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पुण्यतिथि विशेष: आधुनिक भारतीय कला में सैयद हैदर रज़ा ने भरे थे रंग

रज़ा का जन्म एक मुस्लिम के तौर पर हुआ लेकिन परवरिश एक भारतीय के तौर पर

Updated On: Jul 23, 2017 02:56 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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पुण्यतिथि विशेष: आधुनिक भारतीय कला में सैयद हैदर रज़ा ने भरे थे रंग

एक दफे मुझे भोपाल में विश्वप्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रज़ा से निजी इंटरव्यू का शुभ संयोग हासिल हुआ. उस वक्त उन्होंने कहा था, 'नौजवानों, खासकर कलाकारों को मेरी एक ही सलाह है कि वे दुनिया घूमें. लेकिन आपको अपनी जड़ों की भी पूरी जागरूकता से खोज करनी चाहिए. अगर आप ऐसा कर सके तो फिर आपको संतोषप्रद जीवन का सार मिल जाएगा.'

आज यानी 23 जुलाई को हम रज़ा साहब को उनकी पहली पुण्यतिथि पर याद कर रहे हैं. उनका पूरा जीवन (1922-2016) इस बात का साक्ष्य है कि उन्होंने अपनी इस सलाह का खुद ही मनोयोग से पालन किया. कला की अपनी उत्कंठा को शांत करने के लिए वे अक्टूबर 1950 में भारत छोड़कर फ्रांस चले गए. तब उनकी उम्र 28 साल थी.

रज़ा की जीवन-कथा

रजा की जीवन-कथा खुद में साहसिक खोज पर निकले किसी मुसाफिर के यात्रा-वृतांत से कम नहीं. मध्यप्रदेश के दमोह शहर के नजदीक एक गांव बाबरिया में 22 फरवरी 1922 को जन्म हुआ था रज़ा साहब का.

पिता फारेस्ट रेंजर थे और रज़ा साहब ने 12 साल की उम्र में चित्र बनाने के लिए तूलिका उठायी थी. दमोह के सरकारी स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका दाखिला नागपुर आर्ट स्कूल में हुआ. इसके बाद मुंबई के मशहूर सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में. नियति ने एक तरह से उनकी राह तैयार करना शुरू कर दिया था. उन्हें आने वाले वक्त में देश के कला के इतिहास में मील के पत्थर की तरह दर्ज होना था.

वह 1940 का दशक था, मध्यभारत के अनजान से गांव के नौजवान सैयद हैदर रज़ा के मन में पेरिस जाने का सपना बसा था. उन्होंने साहस किया और यह सपना साकार हुआ-वे कला की नगरी पेरिस पहुंचे.

उन्होंने पेरिस में अपना घर बसाया, फ्रेंच चित्रकार जानिन मोंगिया से शादी की. बाद की पीढ़ी के जितने भी भारतीय कलाकार करियर बनाने के लिहाज से पेरिस पहुंचे, सबकी मदद की. पेरिस में उन्होंने 60 साल बिताए लेकिन उनकी रगों में दौड़ने वाली प्राचीन भारत की भाव-राशि में रत्ती भर की कमी नहीं आई. वे 2010 में भारत लौटे, इस सचेत इच्छा के साथ कि जिंदगी के आखिर के साल अपनी मातृभूमि में बिताने हैं.

कैसा रहा सफर?

बतौर कलाकार रज़ा ने बड़ी ऊंचाई का मुकाम हासिल किया है. उनके बनाए चित्र रिकार्ड दामों पर बिके. वे आधुनिक भारतीय कला के उन चंद उस्तादों में शामिल हैं जिनका सिक्का भारतीय कला-बाजार के 80 फीसदी हिस्से में चलता है.

2010 में क्रिस्टी की एक नीलामी में रज़ा का कैनवास पर एक्रीलिक से रचा सौराष्ट्र नाम का चित्र तकरीबन 16.51 करोड़ रुपए में बिका. उस वक्त तक बिकी भारतीय पेंटिंग्स में सबसे बेशकीमती चित्र के रूप में दर्ज हुआ.

