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रिव्यू उपन्यास मदारीपुर जंक्शन : इस जंक्शन पर आती हैं कई कहानियों की ट्रेन्स

‘मदारीपुर जंक्शन’ के जरिए बालेन्दु द्विवेदी सामाजिक बदलाव को बखूबी पकड़ पाए हैं

Updated On: Mar 28, 2018 08:31 PM IST

Hemant R Sharma Hemant R Sharma
कंसल्टेंट एंटरटेनमेंट एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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रिव्यू उपन्यास मदारीपुर जंक्शन : इस जंक्शन पर आती हैं कई कहानियों की ट्रेन्स

चुनावी सरगर्मियां बढ़ चली हैं. सालों में चुप लगाए बैठे दिग्गज राजनीति के अखाड़े में उतने से पहले अंगड़ाई लेते नजर आ रहे हैं. इसी बीच लोकतंत्र की इकाई यानी एक गांव के राजनीतिक समर की व्यंग्य गाथा एक पठनीय उपन्यास के रूप में पाठकों के सामने आ गई है.

देश की राजनीति की झलक देने वाली वह कृति है ‘मदारीपुर जंक्शन’. यह बालेन्दु द्विवेदी का पहला उपन्यास है. जिसे पढ़ते हुए एक पाठक के तौर पर यह यकीन कर पाना कठिन हो जाता है कि लेखक का यह पहला ही उपन्यास है.

भाषा और शैली में वे एक सिद्धहस्त व्यंग्कार की तरह एक मंझे हुए लेखक लगते हैं. उपन्यास पढ़ना शुरू करते ही मन में देश के सामाजिक विविधता वाले किसी भी गांव का चित्र उभर जाता है. लेखक ने उस काल्पनिक गांव को उत्तरप्रदेश में कहीं स्थित बताया है लेकिन उसका चित्रण इतना सटीक है कि पाठक उसे किसी भी गांव के समरूप पा सकता है. एक ऐसा गांव जहां जातिगत राजनीति, वर्ग भेद और समाज के बीच खाई बनाने वाले कई आयाम हैं.

साथ ही यह भी कि आज़ादी के इतने साल बाद भी लोकतांत्रिक मूल्य लोकतंत्र की सबसे पहली कड़ी कही जाने वाली ग्राम पंचायत तक नहीं पहुंचे हैं. यानी लोकतंत्र की गांवों तक की यह यात्रा 21वीं सदी में भी आधूरी रही है.

गांव में परधानी पद का चुनावी घमासान इस उपन्यास का केन्द्रीय घटनाक्रम है. छेदी बाबू और बैरागी बाबू दोनों परधानी के चुनाव में प्रतिद्वंदी हैं. हालांकि दोनों काका-भतीजा के बीच कभी दांत-काटी दोस्ती का रिश्ता रहा है पर अब जानी दुश्मन हैं. एक चवन्नी पट्टी से आते हैं तो दूसरे अठन्नी पट्टी के सबसे कद्दावर नेता हैं. दोनों के अपने अपने स्थायी दरबार भी हैं और दरबारी भी. कुछ एक थाली के बैंगन भी हैं जो दोनों दरबारों में वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं. छेदी बाबू और बैरागी बाबू के अलावा ‘मदारीपुर जंक्शन’ में एक तीसरी दुनिया भी है. यह दुनिया है पिछड़ों और शोषितों की, जिसमें धीरे-धीरे जागरूक हो रही हरिजन टोली और केवटोली है.

Madaripur Juction

छेदी बाबू और बैरागी बाबू के चुनावी घमासान में असली अंतर्विरोध तब आता है जब छेदी बाबू बैरागी बाबू का वर्चस्व कम करने के लिए हरिजन टोली से चइता को चुनावी मैदान में उतार देते हैं. लेकिन पहले चइता विद्रोही तेवर अपनाता है और बाद में उसकी बीवी मेघिया सामाजिक क्रांति का नया स्वर बनती है. यही घटनाक्रम इस उपन्यास की केन्द्रीय विषयवस्तु हैं.

उपन्यास व्यंग्य की विधा में एक सशक्त रचना है इसलिए शुरूआत से ही एक के बाद एक कई रोचक प्रसंग पाठक को गुदगुदाते हुए बांधते जाते हैं. भालू बाबा का ऐसा ही एक प्रसंग आज के बाबाओं की पोल खोलने के काम बखूबी करता है. दरअसल भालू बाबा छेदी बाबू के संरक्षण वाले शिवालय में रहते हैं लेकिन कीर्तन से ज्यादा गांजा क्रांति के लिए बदनाम रहे हैं. उसपर पास के तालाब में स्नान करने वाली महिलाओं को देखकर नयनसुख लेना उनकी दिनचर्या का ज़रूरी हिस्सा रहा है. इसी क्रम में भालू बाबा से एक ऐसी भूल हो जाती है जो कहानी को एक दिशा दे जाती है. अगले प्रसंग में मदारीपुर में आयी मीडिया की टीम को शुरूआत में नसबंदी करने वाली टीम समझने की गफलत भी आजकल के अफवाह कल्चर पर सटीक कटाक्ष है.

यानी बालेन्दु की दिलचस्प किस्सागोई इस उपन्यास को लगातार रोचक बनाती चलती है. नतीजा पाठक मदारीपुर जंक्शन की विराट और सर्वथा प्रासंगिक कथा यात्रा में अचानक खुदको जकड़ा हुआ पाता है. हालांकि उपन्यास का अंत पाठकों को चौंका सकता है क्योंकि थोड़ी-थोड़ी देर में गुदगुदाने वाली यह सुखांत कथा आखिर में एक नाटकीय लेकिन मार्मिक अंत के साथ पाठक को स्तब्ध कर जाती है.

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कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की जड़ों की पड़ताल करता उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ भारतीय ग्रामीण समाज का पठनीय लेखा जोखा है. यहां सवर्णों के शोषण का कुचक्र खुलकर उजागर हुआ है. चइता और मेघिया जहां दलित चेतना के स्वर बनकर उभरते हैं, उनका विद्रोह एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आता है वहीं धार्मिक पाखंड और ब्राह्मणवाद की खोखली हो चली जड़ें छेदी बाबू और बैरागी बाबू की सत्ता का बरगद जमीदोज़ करती नज़र आती हैं.

कुलमिलाकर ‘मदारीपुर जंक्शन’ के जरिए बालेन्दु सामाजिक बदलाव को बखूबी पकड़ पाए हैं और व्यंग्य विधा में हाथ आजमाते हुए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की बेहद पठनीय पड़ताल की है. कहना गलत नहीं होगा कि ‘मदारीपुर जंक्शन’ हिन्दी की व्यंग्य लेखन परंपरा की अत्यंत अपेक्षित रचना है.

 

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