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आरक्षण पर प्रगतिशील बनिए... अमेरिका से सीख लेनी चाहिए

अमेरिका में रिज़र्वेशन सिस्टम को अफरमेटिव ऐक्शन कहते हैं. वहां नस्लीय रूप से भेदभाव झेलनेवाले समूहों को कई जगह बराबर प्रतिनिधित्व के लिए अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Dec 06, 2017 11:23 AM IST

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आरक्षण पर प्रगतिशील बनिए... अमेरिका से सीख लेनी चाहिए

पिछले दिनों दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले एक नेता का वीडियो वायरल हो गया. इसमें वो जाति प्रथा की शुरुआत के पीछे एक नेता को जिम्मेदार बताते हैं. ज्यादातर लोगों ने माना कि इशारों-इशारों में डॉ अंबेडकर की बात हो रही है. हालांकि बाद में सफाई आई कि ये इशारा दरअसल वीपी सिंह और मंडल कमीशन के लिए था. ये तर्क भी गले नहीं उतरता है. क्योंकि कोई भी नहीं मानेगा कि भारत में जाति प्रथा की शुरुआत 1990 के दशक में हुई.

इस तरह के बयान कोई नई बात नहीं हैं. कैमरे पर भले ही ऐसी बातें कम सुनने को मिलती हों, आम ज़िंदगी में अंबेडकर को आरक्षण और जाति वैमनस्य के लिए दोष देने वाले कम नहीं हैं. ऐसी बातों में एक और तर्क होता है कि भारत के सरकारी सिस्टम के पिछड़े होने की बड़ी वजह आरक्षण है, अमेरिका जैसे देश हमसे आगे हैं क्योंकि वहां रिजर्वेशन नहीं होता.

अंबेडकर और जाति की बात करने से पहले रिज़र्वेशन की बात करते हैं. अमेरिका, कनाडा, चीन, फिनलैंड, जर्मनी, इज़रायल और जापान में अलग-अलग तरीकों से आरक्षण मौजूद है. इन नियमों में हर देश की परिस्थिति के चलते कई अंतर भी हैं.

अमेरिका का अफरमेटिव ऐक्शन

मसलन अमेरिका में रिज़र्वेशन सिस्टम को अफरमेटिव ऐक्शन कहते हैं. वहां नस्लीय रूप से भेदभाव झेलनेवाले समूहों को कई जगह बराबर प्रतिनिधित्व के लिए अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं. इस तरीके में भारतीय व्यवस्था की तुलना में कई अंतर हैं. भारत में दलित-ओबीसी आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हैं, जबकि अमेरिका में ऐसे समूह 10-12 प्रतिशत हैं.

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आरक्षण की पेचीदगियों को छोड़िए वापस आते हैं हिंदुस्तान में होने वाले जाति भेदभाव पर. आज के शहरी या अर्धशहरी भारत में किसी से पूछिए कि वो जाति में यकीन रखता है. बिना सोचे समझे जवाब होगा नहीं. इसके समर्थन में लोग अक्सर एक साथ बैठकर खाना खाने का तर्क देते हैं. ये भी कहते हैं कि हमने कभी सामने वाले-वाली का सरनेम भी नहीं पूछा.

दफ्तरों की ये प्रगतिशीलता जाति से ज्यादा बराबरी के कारण आती है. एक दफ्तर में काम करने वाले लोग अमूमन एक जैसे स्तर के ऊपर नीचे होते हैं. एक जैसी जीवनचर्या, रहन-सहन के चलते एक दूसरे के साथ खाना-पीना कोई बड़ी बात नहीं है. मगर अरेंज मैरिज जैसे मामलों में शायद ही कभी ये प्रगतिशीलता दिखती हो. कई सारे प्राइवेट सेक्टरों में उच्च जातियों की अधिकता है, इनमें से ज्यादतर लोग जब किसी नए व्यक्ति का काम के लिए रेफरेंस देते हैं, तो अधिक संभावना होती है कि वो सवर्ण जाति समूह से हो. ऐसा जानबूझ कर न भी किया जाता हो तो फिर भी होता ही है. जिसके चलते बिना चाहे भी एक समूह को ज्यादा मौकै मिलते हैं.

रिज़र्वेशन का विरोध करने वालों की सबसे बड़ी आपत्ति सरकारी नौकरियों पर होती है. भारत में 2011-12 में कुल 1 करोड़ 76 लाख सरकारी नौकरियां थीं. 2017 में ऑनलाइन ऐप्लिकेशन वाली सरकारी नौकरियों की गिनती 60,000 से कुछ ज्यादा थी. 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी में ये आंकड़ा कितना कम है. हम खुद सोच सकते हैं.

अपना-अपना रिजर्वेशन, अपना-अपना मकसद

हकीकत ये है कि रिजर्वेशन वास्तव में जैसा है और इसे जैसे पेश किया जाता है दोनों में बड़ा फर्क है. इसका विरोध करने वाले राजनीति से ज्यादा अक्सर जाति के दंभ के जरिए सियासत करते हैं. इसका समर्थन करने वाले इसको वंचित तबके के इम्पावरमेंट से ज्यादा वोट बैंक बनाए रखने के लिए करते हैं.

2011 जनगणना कहती है कि ग्रामीण एससी-एसटी का मात्र 4 प्रतिशत ही सरकारी नौकरियों में है. बाकी आबादी हाशिए पर रहती है उसके जीवन स्तर को सुधारने के लिए वंचित तबके के ठेकेदार कम ही रुचि दिखाते हैं.

अंबेडकर ने संविधान के जरिए कई सुधार किए. आज जब लोग अपनी हिंदू पहचान का गर्व जताते हुए बहुविवाह, बाल विवाह पर रोक जैसी बातों से दूरी की बात करते हैं तो अंबेडकर को भूल जाते हैं. हिंदू समाज के ये सुधार धर्म से कहीं ज्यादा नेहरू और बाबा साहेब की सोच के चलते हैं.

हिंदुस्तान में जाति हमेशा से रही है. क्रूर तरीके से रही है. हरिजन ऐक्ट जैसे कानूनों के चलते इसकी सार्वजनिक जीवन में अभिव्यक्ति भले ही घट गई हो निजी जीवन में खूब बरकरार है. अखबारों के स्थानीय पन्नों में छपने वाले ‘दलित को घोड़ी चढ़ने पर पीटा’ जैसे समाचार छोड़ दीजिए, सोशल मीडिया पर दलित प्रतीकों की ट्रोलिंग को देख लीजिए.

छोड़िए मायावती की ही बात कर लीजिए. लोग कहते हैं मायावती अपनी पार्टी के टिकट बांटने में चुनाव लड़ने वाले से एक निश्चित पैसा खर्च करवाती हैं. आपने कितने बिज़नेस समूहों, कॉरपोरेट फंडेड कार्यक्रमों में बीएसपी की विचारधारा से जुड़े लोगों को बुलाए जाते, बात करते देखा है. जबकि दूसरी सवर्ण बहुल नेता वाली पार्टियों के लोग अच्छी खासी तादाद में ऐसी जगहों पर मिलते हैं. हो सकता है ये अति सामान्यीकरण हो मगर इसकी जड़ में वो जाति है जो जाती ही नहीं.

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