इस चित्र की गिनती अब भी भारतीय चित्रकारों की बनाई 10 सबसे महंगी कृतियों में होती है. हालांकि रज़ा का बनाया एक और चित्र- ला टेरे (धरती) 2014 में 18.61 करोड़ रुपए में बिका. यह अब तक के सबसे मंहगे भारतीय चित्रों में चौथे नंबर पर है. 1947 में रज़ा प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के सह-संस्थापक बने.

भारत की आजादी के तीन साल बाद वे एक स्कॉलरशिप पर पेरिस के इकोल नेशनल सुपीरियर डी बुजां में पढ़ाई के लिए पहुंचे, लेकिन भारत से उनका संपर्क बना रहा, अपनी जड़ों से वे जुड़े रहे.

क्या था रज़ा का खास गुण?

पद्मविभूषण से अलंकृत रज़ा में एक और विशेष गुण था जिसे हासिल कर पाना बहुत से भारतीयों के लिए कठिन है. उनका जन्म एक मुस्लिम के तौर पर हुआ लेकिन परवरिश एक भारतीय के तौर पर. इसी कारण जब अपनी कला के लिए राह खोजने की बात आई तो प्राचीन भारतीय दर्शन के सागर में गोते लगाने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हुई.

उनकी परवरिश उदार वातावरण में हुई थी और अपनी इसी परवरिश से उन्होंने जाना था कि वे ग्रंथ भारतीय हैं, उन्हें सिर्फ हिन्दुओं का ग्रंथ नहीं कहा जा सकता. उन्होंने प्राचीन भारतीय दर्शन के ग्रंथ उपनिषदों में वर्णित शून्यता की धारणा को रंग और आकार दिया और इस तरह उनकी अमूर्त कला को विश्व भर में प्रसिद्धि मिली.

भारतीय दर्शन से गहरा नाता

बिंदु-श्रृंखला के उनके चित्र प्राचीन भारतीय दर्शन से उनके गहरे राग का परिचय देते हैं. उन्होंने बिंदु की रचना के जरिए शून्यता की धारणा को अभिव्यक्त किया. अपनी जड़ों के प्रति वे बहुत सजग थे.

मध्यप्रदेश से आए कलाकारों की मदद के लिए उनके मन में गहरा संकल्प था. इसी संकल्प का मूर्त रूप है रज़ा फाउंडेशन. यह फाउंडेशन सिर्फ दृश्य कला ही नहीं बल्कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत को भी बढ़ावा देने का सराहनीय काम कर रहा है. बतौर पत्रकार मैं उन कलाकारों के करियर के परवान चढ़ने का गवाह रहा हूं जिन्हें इस फाउंडेशन से सहायता हासिल हुई.

मॉडर्न आर्ट की शुरुआत

रज़ा ने ही एम.एफ. हुसैन, वी एस गयतोंडे, अमृता शेरगिल, तैयब मेहता तथा एन.एन. डीसूजा जैसे विश्वप्रसिद्ध चित्रकारों के साथ मिलकर वह नींव तैयार की. इसी बिनाह पर आज भारतीय कह सकते हैं कि उनका मॉडर्न आर्ट सचमुच उनका अपना है, किसी और राष्ट्र की कला की नकल नहीं.

इन चित्रकारों ने संघर्ष का जीवन जिया लेकिन आधुनिक भारतीय कला का महल खड़ा बनाने की अपनी कोशिशों से वे जरा भी नहीं डिगे. इनमें से अधिकतर कलाकारों को अपनी सफलता का आनंद उठाने का पूरा अवसर नहीं मिला. लेकिन हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि अपने जीवन-काल के ज्यादातर वक्त में ये कलाकार अपनी कला-रचना के प्रति सच्चे और ईमानदार रहे.

हालांकि उन दिनों उनके कला का कोई ग्राहक नहीं हुआ करता था. सैयद हैदर रज़ा ऐसे ही विरले कलाकारों में एक थे और हमारे लिए उनके जीवन से बहुत कुछ सीखना शेष है.

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