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सआदत हसन मंटो: साहित्य की अभिजात्य दुनिया का बाहरी आदमी

ऐसे लापरवाह और बेतरतीब लेखक की प्रासंगिकता और चर्चा वक्त के साथ जैसे बढ़ रही है उससे लगता है कि मंटो में ऐसा कुछ था जिसकी जरूरत हमारी दुनिया में दिनों दिन ज्यादा होती जा रही है

Updated On: Jan 18, 2018 09:44 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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सआदत हसन मंटो: साहित्य की अभिजात्य दुनिया का बाहरी आदमी
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जब सआदत हसन मंटो की मौत हुई थी तब वे उर्दू के चर्चित लेकिन विवादास्पद लेखक थे. आज वे भारतीय उपमहाद्वीप के ही नहीं, दुनिया के निर्विवाद रूप से महान लेखक हैं. भारतीय साहित्य में लेखकों के योगदान को सहेजने और उन्हें याद किए जाने की परंपरा बहुत उज्ज्वल नहीं है, मंटो ऐसे लेखक भी नहीं थे जो अपने को इतिहास में दर्ज किए जाने के लिए आतुर हों.

ऐसे लापरवाह और बेतरतीब लेखक की प्रासंगिकता और चर्चा वक्त के साथ जैसे बढ़ रही है उससे लगता है कि मंटो में ऐसा कुछ था जिसकी जरूरत हमारी दुनिया में दिनों दिन ज्यादा होती जा रही है.

एक तो भारत का विभाजन एक ऐसी त्रासदी है जिसके जख्म आज भी ताजा और पीड़ादायक हैं. इतिहास के एक दौर में जैसे यह बेतुका विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप की अनिवार्य नियति बन गया, उसकी निरर्थकता और पीड़ा यहां के लोग रोज ब रोज नए सिरे से झेलते हैं.

जब तक यह जख्म है तब तक मंटो की प्रासंगिकता बनी रहेगी क्योंकि विभाजन की त्रासदी और विद्रूप का जैसा दस्तावेज इस अकेले लेखक के लेखन में मिलता है उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता. मंटो की खूबी यह है कि वो एक बहुत आम और अदने नागरिक के नजरिये से इतिहास की इस विराट त्रासदी को देखते हैं. यह बात कहने में बहुत आम लगती है मगर है नहीं.

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साहित्य लेखन एक विशिष्ट कौशल है जिसे किसी भी और कौशल की तरह श्रम और अध्यवसाय से पाया जाता है. लेखक को भाषा और शिल्प की महारत हासिल करनी होती है और एक बौद्धिक स्तर भी अर्जित करना होता है. इन सबसे यह होता है कि वह भले ही आमजन की संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण करता हो, लेकिन वह एक विशिष्ट व्यक्ति या आज की भाषा में कहें तो विशेषज्ञ होता है.

SAADAT HASAN MANTO QUOTES

यह विशेषज्ञता उसमें और आमजन के बीच एक दरार पैदा कर देती है. मंटो की खासियत यह है कि उनमें यह दरार लगभग नहीं है. वे साहित्य की अपेक्षाकृत अभिजात्य दुनिया में एक आम बाहरी आदमी की तरह हैं. उन्हें एक दुर्लभ वरदान हासिल है कि वे एक साथ विशिष्ट, बहुत प्रतिभाशाली लेखक और आम आदमी हो सकते हैं, बिना किसी अंतर्विरोध के. यह गुण उन्हें लगातार ज्यादा प्रासंगिक बना रहा है.

बीसवीं शताब्दी विचारधाराओं के टकराव की शताब्दी थी जिसमें हम तमाम समस्याओं के हल विचारधाराओं मे ढूंढते रहे. इक्कीसवीं शताब्दी आते-आते सारी विचारधाराएं ढह गईं और हमारे सारे वे पैमाने बेकार हो गए जिन पर हम हमारी तमाम परिस्थितियों को और समस्याओं को जांचा करते थे अगर हम आज भी कुछ सत्ताओं और नेताओं को विचारधाराओं की दुहाई देते देखते हैं तो वास्तव में वे नंगी तानाशाही और सत्ताकर्षण को किसी विचारधारा का आवरण ओढाए ही दिखते हैं. विचारधाराओं के व्यर्थ हो जाने के दौर में सिर्फ मंटो जैसा मानवीय विवेक और संवेदनशीलता के नजरिए से देखने वाला लेखक ही सही राह पर दिखता है.

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इसी नजरिए से देखने की वजह से मंटो 'टोबा टेकसिंह' जैसी कहानी और 'स्याह हाशिये' की लघुकथाएं लिख सके. मंटो की अपेक्षाकृत अचर्चित कहानियां वे हैं जो उन्होंने जीवन के अंतिम दौर में लिखी हैं.

उनमें कुछ कहानियां उन फौजियों को लेकर हैं जो विभाजन के पहले एक ही सेना में थे, दोस्त थे और एक साथ मिलकर दुश्मन से लड़ते थे. विभाजन के बाद वे अचानक एक दूसरे की दुश्मन फौजों में हैं. विभाजन के साथ साथ युद्ध के बेतुकेपन पर ये कहानियां जैसा व्यंग्य करती हैं वह मंटो के ही बस की बात है. मंटो के लेखन का एक और हिस्सा जिसे पढ़ा तो खूब गया है लेकिन जिसकी चर्चा कम होती है वह है मंटो के लिखे नामी लोगों के संस्मरण.

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इन्हें सितारा देवी जैसे सितारों के निजी जीवन के बेबाक प्रसंगों के लिए पढ़ा और याद किया जाता है लेकिन चूंकि ये संस्मरण वास्तविक लोगों के बारे में हैं इसलिए इनसे मंटो के व्यक्तित्व को समझने में बहुत मदद मिलती है. इन संस्मरणों में सितारों के निजी जीवन के बारे ऐसी ऐसी सूचनाएं हैं जिनसे उनसे नफरत होने लगे, लेकिन तभी हम पाते हैं कि मंटो उनके बीच कोई उदात्त और मानवीय तत्व खोज निकालते हैं.

संगीतकार रफीक गजनवी का संस्मरण इसके लिए पढ़ा जाना चाहिए. इन संस्मरणों में मंटो की गहरी मानवीय और नैतिक दृष्टि दिखती है जिसमें वे गलाजत, मानवीय कमजोरी और दुख के बीच जीवन की उदात्तता और जीवंतता ढूँढ लेते हैं. हमें कहना होगा कि ऐसी निष्पाप, शुद्ध नैतिक दृष्टि कम ही लेखकों में देखने में आती है.

यह 'नॉन जजमेंटल' जीवंतता मंटो के लेखन को तमाम अंधेरे के बीच एक रोशनी की खोज बना देती है. यह जीवंतता और मानवीयता मंटो को आम आदमी होने से मिलती है जो उनके लेखन को मनहूस नहीं बनने देती. यही रोशनी की किरण मंटो को लगातार प्रासंगिक बनाए रखती है और हमें उनका कृतज्ञ बनाए रखती है.

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