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1993 की आतंकी साजिश को दोबारा लिखने की कोशिश संजू की सबसे बड़ी कमजोरी

यहां तथ्यों के आधार पर संजय दत्त और राजू हिरानी को ये याद दिलाना जरूरी है कि संजय दत्त को सजा कोर्ट ने दी थी मीडिया ने नहीं

Updated On: Jul 11, 2018 02:06 PM IST

Naghma Sahar Naghma Sahar

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1993 की आतंकी साजिश को दोबारा लिखने की कोशिश संजू की सबसे बड़ी कमजोरी

साहब बीवी और गैंगस्टर का तीसरा पार्ट जल्द ही आने वाला है. ट्रेलर ऑनलाइन देखा जा सकते है. ट्रेलर में सबसे पहले कोई ध्यान खींचता है तो वो है संजय दत्त. एक गैंगस्टर के तौर पर फिल्मों में उनकी धमाकेदार वापसी जिसकी जमीन उनकी जीवनी संजू ने तैयार कर दी है.

संजय दत्त गैंगस्टर का रोल बढ़िया करते आए हैं. खलनायक, नाम, वास्तव, और अब आ रही है साहब बीवी और गैंगस्टर. लगता है ये रोल खास संजू बाबा के लिए ही लिखा गया है. संजय दत्त कहते सुने जा सकते हैं. जिंदगी का मजा मैंने बहुत कम लिया है, वापस लौटा हूं जिंदगी भर का मजा लेने. मजा और सजा के बीच झूलती रही है  संजय दत्त की अब तक की जिंदगी. लेकिन लगता है कि कसर बाकी रह गई थी , तो अब संजय दत्त के मजे के दिन वापस आ गए हैं. पीछे से कोरस चल रहा है. ‘He is the baba’

समस्या इस बात से नहीं कि संजय दत्त जिंदगी भर का मजा लेने लौट रहे हैं. जो लगता है कि फिल्म का डायलॉग कम और संजय दत्त का दुनिया के लिए पैगाम ज्यादा है. उन्हें हक है कि वो जिंदगी का बेफिक्री से मजा लें और फिल्मों में उनकी वापसी हो जिसके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत सारे लोग उनके साथ खड़े हैं.

ये फिल्म संजय दत्त की कहानी पर संजय दत्त का अपना नजरिया है

हिंदी फिल्मों में उनके माता-पिता की बहुत बड़ी विरासत है, बेशुमार यादगार फिल्में हैं. मदर इंडिया से लेकर सुजाता, चोरी-चोरी और मुन्नाभाई तक. राजनीतिक तौर पर भी परिवार की अच्छी साख रही है. सुनील दत्त बेहद हर दिल अजीज़ और ऐसे शख्स रहे जिनकी सब इज्ज़त करते. इन सब चीज़ों की वजह से संजय दत्त के साथ उनकी तमाम गलतियों के बावजूद बहुत सारे लोग खड़े रहे. जिसमें बॉलीवुड भी शामिल  है. इसलिए विधु विनोद चोपड़ा और संजू के दोस्त राजकुमार हिरानी अगर उनकी जिंदगी को साफ़ सुथरा करके, उसके किरदार पर उठे तमाम सवालों, कोर्ट से हुई एक अपराध के लिए सजा को संजय दत्त के भोलेपन की वजह से एक तरह से सही ठहराते हुए नज़र आते हैं.

फिल्म में रुलाने धुलाने के जज़्बात दिल खोल कर इस्तेमाल हुए हैं. ये निर्देशक की क्रिएटिव फ्रीडम है, उनकी अपनी पसंद है. इसमें भी कोई आपत्ति जायज़ नहीं कि निर्देशक ने संजय दत्त के सिर्फ अच्छे पहलु को उनकी जीवनी पर बनी फिल्म के लिए क्यों चुना. ज़ाहिर है ये फिल्म संजय दत्त की कहानी पर संजय दत्त का अपना नजरिया है. वो अपनी बात, अपना पक्ष लोगों को बताना चाहते हैं. लेकिन समस्या बेईमानी से है. फिल्म बनने के पहले और फिल्म में भी ये बताया गया है कि ये कहानी संजय दत्त का पक्ष नहीं, निष्पक्ष है. ये सच नहीं है. संजय दत्त की बायोपिक होने का दावा करने वाली ये फिल्म अपनी सहूलियत से तथ्यों को चुनती है. इसी से ये सवाल उठता है कि लोगों की जिंदगी पर बनी जीवनियां क्या PR की कसरत बनकर रह गई हैं.

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जीवनी की दुनिया भी अजीब है. अमूमन राजनेताओं की ही जीवनियां बना करती थीं. लेकिन अमेरिका में  मैल्कम  X  की भी बायोपिक बनी जो मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, अश्वेतों के अधिकार के लिए लड़ते थे, है और अल कापोन और बगसी सिगल पर भी जो सबसे मशहूर गैंगस्टर थे. लैरी फ्लिंट जो जानी मानी पोर्न मैगज़ीन हस्लर के पब्लिशर थे उन पर भी फिल्म बनी, बायोग्राफिकल ड्रामा पीपल VS लैर्री फ्लिंट. मतलब कि हर रंग के किरदारों पर फिल्म बनी उन पे भी जो विवादित थे. अपने-अपने क्षेत्रों में मिसाल कायम कर चुके लोगों की जिंदगी पर फिल्म बनाने का चलन फिर बॉलीवुड में शुरू हुआ.

