मुख्यमंत्री बनवा देना वंशवाद है.

इससे त्याग-तपस्या और कर्तव्य के साथ लाइन में खड़े सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं-नेताओं का हक मारा जाता है.

(ये लेख पूर्व में भी प्रकाशित हो चुका है)

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