संजय दत्त को सजा कोर्ट ने दी थी मीडिया ने नहीं

भारत में मिल्खा सिंह पर, धोनी पर, डाकू फूलन देवी पर फिल्में बनी. इसलिए संजय दत्त के दिलचस्प जीवन जो सच में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं पर फिल्म बनना कोई ताज्जुब की बात नहीं लेकिन ये फिल्म हकीकत से ईमानदारी नहीं करती. संजय दत्त अपनी की गई गलतियों के लिए न कहीं पछताते हैं न ही ये दिखाया गया है की वो कभी कुछ ग़लत कर रहे हैं. हर बार उन्हें एक ऐसे व्यस्क के तौर पर दिखाया जो दिल और अक्ल से बच्चा है, जिसे लोगों ने फंसा दिया और वो बहकावे में गलती कर बैठे. और दरअसल ये मीडिया की वजह से हुआ की वो फंस गए. बल्कि फिल्म मीडिया को गाली देने से भी नहीं चुकती. यहां तथ्यों के आधार पर संजय दत्त और राजू हिरानी को ये याद दिलाना जरूरी है कि संजय दत्त को सजा कोर्ट ने दी थी मीडिया ने नहीं.

बॉम्बे ब्लास्ट का जो वो पूरा प्लॉट था जिसका भूल से ही सही वो हिस्सा बने, वो ISI की पूरे भारत में अराजकता फैलाने की बहुत बड़ी साजिश थी जो नाकाम हुई. साढ़े तीन टन RDX अगर इस्तेमाल होता तो बर्बादी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. 500 ग्रेनेड और 71 AK 47 राइफल पहुंचाए गए थे. इसी में से 3 AK 47 , 25 हैंड ग्रेनेड और 9 mm पिस्तौल लेकर अबू सालेम, समीर हिंगोरा, हनीफ कडावाला संजय दत्त के घर पहुंचे. शायद सुनील दत्त की वजह से ये घर शक के दायरे से बाहर लगा होगा.

अब धमकियां कुछ अलग तरीके से दी जाती हैं

अदालत में संजय दत्त ने दलील दी थी कि परिवार को बचाने  के लिए इसी में से 1 AK 47 उन्होंने रख ली. लेकिन उस दौरान सुनील दत्त साहब के पास खुद 3 लाइसेंस वाले हथियार थे. फिर क्या जरूरत थी AK 47 और ग्रेनेड की. उस ज़माने में सोशल मीडिया का दौर नहीं था तो धमकियां फोन पर मिल रही होंगी. आजकल तो धमकियों का ही दौर है, ट्विटर से लेकर स्मार्टफोन तक. आज के दौर में तो स्वरा भास्कर से लेकर संजय लीला भंसाली और दीपिका पादुकोण को नाक और सिर काटने की धमकी मिली है. धमकियां तो कितने सारे पत्रकारों को भी मिल रही हैं, जान की धमकी, उनके पास शायद संजय दत्त के दोस्तों जैसे दोस्त नहीं जो धमकी का मुकाबला करने सीधे ग्रेनेड और AK 47 घर पहुंचा दें. गंभीर सवाल है कि क्या इस बहाने आप AK 47 खरीद लेंगे और फिर खुद को बेगुनाह और भोला साबित करती हुई एक फिल्म से आपके सारे अपराध ख़ारिज कर दिए जाएंगे.

संजय दत्त पर आर्म्स एक्ट और टाडा दोनों में केस हुआ था, वो काफी खुशकिस्मत रहे कि सिर्फ आर्म्स एक्ट में सजा हुई. पहले TADA के तहत सजा हुई लेकिन अब महीने बाद कोर्ट ने ये कह कर TADA को रद्द कर दिया कि वो आतंकवादी नहीं हैं, उन्होंने अपने बचाव के लिए हथियार लिए थे.

11 साल बाद उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत 6 साल की सजा हुई जिसे कोर्ट ने कम कर के 5 साल कर दिया. उसमें भी 1825 दिनों में से उन्होंने 1400 दिन की सजा काटी, बीच-बीच में पेरोल पर बाहर भी आते रहे जिस पर लोगों ने नाराज़गी जताई तो बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से पुछा कि सभी कैदियों के साथ इतनी रियायत होती है. संजू बाबा को निर्दोष और मीडिया को विक्टिम दिखाकर उनकी वापसी की दोबारा तैयारी है जिसमें कोई परेशानी नहीं लेकिन खतरनाक है इतिहास को तोड़ मरोड़ कर दिखाना. 1993 के खतरनाक आतंकी प्लॉट को दोबारा लिखने की कोशिश इस फिल्म की सबसे बड़ी भूल है.

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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